30 October, 2017

शिकायतें तब भी थीं, अब भी हैं

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 उत्तराखंड अलग राज्य बनने से पहले यूपी सरकार को लेकर जितनी शिकायतें पर्वतजनके मानस पर अंकित थीं, उससे कहीं अधिक शिकायतें हल होने के इंतजार में अपनी ही सरकारों का मुहं तक रही हैं। कारण, 17 वर्षों में निस्तारण की बजाए उनकी संख्या ज्यादा बढ़ी है। जिसकी तस्दीक सरकारी आंकड़े करते हैं। यानि कि राज्य निर्माण की उम्मीदें अब तक के अंतराल में टूटी ही हैं।

आलम यह रहा कि 17 सालों में पलायन की रफ्तार दोगुनी तेजी से बढ़ी। अब तक करीब 30 हजार से अधिक गांव वीरान हो गए हैं। कई तो मानवविहीन बताए जा रहे हैं। ढाई लाख घरों में ताले लटक चुके हैं। पर्वतीय क्षेत्रों से करीब इस वक्फे में जहां 14 फीसदी आबादी कम हुई, तो राज्य के मैदानी इलाकों में यह छह प्रतिशत से अधिक बढ़ी। नतीजा, पहाड़ को जनप्रतिनिधित्व के तौर पर छह सीटें गंवानी पड़ी हैं, जिसमें 2026 में लगभग 10 सीटें और कम होने का अनुमान है।

हाल के चुनाव आयोग के आंकड़ों को समझें, तो हरदिन 250 लोग पहाड़ों से पलायन कर रहे हैं। अक्टूबर 2016 से सितंबर 2017 तक राज्य में 1,57,672 नाम वोटर लिस्ट से कटे और 11,704 डुप्लीकेट मिले। वहीं, 9,822 नामों को शिफ्ट किया गया। जबकि इसी दरमियान वोटर लिस्ट में अंकित 3,13,096 में से अधिकांश नाम राज्य के मैदानी इलाकों से जुड़े हैं।

इन स्थितियों के बीच हाल में पलायन के कारणों की पड़ताल (जो कि सर्वविदित हैं) के लिए सरकार ने आयोग गठित किया है। आयोग कैसे काम करते हैं, उनका निष्कर्ष कितना लाभकारी होता है, यह पूर्व मे राज्य की स्थायी राजधानी के बारे गठित आयोग की रिपोर्टों और निष्कर्षों से समझना मुश्किल नहीं। खैर, पलायन आयोग मूल तथ्यों को मैनेज किए बिना कम समय में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप देगा, और सरकार ठोस कदम उठाएगी, इसकी फिलहाल उम्मीद ही की जा सकती है।

आलेख- धनेश कोठारी

28 October, 2017

सिर्फ आलोचना करके तो नहीं जीत सकते

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उत्तराखंड क्रांति दल खुद को अपनी आंदोलनकारी संगठनकी छवि से मुक्त कर एक जिम्मेदार और परिपक्व राजनीतिक पार्टी के रूप में स्थापित करना चाहता है। इसके पीछे निश्चित ही उसके तर्क हैं। जिन्हें अनसुना तो कम से कम नहीं किया जा सकता है। मगर, अतीत में आंदोलनकारी संगठन और फिर सियासी असफलताओं के आलोक में उसके लिए मनोवांछित कायाकल्पआसान होगा?
यूकेडी जिस फार्मेट में अब सामने आना चाहती है, उसका यह नया अवतार जनमन को स्वीकार्य होगा? राज्य के मौजूदा सियासी परिदृश्य में कोई स्पेस बाकी है? खासकर तब जब 17 बरसों में कांग्रेस और भाजपा ने जनता के बीच खुद को लगभग एक-दूसरे का पूरक मनवा लिया हो।

पृथक उत्तराखंड की लड़ाई में उक्रांद के संघर्ष को कौन भला नकार सकता है। 1994 के राज्य आंदोलन का अगवा भी लगभग वही रहा। परिणाम निकला और नौ नवंबर सन् 2000 में आखिरकार अलग राज्य की नींव पड़ी। तब नेशनल मीडिया तक ने उत्तराखंड में यूकेडी को तीसरी ताकत के तौर पर विशेष तौर से पेश किया। अलग राज्य में सन् 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में दल को जनता ने चार सीटें दीं। किंतु, वह अगले पांच साल में खुद को एक राजनीतिक दल के तौर पर नहीं उबार सकी।

