14 July, 2021

विलक्षण, बहुमुखी, प्रखर मेधा के धनी हैं ‘गणी’

https://www.bolpahadi.in/2021/07/Gani-is-unique-versatile-rich-in-intelligence.html


• नरेंद्र कठैत - 


अग्नि, हवा और पानी- इन तीन ईश्वर प्रदत्त तत्वों के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। चाहे हम मंगल तक की दौड़ लगा लें या दूर प्लेटो तक की। किंतु जहां जीव जगत के लिए ये तत्व हितकर हैं वहीं इनकी अति भी अहितकर सिद्ध हुई। इसलिए ये तीन तत्व हमारे लिए अमरतत्व भी हैं और गरल भी। किंतु जिसने इन तीन तत्वों में स्वयं को ढालने की आत्मशक्ति विकसित कर ली वही सच्चा साधक है और लोकप्रिय भी। सच्चे साधक और लोकप्रियता की इसी श्रेणी में आते हैं विलक्षण, बहुमुखी, प्रखर मेधा के धनी, मातृभाषा प्रेमी भ्राता गणेश खुगशाल ‘गणी’!


गणी दा की गिनती जनप्रिय अथवा लोकप्रिय महानुभावों की श्रेणी में यूं ही नहीं होती। मंच संचालन और गणी- यह अब एक किवदंती सी है बन पड़ी। किंतु मंच संचालन और ध्वनि यंत्रों से पहले आपकी सजग जनपक्षीय लेखन यात्रा 1989 से 2001 तक क्रमशः ‘दैनिक अमर उजाला’ तथा ‘दैनिक जागरण’ के संवाददाता से शुरू हुई। यकीनन कविताएं उससे पहले भी आपके लहू में रही होंगी। स्वनामधन्य गीतकार नरेन्द्रसिंह नेगी का सानिंध्य मिला तो भाषा पर पकड़ और कविता की समझ बढ़ी। अतः यह लिखने में भी कदापि गुरेज नहीं कि आप आज जहां पूर्णकालिक पत्रकार हैं वहीं सजग कवि भी हैं और गूढ़ साहित्यकार भी! और यूं- चाहे वह किसी भी क्षेत्र की रही हो जमीन- तपे, मंझे, सधे ‘गणी दा’ जहां खड़े हुए- वहीं उन्होंने अपनी एक अलग ही छाप छोड़ी। 


अलग छाप और छपे हुए दस्तावेजों के बीच सन 2014 में ‘विनसर प्रकाशन’ से ‘वूं मा बोलि दे’ नाम से एक पुस्तक निकली। पुस्तक के लेखक हैं- गणेश खुगशाल ‘गणी’। लेकिन यह बात हर पाठक, कलमकार के मन में निश्चित रूप से उठी कि दशकों से लेखनरत और संचयन में इतनी देरी? वास्तव में- एक लम्बे अंतराल के बाद गणी दा के संचयन की यह पहली कसरत थी। किंतु कभी भी, किसी को भी अलग से गणी दा को संचयन में देरी का कारण पूछने की जरूरत नहीं पड़ी। क्योंकि उन्होंने इसी संकलन में लिखा है कि -


‘किताब की सकल ल्हेकि तुम तक पौछण मा सत्ताईस साल लगि गेनि मेरी कविता तैं। मंच मा त मि कविता छंटि-छंटि ल्यांदो छौ। सुणदरौं तैं सुन्दर लगदि छै तब छपछपि पड़ि जांदि छै। पर किताब छपण मा डौर लगदि छै कि न हो क्वी कुछ बोलु, किलैकि किताब मा त सबि बानी कवितौंल औंण छौ। अब, जब सर्या किताब छाप्याली त इन डौर लगणी छ कि न हो क्वी कुछ बि नि बोलु।... ई सर्या जंकजोड़ छ ‘वूं मा बोलि दे’। 


 गणी दा! भले ही अपने इस काव्य संग्रह को सताईस साल का जंकजोड़ कह लें लेकिन पिछले दो दशक में इतने मंझे हुए अंदाज में गढ़वाली भाषा का कोई काव्य संग्रह मेरी दृष्ठि में आया ही नहीं है। इस काव्य संग्रह में गणी दा ने विभिन्न काल-खण्डों में लिखी गई रचनाओं को मैत बिटि, गौं गाळ, उकरान्त, हमारा मनै, जीवन मा, आणौं मा कविता, ब्वन पर औंदन त, नीत्यूं कि नीति जैसे खण्डों में उनके भावों के अनुरूप अभिव्यक्ति दी है।


आपके भावों की अनुभूति में माँ पहली पंग्ति में है। माँ पर आपने भावनाएं गहराई से व्यक्त की हैं। माँ को संबोधित करते हुए लिखा है-

‘त्यरा खुटौं कि/बिवयूं बिटि छड़कद ल्वे

पर तू नि छोड़दि

ढुंगा माटा को काम

आखिर/कै माटै बणीं छै तु ब्वे?’


