20 August, 2019

गढ़वाली भाषा के उपभेद

bol pahadi
संकलन- नवीन नौटियाल //
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          उत्तराखण्ड के गढ़वाल मण्डल में बोली जाने वाली भाषा को गढ़वाली कहा जाता है। गढ़वाली के अंतर्गत कई उपभाषाएँ और बोलियाँ शामिल हैं। समस्त गढ़वाल में गढ़वाली भाषा व्यवहारिक रूप में बोली जाती है जिसका सामान्य एवं मुख्य रूप श्रीनगर और उसके आसपास प्रयुक्त की जाने वाली बोली को माना जाता है। ग्रियर्सन ने गढ़वाली को आठ बोलियों ( श्रीनगरिया, बधाणी, दस्योली, मांझ-कुमय्या, नागपुरिया, सलाणी, राठी एवं टिरियाली ) में विभाजित किया था। जबकि तत्पश्चात किए गए अध्ययनों एवं शोध-कार्यों में गढ़वाली की 15-20 बोलियाँ प्रकाश में आयी हैं। गढ़वाली भाषा के मुख्य उपभेद निम्नलिखित हैं-

1. श्रीनगरिया बोली - इस बोली को गढ़वाली बोली का परिनिष्ठित रूप माना जाता है। इसका प्रयोग चांदपुर परगने के दक्षिणी भाग में, देवलगढ़ परगने में और आसपास के क्षेत्र में होता है। श्रीनगरिया बोली उच्चारण में आ-कार बहुला है। जैसे - जाणा, खाणा, छया, छवा आदि।

क. राठाली/राठी - श्रीनगरिया बोली के अंतर्गत ही राठाली बोली भी आती है जो पौड़ी गढ़वाल के राठ क्षेत्र में बोली जाती है। इसमें भी आ-कार का प्रयोग मिलता है। जैसे- म्यारा, त्यारा आदि।

ख. चौंदकोटी - गढ़वाल के चौंदकोट परगने और उसके आसपास के क्षेत्र में किया जाता है।

2. मैल मुल्क्या - उत्तरी गढ़वाल में बोली जाने वाली गढ़वाली बोलियों को मैल मुल्क्या कहा जाता है। इसके अंतर्गत चार बोलियाँ शामिल है-

क. लोब्या - लोब्या बोली गढ़वाल के चांदपुर पट्टी एवं परगने की बोली है। इसका प्रयोग राठ क्षेत्र में भी होता है।

ख. बधाणी - यह बोली गढ़वाल के बधाण परगने की बोली है जो श्रीनगरिया बोली एवं राठी बोली से प्रभावित दिखाई देती है।

ग. दस्योला - यह बोली गढ़वाल के दसोली और पैनखंडा परगने में बोली जाती है।

घ. नागपुरया - इस बोली का प्रयोग गढ़वाल के नागपुर क्षेत्र और पैनखंडा परगने में किया जाता है। यह बोली दस्योला और मांझ कुमय्या से मिलती जुलती है।

3. मांझ कुमय्या - यह बोली कुमाऊँ और गढ़वाल के सीमान्त प्रदेश में बोली जाती है। इस बोली पर गढ़वाली और कुमाऊँनी का प्रभाव सामान रूप से देखा जा सकता है। गढ़वाल का बधाण परगना और गढ़वाल-कुमाऊँ के बीच का दुसांध क्षेत्र इस बोली का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है।

4. सलाणी - सलाणी बोली गढ़वाल के सालान क्षेत्र की प्रमुख बोली है जिसमें मल्ला, तल्ला, पाली पट्टी, गंगा सलाण क्षेत्र के अलावा देहरादून, सहारनपुर, बिजनूर और मुरादाबाद के भी कुछ इलाके शामिल रहे हैं।

5. टिहरियाली - गढ़वाल के टिहरी गढ़वाल जिले में प्रयुक्त होने वाली बोली को टिहरियाली अथवा ‘गंगपरया’ बोली कहा जाता है। डॉ. गोविन्द चातक ने टिहरियाली के पुनः छ उपभेद किये हैं – टकनौरी, बड़ाहटी, रमोल्या, जौनपुरी, रंवाल्टी, बडियारगढ़ी तथा टिहरियाली।

क. जौनपुरी - गढ़वाली की यह उपबोली टिहरी जिले के जौनपुर विकासखंड में बोली जाती है। इसमें दसजुला, पालीगाड़, सिलवाड़, इडवालस्यूं, लालूर, छःजुला, सकलाना पट्टियां आती हैं। यह जनजातीय क्षेत्र रहा है।

ख. रंवाल्टी - गढ़वाल के उत्तरकाशी जिले के पश्चिमी क्षेत्र को रवांई कहा जाता है। यमुना और टौंस नदियों की घाटियों तक फैला यह क्षेत्र गढ़वाल के 52 गढ़ों में से एक (राईगढ़) है। इसी से इसका नाम भी रवांई पड़ा। इस क्षेत्र की बोली को रवांल्टी कहा जाता है। टिहरियाली की अन्य उप-बोलियों के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं हो पायी है।

