17 May, 2019

नक्षत्र वेधशाला को विकसित करने की जरूरत


https://www.bolpahadi.in/

अखिलेश अलखनियां/-
सन् 1946 में शोधार्थियों और खगोलशास्त्र के जिज्ञासुओं के लिए आचार्य चक्रधर जोशी जी द्वारा दिव्य तीर्थ देवप्रयाग में स्थापित नक्षत्र वेधशाला ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भेंट है।

आचार्य चक्रधर जोशी जी ने भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री गणेश मावलंकर की प्रेरणा से सन् 1946 में नक्षत्र वेधशाला की नींव डाली थी। ताकि यहां ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन करके लोग लाभ ले सकें। साथ ही उन्होंने बड़े परिश्रम से भारत के कोने-कोने में भ्रमण करके अनेक ग्रन्थ, पांडुलिपियां और महत्वपूर्ण पुस्तकें संग्रहित की। जिसके चलते नक्षत्र वेधशाला अपने अनूठे संग्रह के कारण क्षेत्रीय और देशी-विदेशी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र रहा है।

नक्षत्र वेधशाला में जर्मन टेलीस्कोप, जलघटी, सूर्यघटी, धूर्वघटी, बैरोमीटर, सोलर सिस्टम, राशि बोध, नक्षत्र मंडल चार्ट, दूरबीनें आदि समेत कई हस्तलिखित ग्रन्थ, भोज पत्र, ताड़ पत्र और दर्शन, संस्कृति, विज्ञान, ज्योतिष से सम्बंधित अनेक प्रकार का साहित्य मौजूद है। मगर, मौजूदा वक्त में इनका सही ढंग से उपयोग नहीं हो पा रहा है।
https://www.bolpahadi.in/

इसका एक कारण सरकार की अनदेखी है। समुचित रखरखाव के अभाव में यहां मौजूद बहमूल्य धरोहरें नष्ट होती जा रही हैं और संबंधित विषयों के जानकारों, जिज्ञासुओं और साहित्य प्रेमियों को भी इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। लिहाजा, जरूरी है कि इस स्थान को “साहित्यिक पर्यटन“ स्थल के रूप में विकसित किया जाए। ताकि देश दुनिया के इन विषयों के शोधार्थियों और जिज्ञासुओं तक इसकी जानकारी पहुंच सके।

सरकार इस ओर ध्यान दे तो “साहित्यिक पर्यटन“ स्थल एक ऐसा कदम होगा, जिससे नक्षत्र वेधशाला में संग्रहित उपकरणों व साहित्य की उचित व्यवस्था भी हो सकेगी और यह सैलानियों, साहित्यप्रेमियो, शोधार्थियों के आकर्षण का केंद्र भी बन सकेगा।

उत्तराखंड की कमाई का एक बड़ा हिस्सा पर्यटन विपणन से भी आता है। इसीलिए सरकार लगातार टूरिज्म डेवलपमेंट पर भी काम कर रही है। आध्यात्मिक पर्यटन (Spiritual tourism) की तर्ज पर साहित्यिक पर्यटन जहां नक्षत्र वेधशाला को मजबूती देगा, वहीं दूसरी और यहां पर्यटकों की आवाजाही से स्थानीय रोजगार के अवसर भी विकसित होंगे।

15 May, 2019

अतीत की यादों को सहेजता दस्तावेज


https://www.bolpahadi.in/
- संस्मरणात्मक लेखों का संग्रह ‘स्मृतियों के द्वार’
- रेखा शर्मा

‘गांव तक सड़क क्या आई कि वह आपको भी शहर ले गई।’ यह बात दर्ज हुई है हाल ही में प्रकाशित संस्मरणात्मक लेखों के संग्रह ‘ स्मृतियों के द्वार’ द्वार में। प्रबोध उनियाल ने अपने संपादकीय में लिखा कि- ‘स्मृतियों के द्वार’ एक पड़ताल है या कह लीजिए कि आपके गांव की एक डायरी भी। संग्रह में शामिल लेखक मानवीय संवदेनाओं के प्रति सचेत हैं। वह अतीत में लौटकर अपनी संस्कृति, विरासत, घर, समाज, रिश्ते-नाते, पर्यावरण, जल, जंगल जमीन आदि को अपने लेखों में सहेजते हैं।

डॉ. शिवप्रसाद जोशी के आलेख ‘मेरे घर रह जाना’ में लिखा है कि- गांव के भवन की स्मृति में बहुत सघन है। वहीं पर भैंस पर चढ़ने और फिसलन भरी उसकी पीठ और सींगों को दोनों हाथ से पकड़ने का दृश्य उभरा है। वह सलमान रुश्दी, रघुवीर सहाय, मंगलेश डबराल को कोड करते हैं और कहते हैं कि ‘वो खोये हुए समय के कुहासे में खोये हुए शहर का एक खोया हुआ घर है।’

संग्रह में डॉ. अतुल शर्मा का आलेख ‘जहां मैं रह रहा हूं’ में गढ़वाल, कुमाऊं के नौले धारे और बावड़ियों की संस्कृतियों को शोधपूर्ण तरीके से सहेजा गया है। वे लिखते हैं ‘सोचता हूं कि इन सूखे कुंओं में क्या कभी पानी आ सकेगा?’ दूसरे आलेख में एक विशिष्ट चरित्र ‘खड़ग बहादुर’ का अद्भुत शब्दचित्र खींचा गया है। डॉ. सविता मोहन ‘स्मृति में मेरा गांव’ आलेख में ‘ढौंड’ गांव में अपने बचपन को याद करती हैं। वे लिखती हैं- ‘पूरा गांव बांज, बुरांस, चीड़, हिंस्यालु, किनगोड़, घिंगारु के वृक्षों से आच्छादित था। कविता का एक अंश मां से जुड़ी आत्मीयता को सहेजता है।

इस संग्रह में एक महत्वपूर्ण संस्मरणात्मक लेख है प्रसिद्ध कवियत्री रंजना शर्मा का- ‘बांस की कलम से कंप्यूटर तक’। उन्होंने अपने पिता स्वाधीनता संग्राम सेनानी श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’ के गांव दोस्पुर पहुंचकर अद्भुत अहसास का संस्मरण प्रस्तुत किया है। लिखती हैं- ‘संस्कारों की नदी सी है जो वर्तमान में अपना रास्ता तय कर बहती जा रही है।’

इस पुस्तक में जगमोहन रौतेला का लेख ‘बरसात में भीगते हुए जाते थे स्कूल’ बहुत सहज और बेहतरीन है। वह रवाही नदी और गमबूट का जिक्र भी करते हैं। ये लेख पहाड़ की और बचपन की यादें समेटे हुए है। महेश चिटकारिया का लेख ‘मूंगफली की ठेली से शुरू जिंदगी’ में रामलीला शुरू होने से पहले मूंगफली बेचना और संघर्षशील जीवन जीते हुए भारतीय स्टेट बैंक के बड़े अधिकारी होने तक की कथा उकेरी गई है।