वर्ष 2007 में एक सीट और घटकर तीन ही रह गई। सबक तब भी नहीं लिया और समूची पार्टी भाजपा के आगे लमलेट हो गई। हालांकि तब भाजपा को नौ बिंदुओं पर सहमति के आधर पर समर्थन देने का तर्क दिया गया। जो आज भी अधूरे हैं। कैबिनेट में शामिल होने के बाद भी दिवाकर भट्ट (जो कि वर्तमान में पार्टी अध्यक्ष हैं) पार्टी को इसका लाभ नहीं दिला सके। तीसरी विस (2012) में बमुश्किल एक सीट मिली, तो एकमात्र विधायक प्रीतम सिंह पंवार पूरे पांच साल कांग्रेस की गोद में बैठे रहे।

इससे पूर्व और 17 साल के वक्फे में लीडरशिप के बीच वर्चस्व के लिए संघर्ष, पार्टी में बिखराव, नए धड़ों का गठन सबकुछ हुआ। नतीजा, जनता में बची कुछ प्रतिशत सिंपैथीभी 2017 आने तक जाती रही। पहले ही पार्टी छोड़ चुके प्रीतम सिंह पंवार निर्दलीय विस पहुंचे, तो भाजपा में शामिल दिवाकर भट्ट और ओमगोपाल रावत ने टिकट न मिलने पर चुनाव मैदान में निर्दलीय उतरने पर हार का सामना किया।

खैर, इस फजीहत ने बिखरे धड़ों को फिर से एकमंच आने को मजबूर किया। जिसकी कमान फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट को मिली है। जबकि काशी सिंह ऐरी, त्रिवेंद्र पंवार, पुष्पेश त्रिपाठी ने संयोजक के रूप में नई जिम्मेदारियों को संभाला है। अब शीर्ष नेतृत्व गलतियों को स्वीकार कर अपने चेहरे-मोहरे को एक सियासी दल के रूप में बदलने की बात कह रहा है। पार्टी पर्वतीय जिलों को फोकस में रखकर गांवों तक सांगठनिक विस्तार और खासकर युवाओं को यूकेडी के करीब लाने की रणनीति की बात पर काम कर रही है। साथ ही उसने अपनी भाषा और तौर तरीकों को भी रूपांतरित करने की ठानी है।

मगर, इससे इतर एक बात कि वह आज भी विरोधियों की आलोचनाओं के मायाजाल से बाहर नहीं निकल पा रही है। भाजपा-कांग्रेस के विरूद्ध आलोचना के इस राग में उसके पुराने सेंटेंस ही दोहराए जा रहे हैं। जबकि पिछले 17 बरसों में राज्य में घोटालों की लिस्ट लंबी हुई है। खनन, शराब, शिक्षा और यहां तक कि नीतियों को प्रभावित करने में माफियातंत्र पहले से अधिक हावी दिखता है। बेपटरी कानून व्यवस्था के चलते उत्तराखंड अपराधियों की शरणस्थली बनने लगा है। पलायन ने पहाड़ी गांवों को खाली कर दिया, तो मैदान बाहर से आई भीड़ से पट रहे हैं।

बावजूद इसके यूकेडी के तेवरों में मुखरता नहीं दिख रही। गैरसैंण स्थायी राजधानी क्यों के युवाओं के सवाल पर वह अपना पक्ष और तर्क मजबूती से नहीं रख पा रही है। पहाड़ों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, बिजली, पानी, खेती, रोजगार आदि के लिए उसने कोई ब्लू पिं्रट तैयार किया है या नहीं, कोई नहीं जानता। तकनीकी युग और प्रोपगंडे के इस दौर में वह भाजपा और कांग्रेस का मुकाबला किस तरह करेगी, इसपर उसकी कोई तैयारी नहीं दिखती है। वह सिर्फ आलोचनाओंके बूते चुनावों जीतने का ख्वाब देख रही है। जिसके कामयाब होने में फिलहाल तो शंका है।

