08 May, 2022

माँ अब कुछ नहीं कहती - (हिंदी कविता)



माँ

अब कभी-कभी

आती है सपनों में

चुप रहती है,

कुछ नहीं कहती


माँ

सुनाती थी बातों-बातों में

जीवन के कई हिस्से

सुने हुए कई किस्से

भोगे हुए यथार्थ

जिनके थे कुछ निहितार्थ


माँ

आगाह करती थी

लोगों से, बुरे दौर से

सलाह देती थी

चारों तरफ देखने की


माँ

डाँट देती अक्सर मुझे

मेरी गलतियों पर

मेरी कमियों पर

मृत्यु के कुछ दिन पहले

आखिरी बार भी डाँटा था


माँ

अब आती है सपनों में

चुपचाप देखती है

शायद महसूस करती है

मेरा आज, मेरा कल


मगर,

माँ अब कुछ नहीं कहती

माँ अब कुछ नहीं कहती


• धनेश कोठारी

08 मई 2022, ऋषिकेश (उत्तराखंड)

22 August, 2021

अब....!

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गिर्दा !
आपने कहा था
हमारी हिम्मत बांधे रखने के लिए
‘जैंता इक दिन त आलो ये दिन ये दुनि में’

तब से हम भी इंतजार में हैं
वो ‘दिन’ आने के 
हिम्मत हमने अब भी बांधी हुई है
उसी एक पंक्ति के भरोसे

दिन हमारे आएंगे; नहीं मालूम
हाँ, उन ब्योपारियों के आ गए
जिनसे तुमने पूछा था
‘बोल ब्योपारी अब क्या होगा..’

तुम्हारे चले जाने के दस साल/ और
उत्तराखंड राज्य बनने के बीस साल/ बाद
हमारे अंदर टूटते ‘पहाड़’ को 
अब कौन थामे हुए रखेगा

गिर्दा!
कदाचित अब हम 
हिम्मत को बांध कर नहीं रख सके
तो कौन कहेगा फिर हमसे
‘जैंता इक दिन त आलो ये दिन ये दुनि में’

गिर्दा!
चले आओ फिर से
और गाओ बार बार गाओ
... धन मयेड़ी मेरो यो जनम
तेरि कोखि महान, मेरा हिमाला.....

• धनेश कोठारी - 

फोटो साभार - Google

20 August, 2021

साहित्यकारों के कमरों की कहानी 'मेरा कमरा'


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प्रबोध उनियाल द्वारा संपादित 'मेरा कमरा' चालीस लेखकों के अपने अध्ययन कक्ष के संबन्ध में सुखद-दुःखद अनुभवों को समेटे पठनीय व संग्रहणीय कृति है। 

पुस्तक में साहित्यकारों के अध्ययन कक्ष या आवासीय लेखन कक्ष का लेखा-जोखा अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। समकालीन और तत्कालीन जीवन शैली की विविध चुनौतियों, रचनाधर्मिता में उपस्थित होने वाली समस्याओं, अनेक विसंगतियों और कुछ सकारात्मक पक्षों पर प्रकाश डालने वाली यह कृति लेखकों के जीवन के अनछुए पक्षों को प्रस्तुत करती है। इसमें संगृहीत वरिष्ठ व नए लेखकों के लेखों का सार प्रस्तुत करते हुए हर्ष हो रहा है। 

पुस्तक का पहला आलेख स्वयं सम्पादक प्रबोध उनियाल का है; शीर्षक है- वह अपना कमरा। इस आलेख को पढ़ते हुए लेखक के जीवन की अविस्मरणीय झलकियाँ मिलती हैं। उनके जीवन की अध्ययन और साहित्यिक प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है। वे किस प्रकार से किसी कम्पनी में नौकरी करते हुए भी किस प्रकार साहित्य को समर्पित रहे और उनके सामने क्या परिवारिक परिदृश्य उपस्थित हुए यही प्रमुख बात उभरकर आती है। साहित्य के प्रति लेखक की तन्मयता प्रेरणादायक है। 

अगला आलेख प्रसिद्ध साहित्यकार स्मृतिशेष गंगा प्रसाद विमल का है। मुझे 2019 में उनसे मिलने का सौभाग्य मिला था, उन्हें और मुझे नई दिल्ली में स्मृतिशेष डॉ. मृदुला सिन्हा द्वारा अंतरराष्ट्रीय जेपी अवार्ड से साहित्य सेवा के क्षेत्र में एक ही मंच पर सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

विमल जी सरल और विद्वान व्यक्ति थे। उनका आलेख इस पुस्तक में संगृहीत होना प्रसन्नता देता है। विमल जी के अंतिम आलेखों में से यह आलेख 'उस एकांत का अकेलापन' टिहरी गढ़वाल के चम्बा और सुरकण्डा क्षेत्र की सुंदरता के साथ ही लेखक के तत्कालीन अध्ययन और लेखन सम्बन्धी विवेचन को प्रस्तुत करता है। यह सुन्दर विवेचन है। 
अगला आलेख जनकवि और लाखों हृदयों के प्रिय डॉ. अतुल शर्मा का 'वो बुलाता है... हमेशा पास रहता है' शीर्षक से है। अतुल जी ने अपने पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व कवि श्रीराम शर्मा 'प्रेम' के के संदर्भों को प्रस्तुत करते हुए अपने बचपन, किशोरवय और युवावस्था के दिनों की स्मृतियों को अपने कमरे के साथ जोड़ते हुए प्रस्तुत किया है। 

उन्होंने बाबा नागार्जुन सहित अनेक साहित्यकारों की यादों को उकेरने के साथ ही उत्तराखण्ड आंदोलन के लिए लिखे गए अपने जनगीतों को भी उद्धृत किया है। लिटन रोड स्थित अपने घर के अध्ययन कक्ष को उन्होंने बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया। 

सुरेश उनियाल जी का आलेख 'जहाँ मेरे लेखक ने जन्म लिया' में गढ़वाल में पुराने समय में लैंप की रोशनी में अध्ययन करने से लेकर सुविधाओं के पहुँचने तक का सुन्दर शब्द चित्रण किया है। 

इसी क्रम में गंभीर सिंह पालनी का लेख 'किसको कहूँ - मेरा कमरा' ऋण लेकर बनाए गए शहरी आवासों की व्यवस्था और गहरा चिंतन है। उन्होंने अपनी समय-समय पर प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित और पुरस्कृत कहानियों की चर्चा आलेख में की है। उनके आलेख से प्रेरणा मिलती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति साहित्य को समर्पित रह सकता है। 

फिर शिवप्रसाद जोशी द्वारा लिखित 'जिंदगी के कमरे से होकर गुजरती दुनिया' टिहरी गढ़वाल के जाख-मरोड़ा से जयपुर, बॉन और फ्राईबुर्ग तक का सफर है। ग्रामीण जीवन के अध्ययन से शहरी जीवन तक कि झलकियों से सजा आलेख सुन्दर है। 

मदन शर्मा का लेख 'बीसवें मकान का कोने वाला कमरा' एक ही शहर में बदले गए अनेक कमरों का लेखा-जोखा है। इस लेख में लेखकों की पीड़ा प्रस्तुत की गई है। पत्नी हो या घर के सदस्य लेखक द्वारा रची गयी, प्राप्त हुई या प्रकाशनाधीन पुस्तकों के साथ कितनी उपेक्षा, दुराग्रह और निंदा का भाव रखते हैं यह आलेख में पठनीय और विचाणीय है। 

डॉ. सविता मोहन का लेख 'जब कमरा आकाश हो गया' बचपन की सुन्दर स्मृतियों- जिनमें उनकी दीदी की मार, लैंप, गिट्टे, पुराना पिचका सन्दूक और उनके पिता के नैनीताल के मकान की एक कोठरी इत्यादि हैं। निश्चित रूप से आलेख श्रेष्ठ है। बिना लाग-लपेट के लेखिका ने मन के उद्गार और तत्कालीन परिस्थितियों को प्रस्तुत किया है। 

कृष्ण कुमार भगत का लेख 'कमरा सँवारने का अधूरा ख्याल' में उन्होंने गृहशोभा, जाह्नवी और सरिता आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित अपनी कहानियों तथा अपना कमरा न बन पाने की पीड़ा उकेरी है। 