हरीश तिवारी का लेख- ‘पिता के जीवन से मिली सीख’ एक दस्तावेज है। वे लिखते हैं- ‘11 जनवरी 1948 को नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी शहीद हुए थे। उस आंदोलन में मेरे पिता देवीदत्त तिवारी और त्रेपन सिंह नेगी भी मौजूद थे। संग्रह में डॉ. सुनील दत्त थपलियाल ने एक मार्मिक लेख लिखा है- ‘मेले में मां के दिए दो रुपये’। इसमें वे लिखते हैं कि ‘रास्ते भर दो रुपये से क्या-क्या खरीदूंगा यही उधेड़बुन मेरे बचपन में चलती रही। जलेबी, मूंगफली, नारियल और जाने क्या-क्या।

‘स्मृतियों के द्वार’ पुस्तक में धनेश कोठारी ने लिखा है ‘शहर में ढूंढ़ रहा हूं गांव’। वे लिखते हैं ‘जिन्हें अपनी जड़ों से जुड़ रहने की चाह रहती है वह जरूर कभी कभार ही सही शहरों से निकल कर किसी पहाड़ी पगडंडियों की उकाळ उंदार को चढ़ और उतर लेते हैं’। उन्होंने बहुत नई तरह से अपनी बात लिखी।

इस संस्मरणात्मक संग्रह में डॉ. राकेश चक्र का लेख ‘खिसकते पहाड़ दरकते गांव’, महावीर रवांल्टा का ‘आज भी पूजनीय हैं गांव जलस्रोत’, गणेश रावत का ‘कार्बेट की विरासत संजोये हुए छोटी हल्द्वानी’, राजेंद्र सिंह भंडारी का ‘जड़ों से जुड़े रहने की पहल’, प्रो. गोविंद सिंह रजवार का ‘जैविक खेती से जगी उम्मीद’, डॉ. श्वेता खन्ना का ‘कुछ सोचें सोच बदलें’, कमलेश्वर प्रसाद भट्ट का ‘अब पथरीले पहाड़ भी होंगे हरे भरे’, रतन सिंह असवाल का ‘मेरे गांव का गणेश भैजी’, बंशीधर पोखरियाल का लेख ‘आदर्श गांव पोखरी’ एक डाक्यूमेंशन है।

अजय रावत अजेय का लेख ‘घटाटोप अंधेरे के बीच सुबह की उम्मीद’, आशुतोष देशपांडे का ‘पिता की दी हुई कलम’ और शशिभूषण बडोनी का लेख ‘कुछ उम्मीद तो जगती है’ सकारात्मक लेख हैं। सुधीर कुमार सुंदरियाल का लेख ‘गांव भलू लगदु’ और डॉ. दिनेश शर्मा का लेख ‘लोहार मामा’ आकर्षित करता है। ज्योत्सना ने लिखा है- ‘गांव मुझे रहता है याद’

आभा काला का ‘परंपराओं से आज भी बंधा है राठ’ और सुरेंद्र उनियाल का लेख ‘कुछ छुट गए कुछ छिटक गए’ गांव के अच्छे शब्दचित्र है। आशीष डोभाल ने अपने लेख ‘पेड़ और पानी गांव की कहानी’ में सकारात्मक टिप्पणी की है। डॉ. संजय ध्यानी ने ‘निरंकार की पूजाई का उत्सव’ और शिवप्रसाद बहुगुणा का लेख ‘ हमारी सांझी विरासत’ पठनीय हैं। वहीं दुर्गा नौटियाल का लेख ‘मास्टर जी की गुड़ की भेली’ बालमन का सच्चा संस्मरण अद्भुत है।

संग्रह में ललिता प्रसाद भट्ट का लेख ‘प्रयास यदि किए जाएं’, अशोक क्रेजी का ‘रिश्ते नातों से बंधा था जीवन’, आचार्य रामकृष्ण पोखरियाल का ‘यादें जो वापसी को कहती हैं’, विशेष गोदियाल का ‘अभावों के आगे भी हैं रास्ते’, नरेंद्र रयाल का ‘हुई जहां जीवन की भोर’ और सत्येंद्र चौहान ‘सोशल’ का लेख ‘स्वयं करनी होगी पहल' प्रेरणाप्रद हैं।

काव्यांश प्रकाशन ऋषिकेश से प्रकाशित 172 पृष्ठ की इस किताब का मूल्य दो सौ रुपये है। पुस्तक में स्केच व फोटो तथा मुख्य पृष्ठ आकर्षक हैं। इसकी रुपसज्जा धनेश कोठारी ने और फोटो सहयोग मनोज रांगड़, डॉ. सुनील थपलियाल, आरएस भंडारी व शशिभूषण बडोनी ने किया है।

इंटरनेट प्रस्तुति- धनेश कोठारी

12 May, 2019

मेरि ब्वै खुणै नि आइ मदर्स डे (गढ़वाली कविता)


https://www.bolpahadi.in/

पयाश पोखड़ा//

मेरि तींदि गद्यलि निवताणा मा,
मेरि गत्यूड़ि की तैण रसकाणा मा,
लप्वड़्यां सलदरास उखळजाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

सर्या राति मेरि पीठ थमथ्याणा मा,
मि सिवळणा को बेमाता बुलाणा मा,
सिर्वणा दाथि कण्डळि लुकाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

बिसगीं दूदी फर ल्वै चुसाणा मा,
पैनी हडक्यूं की माळा बिनाणा मा,
अफु रुंदा रुंदा भि मी बुथ्याणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

तातु पाणि परतिम स्यळाणा मा,
फेरि मनतता पाणिम नवाणा मा,
बाढ़ ज्वनि, बाढ़ बाढ़ करणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

धकि धैं धै कैरिक नचाणा मा,
था ले,था ले बोलिक हिटाणा मा,
खुट्यूं छुणक्या धगुलि पैराणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

मेरि जूंका की दवै ल्याणा मा,
द्यप्तों का ठौ मा मुण्ड नवाणा मा,
धौ संदकै मीथैं मंथा मा ल्याणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

खटुला फर मेरि खुटळि लगाणा मा,
डांडौं बटैकि घास लखुड़ु ल्याणा मा,
छनि म गौड़ि भैंस्यूं थैं पिजाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

गुड़ गट्टा नौणि रोटि खवाणा मा,
छंछ्या कि थकुलिम लूण रलाणा मा,
लाटा, हौरि खा, हौरि खा ब्वलणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