आलेख- धनेश कोठारी 

21 October, 2017

जहां बिखरी है कुदरत की बेपनाह खूबसूरती

उत्तराखंड के हिमालय में कई छोटे-बड़े बुग्याल मौजूद हैं। औली, गोरसों बुग्याल, बेदनी बुग्याल, दयारा बुग्याल, पंवालीकांठा, चोपता, दुगलबिट्टा सहित कई बुग्याल हैं, जो बरबस ही सैलानियों को अपनी और आकर्षित करते हैं। लेकिन इन सबसे अलग बेपनाह हुस्न और अभिभूत कर देने वाला सौंदर्य को समेटे सीमांत जनपद चमोली के देवाल ब्लाक में स्थित आली बुग्याल आज भी अपनी पहचान को छटपटाता नजर आ रहा है। प्रकृति ने आली पर अपना सब कुछ लुटाया है, लेकिन नीति नियंताओं की उदासीनता के कारण आज आली हाशिए पर चला गया है।

जान लें कि पहाड़ों में जहां पेड़ समाप्त होने लगतें हैं यानि की टिंबर रेखा, वहां से हरे भरे मखमली घास के मैदान शुरू हो जाते हैं। आपको यहीं पर स्नो और ट्री लाइन का मिलन भी दिखाई देगा। उत्तराखंड में घास के इन मैदानों को बुग्याल कहा जाता है। ये बुग्याल बरसों से स्थानीय लोगों के लिए चारागाह के रूप में उपयोग में आतें हैं। जिनकी घास बेहद पौष्टिक होती हैं। इन मखमली घासों में जब बर्फ की सफेद चादर बिछती है, तो ये किसी जन्नत से कम नजर नहीं आते हैं। इन बुग्यालों में आपको नाना प्रकार के फूल और वनस्पति लकदक दिखाई देंगे। हर मौसम में बुग्यालों का रंग बदलता रहता है। बुग्यालों से हिमालय का नजारा ऐसे दिखाई देता है, जैसे किसी कलाकार ने बुग्याल, घने जंगलों और हिमालय के नयनाभिराम शिखरों को किसी कैनवास पर उतारा है। बुग्यालों में कई बहुमूल्य औषधि युक्त जडी-बू्टियां भी पाई जाती हैं। इसके साथ-साथ हिमालयी भेड़, हिरण, मोनाल, कस्तूरी मृग जैसे जानवर भी देखे जा सकते हैं।

चमोली के देवाल ब्लाक में स्थित आली बुग्याल तक पहुंचने के लिए कर्णप्रयाग से लगभग 100 किमी वाहन में जाना पड़ता है। कर्णप्रयाग से नारायणबगड़, थराली, देवाल, मुंदोली होते हुए अंतिम गांव वाण पहुंचा जाता है। जबकि वाण गांव से आली तक का सफर पैदल ही तय करना पड़ता है। वाण गांव से थोड़ा ऊपर जाने पर लाटू देवता का पौराणिक मंदिर है। जिसके कपाट पूरे साल में केवल एक ही दिन के लिए खुलते हैं। हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात यात्रा में लाटू देवता से अनुमति मिलने के बाद ही राजजात आगे बढती है। लाटू देवता को मां नंदा का धर्म भाई माना जाता है और राजजात में यहां से आगे नंदा का पथ प्रदर्शक लाटू ही होता है।

लाटू मंदिर के बाद रणकधार नामक जगह आती है। फिर आगे नील गंगा, गैरोली पाताल, डोलियाधर होते हुए बांज, बुरांस, कैल के घने जंगलों, नदी, पशु, पक्षियों के कलरव ध्वनियों के बीच 13 किमी पैदल चलने के उपरान्त 12 हजार फीट की ऊंचाई पर आली और बेदनी के मखमली बुग्याल के दीदार होते हैं। बेदनी से ही सटा हुआ है आली बुग्याल। जो पांच किमी से भी अधिक क्षेत्रफल में विस्तारित और फेला हुआ है। यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त देखना किसी रोमांच से कम नहीं है। ये दोनों दृश्य बेहद ही अद्भुत और अलौकिक होते हैं। साथ ही यहां से दिखाई देने वाले त्रिशूल और नंदा देवी सहित अन्य पर्वत शृखंलाओं का दृश्य लाजबाब होता है। वहीं हरी मखमली घास, ओंस की बूंदे, चारों और से हिमालय की हिमाच्छादित नयनाविराम चोटियां, धूप के साथ बादलों की लुकाछिपी आपको यहां किसी जन्नत का अहसास कराती है। दिसंबर से मार्च तक यहां बिछी बर्फ की सफेद चादर स्कीइंग के लिए किसी ऐशगाह से कम नहीं है। इसे स्कीइंग रिसोर्ट के रूप में विकसित किया जा सकता है।

