Thursday, August 23, 2018

सिर्फ ‘निजाम’ दर ‘निजाम’ बदलने को बना उत्तराखंड?

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धनेश कोठारी/
युवा उत्तराखंड के सामने साढे़ 17 बरस बाद भी चुनौतियां अपनी जगह हैं। स्थापना के दिन से ही राज्य के मसले राजनीति की विसात पर मोहरों से अधिक नहीं हैं। राज्य के स्वर्णिम भविष्य के दावों के बावजूद अब तक कारगर व्यवस्थाओं के लिए किसी तरह की नीति अस्तित्व में नहीं है। बात मूलभूत सुविधाओं बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा या संस्कृति, खेल, फिल्म, पर्यटन, भूमि क्रय-विक्रय, खनन, आबकारी, उद्योग, स्थानान्तरण, रोजगार, पलायन और स्थायी राजधानी आदि पर किसी तरह का ‘खाका’ सरकार के पास होगा, उम्मीद नहीं जगती। अब तक राज्य में जो घोटाले चर्चाओं में रहे उनपर क्या कार्रवाई हुई, कौन दोषी था, किसे जेल हुई, यह सब भी आरोपों- प्रत्यारोपों तक ही सीमित दिखता है। भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ने की बात के बाद भी ‘लोकायुक्त’ के वजूद में आने का इंतजार ही है।

इसबीच यदि कुछ खास हुआ है, तो वह यह कि इस छोटे से अंतराल में उत्तराखंड में चार बार सत्ता का हस्तांतरण हुआ ओर नौ बार आठ मुखिया जरूर गद्दीनसीन हुए हैं। लेकिन चेहरों की अदला-बदली के बावजूद कार्यशैली में बदलाव आता नहीं दिखा। सिहांसन पर जिसने भी एंट्री ली राज्यवासियों के दर्द से दूर ही रहा। हां पूर्ववर्ती सरकारों के फैसलों को बदलने, अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को गढ़ने और वोट बैंक को साधने के लिए किसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। सरकारें अपनी बतौर बड़ी उपलब्धि यह तो बताती हैं कि राज्य में प्रति व्यक्ति आय गुजरात से भी अधिक एक लाख 60 हजार हो चुकी है। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि इस अरसे में राज्य पर कर्ज बढ़कर 50 हजार करोड़ से अधिक हो गया है। तब भी आर्थिक मजबूती के लिए कोई ठोस प्लान राज्य के पास नहीं।

आलम यह है कि कर्मचारियो के वेतन, भत्तों और एरियर देने के लिए सरकार को बाजार से कर्ज पर कर्ज उठाना पड़ रहा है। जो कि 4000 करोड़ से आगे पहुंच चुका है। दूसरी तरफ सरकारी महकमों में हजारों रिक्त पदों के बाद भी प्रदेश में बेरोजगारों की तादाद 10 लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। आपदा से तहसनहस केदारनाथ धाम तो संवर गया, किंतु केदार घाटी के प्रभावित गांवों में जीवन अब भी आपदा के घावों से कराह ही रहा है। राज्य की स्थायी राजधानी का मसला अब भी अधर में है।

सवाल यहीं नहीं ठहरते, बल्कि आवाज देते हैं कि राज्य आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को कब और कौन सजा दिलाएगा, यूपी के साथ परिसंपत्तियां का बंटवारा ईमानदारी से कब तक पूरा होगा, पलायन पर किस तरह से रोक लगेगी, भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए लोकायुक्त कब वजूद में आएगा, जीरो टॉलरेंस की बात नारों से निकल कर हकीकत में बदलेगी, घोटालों के दोषी कब तक सींखचों के भीतर होंगे, विजन डॉक्यूमेंट के मुद्दे जमीन पर कब तक अवतिरत होंगे या विजन भर ही रहेंगे। या फिर सब पर अंधेरा ही कायम दिखता रहेगा !!

तन के भूगोल से परे

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निर्मला पुतुल/

तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गांठें खोलकर
कभी पढ़ा है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास..?

अगर नहीं
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के
गणित से परे
एक स्त्री के बारे में...?