6. बंगाणी - तिब्बत की सीमा से जुड़ी भोटिया तथा उत्तरकाशी के उत्तर-पश्चिमी भाग में हिमाचल प्रदेश से सटे क्षेत्र में बोली जाने वाली बोली को बंगाणी कहा जाता है। उत्तरकाशी जिले के मोरी तहसील के अंतर्गत पड़ने वाले क्षेत्र को बंगाण कहा जाता है। इस क्षेत्र में तीन पट्टियां मासमोर, पिंगल तथा कोठीगाड़ आती हैं जिनमें बंगाणी बोली जाती है। यूनेस्को ने इसे उन भाषाओं में शामिल किया है जिन पर सबसे अधिक खतरा मंडरा रहा  है।

7. जौनसारी - गढ़वाल मंडल के देहरादून जिले के पश्चिमी पर्वतीय क्षेत्र को जौनसार बावर कहा जाता है। यहाँ की मुख्य भाषा है जौनसारी। सुरम्य जौनसार बावर का भू-भाग जमुना और टौंस नदी के बीच स्थित है। यह भाषा मुख्य रूप से तीन तहसीलों चकराता, कालसी और त्यूनी में बोली जाती है। इस क्षेत्र की सीमाएं टिहरी और उत्तरकाशी से लगी हुई हैं और इसलिए इन जिलों के कुछ हिस्सों में भी जौनसारी बोली जाती है। जौनसारी की भी कई उप-बोलियाँ मानी गई हैं, जैसे- 'बावरी' और 'कंडवाणी' आदि। जो कि वर्तमान में अधिक लोकप्रिय नहीं रह गई है।

8. मारछा-तोल्छा - गढ़वाल के उत्तरी सीमान्त क्षेत्र के कुछ इलाकों में गढ़वाल मंडल के चमोली जिले की नीति और माणा घाटियों में रहने वाली भोटिया जनजाति मार्च्छा और तोल्छा भाषा बोलती है। इस भाषा में तिब्बती के कई शब्द मिलते हैं। नीति घाटी में नीति, गमसाली और बाम्पा शामिल हैं जबकि माणा घाटी में माणा, इन्द्रधारा, गजकोटी, ज्याबगड़, बेनाकुली और पिनोला आते हैं।

9. बुक्साणी - कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक तराई की पट्टी में निवास करने वाली जनजाति की भाषा है बुक्साणी। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से काशीपुर, बाजपुर, गदरपुर, रामनगर, डोईवाला, सहसपुर, बहादराबाद, दुगड्डा, कोटद्वार आदि शामिल हैं।

सन्दर्भ:-
1. गढ़वाल और गढ़वाल, संपा. - चन्द्रपाल सिंह रावत
2. घसेरी(ऑनलाइन पत्रिका), संपा - धर्मेन्द्र पंत
3. गढ़वाली भाषा के अनालोचित पक्ष - डॉ. अचलानंद जखमोला
4. गढ़वाली भाषा और उसका लोक-साहित्य- डॉ. जनार्दन काला
5. गढ़वाली लोकभाषाएँ : गढ़वाली/कुमाऊँनी/जौनसारी - डॉ. अचलानंद जखमोला

18 August, 2019

गढ़वाली भाषा का शब्द वैभव

संकलन- नवीन नौटियाल //
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गढ़वाल को 'मध्य हिमालय' के नाम से भी जाना जाता है। इतिहास में इस 'मध्य हिमालयी' क्षेत्र में कोल, भील, किरात, नाग, आर्य, द्रविड़ आदि अनेक जातियों का निवास रहा है। वर्तमान समय में प्रचलित गढ़वाली भाषा पर इन जातियों के शब्दों का प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है।


● खस जाति से आए शब्द –
नखरु, बेड़, बुजण, बूखु, बेथ, बैंदार, लैंदु आदि।

● तिब्बती-बर्मी समुदाय से आए शब्द –
पंखी, फंचि/फंचु. अंगड़ि, गौथ, चराण, उस्ययूँ आदि।

● आस्त्रिक मूल के शब्द –
कपाळ, बोई, दाड़िम, छेमी, टिमरु, बेडू, रिंगाळ आदि।

● मुंडा जाति  से आए शब्द –
गाड/गाड़, दिदा, ढुंगु, थोरुडु, ढांग आदि।

● नाग जाति से आए शब्द –
नागनाथ, नागणी, नागपुर आदि।

● किरात जाति से आए शब्द –
सितोनस्यूँ, गगवाड़स्यूँ, खत्यूं, बिग्ड्यूं, महासू, धरासू, झंगोरा, काफळ आदि।

● संस्कृत भाषा से आए शब्द –
दूण, माणु, पाथु, पोरु, परार, परसि, परस्यों, सट्टि, क्वादु/कोदु, आदु, दथुडु आदि।

● तद्भव शब्द –
अखोड़, कंदूड़, औतु, उणदु, काख. घुंडु, घीण, तीस, नौण, संगुडु आदि।

● प्राकृत मूल के शब्द –
लुकणु, भोळ, पौणु, उब्ब, बौड़ि, जोन, सिंगणु आदि।

● अपभ्रंश मूल के शब्द –
माटु, नौळी, ज्वान, पुथड़ो, छैल, चौक, लिसू, स्वाळी, चौकलु आदि।

