November 2017 ~ BOL PAHADI

29 November, 2017

जादूगर खेल दिखाता है

जादूगर खेल दिखाता है
अपने कोट की जेब से निकालता है एक सूर्ख फूल
और बदल देता है उसे पलक झपकते ही नुकीले चाकू में
तुम्हें लगता है जादूगर चाकू को फिर से फूल में बदल देगा
पर वो ऐसा नहीं करता
वो अब तक न जाने कितने फूलों को चाकुओं में बदल चुका है।

जादूगर पूछता है कौन सी मिठाई खाओगे ?
वो एक खाली डिब्बा तुम्हारी ओर बढ़ाता है
तुमसे तुम्हारी जेब का आखिरी बचा सिक्का उसमें डालने को कहता है
और हवा में कहीं मिठाई की तस्वीर बनाता है
तुम्हारी जीभ के लार से भरने तक के समय के बीच
मिठाई कहीं गुम हो जाती है
तुम लार को भीतर घूटते हो
कुछ पूछने को गला खंखारते हो
तब तक नया खेल शुरू हो जाता है।

जादूगर कहता है
मान लो तुम्हारा पड़ोसी तुम्हें मारने को आए तो तुम क्या करोगे ?
तुम कहते हो, तुम्हारा पड़ोसी एक दयालू आदमी है
जादूगर कहता है, मान लो
तुम कहते हो, आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ
जादूगर कहता है, मान लो मानने में क्या जाता है?
तुम पल भर के लिए मानने को राजी होते हो
तुम्हारे मानते ही वह तुम्हारे हाथ में हथियार देकर कहता है
इससे पहले कि वो तुम्हें मारे, तुम उसे मार डालो
जादूगर तुम्हारे डर से अपने लिए हथियार खरीदता है।

जादूगर कहता है
वो दिन रात तुम्हारी चिंता में जलता है
वो पल-पल तुम्हारे भले की सोचता है
वो तुम्हें तथाकथित उन कलाओं के बारे में बताता है
जिनसे कई सौ साल पहले तुम्हारे पूर्वजों ने राज किया था
वो उन कलाओं को फिर से तुम्हें सिखा देने का दावा करता है

वो बडे़-बडे़ पंडाल लगाता है
लाउडस्पीकर पर गला फाड़ फाड़कर चिल्लाता है
भरी दोपहरी तुम्हें तुम्हारे घरों से बुलाकर
स्वर्ग और नरक का भेद बताता है
तुम्हारे बच्चों के सिरों के ऊपर पैर रखकर भाषण देता है
तुम अपने बच्चों के कंकालों की चरमराहट सुनते ही
उन्हें सहारा देने को दौड़ लगाते हो
गुस्से और नफरत से जादूगर की ओर देखते हो
तुम जादुगर से पूछना चाहते हो उसने ऐसा क्यों किया
इस बीच जादूगर अदृश्य हो जाता है
उसे दूसरी जगह अपना खेल शुरू करने की देर हो रही होती है।

कविता-  रेखा
साभार- सुभाष तराण

                    ये जो निजाम है

‘लोक’ की भाषा और संस्कृति को समर्पित किरदार

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ब्यालि उरडी आई फ्योंली सब झैड़गेन/किनगोड़ा, छन आज भी हंसणा...।
बर्सु बाद मी घौर गौं, अर मेरि सेयिं कुड़ि बिजीगे...।
जंदरि सि रिटणि रैंद, नाज जन पिसैणि रैंद..।
परदेश जैक मुक न लुका, माटा पाणी को कर्ज चुका..।
इन रचनाओं को रचने वाली शख्सियत है अभिनेता, कवि, लेखक, गजलकार, साहित्यकार मदनमोहन डुकलान। जो अपनी माटी और दूधबोली की पिछले 35 वर्षों से सेवा कर रहे हैं।
10 मार्च 1964 को पौड़ी जनपद के खनेता गांव में श्रीमती कमला देवी और गोविन्द राम जी के घर मदन मोहन डुकलान का जन्म हुआ था। जब ये महज पांच बरस के थे, तो अपने पिताजी के साथ दिल्ली चले गए। इन्होंने 10वीं तक की पढ़ाई दिल्ली में ग्रहण की। जबकि 12वीं देहरादून से और स्नातक गढ़वाल विश्वविद्यालय से। बेहद सरल, मिलनसार स्वभाव और मृदभाषी ब्यक्तित्व है इनका। जो एक बार मुलाकात कर ले जीवनभर नहीं भूल सकता है इन्हें। क्योंकि पहली मुलाकात में ये हर किसी को अपना मुरीद बना देते हैं। यही इनकी पहचान और परिचय है।

बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी मदन मोहन डुकलान अपने पिताजी के साथ जब दिल्ली आये, तो उसके बाद उनका अपने गांव और पहाड़ जाना बहुत ही कम हो गया था। इनके पिताजी दिल्ली में आयोजित रामलीला के दौरान मंच का संचालन किया करते थे। वे अक्सर अपने पिताजी के साथ रामलीला में मंचों पर जाते रहते थे। जिस कारण इनका झुकाव अभिनय की तरफ हो गया था।

रामलीला में ही अभिनय का पहला पात्र उनके हिस्से में आया पवनपुत्र हनुमान के वानर सेना के वानर सदस्य के रूप में। जिसको उन्होंने बखूबी निभाया। जिसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज अभिनय में उनका कोई सानी नहीं। डुकलान जब दिल्ली में 10वीं की पढाई कर रहे थे तो कविताओं के प्रति उनके रुझान को देखते हुए उनकी अध्यापिका ने उन्हें कविता लिखने को प्रोत्साहित किया। जिसके बाद उन्होंने कई हिंदी कविताएं लिखी। दिल्ली से शुरू हुआ उनके कविता लिखने का सफर आज भी बदस्तूर जारी है।

जब वे बीएससी द्वितीय वर्ष में अध्यनरत थे तो तभी महज 19 बरस की आयु में उनका चयन ओएनजीसी में हो गया था। ओएनजीसी में नौकरी के दौरान उन्हें बहुत सारे मित्र मिले, जो रंगमंच के हितैषी थे और कई लोगों ने उन्हें प्रोत्साहित भी किया। जो आज भी उनके साथ रंगमंच में बड़ी शिद्दत से जुटे हुए हैं।

उनकी अपनी बोली भाषा के प्रति प्रेम और समर्पण को देखकर नहीं लगता की उनका बचपन अपनी माटी से बहुत दूर गुजरा हो। लेकिन यही हकीकत है कि उन्होंने माटी से दूर रहने के बाद भी अपनी माटी को नहीं बिसराया। वो हिंदी में बहुत अच्छा लिखते थे। 80 के दशक में मध्य हिमालय के देहरादून, पौड़ी, श्रीनगर, सतपुली, कोटद्वार, हरिद्वार, रामनगर जैसे छोटे बडे़ नगरों में धाद के संस्थापक लोकेश नवानी गढ़वाली बोली भाषा के संरक्षण, संवर्धन के लिए प्रयासरत थे। इसी दौरान इनकी मुलाकात लोकेश नवानी जी के साथ हुई। जो इनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। जिसने इनके जीवन की दिशा बदल कर रख दी।

लोकेश नवानी जी ने मदन मोहन डुकलान को गढ़वाली भाषा के साहित्य के बारे में विस्तार से बताया और उन्हें गढ़वाली में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। जिसके बाद से डुकलान अपनी दुधबोली भाषा के संरक्षण और संवर्धन में लगे हुए हैं। वे विगत 35 बरसों से अभिनय से लेकर काव्य संग्रहों और कवि सम्मेलनों के जरिये अपनी दुधबोली भाषा और साहित्य को नई ऊंचाइया देते आ रहे हैं।

उन्होंने अपनी दुधबोली भाषा के लिए हिंदी का मोह त्याग दिया, नहीं तो हिंदी कवियों में आज वे अग्रिम कतार में खड़े रहते। इसके अलावा गढ़वाली में गजल विधा का प्रयोग करने वाले वे शुरूआती दौर के रचनाकारों में थे। जो कि गढ़वाली साहित्य में अपने तरह का अलग प्रयास था। इस विधा को गढ़वाली साहित्य में स्थान दिलाने में उनका अहम् योगदान रहा है। पौड़ी से लेकर देहरादून और दिल्ली में आयोजित होने वाले गढ़वाली कवि सम्मेलनों में आपको मदन मोहन डुकलान की उपस्थिति जरूर दिखाई देती है।
बकौल डुकलान बोली भाषा के संरक्षण, संवर्धन के लिए सम्मिलित प्रयासों की नितांत आवश्यकता है। बच्चों को अपनी बोली भाषा में लेखन, संगीत, नाटकों से जोड़ा जाना चाहिए। यही हमारी पहचान है। युवाओं को खुद भी इस दिशा में आगे आना चाहिए।

