Thursday, August 19, 2010

इस दौर की ‘फूहड़ता’ में साफ सुथरी ऑडियो एलबम है ‘रवांई की राजुला’

       नवोदित भागीरथी फिल्मस ने ऑडियो एलबम ‘रवांई की राजुला’ की प्रस्तुति के जरिये पहाड़ी गीत-संगीत की दुनिया में अपना पहला कदम रखा। विनोद बिजल्वाण व मीना राणा की आवाज में लोकार्पित इस एलबम से विनोद ‘लोकगायक’ होने की काबिलियत साबित करते हैं। कैसेट में संगीत वीरेन्द्र नेगी है, जबकि गीत स्वयं विनोद ने ही रचे हैं।
विनोद अपने पहले ही गीत ‘बाड़ाहाट मेळा’ में ‘लोक’ के करीब होकर रवांई के सांस्कृतिक जीवन पर माघ महिने के असर को शब्दाकिंत करते हैं। जब ‘ह्यूंद’ के बाद ऋतु परिवर्तन के साथ ही रवांई का ग्राम्य परिवेश उल्लसित हो उठता है। बाड़ाहाट (उत्तरकाशी) का मेला इस उल्लास का जीवंत साक्ष्य है। जहां लोग ‘खिचड़ी संगरांद’ के जरिये न सिर्फ नवऋतु का स्वागत करते हैं,
बल्कि उनके लिए यह मौका अपने इष्टदेवों के प्रति आस्थाओं के अर्पण का भी होता है। रांसो व तांदी की शैली में कैसेट का पहला गीत सुन्दर लगता है। यों ‘ढफ’ पहाड़ी वाद्‍य नहीं, फिर भी इस गीत में ढफ का प्रयोग खुबसुरत लगता है।
ढोल-दमौऊं की बीट पर रचा एलबम का दूसरा गीत ‘ऋतु बसन्त’ पहाड़ों पर बासन्तिय मौल्यार के बाद की अन्वार का चित्रण है। ऐसे में पहाड़ों की नैसर्गिक सौंदर्य के प्रति ‘उलार’ उमड़ना स्वाभाविक ही है। ‘स्वर’ के निर्धारण में बढ़े हुए स्केल का चयन अखरता है। हां यह गीत रचना के लिहाज से निश्चित ही उमदा है। कई बार खुद को प्रस्तुत करने की ‘रौंस’ में कलाकार लय की बंदिशों को भी अनदेखा कर डालता है। ‘सुरमा लग्यूं छ’ में विनोद ने भी यही भूल की है। क्योंकि नई पीढ़ी के माफिक इस गीत में गुंजाइशें काफी थी। चौथा गीत ‘मेरा गौं का मेळा’ सुनकर अनिल बिष्ट के गाये गीत ‘ओ नीलिमा नीलिमा’ याद हो उठता है। कुछ-कुछ धुन, शब्दों व शैली का रिपीटेशन इस गीत में भी हुआ है। शीर्षक गीत होने पर भी इसमें रवांई की छवि गायब है। कैसेट का पांचवां गीत ‘माता चन्द्रबदनी’ की वन्दना के रूप में भगवती के पौराणिक आख्यानों को प्रकाशित कर देवयात्रा का आह्‍वान करता है। यह रचना उत्तराखण्ड प्रदेश में धार्मिक पर्यटन की संभावनाओं को भी सामने रखती है।
अतिरेक हमेशा प्रेम पर हावी होता है। ‘तेरी सुरम्याळी आंखी’ में भी प्रेम की जिद और उस पर न्यौछावर होने की चाहत गीत का भाव है। जहां बांका मोहन से मन की प्यारी राधा का नेह मोहक है। अधिकांश साफ-सुथरा होने बावजूद गीत के बीच में एक जगह ‘हाय नशीली ज्वानि’ का शब्दांकन इसके सौंदर्य पर दाग लगाता है। गीतकार को इससे बचने की कोशिश करनी चाहिए।
सुरूर पर यदि साकी का नशा तारी हो जाये तो उकताट, उतलाट बुरा भी नहीं। कुछ इसी अंदाज को बयां करता ‘फूली जाला आरू’ गीत रांसो ताल मे सुन्दर बना है। हालांकि यहां हुड़का अपने पारम्परिक कलेवर से जुदा है। नेपाली शैली में गिटार के बेहतर स्ट्रोक और धुन के लिहाज से विनोद के मिजाज से बिलकुल जुदा, कैसेट के आखिरी में शामिल ‘कै गौं की छैं तु छोरी’ गीत एलबम के शुरूआती दो गीतों के साथ तीसरी अच्छी प्रस्तुति है। कोरस के स्वरों में ‘हो दाज्यू’ का उद्‍घोष कर्णप्रिय है। इस गीत में विनोद ने अपने वास्तविक ‘स्वर’ का प्रयोग किया है।
पूरे गीत संकलन के निष्कर्ष में यही निकलता है कि ‘रवांई की राजुला’ में विनोद जहां तुकबन्दी के लिए नये छंदों को तलाशने में कमजोर दिखे हैं तो, अधिकांश गीतों में ‘आटो टोन’ का प्रयोग गीत और श्रोता के बीच के प्रवाह को भी नीरस बनाता है। हालांकि इस दौर की ‘फूहड़ता’ में ‘रवांई की राजुला’ साफ सुथरी एलबम है। जिसका श्रेय विनोद के साथ ही नवोदित भागीरथी फिल्मस् को भी दिया जाना चाहिए।
Review By - Dhanesh Kothari

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