-या-

सर्रा पिरथ्या दुख वींकै भागौ छा धर्यां/अर वींल बोटि मुट्ठ अर सबि दुख वां मा अटर्यां।’ - या कि- ‘जुगु-जुगु बिटि ज्यूंदि छ वींकि प्रीत/यांलै सैरि दुन्या लगांद अपणि ब्वे का गीत।’


-अथवा-


‘तब अच्छि लगिन/घासै पूळ अर लखड़ू बिट्गि/फुल्यूं लया, धण्ये क्यारी/ पिंगळी मर्च, लगुलि उंद लगीं कखड़ि/ गोड़ि बाछि, ठेकि मा पिजयां दूधौ फेण/ हैरि गिंवड़ि भ्वरीं सट्यड़ि/ जबरि तक ब्वे बचीं रै।’ 


निसंकोच कह सकते हैं कि मां पर लिखे आपके ये एक अलग ही ढंग के काव्याचरण हैं।


इसी संचयन के मध्य ही कर्मठ नारी की महिमा भी उच्च कोटी की लिखी है- ‘यूं डांडौं मा यूं डांडौं से बड़ो फंचु च वीं मा।’ और- शृंगारिक छवि देखिए- 

‘मिन तेरी आंख्यू मा देखी/ पिंगळदप्प फूल कखड़ि को....। मिन तेरी आंख्यूं मा देखी/ कौंपदा ह्यूंद मा खिल्दु पयां।’ 

लेकिन पहाड़ में अब वह रौनक कहां! पहाड़ से जो नीचे उतरा वह ऊपर चढ़ने का साहस न बटोर सका। और अपने पीछे छोड़ गया सुनसान घर आंगन और दरवाजे पर लटकता ताला। ताले के लीवर को भी कुछ समय बाद जंक चाट गया। 


लिखते हैं गणी दा!-

‘जब बोलण पर अंदिन कूड़ि/ त आदम्यूं से जादा बोलदन....

हम त वूंको भरोसु छां जो/हमूं तैं यूं मोरुंद लटकै गेनी/ लोग लीवर बोलदन ज्यां खुणि/ हमारि त अंदड़ि चाट्यलिन जंकन।’ 

या-

कइ कूड़ि यन्नि कि/ अगनै ताळा लग्यां अर पिछनै कूड़ि खन्द्वार होंयीं।.../ वूं खंद्वार कूड़यूं का भितर जमीं कंडळी/ पौंछिगे धुरपळा तक/ व झपझपि कंडळी लपलपि ह्वेकि बोनी कि/ मि कबि नि जमदू कैका भितर...’


कवि का कार्य मात्र लिखना भर नहीं। कवि का एक संदेश उनके लिए भी है जिन्होंने वर्षों से अपना पुस्तैनी घर देखा ही नहीं है।-

‘पुंगड्यूं का ओडा जख्या तखि छन/सरकंदरा क्वी नि छन

ऊंको दुबलो/हमारा पुंगड़ सौरिगे

वूं मा बोलि दे।’  


किंतु संदेश पहुंचाकर भी क्या करें? क्योंकि आबाद गांवों की स्थिति भी बड़ी अजीबोगरीब हो गई है। गांवों वह अजीबोगरीब तस्वीर आपने कुछ यूं खींची है- 

‘दिनभर तास ख्यलदा बैख/ य त गौं का घपलै पंचैत। - ईं दुन्या मा क्या ई गौं रे गे छौ सल्यूं को/ सर्या पिरथ्या सल्लि यखि छन सड़णां..../ हे भगवान!/ तेरा ईंइ गंवड़ि खुणि छा यि धर्यां/ यि यख नि होंदा त क्या/ बांझ पड़ि जांदो यो गौं?’  


इसी कृति में जहां-तहां व्यंग्य के तंज उनके असरदार ढंग को कुछ यूं व्याख्यायित करते हैं - 

‘उन त जुत्ता लोगु खुणै की बण्यां छन/ पर लोग ईं बात मनौ तयार नि छन/  जुत्तौं बिगर क्वी चलदु नी/ अर जुत्ता चलदन त क्वी बरदास्त करदु नी’ - ‘ ह्वे सकद कैको बि पाटु-पैणु, हुक्का-पाणी बंद/ कैकि बि देळमि क्वी बि धैर सकद खंद/ जब बिटि मेरा गौं को एक आदिम मंत्री बण।’ और एक सलाह - ‘आज वूनै कैदे तू टटकार/ दारू मासु वळौं का बीच अंक्वे रौणू/ खबरदार!’ 

 

खबरदार! सचेत होना भी चाहिए। अन्यथा सभी प्रतीक चिन्ह स्मृति में ही रह जाएंगे। कवि ने लिखा भी है- 

’एक तरफ जांदरू छ जांदरौ हथन्यड़ु छ/ जांदरा ये हथन्यड़ा पर/ कथगै  दौं बंध्यूं रै मेरू खुट्टू/ जब ब्वे चलि जांदि घास, लखड़ू...। - न कैल देखी न कैल सूणी/ झणि कब अफ्वी-अफ्वी/ कै खटला मूड़/ मोरिगे/ कुण्या बूढ़। - चुल्लि बोनी मित जन बोलेंद अळ्येग्यों - भड्डु / न त लमडु/ न टुटु/ पर न फुटु/ पर जख गै होलु/ स्वादी स्वाद रयूं। - यह भी कि- झणि कब समझलि भागीरथी कि/ टीरी कि जैं ढण्डि उंद व प्वणीं छ/ वींई ढण्डि उंद भिलंगना बि म्वरीं छ/ अब द्वी का द्वी/ साख्यूं तक रैलि टीरी की की ईं ढण्डि उंद रिटणी।’ इतने गहरे बिम्ब वही ला सकता है जिसने ग्राम्य जीवन देखा भी हो और भोगा भी।