● पाली मूल के शब्द –
गरु, खुद आदि।

● गुजराती और मारवाड़ी के प्रभाव वाले शब्द –
अग्यार, बार, तैर, चौद, पंदर, अठार आदि।

● राजस्थानी के प्रभाव वाले शब्द –
किवाड़, हिरण, सपूत, कपूत, डाकण, आछरी, घोल, पाणी, बैण, हिटण आदि।

● अरबी-फ़ारसी के प्रभाव वाले शब्द –
जगा, जनानि, जैदाद, दसकत, बैम, सौलियत आदि।

● अंग्रेजी प्रभाव वाले शब्द-
लालटेन, फुटबौल, पिनसन, डरैबर, पलटन, इस्कूल, मास्टर आदि।

● तमिल से आए शब्द –
चंड/चंडि, छानी, कोट, हुड़को, ओडु, ब्वे, कुड़ी आदि।

● कन्नड़ से आए शब्द –
संटाण, भुक्कि, गुंडु, खज्जि, खाड, घुटकि/घुटगि, काँठो आदि।

● तेलुगु से आए शब्द –
बिसौंण, रांड, बाटो/बाठु, गड्डी, पुटगु/प्वटुगु, कणखिला, कुटलु आदि।


स्रोत:-
1. गढ़वाली भाषा और उसका लोकसाहित्य - डॉ. जनार्दन प्रसाद काला
2. उत्तराखंड की लोकभाषाएँ : गढ़वाली/कुमाऊँनी/जौनसारी - डॉ. अचलानंद जखमोला
3. गढ़वाली - केशवदत्त रुवाली
4. भारतीय संस्कृति का संदर्भ: मध्य हिमालय - डॉ. गोविंद चातक
5. गढ़वाली भाषा के अनालोचित पक्ष - डॉ. अचलानंद जखमोला

संकलन- नवीन नौटियाल
Photo 1- Google

15 August, 2019

निःसंग जी के बहाने वर्तमान संदर्भ पर दो शब्द

bol pahadi
नरेन्द्र कठैत //
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श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी पर अभिनन्दन ग्रंथ और वर्तमान सन्दर्भ में दो शब्द!
          पाश्चात्य कलमकारों ने इस देवभूमि से जो कुछ समेटा उसका आंकलन करने के लिए किसी कलमकार की लिखी यह पंक्ति  ‘धनुष भी उनके, बाण भी उनके, अपनी केवल आंख’ ही पर्याप्त है। कौन नहीं जानता एटकिन्सन हो या ग्रियसन, दोनों ने वर्णित सामग्री अपनी तात्कालीन आंख अर्थात अपने मातहतों के माध्यम से ही जुटाई। किन्तु क्या कारण है कि आज भी हम भूत-पिचास-अयेड, बांज-बुरांस, घास-पात को पहचानने के लिए इ.टी. एटकिन्सन और अपनी भाषा की व्यवहारिकता जानने के लिए ग्रियसन का मुंह ताकते हैं।

जबकि एटकिन्सन महोदय ने जो भौगोलिक, सांस्कृतिक जानकारी दी है उनसे ज्यादा प्रमाणिक विवेचन महीधर शर्मा बड़थ्वाल जी ने अपनी पुस्तक ‘गढ़वाल में कौन’ में किया है। महीधर शर्मा बड़थ्वाल, जिनके पास अपनी आंख के सिवाय दूसरी कोई आंख थी ही नहीं। एक स्थान पर महीधर शर्मा जी ने लिखा भी है कि ‘विभिन्न परिस्थितियों और कौटुम्बिक क्लेशों के कारण मेरे इस कार्य में बाधा होती रही; बल्कि मुद्रण के समय पुस्तक के पू्रफ भी मैंने अस्वस्थ स्थिति में ही पढ़े।’ इसी पुस्तक पर उन्हें न्यायालयी प्रक्रिया से भी गुजरना पड़ा। एक अकेला, सब कुछ झेला। आज कितने विर्मर्शोंं में महीधर शर्मा बड़थ्वाल जी पर चर्चा होती है? प्रश्न विचारणीय है!

ग्रियसन महोदय का ही संदर्भ लें तो ग्रियसन महोदय ने जितना श्रम और कल्पना, हमारी भाषाओं को विभक्त करने में व्यय किया, उतना यदि देवभूमि की भाषाओं के विकास में लगाते तो आज उत्तराखण्डी भाषाओं का स्वरूप ही कुछ और होता। किन्तु यह विडम्बना ही है कि ग्रियसन की ओर ताकती हमारी वे आंखे आज भी दृष्टिभ्रम की स्थिति में हैं। कई बार तो हम ग्रियसन की विभक्तिकरण की कल्पना से इतना आगे निकल जाते हैं कि हमें यह भी ध्यान नहीं रहता कि इतने टुकड़ों में विभक्त कर हम अपनी मातृभाषा के किस स्वरूप को आठवीं सूची तक पहुंचाना चाहते हैं?

