30 December, 2016

गुलज़ार साहब की कविता "गढ़वाली" में

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लोग सै ब्वळदिन,
ब्यठुला हैंकि बानि का
उलखणि सि हुंदिन ।

सर्या राति फस्सोरिक नि सिंदिन,
कभि घुर्यट त कबरि कणट कनि रंदिन,
अद्निंदळ्यामा भि कामकाजा कु
स्या पट्टा लेखिक,
लाल पिंग्ळि पिठै लगैकि,
दिनमनि मा ब्यौ बरि
उर्याणि रंदिन पुर्याणि रंदिन ।

द्वार मोर का च्यौला, चटगण,
गोलण, संगुळि,
ननातिनों का तींदा कयां
सलदरास, गत्यूड़ अर गद्यलि,
अर छ्वारों कु बब्बा कु कळग्यसरु मन,
जपकाणि रैंद, द्यखणि  रैंद, मलसणि रैंद,
अर सुबेर तक उणिंदि रैंद ।
तबि त निंदि म वा,
भजणि रैंद, भजणि रैंद, भजणि रैंद ।

निंद भूख हर्चैकि भि किळै
तणतणि सि हुंदिन ।
सचै, ब्यठुला भि बक्कि बाता का
उलखणि सि हुंदिन ॥

बथौं सि चक्करापति ख्यलणि रैंद ।
उबरि चुलू फर, उबरि गुठ्यारम,
त उबरि सग्वड़म, उबरि स्यारम ।
छन्छ्या का भदलुंद,
बक्ळा गीत थड़काणि रैंद ।
अर लड़बड़ि छुयूं का दगड़ा दगड़ि,
हारु लूण रळाणि रैंद ॥
कभि चम्म खड़ि ह्वै जांद,
रोज दिनमान दगड़  झमडा-झमड
खड़ाखड़ि ह्वै जांद ।
चौका खळ्याणम तुड़ाबुड़ि ह्वै जांद ।

अफु थैं अफु से प्वारम छटकैकि,
जिकुड़ियूं का नजीक चिनगरि सि,
सुलगणि सि रंदिन ।
सचै ब्यठुला मुलैम धुवां जन
उलखणि सि हुंदिन ॥

अधकचा, अधपका, नरनरा स्वीणा,
अधबिचम छट्ट छोड़ि दींद द्यखणु ।
अर झट्ट भाजि जांद,
द्यखणा को दूधा को उमाळ ।
क्वी काम पुरै नि सकदि,
अधबिचमै खरा खोजम लग जांद ।
नौना बाळौ का सुलार कुरता,
पाटि, ब्वळख्या, कम्यड़ू, घ्वट्या ।
इच्चि दुच्चि, गारा  बट्टा अर
ब्यौलि ब्याला ।
फुल्यरा ज्वनि  का वो
ग्वीरळ्या, सकन्यळ्या फूल ।

मैता  का जळ्वठों अंयरों मा लुकयां,
अरसौं का कत्तर, भ्यलि की डैळि,
लुका चोरि कि वा कूंणि क्वलणि
अर ड़ंड्यलि तैलि मैलि ।
रुंदि हैंसदि दीदि भुल्यूं को
वो सिंपल्यण्या प्यार,
अर चौंठा मा कि भुक्की ।
दगड़यों दगड़ सांट बांट मा दिंया लिंया,
कौपि किताब, रबड़ पिनसन,
वा दवात, वा स्या कि टिक्की ।

कभि द्वार उगड़ै त कभि द्वार ढकै,
क्य कनि छे हे छोरी?
हे से गेई, ऐग्याइ त्वै निंद,
खाणि रैंद बगत कुबगत ट्वकै ।

न अक्वैकि ज्यूंदि रैंद,
न अक्वैकि मोरि सकद,
यकुंलास मा रै कै भि सबुकि
आस बिसवास बणि सि रंदिन ।
सचै ब्यठुला भि अपणु ज्यू मार मारिक
उलखणि सि हुंदिन ॥

कत्गै दां द्यखिन सबुन,
चूड़ि फूंदा बिन्दी झुम्का झमकै कि,
अर गळ्वड़ियूं बौंफुर फर प्वण्यां
नील चिर्वड़ा लुकै कि,
स्या सिपै दादा की नौनि जैंती
स्या हलकर्या चैती
स्या बौ, भुलि अर दीदी ।

तिड़्यां फ्यफ्नौं का बग्दान
धोति लब्बी कैकि लुकाणि रैंद
वा लौबाणि की मासट्यनि
कबरि कबरि दिखै जांद,
जब इसकोला कि फैड़्यूं मा
अपणि खुट्टि अळगांद ।

नंग पुटुग आटु निख्वळदा,
सुबेर-सुबेर पाणिम छपत्वळे कै
सळा बळिम असपताळकि
डाकट्यनि दीदी,
सर्या दिनमान म्वरण बचणा कि
क्युंकळ्या छुवीं सि
अर सर्या सर्या राति मटखणि सि हुंदिन ।
सचै ब्यठुला भि घंघत्वळ्या अर
उलखणि सि हुंदिन ॥

बसगळ्या बरखा रुड़्यूं मा
ह्यूं प्वड़्यूं ह्वालु जन कूड़्यूं मा
पोतळ लुकै कि हथग्वळ्यूं का बीच,
स्वचणि रैंद जिंदगि खैचणि रैंद ।

जब जग्वळ्दा जग्वळदा चौमास आंद,
दणमण दणमण कैकि याद
दणमणै जांद,
उडिला थड़्या चौंफला भि हवा दगड़,
खित हैंसिकै मयळ्दु गीत सुणै जांद ।
तब या भग्यान
सुखिला लारौं, अगिला क्याड़ौं,
घमयां बिसौण
अर धोति झुल्लौं बट्वळणा को
बरखा का दीड़ौ मा दौड़ जांद ।
सबि धाणि, एक एक बिंया दाणि,
समलणि सि रंदिन ।
सचै ब्यठुला भारि उल्यरु
अर उलखणि सि हुंदिन ॥

क्वी द्वि बत्था प्यार पिरेम की
क्य बोलि दींद ।
या जिकुड़ि का सब्या द्वार मोर
खोलि दींद ।
साक्यूं कि लड़ै झगड़ौ थैं
बांजा सग्वड़ा पत्वड़ौ थैं
ग्वडणि सि न्यलणि सि रंदिन ।
सचै ब्यठुला भारि जिमदन
अर उलखणि सि हुंदिन ॥