शालिनी जोशी का लेख 'सन्दूक वाला कमरा' उनके बचपन, दादी, मायके और एक सन्दूक की स्मृतियों को प्रस्तुत करते हुए महिलाओं की गहन पीड़ा को प्रस्तुत करता है। 

रामकिशोर मेहता का लेख 'मैं और मेरा कमरा' अपने कमरे पर एकछत्र अधिकार की पठनीय संकल्पना को प्रस्तुत करता है। 

डॉ. एचसी पाठक के लेख 'कई कमरों से गुजरी जिंदगी' छात्रावास से लेकर सरकारी आवास मिलने तक का चित्र खींचता है; जो पठनीय है। 

रणवीर सिंह चौहान का लेख 'पुराने घर की सूरत टटोलता हूँ' उर्दू के कुछ शब्दों को सहेजते हुए  उनके जीवन की झलकियों को प्रस्तुत करता है।

ललित मोहन रयाल का लेख 'कमरे के केंद्र में रहता हूँ मैं' लोकसेवक के जीवन के चित्रांकन से प्रारम्भ होता है और होम तथा स्वछंद कमरे की अवधारणा को पुष्ट करता है। लेख अच्छा है। 

अमित श्रीवास्तव का लेख 'मैं बार-बार लौटता हूँ वहाँ' सपनों और हकीकत के घर के बीच का तारतम्य प्रस्तुत करता है। 

हेमचंद्र सकलानी का लेख 'मेरा कमरा और माँ की सीख' टिहरी गढ़वाल भगवतपुर गाँव की स्मृतियों और उनकी माँ के संस्कारों पर प्रकाश डालता है; सुन्दर लेखन है। 

शशिभूषण बडोनी का लेख 'अपना कमरा जो आज भी सपना है' पारिवारिक जीवन की भेंट चढ़े कमरे के बाद अपना कोई निजी अध्ययन कक्ष न होने की पीड़ा प्रस्तुत करता है।

गुरुचरन लिखित 'कमरे का कंसेप्ट सोचकर अच्छा लगता है' श्रीनगर गढ़वाल में अपनी पढ़ाई के दिनों से लेकर बाद में परिवार तक का चित्रण है। 

जहूर आलम लिखित 'अपने कोने की तलाश आज भी' अभावों के जीवन को चित्रित करता पठनीय लेख है।
 
महिपाल सिंह नेगी 'हम किताबों के कमरे में रहते हैं' किताबों के साथ परिवार और अपना सामंजस्य और आत्मीयता को प्रस्तुत करता सुन्दर लेख है। 

जगमोहन रौतेला का लेख 'आज भी प्रतीक्षा है उस कोने की' पत्रकारिता के जीवन में अध्ययन कक्ष की महत्ता का सुन्दर प्रस्तुतीकरण है। 

योगेश भट्ट का लेख 'मैं, मेरा कमरा और खुली खिड़कियाँ' घर में अपने एक अलग कमरे की विशेषता को दर्शाता सुन्दर आलेख है। 

रंजना शर्मा का लेख 'हम बहते धारे' यादों के कैनवास पर अतीत और वर्तमान के दृश्यों को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करता है। 

शिवप्रसाद सेमवाल का लेख 'न मालूम कितने घर और कमरे बदले' गढ़वाल के रुद्रप्रयाग, उखीमठ से शुरू करते हुए बेसिक शिक्षा अधिकारी, देहरादून बनने तक और उसके बाद कि उनकी जीवन यात्रा को प्रस्तुत करता है। 

मुकेश नौटियाल का लेख 'जहाँ शब्द ढल जाए वही लेखन कक्ष' उनके गाँव से लेकर अपना व्यक्तिगत अध्ययन कक्ष तक के सफर को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करता है। 

अनिल कार्की का लेख 'मेरे पढ़ने-लिखने का कमरा' कुमायूँ मण्डल के पिथौरागढ़ और नैनीताल की स्मृतियों को पठनीय बनाता है। 

डॉ. एमआर सकलानी का लेख 'मेरा कमरा' उनके दादाजी के घर चम्बा तथा उनके ननिहाल (जो अमर शहीद श्रीदेव सुमन का भी गाँव है- जौल) की महत्त्वपूर्ण स्मृतियों को दर्शाता श्रेष्ठ आलेख है। 

जगमोहन 'आजाद' 'वजूद का हिस्सा है वह कोना'  गाँव से शुरू करके परिवार और बेराजगारी की  पीड़ा को प्रस्तुत करता उत्तम आलेख है। 

चंद्र बी. रसाइली का लेख 'मेरे दिल और दिमाग का वर्कशॉप' उनकी अपनी आलमारियों में 30 वर्ष का स्केच है। यह लेख उनकी अध्ययनशीलता को दर्शाता है। 

राजेश पाण्डेय का लेख 'जिसकी दीवारों से बातें की मैंने' कमरे की सजीवता को प्रस्तुत करने वाला सुन्दर आलेख है। 

दिनेश कुकरेती का लेख 'एक कमरा बने न्यारा' देहरादून और मेरठ की उनकी स्मृतियों को प्रस्तुत करते हुए अध्ययन कक्ष की आवश्यकता व महत्त्व को दर्शाता है।

राजेश सकलानी का लेख 'लेखन की जगहें' अध्ययन कक्ष की उनकी संकल्पना को प्रस्तुत करता है। 

रुचिता उनियाल का लेख 'मेरा कमरा मेरा साथी' उनके विद्यार्थी जीवन में उनके मायके के कमरे से विवाहोपरांत बिछड़ने की पीड़ा को प्रस्तुत करता है। 

नवीन चन्द्र उपाध्याय का लेख 'जहाँ रहा वहाँ अपना कोना दूँढ लिया' परिवर्तनशील जीवन का यथार्थ दर्शाता है। 

महेश चिटकारिया का लेख 'बिना खिड़की के वह कमरा' उनके कॉलेज के दिनों की यादों को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करता है। 

ज्योति शर्मा का लेख 'कमरे की दीवारें अब आँसुओं से भीग गई' ससुराल के रिवाजों और मायके के विविध घटनाक्रम और पीड़ाओं को अभिव्यक्त करता है।

डॉ. अशोक शर्मा का लेख 'कमरों के साथ होता रहा बदलाव' ऋषिकेश, पठानकोट और लैंसडाउन इत्यादि स्थानों पर प्राचार्य रहते हुए उनके जीवन के विविध पक्षों का चित्रण है। 

प्रीति बहुखंडी के लेख ' कमरे में मैं और मुझमें कमरा' 'घर' और मन की संकल्पना को दर्शाता है। 

वैशाली डबराल का लेख 'साहित्य साधक का कमरा' 20 वर्षों के उनके अनुभव और अध्ययन को समेटे हुए है। 

रोशनी उनियाल का लेख 'मिट्टी की महक वाला कमरा' उनके बचपन की यादों को सँजोये हुए है।


किताब- मेरा कमरा, 
सम्पादक- प्रबोध उनियाल, 
प्रकाशक- काव्यांश प्रकाशन, ऋषिकेश, 
पृष्ठ- 180  
मूल्य- रु. 250
समीक्षक- डॉ. कविता भट्ट 'शैलपुत्री'

अद्भुत थी कवि चंद्रकुँवर बर्त्वाल की काव्य-दृष्टि

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• बीना बेंजवाल / 

कैलासों पर उगे रैमासी के दिव्य फूलों को निहारने वाली कवि चंद्रकुँवर बर्त्वाल की काव्य-दृष्टि उस विराट सौंदर्य चेतना से संपन्न हो उन्हें रैमासी कविता का कवि बना गई। प्रकृति के इस सान्निध्य में ऋषियों जैसी सौम्यता लिए कवि स्वयं कहते हैं- 

मेरी आँखों में आए वे
रैमासी के दिव्य फूल! 
मैं भूल गया इस पृथ्वी को
मैं अपने को ही भूल गया! 