इसीलिए- अन्तर्मन में जो है वह अक्षरशः लिखा - 

लसम्वड्यां खुटा पर/ कंडळी कि सि झपाक। - कख कैरि जग्वाळ जबारी जोतु तबारी ज्वत्ये ग्यों।’ अथवा ये पीड़ा सतही नहीं है श्रीमान!- ‘हे भगवान/ तू कख ह्वेगे/ अन्तर्धान/ रूणू छ गौं कि/ स्य ह्वेगे भगयान! माया मोह/ त्यारै दियान/ पर/ कैका कथुगु दिन/ सि/ तेरा अफुमै रख्यान।’ 

व्यथा सुनायें तो सुनायें किसको? - 

‘कै दिन? आलो उ दिन/ जैका सार कटेणा छन इ दिन/ कै दिन? आलो उ दिन/ जैका सार बीतिगे आजौ ...?’ 


फिर भी तमाम विसंगतियों के बाद भी कवि मन में हताशा नहीं है। और-चाहते हैं कुछ न कुछ बचे तो! विश्वास न हो तो पढ़ो! - 

‘ये लोळा डरौण्या बगत मा बि/कथगा चीज छन हमुम बचैणौं/बस-/बच्यां रै जैं लोग/ बच्यां रै जैं गौं।’ क्या सतही कह सकते हैं हम इस प्रकार की भावना को?  

भाषा से जुड़े इन्हीं आचार-विचार और संस्कारों को बचाने की मुहीम में तल्लीन हैं पिछले चार दशकों से भ्राता गणी! स्वनाम धन्य नरेन्द्र सिंह नेगी ने आपकी पुस्तक में अपनी बात ‘कबितौं की सार-तार’ अंश में लिखा भी है कि- ‘गढ़वाळी भाषा थैं पयेड़ा लगै-लगै कि ठड्याण वळौं मा गणेश खुगशाल ‘गणी’ को भौत बड़ो योगदान छ। मातृभाषा का प्रति वेको प्रेम अर आदर वेकि कबितौं का साथ-साथ वेका सुभौ मा भी सदानि दिखेणू रौंदू।’


भाग दौड़ आपके जीवन में कुछ ज्यादा ही रही! या यूं भी कह सकते हैं कि आप गृहस्थ हैं लेकिन गृह सीमित कभी रहे नहीं। लेकिन 22 मार्च 2008 को इसी भाग दौड़ के बीच में सुबह सबेरे एक दुर्घटना घटी। देहरादून से पौड़ी आते हुए देवप्रयाग से पहले ड्राइवर ने शिव की विशाल मूर्ति की पीठ देखी और वाहन की स्पीड कुछ ज्यादा ही बढ़ा दी। और एकाएक जीप ड्राइवर से संतुलन खोकर गहरी खाई में जा गिरी। उस दुर्घटना में सात लोगों की सांसें दुबारा लौटकर नहीं आई। किंतु त्रिनेत्र की वही पीठ गणी दा का सहारा बनी। वरना उस सीधी खड़ी चट्टान में जीवन देने की क्षमता कहां थी? आज भी आते-जाते उस खड़ी चट्टान पर जब दृष्टि पड़ती है तो लगता है वो एक दुस्वप्न था हकीकत हो ही नहीं सकती है। खैर अरिष्ठ छटे! विघ्न हटे! कृपालु रहे वही महादेव!

   

इसी दुर्घटना के बाद कुशलक्षेम के उदेश्य से- एक दिन गणी दा से आत्मीयता पूर्वक ये शब्द कहे- ‘गणी दा! अब दौड़ भाग कम करदें! जादा दौड़ भाग बि ठीक नहीं है!’

आपने जवाब दिया- ‘भाई साहब दौड़ धूप नहीं होगी तो घर-परिवार....!’ बात भी सही कह गए गणी दा! सन्यासी हो तो एक जगह पालथी मार लें! दहलीज से बाहर निकलना ही होगा अगर घर परिवार है। लेकिन जीवन यापन के लिए कठिन संघर्ष के साथ-साथ कला, सहित्य, संस्कृति के लिए आपका काम निसंदेह प्रशसंनीय है।


एक प्रतीक और जुड़ा है गणी दा से। वह है उनका थैला! सदाबहार लटकता हुआ कांधे से! एक बार अवसर मिला तो पूछा- ‘गणी दा! क्या रहता है आपके इस थैले में?

जवाब मिला -एक डायरी और एक पैंट।

- पैंट क्यों?

- वो इसलिए कि न जाने बीच में ही कहीं और की राह पकड़नी पड़े।’ 


हम जानते हैं आम जीवन में आम आदमी के लिए राजमार्ग नहीं बल्कि उबड़-खाबड़ पथरीली रास्ते होते हैं। लेकिन सत्य यही है कि इन्हीं रास्तों पर चलते-हिलते-मिलते गणी दा ने भांति-भांति के अनुभव हासिल किये हैं। यही कारण है कि बात विचार ही नहीं अपितु गणी दा की कार्य संस्कृति भी समकालीनों से एकदम हटकर के है। यह कहने में भी कोई संकोच नहीं है कि कुछेक साहित्यिक विमर्षों पर आपसे मतभेद जरूर रहे हैं। हो सकता है ये मतभेद आगे भी रहेंगे। लेकिन मनो में भेद कभी भूल से भी नहीं पनपे हैं।