मेरि पाटि ब्वळख्या सजाणा मा,
अधम्यरम तक इसकोल फट्याणा मा,
इसकोल आंदा जांदा अड़ाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

किताब कौपि पिनसन ल्याणा मा,
फीसी कि इक्कैक पैसि कमाणा मा,
मास्टरु का हथ खुट्टा दबाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

दसा का इमत्यान पास करणा मा,
सर्या गौं मा भ्यलि गिंदड़ा बंटणा मा,
ऐथर नौकरि की गाणि स्याणी करणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

कर्जपात कैरि मीथैं भैर भ्यजणा मा,
अफु खै निखैकि पैसा जमा करणा मा,
च्यूड़ा अखोड़ा की कुटरि धरणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

दिन रात बौलु भुरत्या करणा मा,
स्वारा भारौं कि हींस रींस सुणणा मा,
हैळ हळ्यौ दगड़ हथपैंछि ज्वड़णा मा,
मेरि ब्वै खुण, नि आइ मदर्स डे ||

भ्यलि सिराणी नौकरि लगणा मा,
मीथैं अपणा खुटौं खड़ा करणा मा,
हुणत्यळि आस की फंचि उठाणा मा,
मेरि ब्वै खुण, नि आइ मदर्स डे ||
पेंटिंग साभार- सरोजनी डबराल ‘सरु’

हर साल बर्सफल द्यखाणा मा,
सिरफळ थै मोळि पैराणा मा,
जलम पतड़ा थैं पिठै लगाणा मा,
मेरि ब्वै खुण, नि आइ मदर्स डे ||

मैकु नौनि ब्वारी ख्वज्याणा मा,
बामणा का घौर आणा जाणा मा,
मीथै सीरा मकोट पैराणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

अपणि नथुलि बुलाक त्वड़ाणा मा,
ब्वारी खुणै गुलोबन्द बणाणा मा,
सात फूल्यूं मा पीना लगाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

नौना कु बिगरैलि ब्वारी ल्याणा मा,
लछमि ऐलि हमर खल्याणा मा,
सर्या जिंदगि की खैरि बिसराणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

नौना ब्वारी को परदेस जाणा मा,
रंत रैबार चिठि पतरि नि आणा मा,
टपरांदा सासा लग्यां पराणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

जिंदगि की जग्वाळ करणा मा,
न म्वरणा मा अर ना बचणा मा,
आंदा-जांदा म्यारु बाटु ह्यरणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

इंटरनेट प्रस्तुति- धनेश कोठारी

लोकभाषा के एक भयंकर लिख्वाड़ कवि (व्यंग्य)


https://www.bolpahadi.in/
ललित मोहन रयाल//
लोकभाषा में उनका उपनाम ’चाखलू’ था, तो देवनागरी में ’पखेरू’। दोनों नाम समानार्थी बताए जाते थे। भयंकर लिख्वाड़ थे। सिंगल सिटिंग में सत्तर-अस्सी लाइन की कविता लिख मारते, जो कभी-कभी डेढ़-दो सौ लाइन तक की हद को छू जाती थी। क्या मजाल कि, कभी उनका सृजन-कर्म थमा हो। जितना लिखते थे, समूचा-का-समूचा सुना डालते। बचाकर बिल्कुल भी नहीं रखते थे, झूम-झूमकर सुनाते।

खुद को ’कालजयी’ बताते थे, शायद इसलिए कि बस एकबार ही सही, अगर वे किसी तरह मंच तक पहुंच गए और खुदा-न-खास्ता माइक उनके हत्थे चढ़ गया, तो फिर उस पर लगभर कब्जा ही कर लेते थे। एडवर्स पजेशन टाइप का कब्जा। बिना भूमिका बांधे डाइरेक्ट कविता दागना शुरू कर देते। एकबार शुरू जो हुए, तो फिर घंटों जुबानरुपी तलवार को वापस म्यान में नहीं धरते थे। माइक छुड़ाने में पसीना छुड़ा देते। उन्हें मना करने के लिए मनाने में, आयोजकों को नाकों चने चबाने पड़ते थे। माइक को कसकर जकड़े रहते थे। कुल मिलाकर, उन्होंने समय-सीमा की कभी परवाह नहीं की।

माइक बाएं हाथ से थामते थे और दनादन कविता सुनाते जाते। दाएं हाथ को फ्री रखे रहते थे, जो अपने बाद वाले नंबर के कवि अथवा आयोजकों (जिस-जिस को रोड़ा समझते थे) को मंच पर चढ़ने से थामने के काम आता था। न जाने कहां से उस हाथ में, घड़ी-दो घड़ी के लिए दैवीय सी ताकत आ जाती।

अगर कवि नया- नवेला हुआ, तो आसान पड़ता था। मात्र दायें हाथ को वाइपर की तरह हिला- हिलाकर उनका काम बन आता। बाईचांस खांटी हुआ, तो धींगामुश्ती, झूमाझटकी, धकेलने तक का काम उसी हाथ से ले लिया करते थे। अगर कवि अदावत करने वाला निकाला, तो गर्दनियां दांव भी उसी हाथ से दे जाते थे। अगर धुर विरोधी हुआ, तो उसी हाथ से टेंटुवा दबाने की सक्रिय चेष्टा तक उतारू हो जाते।

हाथ के इशारे से बाद के कवियों को बुरी तरह डपटते। रोकते-टोकते रहते थे। इतना सबकुछ होने के साथ-साथ, खुद बेलगाम होकर काव्य-पाठ जारी रखते थे। क्या मजाल कि, इन अवरोधों के मध्य कभी उनकी कविता में रंचमात्र का भी व्यतिक्रम आया हो। कविता घन-गर्जन की तरह धांय-धांय चालू रहती।

बकौल नेक्स्ट कवि, “अरे! वे निर्बगिकि छ्वीं ना लगावा। औरु तै वु कवि समजदु नी। सबू तै ज्वाड़-जुत्त करदू रैंदु। चटेलिक गाळी द्यौंदू। अपणि दस-बीस बर्स पुराणि कविता त बोदू, आज प्रभा कुण ल्याखी मीन। ताजी-ताजी रचीं छाई। बिल्कुल फ्रेश। झूट्टू नंबर एक।“
(अरे भाई साहब, उस अभागे की चर्चा मत छेड़ो। अपने सिवा, वह किसी को कवि समझता ही नहीं। सबको अनाप-शनाप बोलता है। धाराप्रवाह गालियां देता है। अपनी दस-बीस बरस पुरानी कविता को कहता है, आज सुबह-सुबह लिखी है। रचना एकदम फ्रेश है। झूठा कहीं का।)

उनका काव्य-पाठ बरसों तक एक ही मीटर पर चलता रहा। वही लय-छंद-ताल। और तो और, भाव भी वही। दूसरी कविता कब शुरू हुई, श्रोताओं को इसका पता ही नहीं चल पाता था। उस लय-ताल पर तो उनका इतना एकाधिकार सा था कि, सब-की-सब एक ही कलेवर की जान पड़ती थी।