सम्मोहन की इस स्थिति में जागृत हुई उनकी काव्य चेतना! और ऐसी उच्च भावभूमि पर खिली कविता का परिवेश भी हिमालयी हो गया! फूलों के ऐसे देश चलकर घन छाया में नाचते मनोहर झरने देखने तथा तरुओं के वृंतों पर बैठे विहगों की मधुर ध्वनियाँ सुनने के साथ कविता समवेत स्वर में गाने का भी ’आमंत्रण’ देने लगी-

आओ गाएँ छोटे गीत
पेड़ और पौधों के गीत
आओ गाएँ सुन्दर गीत
नदी और पर्वत के गीत
आओ गाएँ मीठे गीत
पवन और माटी के गीत
आओ गाएँ प्यारे गीत
भूमि और भुवन के गीत। 

कवि इस पर्वत प्रदेश में ’नागनाथ’ की महापुरातन नगरी के बाँज, हिम-से ठण्डे पानी, लाल संध्या-से फूलों को देखते हुए काफल से स्नेह रखने वाले काफल पाक्कू का स्वर पूरे साहित्य जगत को सुनाने लगा-
मेरे घर के भीतर, आकर लगा गूंजने धीरे एक मधुर परिचित स्वर-

’काफल-पाक्कू’ ’काफल-पाक्कू’
’काफल-पाक्कू’ ’काफल-पाक्कू’। 

प्रेम को गहराई से जीने वाला यह कवि गिरि शिखरों पर छाये ’घन’ के गर्जन में सागर का संदेश पढ़ता रहा। मछलियों की चल-चितवन देखता रहा। और ’मन्दाकिनी’ से उसकी कविता इस तरह संवाद करती रही-

हे तट मृदंगोत्ताल ध्वनिते,
लहर वीणा-वादिनी
मुझको डुबा निज काव्य में 
हे स्वर्गसरि मन्दाकिनी।

प्रकृति की स्थानीयता के साथ कवि की वैश्विक दृष्टि संपन्नता मानवता की रक्षा हेतु वृक्षों से छाया, नदियों से पानी लेने वाले ’मनुष्य’ से स्वार्थ छोड़ प्रेम भाव अपनाने की बात कहते हुए ’नवयुग’ का आह्वान करती है-

आओ, हे नवीन युग, आओ हे सखा शान्ति के 
चलकर झरे हुए पत्रों पर गत अशान्ति के। 

’हिमालय’ और ’कालिदास के प्रति’ जैसी कविता लिखने वाली कवि की कलम यथार्थ के धरातल पर खड़ी हो ’कंकड़-पत्थर’ के माध्यम से बदलाव का संकेत देती हुई प्रयोगधर्मिता की ओर बढ़ती नजर आती है। 

प्रकृति के विराट रूप के दर्शन कराती कवि की कविता उनकी अस्वस्थता के कारण अंत में ’क्यों ये इतने फूल खिले’, ’रुग्ण द्रुम’ और ’क्षयरोग’ की बात करती हुई द्वार पर अतिथि बन आए मृत्युदेव ’यम’ को भी संबोधित करने लगी। ’पृथ्वी’ कविता का यह कवि प्राणों के दीपक को विलीन कर देने वाले अंधकार में अपने उर की ज्योति को शब्दों में सहेज यह कहकर 14 सितम्बर 1947 को अपनी इहलीला संवरण कर गया कि -

मैं न चाहता युग-युग तक 
पृथ्वी पर जीना
पर उतना जी लूँ
जितना जीना सुंदर हो।

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( लेखिका बीना बेंजवाल उत्तराखंड की वरिष्ठ साहित्यकार हैं )

19 August, 2021

प्रकृति का हमसफ़र छायाकार डॉ. मनोज रांगड़

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• प्रबोध उनियाल

चेहरे में हमेशा मुस्कान, व्यवहार में बेहद आत्मीयता और प्रकृति को अपनी ही नजर से देखने का अंदाज अगर देखना हो तो एक बार आप जरूर डॉ. मनोज रांगड़ से मिल सकते हैं.

यूँ तो तस्वीरें बोलती ही हैं लेकिन अगर ये मनोज रांगड़ के कैमरे से खींची हों तो रुकिए! ये तस्वीरें आपसे संवाद भी करेंगी. उनका कहना है कि फोटोग्राफी उनका पेशा नहीं, ये तो उनका जुनून है या कह लो कि सुकून भी.

https://www.bolpahadi.in/2021/08/uttarakhand-nature-cinematographer-dr-manoj-rangad.htmlhttps://www.bolpahadi.in/2021/08/uttarakhand-nature-cinematographer-dr-manoj-rangad.html

मनोज जी टीएसडीसी में प्रबंधक पर्यावरण के पद पर कार्यरत हैं. वही ओशो ध्यान केंद्र से भी जुड़े हैं. जहाँ वे अध्यात्म और ध्यान-योग में लीन होकर स्वामी बोधि वर्त्तमान हो जाते हैं. अध्यात्म दर्शन नहीं है, अध्ययन-आत्म इसका शाब्दिक अर्थ है. तब जब ये आत्मा और प्रकृति के साथ हो तो विग्रह में अलौकिक छवि का उतरना स्वाभाविक ही है.

आज विश्व फोटोग्राफी दिवस है। ऐसे में प्रकृति के इस चितेरे फोटोग्राफर को शुभकामनाएं तो दी ही जानी चाहिए. उम्मीद है कि आगे भी आपकी आँख और कैमरे के बेहतर सामंजस्य से हमें प्रकृति के अद्भुत नजारे देखने को मिलते रहेंगे जो आप अपने किसी मन के कोने से खींच कर लाते हैं। 

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प्रत्येक वर्ष एक जनवरी को वे ऋषिकेश में राकेश सहाय जी की स्मृति में फोटो प्रदर्शनी का आयोजन करते हैं जो कला प्रेमियों के इन चित्रों को बेहद करीब से देखने और समझने का एक मौका होता है।

आप और आपके सहयोगी संदीप अवस्थी को पुनः इस अवसर पर ढेर सारी शुभकामनाएं.

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- डॉ. मनोज रांगड़







12 August, 2021

गढ़वाली भाषा के 'की-बोर्ड' हैं 'नरेन्द्र सिंह नेगी'

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• बीना बेंजवाल


शब्द विभूति एवं लोकानुभूति के माध्यम से गढ़वाली भाषा के संरक्षण, उसके प्रचार-प्रसार में अभूतपूर्व योगदान देने वाले नरेन्द्र सिंह नेगी युग प्रतिनिधि गीतकार एवं गायक हैं। उन्होंने शुरुआती दौर में पारंपरिक लोकगीतों को गाकर गढ़वाली भाषा को एक पहचान दी। लगभग तीन दर्जन कैसेट्स में लोकगीतों, गढ़वाली गीतकारों द्वारा रचे गीतों को गाने के साथ-साथ स्वयं 200 से अधिक गीत रचकर, उन गीतों को संगीत एवं स्वर देते हुए गढ़वाली भाषा के विकास में अपना ऐतिहासिक योगदान देते आ रहे हैं। 


गढ़वाली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की बात जोर-शोर से उठ रही है। बोलने वालों की संख्या कम होते जाने के कारण इसे उस मुकाम तक पहुँचाना चुनौतीपूर्ण है। ऐसी स्थिति में आप गीत, कविता, संगीत एवं गायन के साथ विभिन्न मंचों और अब सोशल मीडिया के माध्यम से भी गढ़वाली भाषा के प्रति जन-जन में लगाव पैदा करते आ रहे हैं। भाषा के जिस मानक रूप को आपने अपनाया है, वह सर्वमान्य एवं सर्वस्वीकृत है। यही कारण है कि आपके गीतों को इतनी ख्याति मिली है। 


अभी तक नेगी जी के चार गीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं इनके गीत साहित्य में लोक संस्कृति का आलोक तथा प्रकृति का अपार वैभव बिखरा पड़ा है। 'खुचकण्डी' में संजोई गई गीतों की धरोहर लेकर अपनी गीत यात्रा में आगे बढ़ते हुए 'गाण्यूँ की गंगा अर स्याण्यूँ का समोदर' के गीत गुनगुनाकर सबको आह्लादित करते हुए फिर जनपक्षीय रचनाओं की पोथी 'मुट्ट बोटिकि रख' की सौगात भी आपने समाज को दी है। आपका चौथा गीत संग्रह 'तेरी खुद तेरु ख्याल' फिल्मों के लिए लिखे गए गीतों  का संकलन है। 