बार, त्यौहार, बरत, रिवाज
निभाणि रैंद ।
रौलि गदन्यूं मा सि
गदनि नयरि मा सि
समाणि रैंद ।
जिंदगि की आंख्यूं मा
छ्वट छ्वटा दिन,
बड़ि बड़ी रात्यूं मा,
हौरि  क्वी अटकै सकद कभि
आंसु पिंडळा का पात्यूं मा ।
सदनि जुग जुग बटैकि
काजोळ गंगाजल छळकणि सि रंदिन ।
सचै ब्यठुला लौंकदि कुऐड़ि जन
उलखणि सि हुंदिन ।।

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अनुवादक- पयाश पोखड़ा

प्रख्‍यात साहित्‍यकार गुलज़ार साहब द्वारा लिखी किताब The longest short story of my life with grace की एक कविता का एक अंश ....।
हमारे जीवन में ख़ुशी, समर्पण और प्रेम बरसाने वाली हर महिलाओं को सादर समर्पित इस कविता के एक अंश का गढबोलि में रूपान्तरण का प्रयास किया है, लोकभाषा के स्‍वनाम धन्‍य साहित्‍यकार ''पयाश पोखड़ा जी'' ने।

अनुवादित कविता का हिंदी अंश --

लोग सच कहते हैं -
औरतें बेहद अजीब होतीं है

रात भर पूरा सोती नहीं
थोड़ा थोड़ा जागती रहतीं है
नींद की स्याही में
उंगलियां डुबो कर
दिन की बही लिखतीं
टटोलती रहतीं है
दरवाजों की कुंडियां
बच्चों की चादर
पति का मन..
और जब जागती हैं सुबह
तो पूरा नहीं जागती
नींद में ही भागतीं है

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं
हवा की तरह घूमतीं, कभी घर में, कभी बाहर...
टिफिन में रोज़ नयी रखतीं कविताएँ
गमलों में रोज बो देती आशाऐं

पुराने अजीब से गाने गुनगुनातीं
और चल देतीं फिर
एक नये दिन के मुकाबिल
पहन कर फिर वही सीमायें
खुद से दूर हो कर भी
सब के करीब होतीं हैं

औरतें सच में, बेहद अजीब होतीं हैं
कभी कोई ख्वाब पूरा नहीं देखतीं
बीच में ही छोड़ कर देखने लगतीं हैं
चुल्हे पे चढ़ा दूध...

कभी कोई काम पूरा नहीं करतीं
बीच में ही छोड़ कर ढूँढने लगतीं हैं
बच्चों के मोजे, पेन्सिल, किताब
बचपन में खोई गुडिया,
जवानी में खोए पलाश,

मायके में छूट गयी स्टापू की गोटी,
छिपन-छिपाई के ठिकाने
वो छोटी बहन छिप के कहीं रोती...

सहेलियों से लिए-दिये..
या चुकाए गए हिसाब
बच्चों के मोजे, पेन्सिल किताब

खोलती बंद करती खिड़कियाँ
क्या कर रही हो?
सो गयी क्या ?
खाती रहती झिड़कियाँ

न शौक से जीती हैं ,
न ठीक से मरती हैं
सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

कितनी बार देखी है...
मेकअप लगाये,
चेहरे के नील छिपाए
वो कांस्टेबल लडकी,
वो ब्यूटीशियन,
वो भाभी, वो दीदी...

चप्पल के टूटे स्ट्रैप को
साड़ी के फाल से छिपाती
वो अनुशासन प्रिय टीचर
और कभी दिख ही जाती है
कॉरीडोर में, जल्दी जल्दी चलती,
नाखूनों से सूखा आटा झाड़ते,

सुबह जल्दी में नहाई
अस्पताल मे आई वो लेडी डॉक्टर
दिन अक्सर गुजरता है शहादत में
रात फिर से सलीब होती है...

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं

सूखे मौसम में बारिशों को
याद कर के रोतीं हैं
उम्र भर हथेलियों में
तितलियां संजोतीं हैं

और जब एक दिन
बूंदें सचमुच बरस जातीं हैं
हवाएँ सचमुच गुनगुनाती हैं
फिजाएं सचमुच खिलखिलातीं हैं

तो ये सूखे कपड़ों, अचार, पापड़
बच्चों और सारी दुनिया को
भीगने से बचाने को दौड़ जातीं हैं...

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

खुशी के एक आश्वासन पर
पूरा पूरा जीवन काट देतीं है
अनगिनत खाईयों को
अनगिनत पुलों से पाट देतीं है.

सच है, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं ।

ऐसा कोई करता है क्या?
रस्मों के पहाड़ों, जंगलों में
नदी की तरह बहती...
कोंपल की तरह फूटती...

जिन्दगी की आँख से
दिन रात इस तरह
और कोई झरता है क्या?
ऐसा कोई करता है क्या?

सच मे, औरतें बेहद अजीब होतीं हैं..

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रचनाकार- गुलज़ार

25 December, 2016

समझौता-विहीन संघर्षों की क्रांतिकारी विरासत को सलाम


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तेइस अप्रैल, 1930 को बिना गोली चले, बिना बम फटे पेशावर में इतना बड़ा धमाका हो गया कि एकाएक अंग्रेज भी हक्के-बक्के रह गये, उन्हें अपने पैरों तले जमीन खिसकती हुई-सी महसूस होने लगी। इस दिन हवलदार मेजर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में रॉयल गढ़वाल राइफल्स के जवानों ने देश की आजादी के लिए लडऩे वाले निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया। अंग्रेजों ने तो पठान स्वतंत्रता सेनानियों के विरूद्ध गढ़वाली फौज को उतारा ही इसलिये था कि हिंदू-मुस्लिम विभाजन का बांटो और राज करोखेल जो वे 1857 के ऐतिहासिक विद्रोह के बाद से इस देश में खेलते आये थे, उसे वे पेशावर में एक बार फिर सरंजाम देना चाहते थे।