साभार - कविता

Sunday, August 19, 2018

क्योंकि दिल्ली से ‘हिमालय’ नहीं दिखता


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बचपन में गांव से हिमालय देखने को आतुर रहने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार, वरिष्ठ पत्रकार और मंच संचालक गणेश खुगशाल ‘गणी’ को जब दिल्ली में प्रवास के दिनों में हिमालय नहीं दिखा तो उन्होंने दिल्ली को नमस्कार कर दिया और पौड़ी आ गए। इसके बाद वे पौड़ी के ही होकर रह गए। कई बार पौड़ी से बाहर मीडिया में नौकरी करने के मौके मिले, लेकिन उन्होंने पौड़ी नहीं छोड़ा।

गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी के मंचों का संचालन करने वाले ‘गणीदा’ कुशल संचालक के साथ ही वरिष्ठ कवि भी हैं। उन्हें गढ़वाली लोक साहित्य में ‘हाइकू’ शैली की कविता का जनक भी माना जाता है। लोक साहित्य में उनका लंबा सफर रहा है, जो अभी जारी है। हिमालयी सरोकारों का प्रतिनिधित्व करने वाली धाद पत्रिका के संपादक गणीदा इस माध्यम से भी लोकभाषा के संरक्षण में जुटे हैं। उन्हीं के साथ पत्रकार साथी मलखीत रौथाण की बातचीत के अंश-

मलखीत- गणीदा, आज आप बड़े मंचों के कुशल संचालक हैं, ये हुनर बचपन से ही आपके अंदर था?
गणीदा- नहीं जी! ये हुनर बचपन में नहीं था। बचपन में तो स्कूली कार्यक्रमों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों से दूर ही रहता था। गुरूजी कहते थे गीत गाओ या फिर पत्थर लाने होंगे। मैं पत्थर ही लाता था।

मलखीत - फिर इस हुनर को कैसे विस्तार मिला। क्या कोई प्रेरणा रही है?
गणीदा- दरअसल, प्रेरणा तो हमेशा ही गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी की रही है। बचपन से ही नेगी जी को सुनता आ रहा हूं। जो कुछ भी हूं, इसे देव संयोग ही कहा जायेगा। लोकभाषा के प्रति प्रेम और लगाव बचपन से ही रहा है।

मलखीत - पहाड़ और लोकभाषा के प्रति आपका लगाव कैसे बढ़ा?
गणीदा- दरअसल, मैं सरकारी नौकरी कर रहा था। साल 1987 की बात है, मैं भोपाल में रहता था और वहां मेरी पूज्य माताश्री की मृत्यु हो गई। उस दौरान निचली मंजिल में लोग टेलीविजन देख रहे थे। जो मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने कहा कि ये शहर संवेदनहींन शहर है और मैंने भोपाल छोड़ दिया। मुझे लगता है कि आज भी हर शहर संवेदनहींन शहर है। इसके बाद मैं दिल्ली आया, लेकिन यहां से जब हिमालय नहीं दिखा, तो अंततः वापस अपने गांव पौड़ी आ गया।

मलखीत - आपकी पहली कविता कौन सी थी।
गणीदा- कब तलैकि डौंरू बजली, कब तलैकि बजेली थाली। यह मेरी पहली गढ़वाली कविता थी।

मलखीत - गणीदा, आप रामलीला मंचन देखने भी जाते थे?
गणीदा- हां, बहुत शौक था। लेकिन पिताजी नहीं जाने देते थे, कहते थे कि बस दो दिन ही जाना है मंचन देखने को।

मलखीत - आप आकाशवाणी से कब और कैसे जुड़े?
गणीदा- मैं बचपन से ही आकाशवाणी से प्रसारित ग्राम जगत कार्यक्रम खूब सुनता था। कविता लिखते-लिखते मैंने कई बार आकाशवाणी को भी पत्र लिखे। आखिरकार साल 1988 में चक्रधर कंडवाल जी ने आकाशवाणी से कविता पाठ करने का सौभाग्य दिया।

मलखीत - आप मंच संचालन से कैसे जुड़े?
गणीदा- असल में, एक कार्यक्रम में मैंने नरेंद्र सिंह नेगी की मौजूदगी में काव्यपाठ किया था। इसके बाद एक अन्य कार्यक्रमों में नरेंद्र सिंह नेगी जी ने कहा कि गणी संचालन तू ही करेगा। मैंने कहा कि मुझे तो आता ही नहीं है। इस पर नेगी जी ने कहा कि जहां रूक जाओगे, वहां मैं बोलूंगा। यही से संचालन का सफर शुरू हुआ और ये सब नेगी जी की देन है।

मलखीत - आप धाद से भी जुड़े?
गणीदा- जी हां, करीब 1988 में मुझे धाद से जुड़ने का सौभाग्य मिला। मैं पत्रिका में लेखन भी करता रहा और धाद के कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी भी रही।

मलखीत - लोकभाषा की वर्तमान दशा व दिशा पर आप क्या कहना चाहेंगे?
गणीदा- बेशक, लोकभाषा पर काम हो रहा है। लेखन हो रहा है। लेकिन नई पीढ़ी लोकभाषा से दूर होती जा रही है। इस पर ध्यान देने की नितांत जरूरत है।

Monday, August 06, 2018

उत्तराखंड में राजनीतिक महत्वाकांक्षा का फ्रंट !