पहाड़ की अत्यंत विविधतापूर्ण जीवन चेतना को वाणी देने वाले गीतकार नेगी जी ने श्रुतिमधुर शब्दावली का प्रयोग करके गढ़वाली की अकूत शब्द-संपदा से परिचित कराया है। आम बोलचाल की भाषा को आधार बनाकर उन्होंने एक से बढ़कर एक गीतों का प्रणयन किया है। प्रकृति एवं मानव दोनों के रूप चित्रों को इन्होंने बड़े सुंदर ढंग से अपने गीतों में उकेरा है। सूक्ष्म सौंदर्य चेतना एवं विचारों का औदात्य इनके गीतों का प्राण तत्व है। इनकी भाषा कभी बुरांस की लालिमा से मन को रंग देती है तो कभी फ्यूंली की पीताभा से उसे बासंती बना देती है। जहाँ एक ओर हिमालय की भव्यता, उसकी रमणीयता का वर्णन करने वाली इनकी लोकभाषा उसके सौंदर्य से जगमगाती है वहीं दूसरी ओर खाली मकानों, प्यासे बर्तनों, दरकते पहाडों तथा पलायन करते लोगों का दुःख-दर्द बयां करते हुए अंतर्मन को झकझोर देती है। 


नेगीदा की भाषा में स्थानीयता के सभी रंग बिखरे पड़े हैं। ग्रामीण संवेदना के इस गीतकार के गीत लोकभाषा की लयात्मक शक्ति से संपन्न हैं। इन्होंने लोकमाटी का मन पढ़ा है। पहाड़ का लोकजीवन इनके शब्द-शब्द में धड़कता है। खेतों की गूलों से होकर गाड-गदन्यों के संगीत से लयबद्ध इनकी भाषा गंगा-सा रूप धर लेती है। उसमें 'पैंणै' की पकोड़ी का स्वाद है। किसी 'कौथिगेर' के गहनों की छणमणाहट है, बाँसुरी की भौण है और है 'म्वारियों' का रुमणाट। 


लोकजीवन से ऊर्जा ग्रहण करने वाली इनकी भाषा की जड़ें लोकमाटी में गहराई तक धंसी हैं। जिस गढ़वाली को बोलने में हम कतराते हैं इन्होंने उसी की शक्ति को पहचाना और उसे प्रसिद्धि दिलाई। गढ़वाली का शब्द वैभव इनके काव्य में अपनी स्निग्धता एवं भव्यता के साथ दमकता है। अपनी उर्वर कल्पनाशक्ति के बल पर इन्होंने लय और छंद के अनुसार शब्दों को ध्वनियों के सांचों में बखूबी फिट किया है। किसी छुंयाळ की पोल-पट्टी खोलने वाला ये गीतकार खुद खेत, जंगल, धारा, मंगरा, ऊँचे पर्वत, गहरी घाटी तथा डांडी-कांठियों की छ्वीं लगाते नहीं थकता। अनुभवप्रवण इस गीतकार की काव्य प्रेरणा छिल्लों की तरह जलकर अपनी भाषा के प्रति मन में फैले उदासीनता के घटाटोप अंधेरे को पिघलाकर उस परिदृश्य पर एक उजास की तरह छा जाती है। और तब वबरा, खोळी, चौक, खेत, जंगल इतने करीब आ जाते हैं कि उन्हें भेंटने का मन करता है। 


नेगी जी के पास शब्दों की टकसाल है जिससे निकले शब्दों की खनखनाहट इनके गीतों में साफ सुनी जा सकती है और जिसने गढ़वाली के शब्द भण्डार में वृद्धि करके उसे समृद्ध किया है। इनके व्यक्तित्व की सरलता एवं सहजता इनकी भाषा में भी स्पष्टतः दृष्टिगोचर होती है। यांत्रिकता के बहरा बना देने वाले इस शोर में ये झरने, हवा, पंदेरों, गधेरों, वनपाखियों तथा रिमझिम बरखा से धुनें लेकर गढ़वाली को प्राणवान बनाए हुए हैं। जब व्यावसायिकता के इस अंधड़ में हमारी लोकसंस्कृति तथा लोकभाषा नष्ट-भ्रष्ट हो रही हैं, ये एक ग्वाले की तरह भाषा के सुरम्य जंगल में कलम की सोटगी पकड़ उन शब्दों की भी रखवाली कर रहे हैं जो लोकस्मृति से विस्मृत होते जा रहे हैं। संस्कृति और भाषा के ह्रस के इस भयावह समय में भी कलम और सुर का यह सिपाही अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। 


नेगी जी शब्दों से बट्टी खेलते हैं। लोकमाटी में से खोज-खोजकर उठाए गए ये शब्द इनकी लेखनी से खेले जाते हुए इनके गीतों में अपनी स्फटिक आभा बिखेरते हैं। इनका शब्द वैशिष्ट्य भाषा के बुग्यालों, फूलों की घाटियों, हिंवाळि कांठियों की सैर का ही परिणाम है। एक फुलारी की तरह लोक से चुनकर हर हृदय के द्वार पर रखे जाते उनके पुष्प रूपी कतिपय शब्दों का वैभव इस प्रकार है :-


प्रकृति एवं जनजीवन संबंधी शब्दावली-

प्रकृति एवं जनजीवन संबंधी शब्दों के माध्यम से नेगी जी ने हमारी संवेदना की रक्षा का काम किया है। पहाड़ के प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक वैभव को उजागर करने वाले शब्दों का इनके गीतों में समारोहपूर्वक प्रयोग हुआ है। इनकी लेखनी का स्पर्श पाते ही ये शब्द रसीले काफलों की तरह अंतर्मन में एक छपछपी लगा जाते हैं। लोकजीवन एवं लोक संस्कृति के अक्षय रस-स्रोतों से शक्ति प्राप्त करके ही इन्होंने गढ़वाली भाषा को ऊर्जा प्रदान की है। तभी तो ये आत्मविश्वास पूर्वक कह सके हैं -


मिट्ठी बोली मिट्ठी भाषा, ल्हीजा ई च समळौंण मेरा गौं मा...। नेगी जी के गीतों में इसी मिट्ठी भाषा का शब्द सौष्ठव -


प्रकृति - 

हिमालै, सुर्ज, जोनि, गैणा, सर्ग, अगास, बरखा, गंगा, जमुना, पाणि, नयार


वनस्पति- 

बांज, बुरांस, कांस, देवदार, कुळैं, पय्यां, अयांर, माळू, ग्वीर्याळ, रंसुळा, कैल, रिंगाळ, सेमल, तोण, डैंकण, भीमल, खड़ीक, गैंठी, पीपळ, खर्सु, मोरु, कण्डाळ, मळसु, भंगेलु


फल- 

काफळ, बेडु, भमोरा, तिमला, मेळु, घिंघोरा, हिंसर, किलमोड़, तोतर, आम, अखोड़, स्यो, आरु, अनार, नारंगी 


फूल- 

बुरांस, फ्यूंली, जई, सकीना


जीव-जंतु - 

गौड़ि, बळ्द, बछुरु, भैंसि, बागि, कुकूर, बिराळ, ढेबरा, बखरा, खाडु, लगोठ्या, बुगठ्या, स्याळ, घ्वीड़, बाघ, बांदर, मूसा, छिपाड़ा, मैर, पोतळि, चिमाड़ा, म्वारि, भौंर, गरूड़, चकोर, कफ्फू, घुघुती, घिंडुड़ि, हिलांस, चोळि


महीने (बारामास) - 

चैत, बैसाख, जेठ, असाड़, सौंण, भादों, कातिक, मंगसीर, पूस, मोऊ, फागुण 


ऋतुएँ- 

मौळ्यार, बसंत, रूड़, बसग्याळ, चौमास, ह्यूंद


पहर- 

सुबेर, दोफरा, ब्यखुनि, रुमुक


मकान संबंधी- 

खोळी, देळि, द्वार-मोर, मोरि, डंड्याळी, तिबारि, छज्जा, सतीर, धुर्पुळू, ढैपुरा, ओबरा, पठाळि