आश्चर्य है! खेत की बात करते हैं। लेकिन खेत की चिंता नहीं! चिंता है तो उपज को ही नकार जाते हैं! उपज को सिरे से नकारने की बात कितनी अव्यवहारिक है सोचा ही नहीं! यह स्वभावगत जटिलता है या खीज? इसको बेध्यानी में घटी घटना भी कैसे मान लें? मालूम नहीं, कौन से रास्ते को पकड़कर इस खेत तक पहुंचे हैं लेकिन जिस खेत में भव्य इमारत खड़ी की जानी है उसके लिए इतना तंग गलियारा? क्या भाषा को आठवीं अनुसूची तक पहुंचने का यही मार्ग है? ऐसे निठल्ले चिन्तन का क्या लाभ जिसमें स्वयं ही झुलस जाने का अंदेशा है।

किन्तु निठल्ले चिन्तन से दूर हमारे बीच कुछ ऐसी प्रखर मेघा के चिन्तन शील व्यक्ति भी हैं जो अपनी लेखनी के बल पर बरबस ध्यान आकृष्ठ करते हैं। इन्ही चेतना शील व्यक्तियों के मध्य प्रखर मेघा के धनी आदरणीय श्रीयुत शिवराज सिंह रावत निःसंग  अपनी दमदार लेखनी की उपस्थिति से जब-तब अवगत कराते रहे हैं।

गोपेश्वर के विद्धतजनों यथा डॉ. भगवती प्रसाद पुरोहित एवं अनुज डॉ. चरण सिंह केदारखण्डी ने वर्तमान भाषायी मौखिक मुहिम की अंधड़ से दूर ऋषि परम्परा के मनीषी निःसंग जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित ‘अभिनन्दन ग्रंथ’ को अंतिम सोपान तक पहुंचाया, इसके लिए दोनों विद्वतजनों के साथ उनके इस यज्ञ में जुड़े समस्त बुद्धिजीवियों का साधुवाद!

यूं तो धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति पर निःसंग जी की अनेकों पुस्तकें हैं। किन्तु विन्सर पब्लिशिंग कं0 से प्रकाशित ‘भाषा तत्व और आर्य भाषा का विकास’ भाषा संबन्धी जानकारी के लिए एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसी पुस्तक में भाषा शास्त्री ग्रिसयन के संबन्ध में आपने लिखा है कि -‘यद्यपि डॉ. जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने मध्य पहाड़ी गढ़वाली-कुमाउंनी भाषा को हिन्दी की किसी अन्य भाषा की विभाषा मानकर इसके अपुष्ट पक्ष को सिद्ध करने प्रयास किया है परन्तु मध्य हिमालय के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रयुक्त प्राकृत संस्कृत भाषा के अनगिनत शब्द इन्हीं पहाड़ी भाषा के शब्द भण्डार से निकलकर मानवीय संस्कृति के साथ निःसरित होकर समस्त भारत में फैली और अनेक प्रान्तों की भाषा के निर्माण में सहयोगी सिद्ध हुई। इस ओर डॉ. गियर्सन का ध्यान नहीं गया।’

निःसंग जी ग्रिसयन के इस भाषाई विभेद को मात्र उच्चारण का भेद मानते हैं। आपने स्पष्ट लिखा कि ‘उच्चारण भेद से गढ़वाली ने कई रूप धारण किये हैं। प्राचीन काल में भी यही प्रवृत्ति रही है। इसका कारण... भौगोलिक बनावट, जलवायु की विविधता और दूर-दूर तक दिनों महीनों की पैदल यात्रा आदि रहा है।’ कटु सत्य है।

वहीं एक अन्य स्थान पर ग्रियसन की भाषाई कांट-छांट पर व्याख्या और शोधकर्ताओं के संदर्भ में निःसंग जी के ये शब्द भी विचारणीय हैं। आपने लिखा ‘भाषाविदों ने, भाषायी सर्वेक्षण में, डॉ. गियर्सन के भाषायी धुवीकरण पर ही अपना भाषायी चिन्तन केन्द्रित किया है, ऐसा प्रतीत होता है। वे इस विश्वास को पालते रहे कि, भारत में आर्य बाहर से आये। यही कारण है कि वे मध्य भाषाओं का सम्बन्ध कभी महाराष्ट्र प्राकृत से जोड़ते रहे तो कभी शौरसेनी और कभी आवन्ती से। इन्ही निराधार सिद्धान्तों को वे पाठकों के ऊपर थोपते रहे। यह भी एक कारण है कि गढ़वाली भाषा भारतीय संविधान की आठवीं सूची में स्थान नहीं पा सकी।’ इतना गम्मीर विवेचन शायद ही किसी अन्य भाषा शास्त्री ने किया हो। 