मजे की बात यह होती थी कि, वे आयोजन स्थल पर उतनी ही देर तक रुकते थे, जब तक उनका नंबर ना आ जाए। माइक को हसरत भरी निगाहों से देखते रहते थे। टकटकी लगाकर पोडियम पर पैनी नजर रखते। प्रतिद्वंद्वियों पर कड़ी निगाह रखते। कहीं ऐसा न हो कि, कोई और बीच में ही भांजी मार ले। इस कारोबार में ऐसा होते, उन्होंने खूब देखा था। दूर की बात क्या, जब-जब मौका मिला, खुद उन्होंने इस हुनर को बखूबी भुनाया।

बस एक बार अगर उनका नंबर आ गया, तो कोई माई का लाल उनसे नंबर नहीं छुड़ा सकता था। वे कोई कसर छोड़ते भी नहीं थे। सारा-का-सारा उड़ेल डालते। भयंकर तबाही मचाते थे। ऐसी तबाही, जिसमें राहत- बचाव की जरा भी गुंजाइश बाकी नहीं छोड़ते थे। उनका सरोकार सिर्फ इतने तक ही सीमित रहता था। विषय वही-के-वही- ’गद्दारों का खात्मा’, ’कुछ खास मुल्कों की आंख नोचने का जज्बा।’ ’खास हो गया, नाश हो गया’ टाइप काव्य।

बकौल उनके हमदर्द- हमराज कवि, “कन तब। अपणि सुणैक वु कंदुण्यों पर फोन लगैकि ठर्र-ठर्र कैरिक भैर निकळ जांदू अर गेट पर पौंछिक मुट्ठी पर थूक। पिछनै द्यखदु नी।“
(अपनी कविता सुनाने के बाद, वह कान पर फोन सटाकर, मटक-मटककर गेट तक पहुंचता है। उसके बाद, वहां से सरपट दौड़ लगाता है। एकबार भी पीछे मुड़कर नहीं देखता।)

उनका यह बर्ताव, समकालीनों को खूब खलता रहा। लेकिन बेचारे कर भी क्या सकते थे। मन मसोसकर रह जाते। शीघ्र ही उनके बारे में यह मशहूर हो चला था कि, वे हाहाकारी टाइप की कविता सुनाते हैं, वो भी एकदम रोबोटिक नाटकीयता के साथ। बाकायदा, दोनों उंगलियां पैनी करके आंखें नोचने का सीधा प्रसारण कर डालते थे। जैसाकि तब तक होता आया था, धीरे-धीरे उनके खिलाफ, अनायास ही एक खेमा डिवेलप होता चला गया। जिसकी उन्होंने कभी बाल बराबर भी परवाह नहीं की।

बकौल एक विरोधी खेमा- कवि, “एक बगत, मंच-संचालन मैंमु ऐग्याई। मिन स्वाची, आज बच्चाराम तै आंण दे दिए जाऊ। क्या बुन्न तब। मैन वैकु नंबर ई नी औण दीनि। वैतैं अध्यक्ष बणौणेकि घोषणा कर द्याई। ले चुसणा... जब फंसी बच्चाराम, कन अणिसणि बीतग्याई वैफर। न त घूट सकदु छाई, अर थूक भी नि सकदु छाई। वैन बतै भिनि सैकी, वैफर क्या राई बितणि। घड़ेक वैकि जिकुड़ि अबसा-फाबसी मां फंसी राई।“
(एकबार मंच-संचालन का जिम्मा मुझे मिला। मैंने सोचा, आज इसे सबक सिखा ही दिया जाए। फिर क्या था। मैंने उसका नंबर ही काट दिया। उसे कार्यक्रम-अध्यक्ष बनाने की घोषणा कर दी। बुरी तरह फंसे बच्चूराम। उन पर बहुत बुरी बीत रही थी। ना निगलते बनता था, ना उगलते। बेचारा बता भी नहीं सका, उस पर क्या-क्या बीती। घड़ी भर के लिए, उसके प्राण असमंजस में फंसे रहे।)

उनका एक खास ट्रेंड रहता था। वे अक्सर शास्त्रों से प्रसंग उठाते थे। लगे हाथ उनकी विकृत व्याख्या कर डालते, अनर्थकारी व्याख्या।
’शांताकारम भुजंगशयनम् पद्मनाभम सुरेशं।
विश्वाधारं गगनसदृश मेघवर्णं शुभांगमं।
सभा में पहले इस श्लोक को सुनाते थे। फिर उसकी अनूठी व्याख्या पेश कर जाते। “क्वी यन त बतावा कि यांकु मतलब क्या होंदु। फेर द्वी-तीन बगत खचोरि-खचोरिक पुछद। क्या बल?“
(अरे कोई तो बताओ! इसका क्या अर्थ निकलता है। सभा में सन्नाटा छाया रहता। फिर दो-तीन बार खोद-खोदकर पूछते, क्या अर्थ निकला।)“ फिर काफी देर तक घटिया कथाकारों की तरह हवा बांधे रखते। सांस खींचे रहते। फिर सहसा खजाने का पिटारा खोलते हुए रहस्योद्घाटन करते हुए बोल बैठते, “अरे! यांकु मतलब ह्वाई भैंसु।“  (अरे मूर्खों! इसका तात्पर्य है- भैंस।)

श्रोता मुंह बाए सुनते रहते। होशियार श्रोता चौकन्ने हो जाते। सोचते, जनकवि आखिर बोल क्या रहा है। आखिर कहना क्या चाहता है। इधर लोक-भाषा-कवि की विकृत टीका जारी रहती थी-
“शांताकारम्ः मल्लब भैंसु कु शांत आकार। कन शांत रैंदु तब। ब्वोला तब। देखि क्वी जानवर इन शांत? क्वी उचड़-भटग नी। वैथै पिंडू- पाणि चकाचक मिल जौ। घस्येयूं-बुस्येऊं राऊ। च्वीं-पटग नी सुणी सकदा। वै तै दुन्या सी क्या मतलब। शांत पड़्यू रैंदु।“
(शांताकारम् का तात्पर्य है, शांत आकार। भैंस कितने शांत स्वभाव की होती है। और कोई प्राणी इतने शांत स्वभाव का हो सकता है भला। उसके स्वभाव में किसी किस्म की उठापटक देखी है कभी। उसे बरोबर भूसा-चारा मिलता रहे। बस उसकी खुराक कमती ना पड़े। किसी किस्म की चूं-चपड़ नहीं सुन सकते। उसे दुनिया से क्या मतलब। एकदम शांत पड़ी रहती है।)