वास्तव में देखा जाए तो आली बुग्याल को स्थानीय लोग ही नहीं बल्कि पहाड़ों से प्यार करने वाले, देश से लेकर विदेशी भी आली की सुंदरता के कायल हैं। आली की नैसर्गिक सुंदरता आपको हिमालय के बहुत करीब ले जाती है। मुझे भी नंदा देवी राजजात यात्रा 2014 में आली बुग्याल का दीदार करने का अवसर मिला था। आली बुग्याल के बेपनाह सौंदर्य को देखकर बस देखता ही रह गया था। हरे घास का ये मैदान घोड़े की पीठ का आभास दिलाता है। हिमालय की गोद में बसे मखमली घास और फूलों के इस खजाने को आज भी पर्यटकों का इंतजार है। अगर आप भी आली के बेपनाह हुश्न का दीदार करना चाहते हैं तो सितंबर से लेकर नवंबर महीने तक यहां का रुख कर सकते हैं।

देवाल की ब्लाक प्रमुख उर्मिला बिष्ट कहती हैं कि आली बुग्याल पर्यटन के लिहाज से सबसे ज्यादा मुफीद है। इसे विश्वस्तरीय स्कीइंग रिजोर्ट के रूप में विकसित किया जा सकता है। जिससे न केवल पर्यटन बढे़गा, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। 1972 में आली को रोपवे से जोड़ने का प्रस्ताव भेजा गया था। हमने भी कई बार आली को पर्यटन केंद्र और स्कीइंग रिजोर्ट के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव पर्यटन विभाग और सरकार को भेजा है। लेकिन अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। जिस कारण से आली बुग्याल आज भी पर्यटन के दृष्टि से अपनी पहचान नहीं बना पाया है।

पर्यटन व्यवसाय से जुड़े स्थानीय युवा हीरा सिंह बिष्ट कहते हैं कि आली का मखमली बुग्याल सैलानियों को बरबस ही अपनी और आकर्षित करता हैं। लेकिन सरकारों की उदासीनता और उपेक्षा के चलते आज आली अपनी पहचान के लिए तरसता नजर आ रहा है। वहीं हिमालय को बेहद करीब से जानने वाले पर्वतारोही विजय सिंह रौतेला कहते हैं कि आली बुग्याल की सुदंरता के सामने हर किसी का हुश्न फीका है। बरसात के समय हरी भरी घास की हरियाली मन को मोहित करती है, तो बर्फ के समय पूरा बुग्याल सफेद चादर से चमक उठता है। जबकि यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा देखना वाकई अद्भुत है। सरकार को चाहिए कि इस बुग्याल को पर्यटन के रूप में विकसित करें, ताकि पर्यटन को बढ़ावा मिले और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया हो सकें।

आलेख- संजय चौहान
फोटो साभार- विजय रौतेला

20 October, 2017

ओ साओ ! तुम कैक छा ?

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पहाड़ के रसूल हमताजोव हैं शेरदा अनपढ़

तुम सुख में लोटी रया,
हम दुःख में पोती रयां !

तुम स्वर्ग, हम नरक,
धरती में, धरती आसमानौ फरक !

तुमरि थाइन सुनुक र्वट,
हमरि थाइन ट्वाटे- ट्वट !

तुम ढडूवे चार खुश,
हम जिबाई भितेर मुस !

तुम तड़क भड़क में,
हम बीच सड़क में !

तुमार गाउन घ्युंकि तौहाड़,
हमार गाउन आसुंकि तौहाड़ !

तुम बेमानिक र्वट खानया,
हम इमानांक ज्वात खानयां !

तुम पेट फूलूंण में लागा,
हम पेट लुकुंण में लागां !

तुम समाजाक इज्जतदार,
हम समाजाक भेड़-गंवार !

तुम मरी लै ज्युने भया,
हम ज्युने लै मरिये रयां !

तुम मुलुक कें मारण में छा,
हम मुलुक पर मरण में छां !

तुमुल मौक पा सुनुक महल बणैं दीं,
हमुल मौक पा गरधन चङै दीं !

लोग कुनी एक्कै मैक च्याल छां,
तुम और हम,
अरे ! हम भारत मैक छा,

ओ साओ ! तुम कैक छा ?