मूल साहित्य, कला, संस्कृति के अभेद किले में गणी दा कुछ न कुछ सृजनात्मक करते ही रहते हैं। उसी सृजनात्मकता के अक्स जब-तब धरातल पर दिखते भी रहे हैं। गढ़वाली ही नहीं बल्कि हिंदी में भी गद्य-पद्य दोनों विधाओं में समान अधिकार रखते हैं। गढ़वाली भाषा में ‘प्राथमिक पाठशाला’ के लिए पाठ्यक्रम तैयार करवाने में आप महति भूमिका में रहे हैं। कई पुस्तकों की भूमिका, अनुवाद तथा पत्र पत्रिकाओं के संपादकीय अंश भी आपके वृहद अनुभव से ही लिखे गये हैं। वर्तमान में गढ़वाली मासिक पत्रिका ‘धाद’ के सफल संपादक कर रहे हैं। साथ ही कई प्रतिष्ठानों में व्याख्याता, परामर्शदाता के रूप में भी अपनी नियमित सेवायें दे रहे हैं। समग्रता से यदि कहें तो आप व्यस्तता में भी व्यस्त ही रहे हैं।

गणी दा! सत्य यह है कि आप तन मन से मातृभाषा की सेवा में जुटे हुए हैं! कर्मशील हैं तो कई सम्मान, पुरस्कार आपके खाते में स्वतः ही आये हैं। अन्तर्मन से निकट भविष्य में हम साहित्य, संस्कृति, सामाजिक सरोकारों में आपकी उपस्थिति का और अधिक विस्तार देख रहे हैं!

मां सरस्वती के आगे इसी मनोकामना के निम्मित ये हाथ जुड़े हैं!


( लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ साहित्यकार हैं )

18 June, 2021

अब नहीं दिखते पहाड़ के नए मकानों में उरख्याळी गंज्याळी

https://www.bolpahadi.in/2021/06/ab-nahi-dikhatye-pahad-ke-naye-makanon-men-urkhyali-ganjyali.html

- डॉ. सुनील दत्त थपलियाल


ओखली अब हिन्दी की किताबों में ‘ओ’ से ओखली के अलावा शायद ही कहीं देखने को मिले. उत्तराखंड में ओखली को ओखल, ऊखल या उरख्याळी कहा जाता है. आज भी किसी पुराने मकान के आँगन में ओखल दिख जायेगा.

आज यह घर के आँगन में बरसाती मेढ़कों के आश्रय-स्थल से ज्यादा कुछ नहीं लगते हैं. एक समय था जब ओखल का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था, हमारे आँगन का राजा हुआ करता था.

ओखली को और नामों से भी जाना जाता है. कहीं इसे ओखल तो कहीं खरल कहा जाता है. अंग्रेज़ी में इसे ‘मोर्टार’ (mortar) और मूसल को ‘पॅसल’ (Pestle) कहते हैं. पॅसल शब्द वास्तव में लैटिन भाषा के ‘पिस्तिलम’ (Pistillum) शब्द से सम्बंधित है. लैटिन में इसका अर्थ ‘कुचलकर तोड़ना’ है. मारवाड़ी भाषा में ‘ओखली’ को ‘उकला’ तथा ‘मूसल’ को ‘सोबीला’ कहते हैं. कूटने को मारवाड़ी में ‘खोडना’ कहा जाता है.

डेढ़ दशक पहले की बात होगी उत्तराखंड के गाँवों में सभी शुभ कार्य ओखल से ही शुरू होते थे. किसी के घर पर होने वाले मंगल कार्य से कुछ दिन पहले गाँव की महिलाएं एक तय तारीख को उस घर में इकट्ठा होती थी. जहाँ सबसे पहले ओखल को साफ़ करते और उसमें टीका लगाते. टीका लगाने के बाद सबसे पहले पांच सुहागन महिलायें अनाज कूटना शुरू करती बाकी महिलाएं मंगल गीत गातीं. इसके बाद सभी महिलाएं और लड़कियाँ मिलकर अनाज, मसाले आदि कूटने और साफ़ करने का काम करती.

गढ़वाल क्षेत्र में तो ओखली का आज भी मांगलिक कार्य में बहुत अधिक महत्त्व है. गढ़वाल में ओखली को उरख्याली (उरख्याळी) और उसके साथी मुसल को गंज्याळी (गंज्याळी) कहते हैं. आज भी गढ़वाल के गाँवों में मांगलिक कार्य में प्रयोग होने वाली हल्दी उरख्याली में ही कूटी जाती है.

पुराने समय में पूरे गांव की एक संयुक्त छत के नीचे कई सारी ओखलियाँ हुआ करती थी. आठ बाई छह के इन कमरों में एक से अधिक ओखल हुआ करते थे. इस कमरे को ‘ओखलसारी’ कहा करते थे.

ओखल उत्तराखंड के जन से बड़े गहरे रूप से जुड़ा है. ओखल को पत्थर के अलावा बांज या फ्ल्यांट की मजबूत लकड़ी से बनाया जाता है. पत्थर से बने ओखल में पत्थर का वजन 50-60 किलो होता है. जिसे डांसी पत्थर कहते हैं. ओखल का पत्थर चौकोर होता है जिसे किसी आँगन में नियत स्थान पर गाढ़ा जाता है. ओखली के चारों ओर पटाल बिछा दिये जाते हैं.