“भुजंगशयनम्ः खुट्टू बटोळी कि पड़्यूं रैंदु। तुमुल देखि होलु, भुज्जा उकरिक ऊंक ऐंछ, ठाठ सी पड़्यूं रैंदु। खै- पेक पोटगि भरीं राऊ, त वैकि तर्फ सी दुन्या जाऊ चरखा मा।“
(भुजंगशयनम् अर्थात् पैर समेटकर, ठाठ से उनके ऊपर लेटी रहती है। चारों भुजाओं के ऊपर विश्रामरत रहती है। खा-पीकर उदर भरा रहे, उसकी तरफ से दुनिया जाए भाड़ में।)

“पद्मनाभं- अरे, वैकि नाभिसी दूद नी निकल़्दु। बान्निकि भैंसी ह्वाऊ त छौड़ु लगौण मा क्या देर लगदि।“
(अरे! उसकी नाभि से दूध ही तो निकलता है। अच्छी नस्ल की भैंस हो, तो दुग्ध-धारा बहने में कितनी देर लगती है।)

“विश्वाधारं. मने बिस्सु दादा करौंक भैंसु भारी दुधाळ छै बल। धारु लगैकि दूद देंदु बल।“
(विश्वंभर दादा की उन्नत नस्ल भैंस है, जो धारासार दूध देती है।)

गगनसदृशं- भैंसी तै लंगण देक द्याखा जरा। द्वी-तीन बेळी वै तैं घास-पात नि द्यावा। कन तमासु मचांदु तब। कन अड़ांदू बल, द्यौरु मुंडमां उठै देंदु।“
(भैंस भूखी हो, तब देखो जरा। दो-तीन टाइम उसे घास-चारा न मिले, इतना शोर मचाएगी कि आसमान को सिर पर ही उठा लेगी।)

“मेघबरण नी बल वैकु? भैंसु कन-कन ह्वंदिन बल। क्वी बल भुरेणु होंदु, क्वी काल़ू। अरे! मि ब्वन्नु छौं, यु इस्लोक संट परसैंट भैंसी पर ल्यख्यूं छै।“
(क्या उसका मेघवर्ण नहीं होता? अरे भाई! भैंस कैसे- कैसे रंगों की होती है। कोई भूरी होती है, तो कोई काली। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि, यह श्लोक निश्चित रूप से भैंस पर ही लिखा गया है।)

एक बड़े कवि सम्मेलन में तो उन्होंने गायत्री मंत्र की अति दुर्लभ व्याख्या करके रख दी। ’ओम भूर्भुवः स्वः- यह भूरे रंग की गाय मेरी है। ’तत्सवितुर्वरेण्यं’- अन्य वर्णों की तुम्हारी है। ’भर्गो देवस्य धीमहि’- तुम मुझे भर-भरकर घी दो। ’धियो यो न प्रचोदयात’- मैं तुम को इस आशय की पर्ची देता हूं। ऐसी अनूठी व्याख्या करके उन्होंने श्रोताओं से लेकर आयोजकों तक को अचरज में डाल दिया।

लोक-भाषा कवि होने के नाते, वे लोक-संस्कृति और लोक-वाद्य की भरपूर वकालत करते रहे। ढोल- दमाऊ के प्रति उनका मोह आखिर तक बना रहा। मशकबीन पर तो जान छिड़कते थे। एक बार गांव में कोई बारात पाश्चात्य बैंड-बाजे के साथ आई, नौजवानों के लिए कौतूहल का विषय बना रहा। उन्होंने जनकवि से कहा, “अरे चिचा! बारात क्या सज-धज के आई है। बैंड-बाजे वाली बारात है।“

कविराज ने छूटते ही पाश्चात्य वाद्य-व्यवस्था को  ख़ारिज करके रख दिया, “अरे यार! बैंड तुमारि मवासि। धर्यां छन ऊंक उ बंदकुड़ कांद मा। सुर ना ताल। धोळ ऊंन घ्वल्ड- काखड़ू मा बितगचाड़ू। पौण गैंन बल धुर्पळ मा डांस कन्नू तै, अर ऊंन बल सौब पठाळ रड़ै दिनिन। रामलालैकि कुड़ि कु खंड्वार बणैकि पतातोड़ ह्वैग्येन बल।“
(अरे यार! खाक बैंड। बैंडवालों ने बंदूकनुमा बाजे कंधों पर रखे हुए हैं। ना कोई सुर न ताल। रास्ते में आते हुए उन्होंने घुरड़-काखड़ों में अफरा-तफरी मचाकर रख दी। सुनने में तो ये भी आया है कि, बाराती डांस करने को छत पर चढ़े, उन्होंने सारी पठालें खिसका दीं और रामलाल के मकान को खंडहर बनाकर चलते बने।)

कवि के कुछ हमदर्द है, जो उनसे गहरी हमदर्दी रखते हैं। कहते हैं, “अरे भाई! जैसा भी है, लोकभाषा- बोली को बचाने के लिए जी-जान से जुटा है। प्राण प्रण चेष्टा कर रहा है। अकेले सबसे मुचेहटा लिए रहता है। कम-से-कम उनके रहते, अपनी बोली-भाषा के शब्द, सुनाई तो पड़ते हैं।“

इंटरनेट प्रस्तुति- धनेश कोठारी

10 May, 2019

फेसबुक अकौंट औफ ब्वाडा ... (व्यंग्य)

यस.के थपल्याल ’घंजीर’// 
हे वै निरबै दलेदरा! निगुसैंकरा तु मेरू फीसबुक अकौंट किलै नि खोलणु छै रै... कन बिजोक प्वाड़ रै.. त्वे उंद?
ब्वाडा फेसबुक मड़घट मा चलौण कि तिन? किलै ह्वे तेरी मति भ्रष्ट?
कनु रै, दांत निखुलिगीं पर जीब त् बचीं च.. सिरि फट्टी चपै नि सकदू पर तरी त् पे सकदू... उल्लोपठ्ठा फीसबुकै सबसे जादा जरोरत हम बुढ्यों तैं हि च्। हमुन टैम पास कन मा कन रै? वेमा अपंणा चखुला घुघता दिखे जंदिन बल... कुसगोर्या मीथै मेरी कूड़ी की खुद लगीं च... डांडीयूं की, कुयेड़ी की, गौड़ि भैंसींयू की  खुद लगीं च... सबि छन बल वे फेसबुक मा। बदक्वट्या दलेदरा य्हा रयां सयां दिन कटे जाला छुचा... अर तरबुर तरबुर ब्वाडै आंख्यू मा छुंया फुटगीं।
ब्वाडा तुमरा ’फेस’ फर त मूंजा पोड़गीं... अर वख चिफलपट फोटू लगौण प्वड़द... तब जै की फ्रेंडस मिलदीं।
हब्बै मुजको लाटा चिता रा है क्या?.. मि देवानंदै फोटु लगै द्योंलु... कौन से लोग अपंणि औरिजनल थुंथरी लगंदन?
ब्वाडा इस्माट मुबैल फून चलांणु बि जंणदौ?
हब्बै, फौज मा मेरा इन इना ट्रक चलयां छीं कि चकड़ेता त्वे क्य पता! यु डबल रव्टी सि मुबैल चलांणु क्य चीज च् मीकू.. चल म्यारू नौ लेख जरा...जैकी!
पर तुमरू नौ त ’जै भगबान कीचवान’ चा।
आं भै, मीथै न पढा.. फेसबुक हि च् ना... क्वी फेथबुक नीछ्... चल निपल्टु हो यख मा बटि... अपणा नाति मा खुलौंलु, वेन इतगा जांच पूछ नि कनि!!!