बर्तन -

ठेकि, कितली, परोठी, तौलि, डिग्चि, थकुलि, डौली, कसेरी


अनाज- 

ग्यूं, जौ, झंगोरु, कौंणि, चौंळ, भट्ट, गौथ, लय्या


भोजन सामग्री - 

खीर, दुदभाति भात, दाळ, खिचड़ी, मुंगाणी, रोटि, कोदाळी, भुज्जि, पकोड़ि, मूळै थिंच्वाणी, जख्या की तड़का, माण्ड, च्यापति, ग्यूंकि फुल्की, घ्यू, दूद दै छांछ, नौण, गुड़, चणा, भेली, खाजा, बुखणा, काखड़ी, मुंगरी, ऊमि, सैत


घरेलू एवं कृषि उपकरण- 

थमाळी, दाथि, कुटळि, जूड़ी, बक्सा जंदरी उरख्याळु, गंजेळि, कुलाड़ि, आरि, छतरु, सिलोटी, हौळ, डिल्लु

 

त्योहार - 

बिखोति, बग्वाळ, इगास, पंचमी, फूलपाती, होरी


देवी-देवता- 

गणेस, सिव, नारैण, नरसिंग, नागरजा, भैंरों, बजरंग, भगवती, सरसुती, केदार, बदरी, पण्डौं


लोकगीत / लोकनृत्य- 

झुमैलो, थड़्या, चौंफला, बाजूबंद


वस्त्र-  

झुलि, साड़ी, धोती, बिलोज, सदिरि, चदिरि, टल्खि, टोपलि 


गहने- 

नथुलि, हंसुळि, मुरखलि, बिसार, सूत, चूड़ी, धागुला, झंवरा


श्रृंगार सामग्री -

बिन्दी, बेंदुली, फोन्दि, सुरमा, टिकुलि, लालि, पौडर

 

रिश्ते-नाते-

ब्वे, बोई, बाबा, नौनि, नौनु, बोडा, बोडी, कक्का, काकी, दादि, दादा, भै, बैण, भैजि, दिदा, बौ, भौजि, स्वामी, द्यूर, द्यूराण, जेठ, जिठाण, भेना, स्याळि, सासु, ससुर, ब्वारि, नाति, नतेणा, मयेड़ी, समदेण, सौत, गैल्या, सौंजड़्या


शरीरांग -

दंतुड़ि, उंठिड़ि,  आंखि, डेबळी, कंदुड़ि, मुक्क, मुखड़ि, गिच्चु, जीब, चौंठि, गौळि, मूण, कांध, जिकुड़ि, मुंड, अंगोठु, भट्यूड़, खोपरि, कपाळी, कंदुड़ि, लटुलि, धौंपेलि, हात, गलोड़ि, हटगि, हत्थि-खुट्टि, हतगुळी, पोटगी, गेर, फांड, घुण्डा, फिफना, कळेजी, कमर, 


बीमारी - 

मुण्डारु, बुखार, दाड़ पिड़ा, पिसड़ा 


समूहवाची -

घिमसाण, फौज, कछड़ी, भीड़, पंचैत, कुटुमदारि, मौ, मवासि, पट्टी, कौथिग, रैली


जीवन की अवस्थाएँ- 

बाळापन, ज्वानि, बुढ़ापा 


भाव एवं कार्य - 

भल्यार, खुद, सुदबुद, सक्क, स्येळि, निवाति, पुजै, अंग्वाळ, फाळ, बौलु, बिस्वास, सेवा, निंद, सगोर, मान, निसाब, भलै, बुरै, मजुरि, बिरधी, भयात, मनख्यात, चाल, जस, असंद, भरम, घंघतोळ, हौंस, यकुलांस, बैराग, बैम, भरमणा, भमाण, सांसु, टक, पिड़ा, आस, सेक्कि, उमाळ, त्रास, माया, प्रेम, खैरि, चैन, सरधा, सर्म, गैलु, तीस, कुतगिळि, भताग, छुछकार, पाण, पछ्याण, किरपा  स्याणि, असगार, फजितु, बिणास, 


विशेषण शब्दों का सौंदर्य- 

नरेन्द्र सिंह नेगी जी की रंगों की छटा बिखेरती शब्दावली में हिंवाळि कांठी चांदी तथा पितलण्यां मुखड़ी सूनै के रंग में रंगी नजर आती हैं। 'किरमिची केसरी रंग की बार प्रेम के रंग में भिगो देती है। भाषा भी नीली, पिंगळी, हैरि लाल मुखड़ी लिए गुलाल मलने को उत्सुक दिखाई देती है।


स्वभाव संबंधी शब्द द्रष्टव्य हैं- 

मयाळु, जिदेरि, हौंसिया, रंगमतु, रसिया, बौळ्या, मायादार, उदमातो, लाटी, खुदेड़, निरदैई, निठुर, रिसाड़, नखर्याळ, छुंयाळ, ज़ुल्मी, झूटा, खुसमिजाज


स्वाद- 

मिट्ठी, खट्टि, कड़ि, चटपटु चरचरु, बरबरु, चलमला, मरचण्या


स्पर्श -

गुंदक्यळि, निवाति, ताती, कठोर, कुंगळि


(नेगी जी की लेखनी से निःसृत खड्योणी, निहोण्या, निरभागी तथा बेमान जैसे नकारात्मक विशेषण भी शिकवे-शिकायत के लहजे में ही सही पर संबोधित व्यक्ति के प्रति विशेष लगाव एवं अनुराग की प्रतीति कराते हैं। 

सुपिन्या अर्थात् सपनों के लिए 'चलमला', मजाक के लिए 'खट्टि', गाळि के लिए 'मिट्ठी', माया के लिए 'खोटी' तथा बाटों यानी रास्तों के लिए 'सौतेला' जैसे विशेषणों का प्रयोग अनूठा है।) 


उनके गीतों में प्रयुक्त कुछ विशेषण विशेष्य - 

मायादार आँखि, तैलु घाम, बिगरैला बैख, रौंत्यळो मुलुक, अधीतो पराण, चटपटु ठुंगार, रूखा डांडा, मौळ्यां घौ, कंकर्याळू घ्यू, हौंसिया उमर, छुंयाळ आँखि, झुटा सुपिन्या आदि।


अनुकरणमूलक क्रिया विशेषणों का सौंदर्य- 

नेगी जी के गीतों में अनुकरणमूलक शब्दों की द्विरुक्ति से बनने वाले क्रिया विशेषण शब्दों का प्रयोग बड़ी खूबसूरती से हुआ है। यथा- खिल्ल-खिल्ल हैंसद जांद, खित-खित हैंसण, धमा-धम्म हिटण, टप्प-टप्प ह्यूं -सी गळण, ठुमुक -ठुमुक हिटीकि ऐ, सुरक सुपिन्यों मा ऐक, घळ्ळ घूळण, चट्ट चीमिली, घट्ट घूट्यालि, झम्म झौळ लगण, खळ्ळ खतेण, खस्स रड़दि गयूं, गर्र निंद पड़ण, सराररा कुयेड़ी छैगे, हिरिरिरि बर्खा झुकी आंद, तराररा झुलि रुझैगे, झराररा जिकुड़ि झुराण तथा छुळ्ळ-छुळ्ळ देखण।


नरेन्द्र सिंह नेगी जी की शब्दावली को जब समूचा उत्तराखंड समझता है तो उनके गीतों में प्रयुक्त गढ़वाली शब्दों को ही मानक मानने में एतराज नहीं होना चाहिए। साफ शब्दों में हम कह सकते हैं कि नेगी जी गढ़वाली भाषा के 'की बोर्ड' हैं। 

(गढ़ नंदनी  2011-12 में प्रकाशित लेख का अंश)

फोटो साभार- विनय केडी 


https://www.bolpahadi.in/2021/08/narendra-singh-negi-keyboard-of-Garhwali-language.html

(लेखिका बीना बेंजवाल उत्तराखण्ड में गढ़वाली और हिंदी भाषा की वरिष्ठ साहित्कार हैं)

14 July, 2021

विलक्षण, बहुमुखी, प्रखर मेधा के धनी हैं ‘गणी’

https://www.bolpahadi.in/2021/07/Gani-is-unique-versatile-rich-in-intelligence.html


• नरेंद्र कठैत - 


अग्नि, हवा और पानी- इन तीन ईश्वर प्रदत्त तत्वों के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। चाहे हम मंगल तक की दौड़ लगा लें या दूर प्लेटो तक की। किंतु जहां जीव जगत के लिए ये तत्व हितकर हैं वहीं इनकी अति भी अहितकर सिद्ध हुई। इसलिए ये तीन तत्व हमारे लिए अमरतत्व भी हैं और गरल भी। किंतु जिसने इन तीन तत्वों में स्वयं को ढालने की आत्मशक्ति विकसित कर ली वही सच्चा साधक है और लोकप्रिय भी। सच्चे साधक और लोकप्रियता की इसी श्रेणी में आते हैं विलक्षण, बहुमुखी, प्रखर मेधा के धनी, मातृभाषा प्रेमी भ्राता गणेश खुगशाल ‘गणी’!