ओखल ऊपर से चौड़ा और नीचे की ओर संकरा होता जाता है. जो कि सात से आठ इंच गहरा होता है. दिवाली में इसकी लिपाई पुताई की जाती है और इसके पास एक दीपक जलाया जाता है. कहा जाता है कि यह दीपक अपने पितरों के लिए जलाया जाता है.

ओखल में कूटने के लिए एक लम्बी लकड़ी का प्रयोग किया जाता है जिसे मूसल कहते हैं. मूसल साल या शीशम की लकड़ी का बना होता है. मूसल की गोलाई चार से छ्ह इंच होती है ओर लंबाई लगभग पाँच से सात फीट तक होती है. मूसल बीच में पतला होता है ताकि उसे पकड़ने में आसानी हो. मूसल के निचले सिरे पर लोहे के छल्ले लगे होते हैं. जिन्हें सोंपा या साम कहते हैं. इनसे भूसा निकालने में मदद मिलती है.

ओखल में महिलायें छिल्के वाले अनाज और मसाले कूटती हैं. धान ओखल में कूटा जाने वाला एक प्रमुख अनाज है. महिलायें धान को ओखल में डालती हैं और मूसल से अनाज पर चोट करती है. जब मूसल की चोट से धान बाहर छलकता है तो उसे महिलाएं पैरों से फिर से ओखल में डालती हैं.

उत्तराखण्ड में धान को कूटकर खाज्जि, सिरौला, च्यूड़े आदि बनाये जाते हैं. पहाड़ में महिलाओं का जीवन हमेशा कष्टकर रहा है. च्यूड़े, खाज्जि जंगल में उनके भोजन के पुराने साथी रहे हैं.

पुराने ज़माने में पहाड़ के घरों में सास का खूब दबदबा रहता था. परिवार में बहुओं की स्थिति बड़ी ही दयनीय हुआ करती थी. भर-पेट खाना तक बहुओं को नसीब न था. ऐसे में बहुएं धान को कूटते समय कुछ चावल छुपा कर रख लेती और जंगलों, खेतों में अपनी सहेलियों और साथियों के साथ यह चावल खाती इसे ही खाजा कहते थे.

आज भी पहाड़ में भाई-दूज के त्यौहार के दिन बहिनें अपने भाई का सिर च्युड़े से पूजती हैं. उत्तराखंड में आज अधिकांश घरों में इसकी जगह पोहा प्रयोग में लाया जाता है. च्यूड़ा बनाने के लिए कच्चे धान को पहले तीन-चार दिन पानी में भिगो कर रखते हैं. फिर इसे भूनते हैं और साथ में ही इसे कूटते हैं. जब दो औरतें बारी-बारी से एक साथ ओखल में धान कूटती हैं तो इसे दोरसारी कहते हैं.

च्यूड़ा बनाने के लिए कम से कम तीन लोगों का एकबार में होना जरुरी है. एक धान भूनने के लिए, एक कूटने के लिए और एक ओखल में अड़ेलने (करची से हिलाना) के लिए. कच्चे धान को सीधा भूनकर भी सुखाया जाता है. इसे सिरौला कहते हैं. इसे साल में जब भी खाना हो उससे पहले इसे ओखल में कूट लिया जाता है.

ओखल में जानवरों के लिए बनाये डाले में डाली जाने वाली का सिन्ने की पत्तियों को भी कुटा जाता है. आजकल ओखल का प्रयोग सबसे ज्यादा इसी काम के लिए किया जाता है.

मशीनों के आने से ओखल हमारे घरों से गायब हो गए हैं. गाँवों में सन् 2000 के बाद बने किसी घर में शायद ही किसी में ओखल भी बनाया हो.

भले आज उत्तराखंड के गांवों से लोग पलायन करते जा रहे हैं लेकिन इस परम्परा की यादें आज भी दिल में बसी हैं. आज केवल यादें ही शेष रह गई हैं.


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फोटो संकलन- डॉ. सुनील थपलियाल




17 June, 2021

साहित्य प्रेमियों के बीच आज भी जिंदा हैं अबोध बन्धु बहुगुणा

https://www.bolpahadi.in/2021/06/-abodh-bandhu-is-still-alive-among-literature-lovers.html

- आशीष सुंदरियाल

गढ़वाळी भाषा का सुप्रसिद्ध साहित्यकार अबोध बन्धु बहुगुणा जी जौंको वास्तविक नाम नागेन्द्र प्रसाद बहुगुणा छौ, को जन्म 15 जून सन् 1927 मा ग्राम- झाला, पट्टी- चलणस्यूं, पौड़ी गढ़वाल मा ह्वे। आरम्भिक शिक्षा गौं मा ल्हेणा बाद बहुगुणा जी रोजगार का वास्ता भैर ऐगिन् अर वूंन अपणि उच्च शिक्षा एम.ए. (हिन्दी, राजनीति शास्त्र) नागपुर विश्वविद्यालय बटे पूरी करे। कार्य क्षेत्र का रूप मा वूंन सरकारी सेवा को चुनाव करे अर वो उपनिदेशक का पद से सेवानिवृत्त ह्वेनी। 

अबोध बन्धु बहुगुणा जी को रचना संसार भौत बड़ु छ। गढ़वाळी का दगड़ दगड़ वूंन हिन्दी मा भि भौत लेखी। परन्तु गढ़वाळी साहित्य जगत मा वूंको काम असाधारण व अद्वितीय छ। शायद ही साहित्य कि क्वी इनि विधा होली जैमा अबोध जीन् गढ़वाळी भाषा मा नि लेखी हो।