लेकिन 23 अप्रैल, 1930 को पेशावर में हुई इस घटना को इस तरह पेश किया जाता है जैसे कि गढ़वाली सिपाहियों ने क्षणिक आवेश में आकर यह कार्यवाही कर दी हो। जबकि वास्तविकता यह है कि यह क्षणिक आवेश में घटित घटना या कांड नहीं था। यह एक सुविचारित विद्रोह था जिसकी तैयारी चन्द्र सिंह गढ़वाली और उनके साथी काफी अर्से से कर रहे थे। अंग्रेजी फौज में भर्ती होने से पूर्व चन्द्र सिंह की कोई विधिवत शिक्षा नहीं हुई थी। गरीब परिवार में 24 दिसंबर, 1891 को जन्मे लड़के के पिता यदि पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा गाय-भैंस चराने को महत्वपूर्ण समझते थे तो यह कोई अचरज की बात नहीं थी। घर से भागकर वह फौज में भर्ती हुए। अंग्रेज पढ़ाई-लिखाई तो कराते थे पर हिंदी रोमन लिपि में लिखवाते थे। ऐसा इसलिये क्योंकि अनपढ़ सिपाही यदि देवनागिरी लिपि पढऩा सीख जायेगा तो देश के अखबारों में अंग्रेजों के विरूद्ध हो रही उथल-पुथल को पढ़कर जानने लगेगा। (आश्चर्यजनक यह है कि रोमन लिपि मंप हिंदी यानि अंग्रेजी में हिंदी लिखने का कायदा हमारी फौजों में अब भी कायम है) फ्रांस, मैसोपोटामिया (अब ईराक) आदि की लड़ाइयों के दौरान ही अंग्रेजों के बर्ताव से चन्द्र सिंह को अपने गुलाम होने का बोध होने लगा था।

फौज में रहते हुए ही जब वे देवनागिरी लिपि सीख गये तो उन्होने हिंदी अखबार पढऩा शुरू किया। पेशावर में तैनाती के दौरान भी पकड़े जाने का खतरा उठाते हुए चन्द्र सिंह अखबार खरीदकर लाते, अपने साथियों के साथ रात में दरवाजे पर कंबल लगाकर उसे पढ़ते और सबेरा होने से पहले पानी में गलाकर नष्ट कर देते थे। इसलिये पेशावर में पठानों पर गोली चलाने के लिये भूमिका बनाते हुए अंग्रेज अफसर ने जब यह समझाना चाहा कि पेशावर में 94 फीसदी मुसलमान हैं, दो फीसदी हिंदू हैं। मुसलमान हिंदू की दुकानों को आग लगा देते हैं, लूट लेते हैं। शायद हिन्दुओं को बचाने के लिये हमें बाजार जाना पड़े और इन बदमाशों पर गोली चलानी पड़े’’

तो चन्द्र सिंह ने अपने साथियों को समझाया कि इसने जो बातें कही हैं सब झूठ हैं। हिंदू-मुसलमान के झगड़े में रत्ती भर सच्चाई नहीं है। न ये हिंदुओं का झगड़ा है न मुसलमानों का। झगड़ा है कांग्रेस और अंग्रेज का। जो कंाग्रेसी भाई हमारे देश की आजादी के लिये अंग्रेजों से लड़ाई लड़ रहे हैं, क्या ऐसे समय में हमें उनके ऊपर गोली चलानी चाहिये? हमारे लिये गोली चलाने से अच्छा यही होगा कि अपने को गोली मार लें।’’ यानि जिस दौरान अंग्रेज निहत्थे स्वतंत्रता संग्रामी पठानों पर गोली चलवाने का षडय़ंत्र रचना शुरू कर रहे थे, तब तक चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथी भी पेशावर में निहत्थों पर गोली न चलाने के अपने विद्रोही दृढ़ निश्चय पर पहुंच चुके थे। अंग्रेज स्वयं इस विद्रोह के महत्व और इसके संभावित परिणाम के खतरे को भांप चुके थे।

वे जानते थे कि यदि इस घटना की व्यापक चर्चा हुई तो गढ़वाली पल्टन से उठी ये बगावत की चिंगारी पूरी अंग्रेजी फौज के हिंदुस्तानी सैनिकों में आग की तरह फैल जायेगी। इसलिये जब चन्द्र सिंह और उनके साथियों पर मुकदमा चलाया गया तो 23 अप्रैल को गोली न चलाने का मुकदमा नहीं चला। बल्कि 24 अप्रैल की हुक्म उदूली का मुकदमा चलाया गया। 24 अप्रैल, 1930 को अंग्रेजों ने फिर गढ़वाली पल्टन को पेशावर में उतारना चाहा। परंतु चन्द्र सिंह ओर उनके साथियों की कोशिशों के चलते उनकी बटालियन बैरकों से बाहर ही नहीं निकली। हालांकि इस हुक्म उदूली में पूरी बटालियन शामिल थी लेकिन कोर्ट मार्शल की कार्यवाही उन 67 सैनिकों के खिलाफ हुई जिन्होने ”24 घंटे के भीतर इस्तीफा मंजूर हो’’, लिखे कागज पर हस्ताक्षर किये थे। इन 67 में से भी सात सरकारी गवाह बन गये तो कोर्ट मार्शल में 60 ही लोगों को सजा हुई थी।


पेशावर में गढ़वाली पल्टन द्वारा किया गया विद्रोह भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसके महत्व को कमतर करने की अंग्रेजों ने भरसक कोशिश की। परंतु आश्चर्यजनक तो यह है कि हमारे स्वाधीनता आंदोलन के बड़े नेताओं ने भी इसे कमतर ही आंका है। इस घटना के महत्व को रेखांकित करते हुए 8 जून, 1930 के लीडर ने समाचार छापा कि ”1857 के बाद बगावत के लिये भारतीय सिपाहियों का पहला कोर्ट मार्शल आजकल एबटाबाद के पास काकुल में हो रहा है।’’ यानि अखबार तो पेशावर विद्रोह को 1857 के बाद का सबसे बड़ा सैनिक विद्रोह आंक रहे थे। परंतु अहिंसा की माला जपने वाले स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े नेताओं ने भी इसे अंग्रेजों की तरह ही अपराध समझा।

फ़्रांसिसी पत्रकार चार्ल्स पैत्राश द्वारा गढ़वाली सिपाहियों के बारे में पूछे गये सवाल का जवाब देते हुए गांधीजी ने कहा था कि वह सिपाही जो गोली चलाने से इंकार करता है, अपनी प्रतिज्ञा भंग करता है, इस प्रकार वह हुक्म उदूली का अपराध करता है। मैं अफसरों और सिपाहियों से हुक्म उदूली करने के लिये नहीं कह सकता। जब हाथ में ताकत होगी, तब शायद मुझे भी इन्हीं सिपाहियों से और अफसरों से काम लेना पड़ेगा। अगर मैं इन्हें हुक्म उदूली करना सिखाऊंगा तो मुझे भी डर लगा रहेगा कि मेरे राज में भी वे ऐसा ही न कर बैठें।’’ यानि अंग्रेजों की फौज के प्रति की गयी प्रतिज्ञा को तो गांधीजी महत्वपूर्ण मान रहे थे, परंतु देश की आजादी के निहत्थे मतवालों पर गोली न चलाकर अपनी जान को खतरे में डालने के गढ़वाली सैनिकों के अदम्य साहस की उनकी निगाह में कोई कीमत नहीं थी।