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धनेश कोठारी -
उत्तराखंड की राजनीति नई करवट बदलने को है। इसबार जिस नए मोर्चे की हलचल सामने आई है, उसकी जमीन तैयार करने में कोई और नहीं बल्कि भाजपा और कांग्रेस से बागी व नाराज क्षत्रप ही जुटे हैं। इसलिए राज्य के सियासी हलकों में इस कसरत के मायने निकाले और समझाए जा रहे हैं। कुछ इसे राज्य की बेहतरी, तो कुछ मूल दलों में वापसी के लिए दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। लिहाजा, ऐसी राजनीतिक पैंतरेबाजी के बीच उत्तराखंड में तीसरे मोर्चे पर चर्चा तो लाजिमी है।

सन् 2000 में नए राज्य उत्तराखंड (तब उत्तरांचल) के गठन के साथ ही सियासी जमीन पर भाजपा और कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय और तीसरी ताकत के तौर पर यूकेडी को सामने रखा गया। 2002 में पहले आमचुनाव में यूकेडी को महज चार सीटें मिलीं। जबकि बसपा के खाते में उससे ज्यादा 07 सीटें रही। 2007 और 2012 में भी वह तीन और एक सीट के साथ चौथे नंबर पर सिमटी। बसपा तब भी क्रमशः 08 व 03 सीटों के साथ तीसरा स्थान कब्जाए रही।
सन् 2007 में भाजपा और 2012 में कांग्रेस की अल्पमत सरकारों को समर्थन देने में यूकेडी ने कतई देरी नहीं की। नतीजा 2017 आते-आते वह खुद जमींदोज हो गई। क्योंकि 2012 में जीते अपने एकमात्र विधायक प्रीतम सिंह पंवार को वह पहले ही पार्टी से बाहर कर चुकी थी।2017 में प्रीतम निर्दलीय ही कामयाब रहे। अब संयुक्त उक्रांद अपनी भूलों को स्वीकार रहा है।

इसी अंतराल में क्षेत्रीय ताकत बनने को बेताब उत्तराखंड रक्षा मोर्चा और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी भी अस्तित्व में आईं, मगर वह भी भाजपा और कांग्रेस के चुनावी हथकंडों के आगे खुद को साबित न कर सके। रक्षा मोर्चा फिलवक्त गुम है, जबकि उपपा अभी भी जनमुद्दों पर संघर्षरत है। इससे इतर प्रदेश की सियासत में वामपंथी दल भाकपा, माकपा, भाकपा (माले) के अलावा सपा और एनसीपी भी मैदान में रहे।किंतु, वह भी भाजपा-कांग्रेस को खरोंच तक नहीं लगा सके।हरबार वोटों के बिखराव ने कांग्रेस और बीजेपी को ही बारी-बारी सत्ता सुख दिलाया।

अब रही बात नए मोर्चे की, तो अतीत क्षेत्रीय क्षत्रपों के पक्ष में पूरी तरह से कभी नहीं रहा, या कहें कि उत्तराखंड का सियासी गेम प्लान हमेशा बीजेपी-कांग्रेस के बीच ही फिक्स रहा। पिछले दिनों थर्ड फ्रंट को सिरे से ही नकारने वाले भाजपा और कांग्रेस नेताओं के बयान इस ओर इशारा भी करते हैं। पूरे आत्मविश्वास कहते हैं कि तीसरा मोर्चा उनके लिए कोई खतरा नहीं।

दूसरी बात नए मोर्चे की कवायद में जुटे क्षत्रप जनमुद्दों की खातिर सत्ता पर दबाव के लिए तीसरे मोर्चे की बात तो कह रहे हैं, लेकिन उन्होंने प्रस्तावित फ्रंट में गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस दलों को साथ जोड़ने या उनके साथ चलने का संकेत भी नहीं दिया है। उनकी अब तक की बैठकों में इन दलों के समर्थक भी नहीं दिख रहे।