आपकी उक्त पुस्तक में ‘वाणी की व्युत्पति, स्वर तंत्रियां और ध्वनि’, वैदिक संस्कृति में स्वर और व्यजनों की स्थिति’, शब्द की उत्पति, अक्षर और उनके जन्मदाता, अंक और उनके जन्मदाता, सृष्टि रचना, आर्य सभ्यता और भाषा की उत्पति, आर्य भाषा और उसका प्रभाव, आर्य भाषा का काल विभाजन, गढ़वाली भाषा और उसकी साहित्यिक परम्परा, गढ़वाली भाषा के शब्द स्रोत, ‘गढ़वाली, हिन्दी और पाणिनी का व्याकरण’, गढ़वाली भाषा की उत्पति और उसका विकास,  हिन्दी का स्रोत-प्राकृत पहाड़ी अपभ्रंश, लिपि और उसका विकास’, भोटिया संस्कृति और भाषा’, ‘राष्ट्र भाषा हिन्दी और उसकी वर्तमान स्थिति’, तथा अन्य अनेकों अध्यायों में भाषा विषयक गूढ़ जानकारी एवं वैदिक, संस्कृत, राजस्थानी, गुजराती, बंगाली, सिन्धी, मराठी, नेपाली, पंजाबी तथा अंग्रेजी, अरबी, फारसी, तुर्की, पुर्तगाली, तिब्बती-बर्मी विदेशी भाषाओं के शब्दों के साथ गढ़वाली भाषा के शब्दों की साम्यता एवं ध्वन्यात्मक, आदिम जातीय शब्दों का वृहद विवेचन समाहित हैं।

ल़ अथवा ळ अक्षर की व्यवहारिकता पर आपने लिखा कि ‘महर्षि माण्डव्य, जो पाश्चात्य दार्शनिक सुकरात के भी गुरू रहे हैं, ने यहां तपश्चर्या की। वर्णमाला में गढ़वाली ल, ळ जैसे अक्षरों का अनुसंधान इन्होंने ही किया था।’  

आप गढ़वाली ही नहीं अपितु हिन्दी और संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान हैं। हिन्दी को केन्द्र में रखकर इसी पुस्तक के एक अंश में  आपने लिखा है कि ‘हिन्दी भाषा की रूपरेखा तैयार करते समय भाषाविदों द्वारा मध्य हिमालय की पहाड़ी बोली-भाषा को महत्वपूर्ण स्थान न देना, आज भी चुभन पैदा करता है। हिन्दी शब्दकोश का भण्डार जिन मौलिक शब्दों से भर रहा था, उनमें मध्य हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों गढ़वाली, कुमाउंनी, नेपाली एवं त्रिगर्त देशी भाषाओं का दुर्लभ संयोग रहा है। शब्द निर्माण और समान संप्रयोजन का वही रूप गढ़वाली भाषा में परिरक्षित होने से हिन्दी की उत्पति भारत की भाषा के रूप में हुई।’

इसी संदर्भ में एक अन्य स्थान पर शब्द दिये हैं कि ‘इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्राचीनकाल में गंगा और यमुना के बीच का देश अन्तर्वेदि या मध्यदेश कहलाता था। जिसके अन्तर्गत मध्य हिमालय के पहाड़ी प्रदेश गढ़वाल, कुमांउ, कुरूक्षेत्र, कांगड़ा, जौनसार, नेपाल, प्रयाग एंव विन्ध्या आदि आते हैं। प्राकृत संस्कृत, वैदिक काल के अति निकट की भाषा होने से, इन क्षेत्रों की बोली-भाषा रही है किन्तु भाषाविदों ने इन पहाड़ी प्रदेशों की मौलिक भाषा तत्वों में स्थान देने के बजाय यह जताने का प्रयास किया कि मध्य पहाड़ी कोई भाषा ही नहीं। परिणामस्वरूप संस्कृत के स्रोत और हिन्दी की मौलिकता को एक धक्का लगा। उसके निर्माण में मौलिकता का अभाव होने से उसे भाषा-सागर में कई थपेड़े सहन करने पड़े।’ 

भाषा के सार तत्वों से सम्माहित इस पुस्तक के साथ ही निःसंग जी की ‘भारतीय जीवन दर्शन और सृष्टि का रहस्य, विविध धर्मों में मानव अधिकार सहित अन्य अनेकों पुस्तकें सारग्रभित, शोधपरक एंव संग्रहणीय हैं। साथ ही वृहद त्रिभाषी शब्दकोश (गढ़वाली-हिन्दी-अंग्रेजी) के सह-सम्पादन में आपने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उम्र के इस पड़ाव पर विस्मृति की छाया   स्वाभाविक है। लेकिन इधर से -‘निःसंग जी!’ का नामोचारण सुनते ही तुरन्त संज्ञान ले लेतेे हैं।

कुशल क्षेम हेतु अभी कुछ दिन पूर्व फोन किया- ‘निःसंग जी प्रणाम! कैसा है आपका स्वास्थ्य?’ उनके श्री मुख से सुनाई दिया-‘ ओ हो! कठैत जी! अभी आपसे पहले नागो मोहन माली से बात कर रहा था!‘ दिमाग में प्रश्न कौंधा-‘ नागो मोहन माली?’ भला ये कौन व्यक्ति है? पूछ ही लिया-‘ निःसंग जी नागो मोहन माली कौन हैं?’  थोड़ा हंसे! सांस को थामा! और जबाब साफ-साफ सुनाई दिया-‘ कठैत जी! ये दक्षिण भारतीय हैं। मिले कभी नहीं पर कहते हैं मेरे पाठक हैं। अक्सर फोन पर कुशल क्षेम पूछ लेते हैं!’