अहिंसा के अनन्य पुजारी आजादी के संग्राम में इन सिपाहियों के योगदान को नकारते हुए इस बात के लिये अधिक चिंतित थे कि सत्ता हाथ में आने के बाद उनके कहने पर भी ये सिपाही निहत्थी जनता पर गोली न चलाये तो क्या होगा? पर सैन्य विद्रोह को कमतर आंकने या उन्हें नकारनें की यह प्रवृति सिर्फ पेशावर विद्रोह के प्रति ही नहीं है। बल्कि 1946 में हुये नौसैनिक विद्रोह के प्रति भी गांधीजी, पटेल आदि नेताओं का यही उपेक्षापूर्ण रवैया था। नौसेना विद्रोह के नाविकों को तो पटेल ने गुंडातक कहा था। साहित्यकारों ने अलबता इन विद्रोहों के उचित महत्व को रेखांकित किया था।

जहां पेशावर विद्रोह के नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली की जीवनी राहुल सांकृत्यायन ने लिखी, वहीं नौसैनिक विद्रोह पर साहिर लुधियानवी ने लंबी कविता लिखी: ऐ रहबरे मुल्को कौम बता ये किसका लहू है कौन मरा.

न केवल पेशावर विद्रोह की महत्ता को नकारा गया बल्कि यह भी भरसक कोशिश की गयी कि इस विद्रोह के नायक चन्द्र सिंह गढ़वाली की राजनैतिक भूमिका और विचारधारा को छुपाया जाये। यह आजादी के आंदोलन का इतिहास लिखने की कांग्रेसी शैली रही है कि आजादी के आंदोलन का इतिहास या तो कांग्रेस का इतिहास नजर आता है या अंग्रेजों का इतिहास। पेशावर में तैनाती से पहले ही 1922 के आस-पास चन्द्र सिंह आर्य समाज के निकट आ गये थे। आर्य समाज के प्रभाव में वह ऊंच-नीच, बलि प्रथा, फलित ज्योतिष आदि धार्मिक पाखंडों के विरोधी हो गये थे।

चंद्र सिंह गढ़वाली के बारे में यह भी पढ़ें
आर्य समाज द्वारा किये गये देश भक्ति के प्रचार का भी उन पर प्रभाव था। पेशावर विद्रोह के लिये काले पानी की सजा पाने के बाद विभिन्न जेलों में यशपाल, शिव वर्मा, रमेश चंद्र गुप्त, ज्वाला प्रसाद शर्मा जैसे कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के साथ रहते हुए साम्यवाद से उनका परिचय हुआ और धीरे-धीरे चन्द्र सिंह गढ़वाली का साम्यवाद की और झुकाव हुआ। गढ़वाल प्रवेश पर प्रतिबंधकी शर्त पर जब उनकी रिहाई हुई तो महात्मा गांधी के वर्धा आश्रम सहित विभिन्न स्थानों पर रहते हुए वह बंबई स्थित कम्युनिस्ट पार्टी के कम्यून में पहुंचे और विधिवत पार्टी सदस्य बने। वहां से रानीखेत में पार्टी का काम करने उन्हें भेजा गया। जहां अकाल, पानी की समस्या समेत विभिन्न सवालों पर उन्होने आंदोलन चलाया। गढ़वाल प्रवेश पर से प्रतिबंध हटने तथा अंग्रेजों के देश से चले जाने के बाद भी गढ़वाल में अकाल, पोस्ट ऑफिस के कर्मचारियों की हड़ताल, सड़क, कोटद्वार के लिये दिल्ली से रेल का डिब्बा लगे ऐसे तमाम सवालों पर उन्होंने आंदोलन किए। कम्युनिस्ट पार्टी के निर्देश पर कामरेड नागेंद्र सकलानी टिहरी राजशाही के विरुद्ध लड़ाई तेज करने कीर्तिनगर पहुंचे.

यहां 11 जनवरी, 1948 को सकलानी के साथ ही मोलू भरदारी की भी शहादत हुई। मोलू भरदारी भी कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार सदस्य थे। इन दोनों शहीदों के मृत शरीरों को लेकर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में जनता नें टिहरी मार्च किया। ये शहादत टिहरी राजशाही के ताबूत में अंतिम कील सिद्ध हुई। यानि 1930 में हुये पेशावर विद्रोह से लेकर 1979 में जीवन के अंतिम क्षण तक चंद्र सिंह गढ़वाली निरंतर स्वाधीनता आंदोलन से लेकर तमाम जन संघर्षों में शामिल रहे। इसमें जेलों के भीतर की अव्यवस्था और राजनैतिक बंदियों के लिये की जाने वाली भूख हड़तालें भी शामिल हैं।

परंतु आज टुकड़े-टुकड़े में हमारे सामने पेशावर विद्रोह के इस नायक का जो ब्यौरा पहुंचता है उसे देखकर ऐसा लगता है कि चन्द्र सिंह गढ़वाली वो सितारा था, जो 23 अप्रैल, 1930 को अपनी समूची रोशनी के साथ चमका और फिर अंधेरे में खो गया । जबकि 1930 के बाद आधी शताब्दी से अधिक के जनता के मुद्दों पर जूझते रहे। चन्द्र सिंह गढ़वाली स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद भी संघर्ष की अदम्य जिजिविषा के चलते उत्तराखंड के सबसे बड़े नेताओं में एक ठहरते हैं। लेकिन उन्हें निरंतर उपेक्षित किया गया। इसकी सीधी वजह यह थी कि कम्युनिस्ट पार्टी से जुडऩे के बाद उन्होंने कांग्रेसी खांचे में फिट होने से इन्कार कर दिया।

राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित उनकी जीवनी में यह दर्ज है कि 1946 में उनके गढ़वाल आने पर कांग्रेसियों ने जगह-जगह कोशिश की कि वह सीधे जनता से न मिल सकें। श्रीनगर में तो भक्तदर्शन के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने उनसे मिलकर कांग्रेस में शामिल होने और फिर एम. पी., एम. एल. ए. जो चुनाव वह चाहें लडऩे का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव को गढ़वाली जी ने कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य होने का हवाला देते हुए ठुकरा दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेसियों की उन पर इतनी श्रद्धा है तो वे एक सीट उनके लिये छोड़ दें। जाहिर-सी बात है कांग्रेस नें इसे स्वीकार नहीं किया। देश की आजादी के बाद टिहरी राज परिवार की राजमाता और राजा जिनके हाथ नागेंद्र सकलानी, श्रीदेव सुमन जैसे कितने ही शहीदों के खून से सने थे, कांग्रेस का दामन थामकर भारतीय संसद में पहुंच गये।

परंतु सिद्धांतों पर अडिग रहने के चलते कम्युनिस्ट चन्द्र सिंह गढ़वाली को कांग्रेसियों ने भोंपू लेकर घूमने वाला पागल घोषित कर हंसी का पात्र बनाने की भरसक कोशिश की। चन्द्र सिंह गढ़वाली को नीचा दिखाने का कोई मौका उन्होंने हाथ से नहीं जाने दिया। यहां तक कि आजादी के बाद 1948 में तत्कालीन संयुक्त प्रांत की गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व वाली सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया तो गिरफ्तारी के कारणों में पेशावर में हुए गदर का सजायाफ्ता’’ होना और कम्युनिस्ट पार्टी के जोरदार कार्यकर्ता’’ होना बताया गया है। इसकी खबर भारतीय अखबारों तथा लंदन के डेली वर्कर में छपने के बाद हुई फजीहत के चलते पंत की तरफ से माफी मांगी गयी और गिरफ्तारी नोटिस मेंपेशावर घटना के उल्लेख को आपत्तिजनक’’ माना।

वह पेशावर विद्रोह के सैनिकों के पेंशन के मसले पर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पास पहुंचे। नेहरू जी से चन्द्र सिंह ने मांग की कि पेशावर कांड को राष्ट्रीय पर्व समझा जाय और सैनिकों को पेंशन दी जाये। जो मर गये उनके परिवार को सहायता दी जाये।’’ आजादी के आंदोलन की बड़ी शख्सियत और आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री ने उन्हें टका-सा जवाब दे दिया मान्यता? तुम तो बागी हो।’’ चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों का अंग्रेजों का विरोध करने से भी बड़ा संदेश संभवत: यह है कि सरकारी नौकर होने के बावजूद हमें अपने विवेक को नहीं खोना चाहिए। हमें देखना चाहिए कि हम जिस व्यवस्था की सेवा कर रहे हैं वह किस हद तक जन विरोधी है या हो सकती है। और यह संदेश ज्यादा गंभीर और शाश्वत किस्म का है इसलिए सत्ताधारियों के लिए बेचैन करने वाला है। चन्द्र सिंह गढ़वाली की कांग्रेसियों द्वारा उपेक्षा का यह दौर उनके अंतिम दिनों तक चलता रहा और वैचारिक रूप से तो उन्हें मारने की कोशिशें आज भी जारी हैं। नारायण दत्त तिवारी, जिनकी सभा में कोटद्वार में लगी लाठियों के बाद चन्द्र सिंह गढ़वाली फिर बिस्तर से न उठ सके और पहली अक्टूबर, 1979 को दुनिया से रुखसत हो गए, उन्हीं तिवारी ने उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने के बाद वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली पर्यटन योजनाचलायी। एक ऐसा व्यक्ति जिसने फांका करना कबूल किया पर भ्रष्ट आचरण स्वीकार नहीं किया, उसके नाम पर ऐसी योजना चल रही है जो भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के लिये ही जानी जाती है। तिवारी से उन्हें इससे बेहतर श्रद्धांजलि की उम्मीद की भी नहीं जा सकती थी । चन्द्र सिंह गढ़वाली की स्मृति में 23 अप्रैल को पीठसैण में प्रतिवर्ष मेला लगता है। इस मेले में नेताओं के भाषण सहित सब कुछ होता है। बस यह बताने की हिम्मत कोई नहीं करता कि चन्द्र सिंह गढ़वाली की विचारधारा क्या थी। आजकल तो भाजपा वाले भी जोर-शोर से चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम लेते हैं।मुख्यमंत्री की हैसियत से भुवन चन्द्र खंडूड़ी पीठसैण और रमेश पोखरियालनिशंकभी पीठसैण के मेले में गए थे ।रक्षा मंत्री वहां चन्द्र सिंह गढ़वाली की मूर्ती का अनावरण कर आये हैं.

पेशावर में निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इन्कार करने के बाद चन्द्र सिंह गढ़वाली भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम एकता के बड़े नायक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होने अंग्रेजों की फूट डालो राज करोकी नीति को पलीता लगा दिया था। देश में मंदिर मस्जिद से लेकर लव जिहाद,घर वापसी  जैसे तमाम सांप्रदायिक उन्मादी कारनामे सरकारी संरक्षण में करने वाले भाजपाई, चन्द्र सिंह गढ़वाली की हिंदू-मुस्लिम एकता की परंपरा से नजरें कैसे मिलायेंगे? वे तो अंग्रेजों की फूट डालो राज करोकी परंपरा के वारिस ही हो सकते हैं। चंद्र सिंह गढ़वाली आजीवन कम्युनिस्ट रहे।

कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव भी लड़ा और जन संघर्षों की अगुवाई भी उन्होनें की। चन्द्र सिंह गढ़वाली की समझौता विहीन संघर्षों की परंपरा को आज भी उत्तराखंड व देश में आगे बढ़ाने की जरूरत है। उस दौर में भी चन्द्र सिंह गढ़वाली को कांग्रेस के बारे में कोई मुगालता न था.आजादी से पहले ही जब बम्बई में चन्द्र सिंह गढ़वाली कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने तो उस वक्त उन्होंने पार्टी के तत्कालीन महासचिव कामरेड पी. सी. जोशी से कहा था किकामरेड जोशी, नेहरू पर जो इतना विश्वास करते हैं वह ठीक नहीं है। नेहरू को मैं नजदीक से जानता हूं। जेल से बाहर निकलकर वे नरेन्द्र देव का भोंपू, पटेल की लाठी लेकर आयेंगे और हर तरह से पार्टी को दबा देने की कोशिश करेंगे।’’ 

कामरेड चंद्र सिंह गढ़वाली की सांप्रदायिक सद्भाव और समझौताविहीन संघर्षों की परम्परा को लाल सलाम.