इसलिए, पहली नजर में यह कसरत सिर्फ नए राजनीतिक संगठन बनाने भर की कवायद ही लग रही है।ऐसे में थर्ड फ्रंट जैसी संभावना को इससे जोड़ना शायद जल्दबाजी होगी। प्रदेश की सियासत से वाकिफ लोग तो इस कसरत में सत्ता के लाभों से दूर हुए लोगों की महत्वाकांक्षाओं को छिपा हुआ देख रहे हैं। उनका यहां तक कहना है कि इनमें कब कौन अपने मूल दलों की अंगुलियां पकड़कर उनकी गोदी में बैठ जाए, कहा नहीं जा सकता।

लिहाजा, उत्तराखंड में संभावित तीसरे मोर्चे की हलचल के बीच फिलहाल ‘आगे-आगे देखिए होता है क्या’?

साभार- शिखर हिमालय (हिंदी पाक्षिक) 01 अगस्त अंक

Saturday, August 04, 2018

ग़ज़ल (गढ़वाली)


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दिनेश कुकरेती (वरिष्ठ पत्रकार) -

जख अपणु क्वी नी, वख डांडा आगि कु सार छ भैजी,
जख सौब अपणा सि छन, वख भि त्यार-म्यार छ भैजी।

बाटा लग्यान नाता-पाथौं तैं, कुर्चिऽ सौब अपणि रौ मा,
जै परैं अपण्यास सि लगद, ऊ भि ट्यार-ट्यार छ भैजी।

सच त ई छ कि सिरफ दिखौ कीऽ, छपल्यास रैगे अब,
भितरी-भितरऽ जिकुड़्यों मा, सुलग्यूं अंगार छ भैजी।

जौं तिबरी-डंड्ळयों उसंकद छोड़ी, धार पोर ह्वै ग्यां हम,
सुणदौं कि अब ऊंकी जगा, सिरफ खंद्वार छ भैजी।

ब्याळ स्वीणा मा दिख्ये झळ, अर दिख्येंदी हर्चिग्ये।
कन बिसरुलु वीं तै, जिकुड़ि मा बसिं अन्वार छ भैजी।

खीसा देखी त, क्वी भि अपणु बणि जांद परदेस मा,
जु तुम द्यखणा छा मुखिड़ि परैं, झूठी चलक्वार छ भैजी।

Friday, August 03, 2018

उत्तराखंड में पारंपरिक बीज भंडारण विधियां और उपकरण



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डॉ. राजेन्द्र डोभाल -
मेरे लिए उत्तराखंड अपने अद्भुत व समृद्ध पारंपरिक ज्ञान के लिए हमेशा से एक शोध का विषय रहा है आज ऐसे ही एक विषय (बीज भंडारण) पर अपने विचार साझा करना चाहता हूं। बीज में मूल डीएनए है, जो एक ही तरह के पौधे का उत्पादन करने में सक्षम है। जहां एक ओर बीज भंडारण, घरेलू और सामुदायिक खाद्य सुरक्षा को अगले फसल तक सुनिश्चित करने में मदद करता है, वहीं दूसरी ओर अच्छे बीज भंडारण का मूल उद्देश्य बीज की सुरक्षा, गुणवत्ता और उसकी मात्रा को बनाए रखने के लिए पर्यावरणीय स्थितियों का निर्माण करना है। जिससे घरेलू खाद्य सुरक्षा पूर्ति के साथ साथ कम से कम बीज की हानि हो। सीड स्टोरेज यानि की बीज भंडारण, फसलों की कटाई के फलस्वरूप होने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। बीज और अनाज सामग्री को लंबे समय तक स्टोर करने के लिए उत्तराखंड के स्थानीय लोगों द्वारा अपने निजी अनुभवों, सूझबूझ और स्थानीय संसाधनों से निर्मित सामग्री का प्रयोग एक उत्कृष्ट तरीके से किया जाता है।