कल 12 अगस्त को गोपेश्वर शहर में सम्पन्न होन वाले निःसंग जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित ‘अभिनन्दन ग्रंथ’ के लोकार्पण के निमित्त भेजे गये निमंत्रण पत्र के एक वाक्य पर नजर टिक गई। लिखा है -‘उत्तराखण्ड सहित भारत भर में हजारों साहित्य रसिकों ने उनके लेखकीय अवदान से लाभ उठाया है।’ कहना प्रयाप्त होगा कि नागो मोहन माली जी निःसंग जी के उन्हीं हजारों साहित्य रसिकों के बीच से एक सौभाग्यशाली होंगे।

उम्र के नौवें दशक को पूर्ण करने के बाद भी सम्पूर्ण सजगता के साथ निःसंग जी की लेखनी का गतिशील रहना मां सरस्वती का ही वरदहस्त है। कामना करता हूं निःसंग जी की लेखनी में आगे भी निरन्तरता बनी रहे।
निःसंग जी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर केन्द्रित ‘अभिनन्दन ग्रंथ’ को साकार रूप प्रदाता डॉ. भगवती प्रसाद पुरोहित एवं डॉ. चरण सिंह उत्तराखण्डी अपने इस श्रम साध्य कार्य के लिए एक बार पुनः हार्दिक बधाई स्वीकार करें!

व्यंगकार/कवि/समीक्षक
पौड़ी गढ़वाल

04 August, 2019

मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं...! (भाग - 2)

bol pahadi
दुर्गा नौटियाल //
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हां, मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं! मैं अब बूढ़ा हो चला हूं। लेकिन मैं इतना कमजोर भी नहीं की मृत्यु के आगे नतमस्तक हो जाऊं...। मैं महाभारत के भीष्म की वह प्रतिज्ञा हूं, जो रणभूमि में बाणों की शैय्या पर लेटे हुए भी मृत्यु को अपने बस में कर सकता हूं। मैं महर्षि दधीचि हूं, जो अपनी प्राण शून्यता के बाद भी अपनी हड्डियों से बज्र का निर्माण कर सकता हूं। मैं हाड मांस का इंसान जैसा पुतला नहीं, जो छित, जल, पावक, गगन ओर समीर में विलय हो जाऊं। मैं फौलाद से गढ़ा गया हूं और कभी मिट भी गया तो फौलाद ही रहूंगा। भविष्य में मेरे कण-कण से भी फौलाद ही निर्मित होगा। मैं जड़ हूं लेकिन चेतनशून्य नहीं, मैं आदि भी हूं और अनंत भी। भौतिक रूप से मेरा ओर-छोर तुम भले ही देख पा रहे हों, लेकिन मेरी जड़ें भूतल में भी गहरी गढ़ी हैं, जो शायद किसी को नजर ना आए। मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों हूं। मैंने इस देश, प्रदेश और शहर के कई कालखंड जिए हैं। मैं एक भरपूर सदी हूं, जो अपने आप में एक संपूर्ण इतिहास है। मैं लक्ष्मण झूला सेतु हूं, जो अब बूढा हो चला हूं...।

एक बूढ़े और जर्जर हो चुके लक्ष्मणझूला सेतु को आपने पिछले खंड में कितनी संजीदगी के साथ पढ़ा और जिया...। मैं वास्तव में अब अपनी सार्थकता पर गर्व महसूस कर रहा हूं। मेरे पास शब्द नहीं है कि मैं किस रूप में आपका शुक्रिया अदा करूं। मैं बेशक बूढ़ा हो चला हूं, लेकिन आप लोगों के प्रेम और स्नेह ने मेरे अंदर फिर से एक अजीब सी स्फूर्ति और ताजगी ला दी है...। अब मुझे लग रहा है कि मैं यूं ही खामोशी के साथ विदाई नहीं लूंगा, बल्कि आपके साथ उस एक सदी का अनुभव साझा करके जाऊंगा जिसे मैंने जिया और महसूस किया है।

जिस दिन से मुझे पता चला कि मेरे भीतर कई बीमारियां हैं, जो मुझे खोखला कर करती जा रही हैं और लोग मुझे असुरक्षित बताने लगे हैं। तबसे वास्तव में मैं भी यह महसूस करने लगा हूं कि अब मैं बूढा हो चला हूं...। दोस्तों जैसे आप लोगों की सेहत की देखभाल के लिए एम्स और पीजीआई जैसे चिकित्सा संस्थान बने हैं, ठीक वैसे ही मेरे सेहत की जांच के लिए भी आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थान हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आपको अपनी जांच के लिए इन संस्थानों का रुख करना पड़ता है और मैं इस बुढ़ापे में भी अपनी जगह अटल, बेफिक्र और निश्चिंत रहता हूं। जिसे मेरी जांच करनी होगी वह स्वयं चलकर मेरे पास आएगा। मुझे पता है मेरी तरह आप अपने डॉक्टर को यह कहने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाओगे की, डॉक्टर बेटे, तू आ और मेरे सेहत की जांच कर... एक बार नहीं कई बार कर...। 

यह सबसे बड़ा फर्क है जो मुझे आप जैसी आम जिंदगी से अलग लक्ष्मणझूला सेतु बनाता है। मैं यह सब इसलिए बेबाकी से कह रहा हूं कि अब कोई डॉक्टर, इंजीनियर मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन आपको बता रहा हूं कि अपने डॉक्टर के साथ ऐसा मजाक कभी मत करना। बूढ़ा बुजुर्ग हूं, इसलिए बता रहा हूं...। हां ऐसी दृढ़ता तुम में भी हो सकती है, बशर्ते तुम मेरी तरह सात्विक जीवन जिओ और प्रकृति के सापेक्ष आचरण करो।