आलेख  - इन्द्रेश मैखुरी

24 December, 2016

दुनिया ने जिन्हें माना पहाड़ों का गांधी


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24 दिसंबर 1925 को अखोड़ी गाँव,पट्टी-ग्यारह गांव, घनसाली, टिहरी गढ़वाल में श्रीमती कल्दी देवी और श्री सुरेशानंद जी के घर एक बालक ने जन्म लिया। जो उत्तराखंड के गांधी के रूप मे विख्यात हुए। इनका नाम था इन्द्रमणी बडोनी । इनकी कक्षा 4 (लोअर मिडिल) अखोड़ी से, कक्षा 7(अपर मिडिल)रौडधार प्रताप नगर से हुई। इन्होने उच्च शिक्षा देहरादून और मसूरी से बहुत कठिनाइयों के बीच पूरी की। इनके पिताजी का जल्दी निधन हो गया था । इन्होने खेती बाड़ी का काम किया और रोजगार हेतु बॉम्बे गये। अपने 2 छोटे भाई महीधर प्रसाद और मेधनीधर को उच्च शिक्षा दिलाई । इन्होने गांव में ही अपने सामाजिक जीवन को विस्तार देना प्रारम्भ किया जगह जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम कराये।

इन्होंने वीर भड़ माधो सिंहभंडारी नृत्य नाटिका और रामलीला का मंचन कई गांवों और प्रदर्शनियों में किया ।  यह एक अच्छे अभिनेता, निर्देशक, लेखक, गीतकार, गायक, हारमोनियम और तबले के जानकार और नृतक थे। संगीत में उनके गुरु लाहौर से संगीत की शिक्षा प्राप्त श्री जबर सिंह नेगी थे। ये बालीबाल के कुशल खिलाड़ी थे। इन्होंने जगह-जगह स्कूल खोले। 1956 में स्थानीय कलाकारों के एक दल को लेकर गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रमों में केदार नृत्य प्रस्तुत कर अपनी लोककला को बड़े मंच पर ले गये। 
1956 में ये  जखोली विकास खण्ड के प्रमुख बने। उससे पहले गांव के प्रधान थे। 1967 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुचे।1969 में अखिल भारतीय कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में दूसरी बार विधायक बने। 1974 में गोविन्द प्रसाद गैरोला जी से चुनाव हारे। 1977 में तीसरी बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित होकर लखनऊ विधानसभा में पहुचे। 1989 में  ब्रह्मदत्त जी से चुनाव हारे। 1979 से ही पृथक उत्तराखंड राज्य के लिए वे सक्रिय रहे। पर्वतीय विकास परिषद के उपाध्यक्ष रहे। 
1994 में पौड़ी में उन्होंने पृथक उत्तराखंड राज के लिये आमरण अनशन शुरू किया। सरकार द्वारा उन्हें मुजफ्फरनगर जेल में डाल दिया गया । उसके बाद 2 सितम्बर और 2 अक्टूबर का काला इतिहास घटित हुआ। उत्तराखंड आंदोलन में कई मोड़ आये पूरे आंदोलन में वे केंद्रीय भूमिका में रहे । बहुत ज्यादा धड़ो और खेमों में बंटे आंदोलनकारियों का उन्होंने सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। 
एक अहिंसक आंदोलन में उमड़े जन सैलाब की उनकी प्रति अटूट आस्था, करिश्माई  पर सहज -सरल व्यक्तित्व के कारण वाशिंटन पोस्ट ने उन्हें "पर्वतीय गाँधी" की संज्ञा दी।
18 अगस्त 1999 को विठल आश्रम ऋषिकेश में इनका निधन हो गया। लेकिन आज भी पूरा उत्तराखंड इन्हें उत्तराखंड के गांधी के नाम से जानते है । हमारी ओर से उत्तराखंड के गांधी को उनकी पुण्य तिथि पर एक श्रद्धांजलि ।

संकलन - संजय चौहान

20 December, 2016

गोर ह्वेग्यो हम


bol pahadi

जैकि मरजि जनै आणी, वु उनै लठ्याणूं छ
जैकि गौं जनै आणी, वु उनै हकाणू छ
ज्वी जनै पैटाणू छ, उनै पैटि जाणा छौ हम
सच ब्वन त मनखि नि रैग्यो, गोर ह्वेग्यो हम

छ्वटि बड़ि धाणि खुणै, यूंका मुख नज़र छ
क्य कन, कनु कन, कब कन,सब यूंका हथ पर छ
नकप्वणों घळ्यॉ छन, यूंन स्यूंता हमारा
अब जनै यि दौड़ाणा छन,उनै दौड़ण लग्यॉ छौ हम
सच ब्वन त मनखि नि रैग्यो, गोर ह्वेग्यो हम

गिच्चु त यून हमारो, पट्ट लीसन बुजेयालि
कन्दूणों का पुटका हमारा,यून रुआ कुचेयालि
दौळे यलो यून त पैदा होन्दै हम
अब जनै रंग्वड़णा छन, उनै रंग्वड़ेणा छौ हम 
सच ब्वन त मनखि नि रैग्यो, गोर ह्वेग्यो हम

प्रयोगशाला बणयीं छन, हमारि इसकूल यून
मिंडका समझि यली, हमारा नौन्याळ यून
ज्वी आणूछ वी चीर फाड़ कैरिकि,चलि जाणू छ
दाड़ि कीटिकि, स्वीळि पिड़ा सी सब सैंणा छौ हम 
सच ब्वन त मनखि नि रैग्यो,गोर ह्वेग्यो हम

पण आखिर कब तक, गौउ बणिकि रैण हमन,
मदारि कि सान्यूं मा बान्दर सि, नचणूं रैण हमन
जैदिन चैढि जालु ,लाटु गुस्सा ना हमफरै 
ता फिर नि ब्वल्यॉ कि कखि जुगा नि रैग्यो हम 
सच ब्वन ता कुछ, ज्यादा लटै यलों तुमन हम 

सर्वाधिकार सुरक्षित-: धर्मेन्द्र नेगी 
ग्राम चुरानी, रिखणीखाळ 

पौड़ी गढ़वाल



10 December, 2016

युगों से याद हैं सुमाड़ी के 'पंथ्‍या दादा'


सुमाड़ी गांव
'जुग जुग तक रालू याद सुमाड़ी कू पंथ्‍या दादा' लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के एक गीत की यह पंक्तियां आपको याद ही होंगी. यह वही सुमाड़ी गांव के पंथ्‍या दादा थे, जिन्‍होंने तत्‍कालीन राजशाही निरंकुशता और जनविरोधी आदेशों के विरोध में अपने प्राणों की आहु‍ती ही दे डाली थी. उत्‍तराखंड की महान ऐतिहासिक गाथाओं में उनका नाम उसी गौरव के साथ शुमार ही नहीं, बल्कि उन्‍हें याद भी किया जाता है.