वास्तव में देखा जाय तो मदन मोहन डुकलान का गढ़वाली साहित्य के संरक्षण और संवर्धन में अमूल्य योगदान रहा है। वह विगत 35 बरसों से न केवल बोली भाषा के मजबूत स्तभ बने हुए हैं, अपितु सांस्कृतिक व साहित्यिक गतिविधियों से लेकर रंगमंच तक निरंतर सक्रिय भूमिका निभा रहें हैं। गढ़वाली साहित्य के प्रचार प्रसार में भी उनका योगदान अहम रहा है।

उत्तराखंड में लोकभाषा, संस्कृति, समाज की निस्वार्थ सेवा करने वाले बहुत ही कम लोग हैं। ऐसे में मदन मोहन डुकलान और अन्य साहित्यकारों के कार्यों को लोगों तक नहीं पहुंचा सके तो नई पीढ़ी कैसे इनके बारे में जान पाएगी।

इनके खाते में दर्ज सृजन के कई दस्तावेज
अगर मदन मोहन डुकलान के सृजन संसार पर एक सरसरी निगाहें डाले तो साफ पता चलता है कि अपनी बोली भाषा के लिए उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होंने जहां पहला गढ़वाली कविता पोस्टर बनाया, तो वहीं अपनी दुधबोली भाषा के प्रति असीम प्रेमभाव दिखाते हुए अपने संसाधनों से गढ़वाली त्रैमासिक पत्रिका चिट्ठी-पत्रिका निरंतर प्रकाशन किया। इस पत्रिका के जरिये उन्होंने कई लोगों को एक मंच भी प्रदान किया। जबकि ये पत्रिका विशुद्ध रूप से अव्यवसायिक है। उन्होंने ग्वथनी गौं बटे’ (18 कवियों को कविता संग्रह), ‘अंग्वाल’ (वृहद् गढ़वाली कविता संकलन), ‘हुंगरा’ (100 गढ़वाली कथाओं का संग्रह) का संपादन किया। वहीं आंदि-जांदि सांस (गढ़वाली कविता संग्रह), अपणो ऐना अपणी अन्वार (गढ़वाली कविता संग्रह), चेहरों के घेरे (हिंदी कविता संग्रह), इन दिनों (हिंदी कवियों का सह-संकलन), प्रयास (हिंदी कवियों का सह-संकलन) जैसी ख्याति प्राप्त पुस्तकें लिखीं। जो उनकी प्रतिभा को चरितार्थ करती हैं।

इन सम्मानों ने बढ़ाया मदन मोहन का मान
उन्हें रंगमंच से लेकर अपनी बोली भाषा और साहित्य की सेवा के लिए कई सम्मानों से भी सम्मानित किया जा चूका है। जिसमें उत्तराखंड संस्कृति सम्मान, दूनश्री सम्मान, डॉ. गोविन्द चातक सम्मान (उत्तराखंड भाषा संस्थान), उत्तराखंड शोध संस्थान सम्मान, सर्वश्रेठ अभिनेता (नाटक- प्यादा), गोकुल आर्ट्स नाट्य प्रतियोगिता, वाराणसी, सर्वश्रेठ अभिनेता (फिल्मः याद आली टिरी) - यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड, सर्वश्रेठ अभिनय- नेगेटिव रोल (फिल्मः अब त खुलली रात) - यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड, यूथ आइकॉन अवार्ड के बाद कुछ दिन पहले गढ़वाली भाषा के लिए देश की राजधानी दिल्ली में कन्हैयालाल डंडरियाल साहित्य सम्मान 2017 भी शामिल है।

आलेख- संजय चौहान, युवा पत्रकार।

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16 November, 2017

17 साल बाद भी क्यों ‘गैर’ है ‘गैरसैंण’