09 May, 2019

‘जानलेवा' कवि (व्यंग्य)


ललित मोहन रयाल//

जानलेवा' उनका तखल्लुस था, ओरिजिनल नाम में जाने की, कभी किसी ने जरूरत ही नहीं समझी। संपादक को जब उन्होंने अपनी हस्बमामूल कविता सुनाई, तो संपादक ने पहले तो रस लेने की भरसक कोशिश की, लेकिन रस लेते-लेते कब उन्हें मूर्च्छा छाई, इस बात का पता किसी को नहीं चला। कवि को, श्रोता को।

अगले दिन जब कवि महाशय ने संपादक के दफ्तर में हाजिर होने की कोशिश की, तो उनकी मनचाही इच्छा पूरी नहीं हो सकी। मेन गेट के चैनल पर बड़ा सा ताला लटका हुआ मिला। उस दिन उन्होंने खूब लंबा इंतजार किया, ''आएगा तो इसी रास्ते। बच्चू बचकर जाएगा कहां।'' इंतजार करते-करते जब शाम घिर आई, तो बड़ी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। तो संपादक ने उस रास्ते से गुजरने का साहस दिखाया, ही कवि महाशय का उत्साह ही रंच मात्र भी क्षीण हुआ। एक किस्म से कुश्ती बराबरी पर छूटी।

हालांकि कहने वाले तो यह भी कहते रहे कि, संपादक उसी घर के अंदर था, और जाली वाले रास्ते से आवाजाही कर रहा था। इधर जानलेवा कवि, अपने कौल से टस-से-मस नही हुए। उन्हें अपनी मान्यताओं पर दृढ़ विश्वास था। उनकी मान्यता थी कि, ''चैनल गेट का ताला नहीं खुला, तो क्या हुआ। इतने से कविता मर थोड़ेई जाएगी।'' यही वो घटना थी, जो उनके जीवन का प्रस्थान बिंदु बनी। लब्बोलुआब ये रहा कि, यहीं से वे मंचीय कविता की ओर उन्मुख हुए।

जैसे ही यह खबर, साहित्य अनुरागी जीवों ने सुनी, वे चौकन्ने से रहने लगे। ऐसा था कि, उन्हें मंच नसीब ना हुआ हो। एकाधबार उन्हें मंचों पर अवसर मिला। पर्याप्त समय मिला। बाकायदा स्लॉट मिला, लेकिन जानलेवा कवि असल कवि थे, दोगले नहीं। उन्होंने यह साबित करने में जरा भी देरी नहीं की, कि दरअसल वे चीज क्या हैं। सबका स्लॉट अकेले ही पी गए। बकौल एक लोक-भाषा-कवि, ''एक बगत मंच क्या लूछी, वैन अपणु सदानिकु भाड़ू कर दीनि'' (एक अवसर पर जानलेवा कवि ने मंच क्या हथियाया कि, हमेशा के लिए अपना ही रास्ता बंद कर दिया।)

इस घटना के बाद उन्होंने अपनी काव्य-शैली में थोड़ा सा परिवर्तन किया, जिसे वे युगांतरकारी परिवर्तन कहते नहीं अघाते थे। दरअसल यहीं से वे प्रशस्ति-गीत लिखने की ओर उन्मुख हुए। उन्होंने ब्लाक क्षेत्र का एक भी इंटर कॉलेज नहीं छोड़ा होगा, जिसके प्रिंसिपल पर उन्होंने प्रशस्ति-गीत ना लिखा हो। इसके एवज में, उनकी बस एक ही गुजारिश रहती थी, ''असेंबली में बच्चों से रू--रू होने के लिए मात्र एक घंटे का समय चाहिए। उन्हें जीवनोपयोगी शिक्षा देने की आखिरी आस है। इसी आस को लिए जी रहा हूं।''

एकाध प्रिंसिपल तो इस झांसे में भी गए। फिर क्या था। इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते। बात फैलते देर नहीं लगी। प्रिंसिपल तो प्रिंसिपल, जिले भर के बच्चे तक आनाकानी करने लगे।

इस तरह के प्रोपोगेंडा से भी जानलेवा कवि का उत्साह भंग नहीं हुआ। हालांकि इस स्तर की उपेक्षा के बाद, उन्होंने अपने स्तर को जूनियर हाईस्कूल हेडमास्टर तक डाइल्यूट करने की कोशिश की, लेकिन दाल उनकी वहां भी नहीं गली। कविता के क्षेत्र में जैसे ही उन्होंने स्वयं को असुरक्षित महसूस किया, वे सुरक्षा विभाग यानी पुलिस के उच्चाधिकारियों पर प्रशस्ति-गीत लिखने लगे। मात्र एक विनती करते रहे, ''मेरा प्रशस्ति-गीत आप पर ही लिखा गया है। इतनी सी विनती है, बस एकबार प्रशस्ति-गीत सुन लें। मुझ कवि का यह जीवन धन्य हो जाएगा।''

जब उन्हें वहां भी कोई सहारा नहीं मिला, तो वे स्तर गिराने को मजबूर हो गए। स्तर भी डाउनग्रेड होते-होते थाना से चौकी स्तर तक उतर आया। चौकी प्रभारी, संतरी को सख्त हिदायत दिए रहते। एहतियातन यह उपाय बरतना जरूरी लगता होगा, ''साहब राउंड पर गए हैं। लॉ एंड ऑर्डर का मसला देखकर ही वापस लौटेगें।'' पुलिस अधिकारियों ने अब जाकर मामले की गंभीरता समझी।