पन्थ्या दादा का जन्म सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पौड़ी गढ़वाल की कटूलस्यूं पट्टी के प्रसिद्ध गांव सुमाडी में हुआ था. माता पिता का देहांत उनके बचपन में ही होने से उनका लालन पालन बहन की ससुराल फरासू में हुआ. उस समय उत्तराखंड का गढ़वाल क्षेत्र 52 छोटे राज्यों (गढ़ों) में बंटा हुआ था. इन्हीं गढ़पतियों में से एक शक्तिशाली राजा मेदनीशाह का वजीर सुमाड़ी का सुखराम काला था.
लोकमान्यताओं के अनुसार राजा अजयपाल ने जब अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ी से देवलगढ़ में स्थानांतरित की थी, तो उन्होंने सुमाड़ी का क्षेत्र काला जाति के ब्राह्मणों जो कि मां गौरा के उपासक थेको दान में दे दिया था. यह भूमि किसी भी राजा द्वारा घोषित करों से मुक्त थी. चूंकि एकमात्र सुमाड़ी के ग्रामीण ही सभी राजकीय करों से मुक्त थेइसलिए यह व्यवस्था राजा के कुछ दरबारियों को फूटी आंख नहीं सुहाई. वहीं वजीर सुखराम काला से कुछ मतभेदों के चलते कई दरबारी भी असंतुष्ट थे. ऐसे में इन्‍होंने ही राजा को सुमाड़ी के लोगों पर भी 'कर' लगाने के अतिरिक्त अन्य राजकीय कार्यो को करने के लिए उकसाया. जिनमें दूणखेणी (बोझा ढोना) भी शामिल था. इसी काल में पूजा पर मेदनीशाह द्वारा दो अन्य कर स्यूंदी और सुप्पा भी लगाए गए.
मेदनीशाह ने राजदरबारियों के कहने पर वजीर सुखराम काला से मशविरा कर सुमाड़ी की जनता को बोझा ढोने और राजकीय करों को सुचारु रूप राजकोष में जमा करने का फरमान जारी कर दिया. सुमाड़ी में जब यह फरमान पहुंचा, तो गांववासियों ने राजा का यह हुक्म मानने से मना कर दिया. इसे राजाज्ञा के प्रति दंडनीय अपराध मानते हुए राजा ने पुनफरमान भेजा, कि जनता या तो राजकीय आदेश पर अतिशीघ्र अमल करे या गांव को अतिशीघ्र खाली करे. जब ग्रामीणों ने इन दोनों व्यवस्थाओं को भी मानने से इनकार कर दिया तो बौखलाहट में मेदिनीशाह ने दंडस्वरूप गांववालों को प्रतिदिन एक आदमी की बलि देने के लिए फरमान भेज दिया. इस ऐतिहासिक दंड को आज भी 'रोजा' के नाम से जाना जाता है।
राजशाही का यह फरमान प्रजा के स्वाभिमान को भंग करने की एक साजिश थी जिससे निरपराध ग्रामीण बोझा ढोने को तैयार हो जाएं. इस फरमान के आते ही गांव में आतंक फैल गया. ग्रामीण राजतंत्र की निरंकुशता से भली भांति परिचित थे, और वे अच्छी तरह जानते थे कि प्रजा को राजा के आदेश की अवहेलना करने की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है. ग्रामीण किंकर्तव्यविमूढ़ होकर फरमान मानने या गांव छोड़ने को विवश होने लगे. राजा के इन आदेशों से गांव वालों में मतभेद भी उभरने लगे. किंतु अंततउन्होंने अपने स्वाभिमान को बचाने की खातिर रोजा देना उचित समझा.
इस घटनाक्रम के समय सुमाड़ी में अन्य जातियों के अलावा काला जाति के तीन प्रमुख परिवार उदाण कुटुम्बभगड़ एवं पैलू थे. जिनमें उदाण सबसे बड़े भाई का परिवार था. आज भी इन तीनों भाइयों के वंशज पितृ पूजा के अवसर पर अपने पूर्वजों का नाम बड़ी श्रद्धा से लेते हैं. संभवतसबसे बड़े भाई का परिवार होने के कारण इस संकट की घड़ी में रोजा देने के लिए उदाण कुटुंब के सदस्य का आम सहमति से चुनाव किया गया होगा. दैववश जिस परिवार को सबसे पहले रोजा देना था उस परिवार में कुल तीन लोग पतिपत्नी और एक अबोध बालक ही था. यह था पंथ्‍या के बड़े भाई का परिवार. पंथ्‍या इस सारे घटनाक्रम से अनभिज्ञ फरासू में अपनी बहन के साथ था.
लोकगीतों के अनुसार जिस दिन सुमाड़ी में पन्थ्या के भाई के परिवार को रोजा देने के लिए नियुक्त किया गया, उस दिन पन्थ्या फरासू में गायों को जंगल में चुगा रहा था. थकान लगने के कारण उसे जंगल में ही कुछ समय के लिए नींद आ गई. इसी नींद में पन्थ्या को उनकी कुलदेवी मां गौरा ने स्वप्न में दर्शन देकर सुमाड़ी पर छाए भयंकर संकट से अवगत कराया. नींद खुलने पर पन्थ्या ने देखा कि लगभग शाम होने वाली है. इसलिए वह तुरंत गायों को एकत्र कर घर ले गया और बहन से सुमाड़ी जाने की अनुमति लेकर अंधेरे में ही प्रस्थान कर दिया. लोकगीतों में कहा भी जाता है :-
फरासू कू छूट्यो पन्थ्यासौड़ू का सेमल
सौड़ू का सेमल छुट्योजुगपठ्याली पन्थ्या
फरासू से सुमाड़ी के बीच में ये दोनों स्थान सौड़ू एवं जुगपठ्यालीपहाड़ की चढ़ाई चढ़ते समय विश्राम के ठौर थेा घर पहुंचकर पन्थ्या को स्वप्न की सारी बातें सच होती हुई दिखी. उन्होंने राजा के इस थोपे हुए फरमान को प्रजा का उत्पीड़न मानते हुए इसके विरोध में आत्मदाह का ऐलान कर दिया. तत्पश्चात् ग्रामीणों को स्वाभिमान के साथ जीने की शिक्षा देकर अगले दिन इस वीर बालक पन्थ्या ने मां गौरा के चरणों में अंतिम बार सिर नवाकर अग्निकुंड में अपने प्राणों की आहुति दे दी. इस हृदयविदारक दृश्य को पन्थ्या की चाची भद्रादेवी सहन न कर सकीं और उन्होंने भी तत्काल कुंड में छलांग लगा दी. इसी समय बहुगुणा परिवार की एक सुकोमल बालिका ने भी इसी अग्निकुंड में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. राजा मेदिनीशाह को जैसे ही इस दु:खद घटना से अवगत कराया गया, तो उन्होंने अगले तीन दिनों तक रोजा न देने का फरमान सुमाड़ी भेजा. इस घटना को लेकर प्रजा में जहां विद्रोह होने का डर राजा को सताने लगा वहीं संयोगवश इसी बीच राज परिवार दैवीय प्रकोपों के आगोश में भी तड़पने लगा.
इन आकस्मिक संकटों से उबरने के लिए राजा ने राजतांत्रिक से सलाह मशविरा किया. राजतांत्रिक ने राजा को बताया कि यह दैविक विपत्तियां ब्रह्म हत्याओं और एवं निरपराध पन्थ्या के आत्मदाह से उपजी हैं. अतइन आत्माओं की शांति के लिए इनकी विधिवत् पूजा अर्चना करना आवश्यक है. विपत्तिमें फंसे राजा ने तुरंत ही इस कार्य के लिए अपनी सहमति देकर यह कार्य संपन्न कराने के लिए तांत्रिक को सुमाड़ी भेज दिया. जहां तांत्रिक ने परंपरागत वाद्यों के माध्यम से घड़याला लगाकर पन्थ्या और उसके साथ आत्मोत्सर्ग करने वाली सभी पवित्र आत्माओं का आह्वान किया और उन सभी की प्रतिवर्ष विधिवत् पूजा अर्चना करने का वचन दिया. यह पूजा आज भी पूस के महीने में निर्बाध रूप से बड़ी श्रद्धा के साथ की जाती है.
साधारणतया पितृपक्षों में सभी हिंदुओं द्वारा अपने पूजनीय पितरों को अन्न और जल अर्पित किया जाता है. लेकिन सुमाड़ी संभवतऐसा पहला गांव हैजहां पर पितृपक्ष के अतिरिक्त पूस में भी सामूहिक रूप से एक दिन का चयन कर बड़ी श्रद्धा एवं भक्ति से अपने पूज्य पितरों की पूजा अर्चना अन्न एवं जल देकर की जाती है. इसी कड़ी में पन्थ्या काला राजशाही की निरंकुशता के खिलाफ आत्मदाह करने वाले प्रथम ऐतिहासिक बालक थे, जिन्हें सुमाड़ी की जनता प्यार अविराम रूप से मिलता चला आ रहा है.