इन-वीवो या ऑन साइट प्रिजर्वेशन (कटाई के पहले संरक्षण):
इस शैली के अंतर्गत एक विशेष तकनीक याद आती है, जिसमे करीब-करीब पक चुके पौधों के सीड्स को पक्षियों (जैसे मुख्य रूप से तोते और कौवे) व अन्य जानवरों जैसे बंदर आदि से सुरक्षित रखने के लिए एक “बर्ड स्केर” (जिसे गढ़वाल में अक्सर डरोंणयां कहा जाता है) खेत में स्थापित किया जाता है। बर्ड स्केर द्वारा जानवरों में कैमोफ्लेज प्रभाव विकसित कर उन्हें भ्रमित कर, फसल की सुरक्षा की जाती है। (बर्ड स्केर पुतलों का ज़िक्र कर, स्मृति पर बचपन के दिन स्वतः ही अंकित हो जाते हैं जब मक्के (मुंगरी) के खेतों में लगे इन बर्ड स्केर पुतलों को देखकर मैं और मेरे साथी रोमांच से भर उठते और उत्सुकतावश पत्थर फेंक कर ये कन्फर्म करने की कोशिश करते कि क्या वाकई ये कोई इंसान है या फिर पुतला?)

पोस्ट हार्वेस्ट प्रिजर्वेशन (कटाई के उपरांत संरक्षण):
कटाई के बाद अनाज के साथ मिश्रित प्लांट मटेरियल जैसे अवांछनीय बीज या कर्नेल, भूसा, डंठल, खाली अनाज (एम्प्टी सीड्स) और खनिज मटेरियल जैसे पृथ्वी, पत्थर, रेत, धातु कण, इत्यादि पाए जाते हैं, जो निश्चित रूप से बीजों के भंडारण और प्रसंस्करण स्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं, को कई विधियों द्वारा पृथक किया जाता है। इस तकनीक में अनाज या बीजों को साफ़ करके (जिनमें विनोविंग (फटेला), सेपेरेटिंग (रूंगडना) आदि प्रमुख हैं), कम से कम 2 दिनों के लिए धूप में सुखाने के बाद पारंपरिक भंडारण उपकरणों में अलग से भंडारित किया जाता है, जिन्हें स्थानीय तौर पर भकार, डोक, बिसौण/बिसाऊ, मटुल/मौहट, तुमड़ी/तोमडी (खोखली व सूखी बॉटलनुमा लौंकी), ठेकी, और मेटल बिन्स (गागर, तौल, कंटर और कसरा) कहा जाता है। आइये कुछ ऐसे ही पारम्परिक भण्डारण उपकरणों पर एक नजर डालते हैं।

भकार (वुडन बॉक्स):
भकार, एक विशाल आयताकार लकड़ी का बॉक्स होता है जिसका इस्तेमाल गेहूं और धान के सीड्स को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है। यह आमतौर पर चीड़ (पाइनस रॉक्सबर्घी) या देवदार (सेड्रस देओदारा), कटौंज (केस्टोनोपस ट्राइबोलॉइड), बांस (डेंड्रोकेलेमस स्ट्रीकस), निंगल (थम्नोकालेमस स्पिथफ्लोरा), तून (सेड्रेला टोना) की लकड़ी से बना होता है।

डोकः
यह एक बेलनाकार या अंडाकार बांस या रिंगाल (थेमनोकेलामस स्पेथिफ्लोरा) का बना बॉक्स है। जिसे अंदर और बाहर से गाय के गोबर व मिटटी के पेस्ट से प्लास्टरिंग कर बनाया जाता है (मिट्टी अनावश्यक नमी को अवशोषित कर बीज को सड़ने से बचती है। जबकि गाय का गोबर भंडारण कीटों के लिए एक विकर्षक (रेपलेंट) के रूप में कार्य करता है)। डोक में 50 से 100 किलो तक अनाज संगृहीत करने की कैपेसिटी होती है।

बिसौण/बिसाऊः
बिसौण/बिसाऊ का इस्तेमाल मुख्य रूप से दाल और बाजरा को सुखाने के लिए किया जाता रहा है। यह एक फ्लैट और अंडाकार आकार की संरचना बांस की पट्टियों से बनायीं जाती है। जिसे बाद में गाय के गोबर व गोमूत्र पेस्ट से प्लास्टरिंग कर खूब अच्छी तरह से सूखा कर प्रयोग में लाया जाता है।

मटुल/मौहटः
2015 में प्रकाशित एक शोध में किये गए सर्वे के अनुसार आज भी कुमाऊं में रह रहे 95 प्रतिशत रेस्पोंडेंट कृषक परिवारों द्वारा गेहूं और धान जैसे अनाज को सुखाने के लिए मटुल/मौहट (बांस की पट्टियों से बने चटाई) का प्रयोग किया जाता है।