क्रमशः जिले भर के थानों में उनका हुलिया नोट कराना पड़ा, ''जैसे भी हो, इसे रोको।'' बीट के सिपाही को मुरीद बनाने का फैसला, उन्हें इसलिए नामंजूर करना पड़ा क्योंकि वो तो बिना कविता सुने ही, वीर रस से सरोबार रहता था। सत्ता के सख्त पहरे में, उन पर सख्त नजर रखे जाने लगी। यही वह प्रस्थान बिंदु था, जहां से उन्हें जेल डिपार्टमेंट में आस दिखाई दी। वे तत्काल जेलर से मिले, इस प्रार्थना के साथ, ''बस बंदियों का हृदय-परिवर्तन करना चाहता हूं। उन्हें बस एक बार अपनी कविता सुनाना चाहता हूं।''

कविवर बखूबी जानते थे, 'बंदी तो पिंजरे में कैद है। वहां कोई बहाना चलने का नहीं। ना तो वे राउंड पर जा सकते हैं, ना ही उनकी कविता सुनने से भाग सकते हैं।' कुल मिलाकर, किसी भी तरह बचत की कोई गुंजाइश नहीं थी।

भाग्य को यूं ही प्रबल नहीं कहा जाता। उनकी बदकिस्मती देखिए कि, जेलर पढ़ा-लिखा आदमी निकला। वह समसामयिक घटनाओं पर बराबर नजर रखता था। ''बंदियों के भी तो मानवाधिकार होते हैं।'' कहकर उसने 'जानलेवा' से बंदियों की जान छुड़ाई।

कुछ दिनों तक जानलेवा कवि को हाजमे की शिकायत रही। उनके उद्गार व्यक्त कर पाने की दशा में इसी तरह की आशंका जताई जा रही थी। हाजमे को दुरुस्त रखने की नीयत से अलस्सुबह उन्होंने एक दुकानदार को जा पकड़ा। उधर से कोई विरोध नहीं दिखा। फिर क्या था। 'जानलेवा' ने अपने झोले में हाथ डाला, और अपने अकूत खजाने में से एक दफ़्ती निकाली। छोटे-छोटे फॉण्ट साइज, में रंग-बिरंगे अक्षरों में विरुदावली लिखी हुई थी। दुकानदार ने अनुमान लगाया, ''इतनी देर में तो कोई ग्राहक आने से रहा। आत्मप्रशंसा किसे बुरी लगती है। लगे हाथ, प्रशस्ति-गीत ही सुन लिया जाएगा।''

गायन चालू था। जैसे ही उन्होंने पृष्ठ भाग में रंग-बिरंगे अक्षरों में, फुलस्केप साइज में लिखी हुई विरुदावली का अगला हिस्सा देखा, वे मन मसोसकर रह गए। किसी तरह खुद को संभाला। जल्दी ही उसने मन में यह मान लिया कि, थोड़ी देर और सही, लेकिन यह जानकर तो उसके होश ही उड़ गए कि, इसी आकार की तीन दफ्तियां अभी और शेष हैं। तीन दिनों तक तो उसने खुद की विरुदावली सुनी। बेचारे को मुलाहिजा दिखाना पड़ा।

'जानलेवा' कवि को उसने बाकायदा चाय पिलाई। यथाशक्ति आदर-सत्कार किया। चौथे दिन, जब वो अपनी दुकान पर पहुंचा, तो जैसे ही उसने शटर उठाने की कोशिश की, जानलेवा कवि उसे वहां पर धरना देते हुए मिले। उसने उन्हें इग्नोर किया। रूटीन के कारोबार की तरह शटर उठाया। कविवर ऐसे ही कहां मानने वाले थे। सीधे तख्त पर जा विराजे।

हालांकि कच्ची गोलियां तो दुकानदार ने भी नहीं खेली थी। दरअसल वह खुद एक 'एक्स कवि' था। परिजनों ने उसे मार-बांधकर दुकान खुलवाई थी। किसी तरह उससे कविता की लत छुड़ाई थी। वो खुद कुछ समय पहले तक प्राणलेवा कवि हुआ करता था। सॉनेट लिखने का शौकीन था। मूलतः वह सॉनेट, इतालवी कविता का हिंदी संस्करण, लिखने का हद दर्जे का शौकीन था।

चौथे दिन दुकानदार ने कोई औपचारिकता नहीं दिखाई। वो तीन दिनों से लगातार भरा हुआ था। चौथे दिन उसका धैर्य चुक गया। संयम जवाब दे गया। बात, प्रियजनों को दिए गए वचन-भंग करने तक जा पहुंची।

'जानलेवा' ने किया भी तो गजब ही था। सोए शेर को जगा दिया। बाकायदा उसकी पूंछ से ही छेडख़ानी कर डाली। फिर देर किस बात की थी। उसने वही हथियार निकालें। सॉनेटर को इस बात का एडवांटेज मिला कि, मुक्तक और छंद की तुलना में, उसकी एक-एक कविता, मात्र चौदह पंक्तियों की होती थी। बस फिर क्या था। साइज की वजह से, पूरे मुकाबले में वह उस पर भारी पड़ा।

'जानलेवा' कवि ने नव- दुकानदार के सामने हथियार डालने में जरा भी देर नहीं की। फलस्वरूप, अगले दिन से, 'जानलेवा' ने उस दुकान की दिशा में मुड़कर भी नहीं देखा।

कुछ दिनों बाद, 'जानलेवा' को एक गृहस्थ में सुधी श्रोता होने की संभावना दिखाई दी। वे पेशे से शिक्षक थे। जाहिर सी बात है, पढ़े-लिखे भी रहे होंगे। 'जानलेवा' को यह अवसर नदी-नाव संयोग जैसा दिखाई दिया। नेकी और पूछ-पूछ। वे भोर में ही, दफ्ती पर टंगे मान-पत्र लेकर, उनके घर जा धमके। पहले दिन उन्होंने 'जानलेवा' को सुना। मुरब्बत में चाय भी पिलाई। अब ये रोज का कारोबार बन गया।

एक दिन क्या हुआ कि, जानलेवा पौ फटने से पहले, उनके गेट पर खड़े थे। अनजान व्यक्ति को संदिग्ध हालत में देखकर, गृहस्थ की मां को आशंका हुई। उन्होंने बेटे से पूछ ही डाला, ''क्वा यू।'' (ये कौन है रे!) बकौल गृहस्थ, ''अब मैं क्या बताता कि वह कौन है।'' वे उनसे इतना आजिज चुके थे कि अपने उद्गार इन शब्दों में व्यक्त किए, ''बाई गॉड! अगर ये दरबारी कवि होता, तो हर रोज बीस-पच्चीस बार सूली पर चढ़ाया जाता, क्योंकि हर कविता पर राजा इसे गारंटेड प्राणदंड देता।''