फोटो- सुमाड़ी गांव
संकलन - हर्ष बुटोला

09 December, 2016

हत्यारी सडक


अतुल सती// 

ऋषिकेश से लेकर 
बद्रीनाथ तक 
लेटी है नाग की तरह 
जबडा फैलाये 
हत्यारी सडक 
राममार्ग 58 
रोज माँगती है 
भूखी नर भक्षणी शिकार 

अब तक अनगिनत 
कई हजार 
नौजवान एक 
15 दिन का ब्याहता 
मिलकर लौटा था 
कुछ घंटे पहले अपनी 
नयी नवेली दुल्हनिया से 
ला रहा था सवारी 

जोशीमठ चाइं का नीरज 
दीवार पर अटकी 
सड़क की चट्टान का 
शिकार हुआ 
22-24 साल की उम्र में 
पिछले ही साल ...
यात्रा को जाते हेमकुंड 
सिक्ख 16 कुचल गये 
यात्री बस पलट गयी 
सड़क के पार 32 मरे 
दो लडके आल्टो सवार 
बिरही गंगा बहे 
जोशीमठ के उमेश भाई शाह 
बच्चा साहित 
अलकनन्दा में बिरही के पास 
तोता घाटी 
मौत की घाटी 
लील गयी कितने ही 
बेशकीमती जीवन 
असमय 
300 किलोमीटर  की लम्बाई में 
जगह -जगह हर मोड-मोड़ 
फन फैलाए 
नाग की तरह 
खडी कर दी है मौत 
ड्सने को तैयार 
कितने दीप बुझे 
मजदूर बनाते हुए सड़क 
दब गये चट्टान तले 
डोजर पर बैठा 
सड़क खोदता ड्राइवर 
दब गया मलबे तले 

सिरोबगड़ में 
मजदूर, सड़क पार करते 
पैदल जवान बच्चे 
गाडियां कई 
जोशीमठ ज़ीरो बैंड दुर्घटना 
नगरासू बारात दुर्घटना 
स्वीत दुर्घटना 
नंदप्रयाग हाद्सा 
मुल्या गांऊ 
ऐसी सैकडों  
ढूर्घटनाएं स्मृति में दर्ज हैं 
जिनके लिये 
रिकार्ड नहीं तलाशने पड़ते  
बचपन से और उससे पहले से भी 

पाताल गंगा बस हाद्सा 
विष्‍णुप्रयाग बस हादसा 
हनुमानचट्टी  बस दुर्घटना 
भैसोडा
ब्रहमपुरी, जहाँ ताउजी बारात के दूल्हे 
उसके पिता समेत काल का ग्रास बने 
हादसों की श्रृंखला है 
बहुत से भूल भी गया होऊँ  
पढते हुए कईयों को याद आ ज़ांय 
कि मुश्किल ही कोई ऐसा हो कि 
इस सड़क पार रहता हो और 
दुर्घटना में उसका कोई जाने वाला ना हो 

कभी गुजरिये रात को 
तोता घाटी से 
आपके दिमाग में कौंधती हैं 
हाल में घटी घटनाएं 
और फ़िर स्मृति में फ़िल्म की तरह सारी .,.
ये युद्ध में नहीं मरे 
सीमा पर नहीं मरे 
ये शहीद नहीं गिने जायेन्गे 
कहाँ दर्ज होंगे ये 
इनके लिये कौन देगा जवाब 
किस पर आयद होगी 

इन हत्याओं की जावाबदेही 
ओ ह्त्यारी सड़क  राजमार्ग 58 !!!


कवि- अतुल सती

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