खैर, छोड़ो मैं आज अपनी प्रवृति के विरुद्ध उपदेश दे रहा हूं.. जो मैंने अपने 90 साल की उम्र में नहीं दिया। लेकिन पता नहीं क्यों... अब मुझे लगता है, कि मुझे वास्तव में मेरा बुढ़ापा ऐसा करने को विवश कर रहा है। जो भी हो मैंने भी ठानी है कि आपको वह तमाम बातें बता कर दम लूंगा, जो एक नई पीढ़ी को बताने का फर्ज एक बुजुर्ग का होता है।

आपको पता है मेरा नाम लक्ष्मण झूला क्यों पड़ा..? दुनिया में मेरे जैसे न जाने कितने सेतु हैं, लेकिन मुझे ही पूरी दुनिया ने क्यों इतना सम्मान और प्रेम दिया..? आज में आपको बताता हूं।

मैं जिस स्थान पर विराजमान हूं, यह भूमि देवताओं और ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है। गोमुख से निकल कर गंगा अपने साथ छोटे बड़े हिमनद, नदी और नयारों को मिलाकर पहाड़ों के बीच सर्पीले रास्तों से कलकल निनाद करते हुए यहां तक पहुंचती है। फिर यहीं से गंगा अपने उस चंचल और चपल स्वभाव को बदल कर शांत और गंभीर बहने लगती है। मानो वह इस तपोभूमि में तपस्यारत साधकों का ध्यान भंग नहीं करना चाहती हो। रामायण काल में भगवान राम के अनुज लक्ष्मण जी ने इसीलिए इस भूमि को तप के लिए चुना था। उन्होंने इसी भूमि पर आकर तप किया। तब से इस भूमि का नाम तपोवन हो गया। आपके यकीन के लिए मैं स्कंद पुराण के केदारखंड का ज़िक्र करना चाहूंगा। केदारखंड के अध्याय 123 के 25वें श्लोक में इस बात के प्रमाण काफी हद तक आपको मिल जाएंगे। गंगा की दाहिने छोर पर आज भी लक्ष्मण मंदिर स्थित है, जहां भगवान शिव लिंग रूप में विराजमान हैं। कुछ ही दूरी पर शेष मंदिर व एक प्राकृतिक जल कुंड भी मौजूद है।

यहां आकर आप पुराने लोगों से उनके लक्ष्मण मंदिर से जुड़े अनुभव पूछ सकते हैं। इस मंदिर में स्थित शिवलिंग पर कभी अनगिनत सर्प लिपटे रहते थे, जो अब यदा-कदा ही सही मगर, यहां नजर आते हैं। लक्ष्मण जी को पुराणों में शेष नाग का अवतार माना गया है और सर्प भगवान शिव के आभूषण। शायद यह संयोग इन्हीं पौराणिक मान्यताओं को बल देते हैं। पुराणों में इसी स्थान पर 'इंद्र कुंड' जिसे कुछ लोग 'लक्ष्मण कुंड' भी कहते थे, कभी हुआ करता था। इस कुंड में स्नान करने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिल जाती थी। लक्ष्मण जी ने भी अपने कुष्ठ रोग के निवारण के लिए इस कुंड में स्नान किया था, ऐसा पुराणों में उल्लेख है। इस पौराणिक मान्यता से इतना तय है कि यह भूमि लक्ष्मण जी की तपोभूमि रही है।

अब सवाल यह उठता है कि इस स्थान पर सेतु (पुल) की जरूरत क्यों पड़ी..? चलो मैं यह भी प्रमाणिक तौर पर बता देता हूं। दरअसल, उत्तराखंड हिमालय के प्रसिद्ध धाम श्री बद्रीनाथ व श्री केदारनाथ को पहुंचने का एकमात्र (पैदल) मार्ग यही था। पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्री राम के अनुज लक्ष्मण ने सबसे पहले इस स्थान पर गंगा को पार करने के लिए जूट की रस्सियों की मदद से पुल का निर्माण किया था। इसके बाद भी इंसानी सभ्यता में यहां पर जूट की रस्सियों के सहारे ही पुल का निर्माण होता रहा। तब जूट की रस्सियों पर छींके के सहारे यात्री इसी गंगा को पार करते थे और आगे की यात्रा करते थे।

समृद्धि इंसानी सभ्यता के दौर में यह क्रम सन 1889 तक जारी रहा। इसी दौर में एक प्रसिद्ध संत जिन्हें बाबा काली कमली वाले के नाम से प्रसिद्धि मिली (स्वामी विशुद्धानंद) ने तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए ऋषिकेश से लेकर बद्रीनाथ, केदारनाथ व गंगोत्री-यमुनोत्री के पैदल यात्रा मार्ग पर कई पड़ाव विकसित किए, जिन्हें चट्टियों का नाम दिया गया। ऋषिकेश से बद्रीनाथ पैदल मार्ग पर सत्यनारायण मंदिर (रायवाला) के बाद ऋषिकेश, लक्ष्मण चट्टी, गरुड़ चट्टी, मोहन चट्टी, महादेव चट्टी, कांडी, व्यास चट्टी, देवप्रयाग.. और फिर आगे संपूर्ण यात्रा मार्ग पर इसी तरह के पड़ाव विकसित किए गए। यानि कि बद्रीनाथ-केदारनाथ यात्रा के लिए लक्ष्मण झूला से गंगा को पार करना होता था। जिसके लिए यहां पर पुल (सेतु) की आवश्यकता महसूस की गई होगी।