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गैरसैंण एकबार फिर से सुर्खियों में है। उसे स्थायी राजधानी का ओहदा मिल रहा है? जी नहीं! अभी इसकी दूर तक संभवनाएं नहीं दिखती। सुर्खियों का कारण है कि बर्तज पूर्ववर्ती सरकार ही मौजूदा सरकार ने दिसंबर में गैरसैंण में एक हफ्ते का विधानसभा सत्र आहूत करने का निर्णय लिया है। जो कि सात से 13 दिसंबर तक चलेगा। विस सत्र में अनुपूरक बजट पास किया जाएगा। इसके लिए आवश्यक तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं। तो दूसरी तरफ गैरसैंण पर सियासत भी शुरू हो गई है। 
कांग्रेस और यूकेडी नेताओं ने जहां भाजपा सरकार की नियत पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं, वहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने भी जनभावनाओंके अनुरूप निर्णय लेने की बात को दोहरा भर दिया है।

दरअसल, उत्तराखंड के पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में आने से अब तक गैरसैंण के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा का अतीत सवालों में रहा है। दोनों दल उसे स्थायी राजधानी बनाने के पक्षधर हैं, ऐसा कभी नहीं लगा। यूकेडी ने राज्य आंदोलन के दौरान गैरसैंण को पृथक राज्य की स्थायी राजधानी बनाने के संकल्प के तहत जरूर उसे वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के नाम पर चंद्रनगर का नाम दिया। लेकिन बीते 17 सालों के दौरान दो सरकारों में भागीदारी के बावजूद वह इस पर निर्णायक दबाव पैदा नहीं कर सकी।

उत्तराखंड में अन्य राजनीतिक पार्टियों का कोई मजबूत जमीनी आधार नहीं, इसलिए वह भी सड़क के आंदोलन तो दूर आम लोगों को गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के लाभ तक नहीं बता पाएं हैं। जिसके चलते गैरसैंण के मसले पर जनमत तैयार होने जैसी कोई बात अब तक सामने नहीं आई है। हाल के वर्षों में कुछ स्थानीय और प्रवासी युवाओं ने इस मुद्दे पर खासकर पर्वतजन के बीच वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने की कोशिशें की हैं और प्रयासरत भी हैं। मगर, संसाधनों के लिहाज से वह भी कुछ दूर आगे बढ़ने के बाद निराश होकर लौटते हुए लग रहे हैं।

इसबीच राज्य में चार बार हुए चुनावों के नतीजों को देखें, तो जिस पहाड़ की खातिर गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग उठ रही है, उसके दिए चुनाव परिणाम कहीं से भी इसके पक्ष में नहीं दिखे। निश्चित तौर पर इसका पूरा लाभ अब तक सत्तासीन रही कांग्रेस और भाजपा ने अपने-अपने तरीके से उठाती रही।

पिछली कांग्रेस सरकार जहां मैदानी वोटों के खतरे से डरकर गैरसैंण पर निर्णायक फैसला नहीं ले सकी, उसी तरह भाजपा भी डरी हुई ही लग रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का जनभावनाओं वाला ताजा बयान और गैरसैंण में सिर्फ सत्र का आयोजन इसी तरफ इशारा कर रहा है।


लिहाजा, इतना तो स्पष्ट है कि गैरसैंण स्थायी राजधानी के मसले पर जहां कांग्रेस की पैंतरेबाजी सिर्फ सियासत भर लग रही है, वहीं भाजपा की टालमटोल को समझें तो उसके लिए भी गैरसैंण पहले की तरह अब भी गैरही है। सो, ... आगे-आगे देखिए होता है क्या?
आलेख- धनेश कोठारी

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01 November, 2017

उत्तराखंड में एक और फूलों की घाटी ‘चिनाप’

विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी से तो हर कोई परिचित है। लेकिन इससे इतर एक और फूलों की जन्नत है चिनाप घाटी। जिसके बारे में शायद बहुत ही कम लोगों को जानकारी होगी। सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ ब्लाक में स्थित है कुदरत की ये गुमनाम नेमत। जिसका सौंदर्य इतना अभिभूत कर देने वाला है कि देखने वाला इसकी सुंदरता से हर किसी को ईर्ष्या होने लगे।