भुम्याळ (महाकाव्य), तिड़का (दोहा), रण-मण्डाण ( देशभक्ति कविताएं), पार्वती (गीत), घोल (अतुकांत कविताएं), दैसत (उत्तराखंड आन्दोलन से प्रेरित कविताएं), भारत-भावना (देशप्रेम कविताएं), कणखिला (चार पंक्तियों की कविताएं), शैलोदय (कविता संग्रै) अर अंख-पंख (बालगीत) गढ़वाळी पद्य साहित्य तैं अबोध जी की अनमोल देन छ। 

भुगत्यूं भविष्य (उपन्यास), रगड़वात (कहानी संग्रै), कथा-कुमुद (लघु-कथाएं) अर एक कौंळी किरण (विविध) आदि कृतियाँ अबोध बन्धु बहुगुणा जी को गढ़वाळी गद्य साहित्य मा सृजन का डमडमा उदाहरण छन। 

साहित्य सृजन का अलावा अबोध बन्धु बहुगुणा जीन् जो अद्भुत अर अद्वितीय काम गढ़वाळी भाषा व साहित्य का वास्ता करे वो छ- धुंयाळ  (लोकगीत संकलन) अर लंगड़ी बकरी (लोक कथा संकलन) माध्यम से यत्र तत्र बिखर्यां लोक साहित्य को संरक्षण अर गाड़ म्यटेकि गंगा (गढ़वाळी गद्यकारों को संकलन) व शैलवाणी (गढ़वाळी कवियों को संकलन) जनी पुस्तकों को संकलन व प्रकाशन। यो बहुगुणा जी को एक ऐतिहासिक काम छ अर गढ़वाळी भाषा साहित्य का क्षेत्र मा इ द्वी पोथी मील को पत्थर छन अर नया शोधकर्ताओं खुणि प्रकाशपुंज कि तरां काम करदन्।

नाटक व गीति-नाटिका विधा मा भि अबोध बन्धु बहुगुणा जी न् अपणि कलम चलै अर माई को लाल अर चक्रचाल ( 12 नाटक व 4 गीति-नाटिका) उल्लेखनीय छन। 

गढ़वाळी भाषा साहित्य का अलावा अबोध बन्धु बहुगुणा जीन् हिन्दी मा भि साहित्य सृजन करे। दग्ध-हृदय, सर्वविकृति व अरण्य रोदन आदि वूंकी चर्चित कृति छन। दगड़ मा अन्तिम गढ़, गांव की हरियाली व डूबता हुआ गाँव आदि कुछ नाटक भि भौत प्रसिद्ध छन। 

जीवन-पर्यन्त साहित्य सेवा का वास्ता अबोध बन्धु बहुगुणा जी तैं अनेक साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित बि करेगे। 

भाषा-साहित्य का असाधारण अर अद्वितीय साहित्यकार  अबोध बन्धु बहुगुणा जी 5 जुलाई 2005 मा हमरा बीच बटि विदा ह्वेगिन। परन्तु अपणा साहित्य का माध्यम से वो आज भि हरेक गढ़वाळी भाषा प्रेमियों का बीच ज्यूंदा छन। 

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Ashish Sundriyal








फोटो- हरीश ध्यानी

28 May, 2020

त्राही-त्राही त्राहिमाम... (गढ़वाली कविता)

https://www.bolpahadi.in/2020/05/blog-post-trahi-trahi-trahimam-gargwali-poem-durga-nautiyal.html


• दुर्गा नौटियाल

त्राही-त्राही त्राहिमाम, 
तेरि सरण मा छां आज।
कर दे कुछ यनु काज, 
रखि दे हमारि लाज।।

संगता ढक्यां छन द्वार,
मुस्कौं न घिच्चा बुज्यान।
खट्टी-मिट्ठी भितर-भैर,
ह्वेगे कनि या जिबाळ।
बिधाता अब त्वी बचो, 
ईं विपदा तैं हरो।
करदे कुछ यनु काज, 
रखि दे हमारी लाज।।
त्राही-त्राही त्राहिमाम...

पित्र होला दोष देंणा,
देवता होलु नाराज क्वी।
लोग सब्बि बोळ्न लग्यां,
त्वी कारण निवारण त्वी।
मेरा इष्ट, कुल देबतों, 
अब त दिश्ना द्या चुचों।
करदे कुछ यनु काज, 
रखि दे हमारी लाज।।
त्राही-त्राही त्राहिमाम...

धाण काज अब नि राई,
खिस्सा बटुवा ह्वेगे खालि।
लोण तेल लौण कनै,
लाला बंद करिगे पगाळी।
हे भगवती अब दैणि हो, 
ईं बैतरणी तै तरो।
करदे कुछ यनु काज, 
रखि दे हमारी लाज।।
त्राही-त्राही त्राहिमाम...