नतीजतन, 'जानलेवा' को देखकर, भले लोग उन्हें इग्नोर करने लगे। साहित्यकार उनसे कन्नी काटने लगे। श्रोता तो उन्हें दूर से देखते ही, रास्ता बदलने लगे। उनसे ऐसे पेश आते, मानो उन्हें जानते ही नहीं हों। मतलब निकल गया, तो जानते ही नहीं। अब अपनी कविता को कहां खर्च करें, जब यह सवाल उठ खड़ा हुआ, तो कवि को कोई चारा नहीं सूझा। उन्होंने आव देखा ताव। अपनी पुत्रवधू-पुत्रादि की पच्चीसवीं वर्षगांठ, बच्चों की वैवाहिक वर्षगांठ, नाती-पोतों के जन्मदिन पर उसी आकार की कविताएं पेश करनी चालू कर दी।

फिर भी कवि का मन उन्हें हर समय सालता रहा। इन आयोजनों में सबसे बड़ी खामी ये रहती थी कि, ये बरस में एक ही बार पड़ते थे। इधर उत्पादन जोरों पर था। अब इस सरप्लस माल को खपाएं, तो कहां खपाएं। उस पर कविता का सौंदर्य यह रहता था कि, वह छायावादी छंदों के प्रभाव में प्रयाण-गीत अथवा युद्ध-गीत जैसी आभा देती थे। ओज-तेज का जबरदस्त बोलबाला।

कुछ दिनों से नौजवानों को फुसलाने के लिए कुछ टीमटाम भी करने लगे थे, जिसे वे खुद 'नवगीत' कहते थे। कहने वाले दबी जुबान में यह भी कहते थे कि, तो उसमें कुछ नया है। और गीत तो वह किसी भी एंगल से नहीं है। तुक तो उनकी हर कविता में मिलता था, भले ही कंटेंट बेतुका क्यों ना हो। श्रृंगार की तो जबरदस्त घालमेल दिखती थी, जिनमें वादा-दावा, कली-गली-टली, ऐबी-फरेबी, रैना-चैना, राहों- निगाहों, वारे-न्यारे-मतवारे जैसे शब्दों की भरमार रहती थी।

काम था तो पेचीदा, पर उन्होंने सीधा सा फार्मूला ढूंढा हुआ था। डेढ-दो कुंटल विशेषण, तो उनके स्टॉक में हरदम तैयार मिलते थे। अंजुली-दो- अंजुली, किसी के ऊपर उड़ेल भी दी, तो क्या फर्क पड़ता है। कुंए से एक-दो बाल्टी पानी खींचने से कुआं सूख तो नहीं जाता। इतने से कुंए की सेहत पर क्या फर्क पड़ता है। तो उन्हीं की रेसिपी तरह-तरह से परोसते रहते। हरदम कमाल की फॉर्म में रहते। क्या मजाल कि, कभी दबाव का सामना महसूस किया हो। किंतु- परंतु, अगर-मगर से काव्य को रोचक बनाने की चेष्टा करते। बड़े फख्र के साथ बताते थे, 'चलते-चलते कोई मिल गया था.. सरेराह चलते-चलते..गीत में 'चलते-चलते', मात्र बहत्तर बार आता है। तो 'एक चतुर नार, करके सिंगार..' में 'चतुर' विशेषण अठ्ठाइस बार। खुद को किसी से कम, कभी इन्होंने आंका नहीं। सो इनकी कविताओं में कोई भी विशेषण रहा हो, क्या मजाल कि कभी एक सौ आठ बार से कम आया हो।

एक बीमा-एजेंट, जिससे एरिया के लगभग सभी गृहस्थ भय खाते थे, वो तक इनसे मुंह चुराने लगा। बात इतनी सी थी कि, एक बार उसे भी इनका श्रोता बनने का सुअवसर मिल चुका था। जब श्रोता बन ही गए, तो नतीजे तो भुगतने ही पड़ते हैं। वे बीमा-एजेंट से दाद की उम्मीद भी रखने लगे। एक ही दिन कविता सुनाई और चेहरे की तरफ इतना घूरकर देखा कि, यह दाद दे भी रहा है, कि नहीं। लोग उन्हें दूर से ही देखते, तो कलेजा धक से रह जाता। जान-पहचान वाले चोरी-छुपे निकलते।

अरसे से उन्होंने एक नियम बना लिया था, ''किसी की उपेक्षा नहीं करेंगे। कोई भी सुधी श्रोता निकल सकता है। श्रोताओं के सींग थोड़ेई होते हैं।'' अनजान श्रोताओं को तो छलांग लगाकर ऐसे पकड़ते, मानो छलांग नहीं लगाई, तो भाग जाएगा। साहित्यकार, तो सौ परदों के भीतर छुपे, डरे-सहमे रहते। कवि महाशय करते भी तो ऐसा जुर्म थे कि, कोई साहित्यकार दिखा नहीं, एकदम हमलावर हो जाते। भीषण काव्य-पाठ चालू कर देते। धारावाहिक खंडकाव्य सुनाते।
अब सामने वाला निकला तो था सब्जी खरीदने। गृहणी क्या जाने कि, सब्जी लाने वाले को 'जानलेवा' ने हाईजैक कर लिया है। उसके सुहाग के प्राण भारी संकट में हैं। देर होना स्वाभाविक हो जाता। देर हो जाने पर, गृहलक्ष्मी पीड़ित को जली-कटी सुनाती। महीनों दंपत्ति में बोलचाल बंद हो जाती।

सृष्टि के सारे विषयों पर उन्होंने कविता लिख मारी। गांव-कूचे-चौबारे पर भी। यहां तक कि जर्रे-जर्रे पर लिख मारी। मोबाइल बैटरी, लो बैटरी। फिर मॉडेम-प्रिंटर को तक उनके काव्य का विषय बने का दर्जा हासिल हुआ। लाख हूटिंग हुई हो, उनका जुझारूपन टूटा नहीं। एक भी लम्हा गंवाए बगैर काव्य-पाठ चालू।

सुनने में तो ये भी आया कि, कुछ दिनों से विषाणु-जीवाणु-कीटाणु पर कविता कर रहे हैं। कहते हैं, ''हैं तो, इसी सृष्टि का हिस्सा। उन्हें भी तो उसी सृष्टा ने रचा है।'' दबी जुबान से लोग कहते हैं, ''माइक्रो ऑर्गेनिज्म पर इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि वे विरोध नहीं जता सकते। और शायद इसलिए भी कि, आखिर होते तो वे भी 'जानलेवा' ही हैं।''
--
- रचनाकार ललित मोहन रयाल उत्तराखंड लोकसेवा में अपर सचिव पद पर कार्यरत हैं। अब तक उनके दो गद्य संग्रहखड़कमाफी की स्मृतियों से' और हाल ही मेंअथश्री प्रयाग कथा' प्रकाशित हो चुकी हैं। साहित्य जगत में उनके लेखन को व्यंग्य की एक नई ही शैली के रुप में पहचान मिल रही है।

Popular Posts

Blog Archive