गणी दा की गिनती जनप्रिय अथवा लोकप्रिय महानुभावों की श्रेणी में यूं ही नहीं होती। मंच संचालन और गणी- यह अब एक किवदंती सी है बन पड़ी। किंतु मंच संचालन और ध्वनि यंत्रों से पहले आपकी सजग जनपक्षीय लेखन यात्रा 1989 से 2001 तक क्रमशः ‘दैनिक अमर उजाला’ तथा ‘दैनिक जागरण’ के संवाददाता से शुरू हुई। यकीनन कविताएं उससे पहले भी आपके लहू में रही होंगी। स्वनामधन्य गीतकार नरेन्द्रसिंह नेगी का सानिंध्य मिला तो भाषा पर पकड़ और कविता की समझ बढ़ी। अतः यह लिखने में भी कदापि गुरेज नहीं कि आप आज जहां पूर्णकालिक पत्रकार हैं वहीं सजग कवि भी हैं और गूढ़ साहित्यकार भी! और यूं- चाहे वह किसी भी क्षेत्र की रही हो जमीन- तपे, मंझे, सधे ‘गणी दा’ जहां खड़े हुए- वहीं उन्होंने अपनी एक अलग ही छाप छोड़ी। 


अलग छाप और छपे हुए दस्तावेजों के बीच सन 2014 में ‘विनसर प्रकाशन’ से ‘वूं मा बोलि दे’ नाम से एक पुस्तक निकली। पुस्तक के लेखक हैं- गणेश खुगशाल ‘गणी’। लेकिन यह बात हर पाठक, कलमकार के मन में निश्चित रूप से उठी कि दशकों से लेखनरत और संचयन में इतनी देरी? वास्तव में- एक लम्बे अंतराल के बाद गणी दा के संचयन की यह पहली कसरत थी। किंतु कभी भी, किसी को भी अलग से गणी दा को संचयन में देरी का कारण पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। क्योंकि उन्होंने इसी संकलन में लिखा है कि -


‘किताब की सकल ल्हेकि तुम तक पौछण मा सत्ताईस साल लगि गेनि मेरी कविता तैं। मंच मा त मि कविता छंटि-छंटि ल्यांदो छौ। सुणदरौं तैं सुन्दर लगदि छै तब छपछपि पड़ि जांदि छै। पर किताब छपण मा डौर लगदि छै कि न हो क्वी कुछ बोलु, किलैकि किताब मा त सबि बानी कवितौंल औंण छौ। अब, जब सर्या किताब छाप्याली त इन डौर लगणी छ कि न हो क्वी कुछ बि नि बोलु।... ई सर्या जंकजोड़ छ ‘वूं मा बोलि दे’। 


 गणी दा! भले ही अपने इस काव्य संग्रह को सताईस साल का जंकजोड़ कह लें लेकिन पिछले दो दशक में इतने मंझे हुए अंदाज में गढ़वाली भाषा का कोई काव्य संग्रह मेरी दृष्ठि में आया ही नहीं है। इस काव्य संग्रह में गणी दा ने विभिन्न काल-खण्डों में लिखी गई रचनाओं को मैत बिटि, गौं गाळ, उकरान्त, हमारा मनै, जीवन मा, आणौं मा कविता, ब्वन पर औंदन त, नीत्यूं कि नीति जैसे खण्डों में उनके भावों के अनुरूप अभिव्यक्ति दी है।


आपके भावों की अनुभूति में माँ पहली पंग्ति में है। माँ पर आपने भावनाएं गहराई से व्यक्त की हैं। माँ को संबोधित करते हुए लिखा है-

‘त्यरा खुटौं कि/बिवयूं बिटि छड़कद ल्वे

पर तू नि छोड़दि

ढुंगा माटा को काम

आखिर/कै माटै बणीं छै तु ब्वे?’


-या-

सर्रा पिरथ्या दुख वींकै भागौ छा धर्यां/अर वींल बोटि मुट्ठ अर सबि दुख वां मा अटर्यां।’ - या कि- ‘जुगु-जुगु बिटि ज्यूंदि छ वींकि प्रीत/यांलै सैरि दुन्या लगांद अपणि ब्वे का गीत।’


-अथवा-


‘तब अच्छि लगिन/घासै पूळ अर लखड़ू बिट्गि/फुल्यूं लया, धण्ये क्यारी/ पिंगळी मर्च, लगुलि उंद लगीं कखड़ि/ गोड़ि बाछि, ठेकि मा पिजयां दूधौ फेण/ हैरि गिंवड़ि भ्वरीं सट्यड़ि/ जबरि तक ब्वे बचीं रै।’ 


निसंकोच कह सकते हैं कि मां पर लिखे आपके ये एक अलग ही ढंग के काव्याचरण हैं।


इसी संचयन के मध्य ही कर्मठ नारी की महिमा भी उच्च कोटी की लिखी है- ‘यूं डांडौं मा यूं डांडौं से बड़ो फंचु च वीं मा।’ और- शृंगारिक छवि देखिए- 

‘मिन तेरी आंख्यू मा देखी/ पिंगळदप्प फूल कखड़ि को....। मिन तेरी आंख्यूं मा देखी/ कौंपदा ह्यूंद मा खिल्दु पयां।’ 

लेकिन पहाड़ में अब वह रौनक कहां! पहाड़ से जो नीचे उतरा वह ऊपर चढ़ने का साहस न बटोर सका। और अपने पीछे छोड़ गया सुनसान घर आंगन और दरवाजे पर लटकता ताला। ताले के लीवर को भी कुछ समय बाद जंक चाट गया। 


लिखते हैं गणी दा!-

‘जब बोलण पर अंदिन कूड़ि/ त आदम्यूं से जादा बोलदन....

हम त वूंको भरोसु छां जो/हमूं तैं यूं मोरुंद लटकै गेनी/ लोग लीवर बोलदन ज्यां खुणि/ हमारि त अंदड़ि चाट्यलिन जंकन।’ 

या-

कइ कूड़ि यन्नि कि/ अगनै ताळा लग्यां अर पिछनै कूड़ि खन्द्वार होंयीं।.../ वूं खंद्वार कूड़यूं का भितर जमीं कंडळी/ पौंछिगे धुरपळा तक/ व झपझपि कंडळी लपलपि ह्वेकि बोनी कि/ मि कबि नि जमदू कैका भितर...’


कवि का कार्य मात्र लिखना भर नहीं। कवि का एक संदेश उनके लिए भी है जिन्होंने वर्षों से अपना पुस्तैनी घर देखा ही नहीं है।-

‘पुंगड्यूं का ओडा जख्या तखि छन/सरकंदरा क्वी नि छन

ऊंको दुबलो/हमारा पुंगड़ सौरिगे

वूं मा बोलि दे।’  


किंतु संदेश पहुंचाकर भी क्या करें? क्योंकि आबाद गांवों की स्थिति भी बड़ी अजीबोगरीब हो गई है। गांवों वह अजीबोगरीब तस्वीर आपने कुछ यूं खींची है- 

‘दिनभर तास ख्यलदा बैख/ य त गौं का घपलै पंचैत। - ईं दुन्या मा क्या ई गौं रे गे छौ सल्यूं को/ सर्या पिरथ्या सल्लि यखि छन सड़णां..../ हे भगवान!/ तेरा ईंइ गंवड़ि खुणि छा यि धर्यां/ यि यख नि होंदा त क्या/ बांझ पड़ि जांदो यो गौं?’  