रीता गौं बच्याण लग्यां,
तिवारी हैंसण बैठिगे।
बिसरिगे था जु बाटा,
आज तखि उलार बौडिगे।
हे भूमि का भूम्याल, 
तुम दैणा ह्वेजा आज।
करदे कुछ यनु काज, 
रखि दे हमारी लाज।।
त्राही-त्राही त्राहिमाम...

https://www.bolpahadi.in/2020/05/blog-post-trahi-trahi-trahimam-gargwali-poem-durga-nautiyal.html

(लेखक दुर्गा नौटियाल वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं)

21 May, 2020

मैं पहाड़ हूं (हिन्दी कविता)

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• मदन मोहन थपलियाल ’शैल’

मैं पहाड़ (हिमालय) हूं
विज्ञान कहता है
यहां पहले हिलोरें मारता सागर था
दो भुजाएं आपस में टकराईं
पहाड़ का जन्म हुआ
हिमालय का अवतरण हुआ
सदियों वीरान रहा
धीरे-धीरे 
वादियों और कंदराओं का उद्गम हुआ
गंगा पृथ्वी पर आईं
कंद मूल फलों से धरा का श्रंगार हुआ
सब खुशहाल थे
मेरे ही गीत गुनगुनाते थे
शांत एकांत निर्जन विजन
ऋषि मुनियों को बहुत भाया
देवताओं ने अपनी शरणस्थली बनाई
तपस्वी रम गए प्रभु आराधना में
मनीषियों ने ग्रंथ लिखे
काव्य खंड लिखे
चहुंओर 
संस्कृति औ संस्कृत की ध्वनि गूंजने लगी
वेदों की ऋचाएं गाई जाने लगीं
आक्रमणकारियों ने मेरी शांति भंग कर दी
आततायियों के भय से
मनुज ने पहाड़ों का आश्रय लिया
पहाड़ सैरगाह बन गए
सब खुशहाल थे
मेरे ही गीत गुनगुनाते थे
मैदानी क्षेत्रों में बस्तियां बसने लगीं
आधुनिक चकाचौंध ने 
मेरे अस्तित्व को कम करके आंकना शुरू कर दिया
फिर क्या था
चल पड़े दरिया के मानिंद
मैदानों के विस्तार में अपने को खोने
बस वहीं के हो गए
नौकर बन गए
श्रम, पसीना, मनोबल सब बेच दिया
भौतिक सुख और दो जून रोटी के लिए
बाजार हो गए
योग्यतानुसार दाम तय होने लगे
पैसे की हवस का जादू सिर चढ़कर बोला
सब अधिकार की लड़ाई लड़ने लगे
लेकिन सब व्यर्थ
पलायन रुका नहीं
बहाने लाख बने
मैं आज भी वहीं खड़ा हूं
शांत एकांत सा
अपनों की प्रतीक्षा में
मैंने नहीं, उन्होंने मुझे ठुकराया
मेरी छाती में धमाचौकड़ी करने
फिर आओगे न
मैं सदियों प्रतीक्षा करूंगा
तुम्हारी पग ध्वनि सुनने को उत्सुक
तुम्हारा अपना वैभव
पहाड़ (हिमालय)

पेंटिंग फोटो - ईशान बहुगुणा

20 May, 2020

कल की सी ही बात है

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•  डॉ. अतुल शर्मा

प्रकृति के सुकुमारतम कवि श्री सुमित्रानंदन पंत की आज शुभ जयंती है। कल की सी ही बात लगती है कि 1980 के दशक में लेखिका और दिल्ली दूरदर्शन की निदेशिका डॉ. कांता पंत के नई दिल्ली गोल मार्केट एसई जोड एरिया स्थित आवास पर प्रायः पंत जी के दर्शन का सौभाग्य मिलता रहता था। कांता भारती जी का पंत जी ने अपने भतीजे गोर्की पंत से विवाह करा दिया था। इस प्रकार वह कांता पंत हो गयी थीं। 

‘‘मैं पंत जी के दर्शनार्थ प्रायः कवि एवं समीक्षक श्री गोपाल कृष्ण कौल के साथ जाया करता था, कभी-कभी अकेला भी जाता था। पंत जी की बादल और परिवर्तन जैसी कविताएं और उनका सौम्य सुदर्शन व्यक्तित्व आज भी स्मृति में सुरक्षित है। उनकी पावन स्मृति को सश्रद्ध नमन!’’ यह कहना है प्रसिद्ध कवि धनंजय सिह का।

कवि सुमित्रानन्दन पंत का जन्म 20 मई 1900 के दिन कौसानी उत्तराखंड में हुआ था। वे छायावादी युग के स्तंभ थे। उनके काव्य साहित्य पर जहां गांधी का प्रभाव था वहीं कई जगह मार्क्स और फ्रायड का प्रभाव बताया गया। आप हिन्दी साहित्य की काव्य परम्परा के कीर्ति स्तंभ हैं। उन्होंने पद्य के साथ गद्य रचनाएं की। 

कवि पंत को पद्मभूषण सम्मान प्रदान किया गया था। साथ ही भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। साहित्य अकादमी सम्मान प्रदान किया गया। उनकी काव्य पुस्तकें हैं- वीणा, ग्रन्थि, पल्लव, गुंजन, युगवाणी, ग्राम्या, उत्तरा आदि। गद्य पुस्तकों में ‘हार’ उपन्यास, ज्योत्सना,  पांच कहानी साठ वर्ष और अन्य निबन्ध, कला और संस्कृति निबंध आदि। सुमित्रानन्दन पन्त की स्मृति में कौसानी में संग्रहालय है।


(लेखक डॉ. अतुल शर्मा जाने माने साहित्यकार एवं जनकवि हैं।)


19 May, 2020

जरा बच के ... (व्यंग्य)