तुमड़ी/तोमड़ीः
एक गोल या अंडाकार आकार वाली लौंकी (बोटल गार्ड) को 3-4 माह तक सूख जाने के बाद इसके बीज व पल्प निकल दिया जाता है। इसमें ढक्कन आम तौर पर लकड़ी या सूखे घास से बनायीं जाती है। मूलरूप से इसका उपयोग अगले सीजन के लिए बीज संग्रहित करने के लिए किया जाता है। कभी-कभी तुमड़ी का आकार बड़ा होने पर इसमें 10-15 किलो अनाज (एक मानक आकार में) संग्रहीत किया जा सकता है।

मेटल बिन्सः
धातुओं में तांबे, टिन व स्टील के बने डिब्बों का इस्तेमाल विशेष रूप से दाल और बाजरा को स्टोर करने के लिए किया जाता है। गढ़वाल में इन्हें गागर, तौल, कंटर और कसरा कहा जाता है।

ठेकीः
बाजरा और दालों के भंडारण के लिए पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाला एक लकड़ी का कंटेनर है।

दूसरे चरण में, बीज सामग्री और अनाज की रक्षा के लिए एक उपाय के रूप में, किसान विभिन्न औषधीय पौधे, राख, तेल, नमक आदि का उपयोग करते हैं, जिन्हें उन्होंने अपने बड़े-बजुर्गों से सीखा। उत्तराखंड में, किसानों के लिए बीज केवल भविष्य के पौधों और भोजन का स्रोत नहीं है। बल्कि कई वर्षों के अथक प्रयासों व संघर्षों के फलस्वरूप प्राप्त वैज्ञानिक, व्यावहारिक व पारंपरिक सहज ज्ञान का प्रतीक है।

उत्तराखंड में वर्षों से चली आ रही पुराने परंपरागत भंडारण विधियों को प्रोत्साहित करने, एक वैज्ञानिक दस्तावेज बनाने और पुनर्जीवित करने की दिशा में मेरे द्वारा किया गया एक छोटा सा प्रयास, उत्तराखंड के स्थानीय लोगों (कृषि समुदाय) द्वारा विकसित ईको-फ्रेंडली व आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण, कृषि शैलियों के संरक्षण में अवश्य सहायक होगा।

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(लेखक महानिदेशक, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद्, उत्तराखंड हैं)

Thursday, August 02, 2018

जैसे को तैसा


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( लघुकथा )
गांव में एक किसान रहता था जो दूध से दही और मक्खन बनाकर बेचने का काम करता था...
एक दिन उसकी बीबी ने उसे मक्खन तैयार करके दिया। वो उसे बेचने के लिए अपने गांव से शहर की तरफ रवाना हुआ...
वो मक्खन गोल पेढ़ों की शकल में बना हुआ था और हर पेढ़े का वजन एक किलो था...
शहर में किसान ने उस मक्खन को हमेशा की तरह एक दुकानदार को बेच दिया और दुकानदार से चायपत्ती, चीनी, तेल और साबुन वगैरह खरीदकर वापस अपने गांव को रवाना हो गया...
किसान के जाने के बाद -
दुकानदार ने मक्खन को फ्रिज में रखना शुरू किया...
उसे खयाल आया के क्यूं ना एक पेढ़े का वजन किया जाए...
वजन करने पर पेढ़ा सिर्फ 900 ग्राम का निकला...
हैरत और निराशा से उसने सारे पेढ़े तोल डाले, मगर किसान के लाए हुए सभी पेढ़े 900-900 ग्राम के ही निकले।
अगले हफ्ते फिर किसान हमेशा की तरह मक्खन लेकर जैसे ही दुकानदार की दहलीज पर चढ़ा...
दुकानदार ने किसान से चिल्लाते हुए कहा- दफा हो जा, किसी बेईमान और धोखेबाज शख्स से कारोबार करना... पर मुझसे नहीं। 900 ग्राम मक्खन को पूरा एक किलो कहकर बेचने वाले शख्स की वो शक्ल भी देखना गवारा नहीं करता...
किसान ने बड़ी ही ‘विनम्रता’ से दुकानदार से कहा ‘मेरे भाई मुझसे नाराज ना हो हम तो गरीब और बेचारे लोग हैं, हमारी माल तोलने के लिए बाट (वजन) खरीदने की हैसियत कहां’।
आपसे जो एक किलो चीनी लेकर जाता हूं, उसी को तराजू के एक पलड़े में रखकर दूसरे पलड़े में उतने ही वजन का मक्खन तोलकर ले आता हूं।
- साभार

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