इसी कृति में जहां-तहां व्यंग्य के तंज उनके असरदार ढंग को कुछ यूं व्याख्यायित करते हैं - 

‘उन त जुत्ता लोगु खुणै की बण्यां छन/ पर लोग ईं बात मनौ तयार नि छन/  जुत्तौं बिगर क्वी चलदु नी/ अर जुत्ता चलदन त क्वी बरदास्त करदु नी’ - ‘ ह्वे सकद कैको बि पाटु-पैणु, हुक्का-पाणी बंद/ कैकि बि देळमि क्वी बि धैर सकद खंद/ जब बिटि मेरा गौं को एक आदिम मंत्री बण।’ और एक सलाह - ‘आज वूनै कैदे तू टटकार/ दारू मासु वळौं का बीच अंक्वे रौणू/ खबरदार!’ 

 

खबरदार! सचेत होना भी चाहिए। अन्यथा सभी प्रतीक चिन्ह स्मृति में ही रह जाएंगे। कवि ने लिखा भी है- 

’एक तरफ जांदरू छ जांदरौ हथन्यड़ु छ/ जांदरा ये हथन्यड़ा पर/ कथगै  दौं बंध्यूं रै मेरू खुट्टू/ जब ब्वे चलि जांदि घास, लखड़ू...। - न कैल देखी न कैल सूणी/ झणि कब अफ्वी-अफ्वी/ कै खटला मूड़/ मोरिगे/ कुण्या बूढ़। - चुल्लि बोनी मित जन बोलेंद अळ्येग्यों - भड्डु / न त लमडु/ न टुटु/ पर न फुटु/ पर जख गै होलु/ स्वादी स्वाद रयूं। - यह भी कि- झणि कब समझलि भागीरथी कि/ टीरी कि जैं ढण्डि उंद व प्वणीं छ/ वींई ढण्डि उंद भिलंगना बि म्वरीं छ/ अब द्वी का द्वी/ साख्यूं तक रैलि टीरी की की ईं ढण्डि उंद रिटणी।’ इतने गहरे बिम्ब वही ला सकता है जिसने ग्राम्य जीवन देखा भी हो और भोगा भी।


इसीलिए- अन्तर्मन में जो है वह अक्षरशः लिखा - 

लसम्वड्यां खुटा पर/ कंडळी कि सि झपाक। - कख कैरि जग्वाळ जबारी जोतु तबारी ज्वत्ये ग्यों।’ अथवा ये पीड़ा सतही नहीं है श्रीमान!- ‘हे भगवान/ तू कख ह्वेगे/ अन्तर्धान/ रूणू छ गौं कि/ स्य ह्वेगे भगयान! माया मोह/ त्यारै दियान/ पर/ कैका कथुगु दिन/ सि/ तेरा अफुमै रख्यान।’ 

व्यथा सुनायें तो सुनायें किसको? - 

‘कै दिन? आलो उ दिन/ जैका सार कटेणा छन इ दिन/ कै दिन? आलो उ दिन/ जैका सार बीतिगे आजौ ...?’ 


फिर भी तमाम विसंगतियों के बाद भी कवि मन में हताशा नहीं है। और-चाहते हैं कुछ न कुछ बचे तो! विश्वास न हो तो पढ़ो! - 

‘ये लोळा डरौण्या बगत मा बि/कथगा चीज छन हमुम बचैणौं/बस-/बच्यां रै जैं लोग/ बच्यां रै जैं गौं।’ क्या सतही कह सकते हैं हम इस प्रकार की भावना को?  

भाषा से जुड़े इन्हीं आचार-विचार और संस्कारों को बचाने की मुहीम में तल्लीन हैं पिछले चार दशकों से भ्राता गणी! स्वनाम धन्य नरेन्द्र सिंह नेगी ने आपकी पुस्तक में अपनी बात ‘कबितौं की सार-तार’ अंश में लिखा भी है कि- ‘गढ़वाळी भाषा थैं पयेड़ा लगै-लगै कि ठड्याण वळौं मा गणेश खुगशाल ‘गणी’ को भौत बड़ो योगदान छ। मातृभाषा का प्रति वेको प्रेम अर आदर वेकि कबितौं का साथ-साथ वेका सुभौ मा भी सदानि दिखेणू रौंदू।’


भाग दौड़ आपके जीवन में कुछ ज्यादा ही रही! या यूं भी कह सकते हैं कि आप गृहस्थ हैं लेकिन गृह सीमित कभी रहे नहीं। लेकिन 22 मार्च 2008 को इसी भाग दौड़ के बीच में सुबह सबेरे एक दुर्घटना घटी। देहरादून से पौड़ी आते हुए देवप्रयाग से पहले ड्राइवर ने शिव की विशाल मूर्ति की पीठ देखी और वाहन की स्पीड कुछ ज्यादा ही बढ़ा दी। और एकाएक जीप ड्राइवर से संतुलन खोकर गहरी खाई में जा गिरी। उस दुर्घटना में सात लोगों की सांसें दुबारा लौटकर नहीं आई। किंतु त्रिनेत्र की वही पीठ गणी दा का सहारा बनी। वरना उस सीधी खड़ी चट्टान में जीवन देने की क्षमता कहां थी? आज भी आते-जाते उस खड़ी चट्टान पर जब दृष्टि पड़ती है तो लगता है वो एक दुस्वप्न था हकीकत हो ही नहीं सकती है। खैर अरिष्ठ छटे! विघ्न हटे! कृपालु रहे वही महादेव!

   

इसी दुर्घटना के बाद कुशलक्षेम के उदेश्य से- एक दिन गणी दा से आत्मीयता पूर्वक ये शब्द कहे- ‘गणी दा! अब दौड़ भाग कम करदें! जादा दौड़ भाग बि ठीक नहीं है!’

आपने जवाब दिया- ‘भाई साहब दौड़ धूप नहीं होगी तो घर-परिवार....!’ बात भी सही कह गए गणी दा! सन्यासी हो तो एक जगह पालथी मार लें! दहलीज से बाहर निकलना ही होगा अगर घर परिवार है। लेकिन जीवन यापन के लिए कठिन संघर्ष के साथ-साथ कला, सहित्य, संस्कृति के लिए आपका काम निसंदेह प्रशसंनीय है।


एक प्रतीक और जुड़ा है गणी दा से। वह है उनका थैला! सदाबहार लटकता हुआ कांधे से! एक बार अवसर मिला तो पूछा- ‘गणी दा! क्या रहता है आपके इस थैले में?

जवाब मिला -एक डायरी और एक पैंट।

- पैंट क्यों?

- वो इसलिए कि न जाने बीच में ही कहीं और की राह पकड़नी पड़े।’ 


हम जानते हैं आम जीवन में आम आदमी के लिए राजमार्ग नहीं बल्कि उबड़-खाबड़ पथरीली रास्ते होते हैं। लेकिन सत्य यही है कि इन्हीं रास्तों पर चलते-हिलते-मिलते गणी दा ने भांति-भांति के अनुभव हासिल किये हैं। यही कारण है कि बात विचार ही नहीं अपितु गणी दा की कार्य संस्कृति भी समकालीनों से एकदम हटकर के है। यह कहने में भी कोई संकोच नहीं है कि कुछेक साहित्यिक विमर्षों पर आपसे मतभेद जरूर रहे हैं। हो सकता है ये मतभेद आगे भी रहेंगे। लेकिन मनो में भेद कभी भूल से भी नहीं पनपे हैं।


मूल साहित्य, कला, संस्कृति के अभेद किले में गणी दा कुछ न कुछ सृजनात्मक करते ही रहते हैं। उसी सृजनात्मकता के अक्स जब-तब धरातल पर दिखते भी रहे हैं। गढ़वाली ही नहीं बल्कि हिंदी में भी गद्य-पद्य दोनों विधाओं में समान अधिकार रखते हैं। गढ़वाली भाषा में ‘प्राथमिक पाठशाला’ के लिए पाठ्यक्रम तैयार करवाने में आप महति भूमिका में रहे हैं। कई पुस्तकों की भूमिका, अनुवाद तथा पत्र पत्रिकाओं के संपादकीय अंश भी आपके वृहद अनुभव से ही लिखे गये हैं। वर्तमान में गढ़वाली मासिक पत्रिका ‘धाद’ के सफल संपादक कर रहे हैं। साथ ही कई प्रतिष्ठानों में व्याख्याता, परामर्शदाता के रूप में भी अपनी नियमित सेवायें दे रहे हैं। समग्रता से यदि कहें तो आप व्यस्तता में भी व्यस्त ही रहे हैं।

गणी दा! सत्य यह है कि आप तन मन से मातृभाषा की सेवा में जुटे हुए हैं! कर्मशील हैं तो कई सम्मान, पुरस्कार आपके खाते में स्वतः ही आये हैं। अन्तर्मन से निकट भविष्य में हम साहित्य, संस्कृति, सामाजिक सरोकारों में आपकी उपस्थिति का और अधिक विस्तार देख रहे हैं!