गौरतलब है ये घाटी चमोली के जोशीमठ ब्लाक के उर्गम घाटी, थैंग घाटी व खीरों घाटी के मध्य हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों की तलहटी में 13 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर 300 से अधिक प्रजाति के फूल बेपनाह सुंदरता और खुशबू बिखेरे रहते हैं। पुराणों में भी इसकी सुंदरता और खुशबू के बारे में वर्णन है। जिसमें कहा गया है कि यहां के फूलों की सुंदरता व खुशबू के सामने बद्री नारायण और गंधमान पर्वत के फूलों की सुंदरता व खुशबू न के बराबर है। वैसे इस घाटी की सुंदरता 12 महीने बनी रहती है। लेकिन खासतौर पर जुलाई से लेकर सितंबर के दौरान खिलने वाले असंख्य फूलों से इस घाटी का अविभूत कर देने वाला सौंदर्य बरबस ही हर किसी को अपनी ओर खींचने को मजबूर कर देता है।

इस घाटी की सबसे बड़ी विशेषता यह है की यहां पर फूलों की सैकड़ों क्यारियां मौजूद हैं। जो लगभग पांच वर्ग किमी के दायरे में फैली हैं। हर क्यारी में 200 से लेकर 300 प्रकार के प्रजाति के फूल खिलतें हैं। जिनको देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है की इन कतारनुमा फूलों की क्यारियों को खुद कुदरत ने अपने हाथों से फुरसत में बड़े सलीके से बनाया हो।

फूलों की इस जन्नत में कई दुर्लभ प्रजाति के हिमालयी फूल के अलावा बहुमूल्य वनस्पतियां व जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। इसके अलावा राज्यपुष्प ब्रह्मकमल की तो तो यहां सैकड़ों क्यारियां पाई जाती हैं जो इसके सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं। साथ ही इस घाटी से चारों ओर हिमालय का नयनाभिराम और रोमांचित कर देना वाला दृश्य दिखाई देता है। लेकिन आज भी फूलों की ये जन्नत देश और दुनिया की नजरों से ओझल है। राज्य बनने के 17 साल बाद भी सूबे के नीति नियंताओं की नजरें प्रकृति की इस अनमोल नेमत पर नहीं पड़ी। जबकि ये घाटी सूबे के पर्यटन के लिए मील का पत्थर साबित हो सकतीं हैं।

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प्रकृति प्रेमी, अधिवक्ता और गांव के युवा दिलबर सिंह फरस्वाण कहते हैं कि चिनाप फूलों की घाटी को पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए ग्रामीण कई बार जनप्रतिनिधियों से लेकर जिले के आलाधिकारी से मांग कर चुके हैं। लेकिन नतीजा सिफर रहा। यदि चिनाप फूलों की घाटी को पर्यटन के रूप में विकसित किया जाता है, तो आने वाले सालों में उत्तराखंड में सबसे अधिक पर्यटक यहां का रुख करेंगें। चिनाप फूलों की घाटी के साथ-साथ यहां पर फुलारा बुग्याल, गणेश मंदिर, सोना शिखर जैसे दर्शनीय स्थलों का दीदार किया जा सकता है। जबकि हेलंग, उर्गम, चेनाप, खीरों, होते हुए हनुमान चट्टी पैदल ट्रेकिंग किया जा सकता है। साथ ही बदरीनाथ तक भी ट्रेकिंग किया जा सकता है। ये ट्रैक पर्वतारोहियों के लिए किसी रोमांच से कम नहीं है।

वहीं जोशीमठ ब्लाक के ब्लाक प्रमुख प्रकाश रावत कहतें है कि चिनाप जैसे गुमनाम स्थलों को देश और दुनिया के सामने लाया जाना अति आवश्यक है। क्योंकि इससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। उन्होंने चिनाप घाटी को भी द्रोणागिरी की तर्ज पर टै्रक ऑफ द ईयर घोषित करने की मांग की है। ताकि देश और दुनिया की नजरों से ओझल ये घाटी पर्यटन के मानचित्र पर आ सके।

वास्तव मे हमारे उत्तराखंड में चिनाप घाटी जैसे दर्जनों स्थल ऐसे हैं, जो पर्यटन के लिहाज से मील का पत्थर साबित हो सकतें हैं। लेकिन नीति नियंताओं ने कभी भी इनकी सुध नहीं ली। यदि ऐसे स्थानों को चिह्नित करके इन्हें विकसित किया जाए, तो इससे न केवल पर्यटक यहां का रूख करेंगे, अपितु रोजगार के अवसरों का सृजन भी होगा। सरकार को चाहिए की तत्काल ऐसे स्थानों के लिए वृहद कार्ययोजना बनाए।

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आलेख- संजय चौहान, पीपलकोटी

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