कवि- शेरदा अनपढ़

18 October, 2017

दाज्यू मैं गांव का ठैरा


पहाड़ में रहता हूं गांव का ठैरा
दाज्यू में तो पीपल की छांव सा ठैरा

ओल्ले घर में हाथ बना है
पल्ले घर नेकर और डंडा 
मल्ले घर में हाथी आया
तल्ले घर कुर्सी का झण्डा

पहाड़ में रहता हूं गांव का ठैरा
दाज्यू में तो पीपल की छांव सा ठैरा

प्रशासन दावत पर अटका
मतदाता रावत पर अटका
छप्पन लेकर सुस्त पड़े हैं 
कौन लगाए बिजली झटका

पहाड़ में रहता हूं गांव का ठैरा
दाज्यू में तो पीपल की छांव सा ठैरा

अंग्रेजी गानों में करते
पधान जी भी हिप हॉप
जीलाधीस कुर्सी में बैठे
चूस रहे हैं लालीपॉप

पहाड़ में रहता हूं गांव का ठैरा
दाज्यू में तो पीपल की छांव सा ठैरा

शराब माफिया चंवर ढुलाए
खनन माफिया आरत गाए
दिल्ली से दिल लगी राज की
जनता से ताली पिटवाए

पहाड़ में रहता हूं गांव का ठैरा
दाज्यू में तो पीपल की छांव सा ठैरा

चीनी कटक हुआ सब महंगा
महंगी हो गई गेहूं रोटी
गाडी से हूटर हटवाकर  
नोच रहे चुपके से बोटी

पहाड़ में रहता हूं गांव का ठैरा
दाज्यू में तो पीपल की छांव सा ठैरा

टूरिस्टों की टयामटुम
ठेकदार की रेलमपेल
बकरी सा जीवन है अपना
नेताओं की ठेलम ठेल

पहाड़ में रहता हूं गांव का ठैरा
दाज्यू में तो पीपल की छांव सा ठैरा


कवि- अनिल कार्की


अनिल कार्की का ही नोट :- एक तुकबन्दी! इस तुकबंदी के सभी पात्र और खुद तुकबंदी करने वाला भी काल्पनिक हैं। यह कहीं दूसरे ग्रह की बात है अपने उत्तराखंड की नहीं उत्तराखंड से इन घटनाओं का संयोग महज इत्तफाक होगा, तो महाराज सुनो !  

17 October, 2017

ग़ज़ल

तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं ।।

मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं,
मैं इन नजारों का अंधा तमाशबीन नहीं ।।

तेरी जुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह,
तू एक जलील-सी गाली से बेहतरीन नहीं ।।

तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएं,
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं ।।

तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर,
तु इस मशीन का पुर्जा है तू मशीन नहीं ।।

बहुत मशहूर है आएं जरूर आप यहां,
ये मुल्क देखने लायक तो है हसीन नहीं ।।

जरा-सा तौर-तरीकों में हेर-फेर करो,
तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं ।।

कवि-  दुष्यंत कुमार

साभार

16 October, 2017

मेरो हिमालय

म्यारा ऊंचा हिमालय
तै शांत रैण द्या
नि पौंछावा सड़की
पुंगड़ी - कूड़ी नि दब्यौण द्या,
म्यारा ऊंचा हिमालय
तै शांत रैण द्या ।

नि बांधा बगदि गंगा तैं
यूं पंडों का गौं अठूर-
टीरी पाणी मा नि समौंण द्या 
म्यारा ऊंचा हिमालय
तै शांत रैण द्या ।

नि चैंदी
तुम्हारी राजधानी गैरसैंण मा

हम चमोली का ढेबरा
पौड़ी का सलाणी
खासपट्टी का खस्या
बंगाण का बंगाणी
जोशीमठ का भोट्या मार्छा
पिथौरागढ़ का तोलछा
गंगाड़ का गंगाड़ी
जौनसार का जौनसारी
जौनपुर का जौनपुरी
कुमौं का कुंमय्यां,
गढ़वाल का गढ़वाळी   