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•  प्रबोध उनियाल


बहुत समय पहले की बात है, तब इतनी मोटर गाड़ियां नहीं थीं। सबके अपने-अपने घोड़े होते थे। भले ही हम तब भी गधे ही रहे। अस्तु! उस समय मकान की दीवारें 'टच' नहीं होती थी बीच में नाली या नाला आपकी सुविधा अनुसार होता था। 'टच' के जमाने तो अब आये, चाहे दीवारें 'टच' हो या मोबाइल टच...।

पुराने लोग गवाह हैं। उनके जमाने की फिल्मों में शम्मी कपूर और मनोज कुमार पेड़ के ही आसपास घूमते हुए हीरोइन को रिझाते थे लेकिन 'टच' नहीं करते थे। ये सोशल डिस्टेंस ( Social distance ) के जमाने थे। यही वजह थी कि ये फिल्में बेहद मनोरंजक और घर के लोगों के साथ देखने वाली होती थीं। साम्बा इसीलिए हमेशा दूर पत्थर पर बैठा रहता था।

सोशल डिस्टेंस पर कई हिट गाने भी बने हैं। 'दूर रहकर न करो बात करीब आ जाओ..।' लेकिन साहब मजाल है जो हीरो या हीरोइन इतने करीब आ जाएं। समय बैल गाड़ियों से होता हुआ इलेक्ट्रॉनिक रेलगाड़ियों तक आ गया। दूरियां घटने लगी। यानि no distance ...

गांव की बात छोड़ दें तो शहरों में बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो गयीं। इन इमारतों में घर तो थे लेकिन छत नहीं। इन घरों में रह रहे लोग एक दूसरे से डिस्टेंस में ही रहते हैं। फ्लैट कल्चर है साहब! सही बात कहें तो ये डिस्टेंस तो आम लोगों के लिए है। उसे संभलना होगा। तभी कोरोना से बचा जा सकता है ...!


(लेखक प्रबोध उनियाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

11 May, 2020

लॉकडाउन में गूंज रही कोयल की मधुर तान

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• प्रबोध उनियाल

ये एक भीड़ भरा इलाका है, जहां मैं रहता हूं। मेरी घर की बालकनी से सड़क पर अक्सर भागते लोग और दौड़ती गाड़ियां ही दिखती हैं। तब कहीं न कहीं इस भीड़ में आप भी हैं। अभी तक मैंने इस सड़क को देर रात में ही थोड़ी सी सांस लेते देखा है। लेकिन लॉकडाउन के चलते एक निश्चित समय की छूट के बाद ये सुनसान सी पसरी पड़ी देख रहा हूं।

आजकल दिनचर्या सामान्य नहीं है। कामकाज के दिनों में आपका समय उसी हिसाब से बंधा होता है। पूरे दिन के इस खाली समय में आपको अपने आप को नियत करना होता है। तब आप कहीं ना कहीं सुकून ढूंढ रहे होते हैं।

लेकिन कुछ दिनों से मेरे लिए ढलती सांझ सुकून भरी आती है। बचपन यूं ही उन तमाम बच्चों की चुहलबाजियों सा ही बीता। मुझे याद है कि मेरे घर के पास तब इस तरह की ये तमाम सीमेंटेड अट्टालिकाएं नहीं थी। घर में सिर्फ कमरे होते थे दुकाने नहीं! बाजारीकरण के चलते दृश्य बदला और कई कमरे दुकानों में तब्दील हो गए।

मैं लौटता हूं आजकल की अपनी सांझ पर। पानी पीने के लिए फ्रिज को खोलते हुए मैं अचानक कोयल की मधुर तान सुन रहा हूं। बचपन में, मैंने कोयल की इस कुहू को बखूबी सुना है जो अभी तक भी मेरी स्मृतियों में है। हमारे दौर के बचपन आंगन में ही खेलते हुए बड़े होते थे। आज की तरह बच्चों के हाथ में मोबाइल और सामने टीवी स्क्रीन नहीं होता था।

कोयल का वैज्ञानिक नाम यूडाइनेमिस स्कोलोपेकस है। कोयल सभी पक्षियों में अपनी तरह की एक नीड परजीविता पक्षी है जो कभी भी अपने घोंसला नहीं बनाती। सभी पक्षियों में कोयल की बोली सबसे मधुर होती है। लेकिन केवल नर कोयल ही गाता है। कोयल कभी जमीन पर नहीं उतरती है, पेड़ों पर ही गुनगुनाती है और वह भी आम के पेड़ों पर। 

उर्वर जमीन को उगल रहे यूकेलिप्टस के पेड़ पर तो ये बिल्कुल भी नहीं मंडराती। दुनियाभर के साहित्यकारों ने कोयल की मीठी बोली पर खूब लिखा है। रोमांटिक कवि विलियम वर्ड्सवर्थ कहते हैं- O Cuckoo! Shell I Call Thee Birds, Or but a Wandering Voice! (ओ कोयल! क्या मैं तुम्हें पक्षी कहूंगा, या फिर भटकती आवाज?)

बसंत आते ही कोयल कूकने लगती है। लेकिन इनदिनों सन्नाटे के बीच मैं कोयल की कूक को बेहतर सुन रहा हूं। हो सकता है कि ये इत्तेफाक हो कि वह आजकल हर शाम को मुझे कुकते हुए सुनाई दे रही है। मौसम कोई भी हो कोयल गा रही है, आओ हम सब भी इसकी तान के संग हो लें...।

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लेखक प्रबोध  उनियाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। 
Photo Source - Google

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