मां सरस्वती के आगे इसी मनोकामना के निम्मित ये हाथ जुड़े हैं!


( लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ साहित्यकार हैं )

18 June, 2021

अब नहीं दिखते पहाड़ के नए मकानों में उरख्याळी गंज्याळी

https://www.bolpahadi.in/2021/06/ab-nahi-dikhatye-pahad-ke-naye-makanon-men-urkhyali-ganjyali.html

- डॉ. सुनील दत्त थपलियाल


ओखली अब हिन्दी की किताबों में ‘ओ’ से ओखली के अलावा शायद ही कहीं देखने को मिले. उत्तराखंड में ओखली को ओखल, ऊखल या उरख्याळी कहा जाता है. आज भी किसी पुराने मकान के आँगन में ओखल दिख जायेगा.

आज यह घर के आँगन में बरसाती मेढ़कों के आश्रय-स्थल से ज्यादा कुछ नहीं लगते हैं. एक समय था जब ओखल का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था, हमारे आँगन का राजा हुआ करता था.

ओखली को और नामों से भी जाना जाता है. कहीं इसे ओखल तो कहीं खरल कहा जाता है. अंग्रेज़ी में इसे ‘मोर्टार’ (mortar) और मूसल को ‘पॅसल’ (Pestle) कहते हैं. पॅसल शब्द वास्तव में लैटिन भाषा के ‘पिस्तिलम’ (Pistillum) शब्द से सम्बंधित है. लैटिन में इसका अर्थ ‘कुचलकर तोड़ना’ है. मारवाड़ी भाषा में ‘ओखली’ को ‘उकला’ तथा ‘मूसल’ को ‘सोबीला’ कहते हैं. कूटने को मारवाड़ी में ‘खोडना’ कहा जाता है.

डेढ़ दशक पहले की बात होगी उत्तराखंड के गाँवों में सभी शुभ कार्य ओखल से ही शुरू होते थे. किसी के घर पर होने वाले मंगल कार्य से कुछ दिन पहले गाँव की महिलाएं एक तय तारीख को उस घर में इकट्ठा होती थी. जहाँ सबसे पहले ओखल को साफ़ करते और उसमें टीका लगाते. टीका लगाने के बाद सबसे पहले पांच सुहागन महिलायें अनाज कूटना शुरू करती बाकी महिलाएं मंगल गीत गातीं. इसके बाद सभी महिलाएं और लड़कियाँ मिलकर अनाज, मसाले आदि कूटने और साफ़ करने का काम करती.

गढ़वाल क्षेत्र में तो ओखली का आज भी मांगलिक कार्य में बहुत अधिक महत्त्व है. गढ़वाल में ओखली को उरख्याली (उरख्याळी) और उसके साथी मुसल को गंज्याळी (गंज्याळी) कहते हैं. आज भी गढ़वाल के गाँवों में मांगलिक कार्य में प्रयोग होने वाली हल्दी उरख्याली में ही कूटी जाती है.

पुराने समय में पूरे गांव की एक संयुक्त छत के नीचे कई सारी ओखलियाँ हुआ करती थी. आठ बाई छह के इन कमरों में एक से अधिक ओखल हुआ करते थे. इस कमरे को ‘ओखलसारी’ कहा करते थे.

ओखल उत्तराखंड के जन से बड़े गहरे रूप से जुड़ा है. ओखल को पत्थर के अलावा बांज या फ्ल्यांट की मजबूत लकड़ी से बनाया जाता है. पत्थर से बने ओखल में पत्थर का वजन 50-60 किलो होता है. जिसे डांसी पत्थर कहते हैं. ओखल का पत्थर चौकोर होता है जिसे किसी आँगन में नियत स्थान पर गाढ़ा जाता है. ओखली के चारों ओर पटाल बिछा दिये जाते हैं.

ओखल ऊपर से चौड़ा और नीचे की ओर संकरा होता जाता है. जो कि सात से आठ इंच गहरा होता है. दिवाली में इसकी लिपाई पुताई की जाती है और इसके पास एक दीपक जलाया जाता है. कहा जाता है कि यह दीपक अपने पितरों के लिए जलाया जाता है.

ओखल में कूटने के लिए एक लम्बी लकड़ी का प्रयोग किया जाता है जिसे मूसल कहते हैं. मूसल साल या शीशम की लकड़ी का बना होता है. मूसल की गोलाई चार से छ्ह इंच होती है ओर लंबाई लगभग पाँच से सात फीट तक होती है. मूसल बीच में पतला होता है ताकि उसे पकड़ने में आसानी हो. मूसल के निचले सिरे पर लोहे के छल्ले लगे होते हैं. जिन्हें सोंपा या साम कहते हैं. इनसे भूसा निकालने में मदद मिलती है.

ओखल में महिलायें छिल्के वाले अनाज और मसाले कूटती हैं. धान ओखल में कूटा जाने वाला एक प्रमुख अनाज है. महिलायें धान को ओखल में डालती हैं और मूसल से अनाज पर चोट करती है. जब मूसल की चोट से धान बाहर छलकता है तो उसे महिलाएं पैरों से फिर से ओखल में डालती हैं.

उत्तराखण्ड में धान को कूटकर खाज्जि, सिरौला, च्यूड़े आदि बनाये जाते हैं. पहाड़ में महिलाओं का जीवन हमेशा कष्टकर रहा है. च्यूड़े, खाज्जि जंगल में उनके भोजन के पुराने साथी रहे हैं.

पुराने ज़माने में पहाड़ के घरों में सास का खूब दबदबा रहता था. परिवार में बहुओं की स्थिति बड़ी ही दयनीय हुआ करती थी. भर-पेट खाना तक बहुओं को नसीब न था. ऐसे में बहुएं धान को कूटते समय कुछ चावल छुपा कर रख लेती और जंगलों, खेतों में अपनी सहेलियों और साथियों के साथ यह चावल खाती इसे ही खाजा कहते थे.

आज भी पहाड़ में भाई-दूज के त्यौहार के दिन बहिनें अपने भाई का सिर च्युड़े से पूजती हैं. उत्तराखंड में आज अधिकांश घरों में इसकी जगह पोहा प्रयोग में लाया जाता है. च्यूड़ा बनाने के लिए कच्चे धान को पहले तीन-चार दिन पानी में भिगो कर रखते हैं. फिर इसे भूनते हैं और साथ में ही इसे कूटते हैं. जब दो औरतें बारी-बारी से एक साथ ओखल में धान कूटती हैं तो इसे दोरसारी कहते हैं.

च्यूड़ा बनाने के लिए कम से कम तीन लोगों का एकबार में होना जरुरी है. एक धान भूनने के लिए, एक कूटने के लिए और एक ओखल में अड़ेलने (करची से हिलाना) के लिए. कच्चे धान को सीधा भूनकर भी सुखाया जाता है. इसे सिरौला कहते हैं. इसे साल में जब भी खाना हो उससे पहले इसे ओखल में कूट लिया जाता है.

ओखल में जानवरों के लिए बनाये डाले में डाली जाने वाली का सिन्ने की पत्तियों को भी कुटा जाता है. आजकल ओखल का प्रयोग सबसे ज्यादा इसी काम के लिए किया जाता है.

मशीनों के आने से ओखल हमारे घरों से गायब हो गए हैं. गाँवों में सन् 2000 के बाद बने किसी घर में शायद ही किसी में ओखल भी बनाया हो.

भले आज उत्तराखंड के गांवों से लोग पलायन करते जा रहे हैं लेकिन इस परम्परा की यादें आज भी दिल में बसी हैं. आज केवल यादें ही शेष रह गई हैं.


https://www.bolpahadi.in/2021/06/ab-nahi-dikhatye-pahad-ke-naye-makanon-men-urkhyali-ganjyali.html







फोटो संकलन- डॉ. सुनील थपलियाल




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