हम तै
हमीं रैंण द्या ।।

रचनाकार- जय प्रकाश पंवार

10 October, 2017

कलह से धीमी हुई डबल इंजन की रफ्तार

हाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तराखंड दौरे पर भले ही सरकार के छह महीने के कार्यकाल को 100 नंबर दिए हों, मगर उन्होंने अपने दौरे में सरकार के अधिक संगठनको तरजीह दी। शायद इसलिए भी कि कुछ समय से सरकार और संगठन के बीच का तालमेल पटरी पर नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि किसी दल के लिए सियासत में प्रचंड बहुमत ही पर्याप्त नहीं होता है, निरंतरता और प्रगति के लिए संगठनात्मक ताकत का उत्तरोत्तर बढ़ना भी जरूरी है। दरारों और खाइयों के बीच ताकत को सहेजे रखना आसान नहीं होता। इस दौरे में शाह का विधायक और मंत्रियों से लेकर अनुषंगियों तक जरूरत के हिसाब से पेंच कसना, स्पष्ट करता है कि अंदरुनी घमासान कुछ जोर पर है।

यहां कौन किस से नाराज है, कोई कहे, जरा हाल की कुछ घटनाओं पर भी नजर डाल लें। राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा बुलाई गई क्लास में जब पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ सांसद बीसी खंडूड़ी हाजिर हुए, तो कुर्सियां खाली नहीं थीं और किसी ने उनके लिए कुर्सी खाली करने की औपचारिकता भी नहीं निभाई। नतीजा उन्हें कुछ देर जगह तलाश में खड़ा ही रहना पड़ा। तब टिहरी सांसद मालाराज्य लक्ष्मी शाह ने उन्हें अपने सीट पर कुछ जगह दी। जबकि यही जनरल खंडूड़ी 2012 के विस चुनाव तक सबके लिए जरूरीथे।  

उधर, हरिद्वार के अखाड़े में दो कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक और सतपाल महाराज समर्थकों के बीच खूंनी संघर्ष भी संबंधों में रारका ही नतीजा माना जा रहा है। प्रेमनगर आश्रम के अतिक्रमण के नाम पर हुई कार्रवाई को आपसी द्वंद के तौर पर ही देखा गया। मामला अमित शाह तक भी पहुंचा और पटाक्षेप की बात भी हुई बताई गई। मगर, संबंध अब भी मधुर हुए होंगे, इसके आसार कम लग रहे हैं। जनपद हरिद्वार में ही सांसद और पूर्व सीएम रमेश पोखरियाल निशंक और कांग्रेस से भाजपा में आए विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन समर्थकों के बीच भी विवाद बताया जा रहा है।

अनुशासन, सम्मान, मर्यादा और नैतिकता की बातों के बीच यह अंतर्द्वंद का सीमा क्षेत्र गढ़वाल ही नहीं कुमाऊं में भी है। बताते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद भगत सिंह कोश्यारी को भी फिलहाल साइड लाइन किया गया है। केंद्रीय कपड़ा राज्यमंत्री अजय टम्टा और कैबिनेट में एकमात्र महिला मंत्री रेखा आर्य के बीच भी टकराव की बात सामने आ रही हैं। दून के मेयर विनोद चमोली और मुख्यमंत्री के बीच संवाद का वायरल वीडियो, हरिद्वार ग्रामीण से विधायक यतिश्वरानंद पर एबीवीपी छात्रों का हमला और डिग्री कॉलेजों में एबीवीपी का ही ड्रेस कोड के खिलाफ खड़ा होना, काफी कुछ बता दे रहा है।

यहां तक कि अंदरखाने यह बात भी कही जा रही है कि पूर्व के कांग्रेसी और अब भाजपा के विधायकों के साथ भी संगठन और सरकार की ट्यूनिंग भी बहुत अच्छी नहीं। सड़क पर आम कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री तक नाराजगियों का यह सिलसिला अमित शाह के दौरे के बाद भी थमा हो, ऐसा नहीं। जानकारों की मानें, तो सरकार और संगठन के बीच मसलों को सुलटाए जाने की बजाए फिलहाल उन्हें अनदेखा करने की नीति पर अधिक फोकस किया जा रहा है। नतीजा, क्षत्रप इस छाया युद्ध में अपने वजूद बचाने में जुट गए हैं। अंदरखाने मीटिंगों से लेकर हाईकमान तक खुद को साबित करने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

ऐसे में जब 2019 के लिए शाह ने देशभर में 350 प्लस का लक्ष्य तय किया है, उससे पहले उत्तराखंड में रारका यह सिलसिला
थम जाएगा, फिलहाल कहना मुश्किल है। हां, इस छोटे से वक्फे में उत्तराखंड भाजपा के भीतर घमासान का असर भविष्य पर क्या होगा, यह देखना बाकी है।

आलेख- धनेश कोठारी

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