सन 1889 में इन्हीं संत बाबा काली कमली वाले की प्रेरणा से कोलकाता के सेठ रायबहादुर सूरजमल झुनझुनवाला ने इस स्थान पर 50 हजार रुपये की लागत से लोहे की रस्सियों पर एक पुल का निर्माण कराया था, जो 1923 में गंगा में आई बाढ़ में बह गया और फिर मेरे निर्माण की कवायद, जैसा कि मैं पिछले खंड में बता चुका हूं। यह सेतु वास्तव में मेरा आदि पूर्वज था। मैं विशुद्ध रूप से विज्ञान की देन हूं, इसलिए धर्म और अध्यात्म के मामले में कमजोर हूं। यह सब तो प्रसंगवश मैंने आपको बता दिया। लेकिन इसमें जो इतिहास बताया गया है, वह सत्य की कसौटी पर खरा और प्रमाणिक है। मैं अब बूढा हो चला हूं..., इसलिए अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह इतिहास बताने की कोशिश कर रहा हूं।

जहां तक आस्था का सवाल है तो मैंने आप जैसे अनगिनत लोगों के दिलों में मेरे प्रति आस्था का वह भाव देखा। आपको याद हो या ना हो मगर मुझे खूब याद है कि जब तुमने पहली दफा मेरी हथेलियों में अपने पैर बढ़ाएं, उससे पहले एक अनजान आस्था ने तुम्हारा शीश मेरे सम्मान में झुका दिया था। तुमने मेरे ऊपर बेफिक्री से गंगा पार करने से पहले न जाने क्यों मुझे अपने अंतर मन से सम्मान देते हुए प्रणाम कहा था। हालांकि मैंने कभी किसी से भी ऐसी अपेक्षा नहीं की थी।

मैं अपने निर्माण से लेकर आज तक, जब मैं बूढ़ा हो चला हूं... मैंने कभी अपने स्वार्थ को नहीं जिया और ना ही अपने स्वभाव को कभी स्वार्थी होने दिया। हां यह अलग बात है कि मेरा अस्तित्व ना जाने कितने लोगों को स्वार्थी बना गया। मैंने तो हमेशा स्वयं को भूगोल के दो खंडों के बीच अखंड रखने का प्रयास किया। मेरी इस अखंडता ने मेरे आस-पास की सभ्यता को इतना सुदृढ़ बना दिया कि अब मुझे इस सभ्यता की चिंता भी सताने लगी है। चिंता इसलिए कि जो सभ्यता मेरे बलबूते सुदृढ़ हुई, संपन्न बनी, मेरे बाद ना जाने क्या परिणाम होगा। मैं कभी अंतर्मुखी और स्वपोषी नहीं रहा। इसलिए, क्योंकि मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..., मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं.., मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..,

@ - दुर्गा नौटियाल, ऋषिकेश
photo- google

02 August, 2019

यलगार चहेणी (गढ़वाली कविता)













प्रदीप रावत "खुदेड़"//
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म्येरा पाड़ तै ज्वान नौनो कि दरकार चाहेणी च ,
दिल्ली देहरादून न गैरसैणे कि सरकार चहेणी च ।

जू रोजगार का बाद बी उंदा बस्ग्येन तौंते छोड़ा ,
जू सच्चा हिमपुत्र छन तौंकी ललकार चहेणी छ ।

मास्टर अपड़ा नौनो तै सरकरि इस्कूल मा पढ़ाण ,
पहाड़ मा इना मास्टरूं कि लंग्त्यार चहेणी छ ।

स्यू बी चुनौ जीती कि देहरादून जगता नि व्हान ,
इख समर्प्रित नेतों कि इख अगल्यार चहेणी छ ।

हर रोज हर हफ्ता हर मैना स्यूं पर घचाक मार ,
जनता बी पाड़े इख जागरूक दार चहेणी छ ।

अन्याय का दगड़ा खड़ी नि व्हा पुलिस चहेणी ,
नागरिक समाज का प्रति जिमेदार चाहेणी छ ।

केवल बिधायक नि कैर सकदू गौं कू विकास ,
प्रधान पंचू कि फ़ौज बी इख बफादार चहेणी छ ।

दारू भंगलू पे कि नि फूंका तुम यी ज्वनि तै ,
आपदा तोड्या पाड़ तै ज्वनि ताकतदार चहेणी छ ।

दल वल क्वी बी हो तुमारु ये पाड़ी मनख्यूं इख ,
पाड़ी हितों पर न इख क्वी तकरार चहेणी छ ।

एक दौं डंडा झंडा ले कि क्रांति का नारा लगजान ,
त्येरि कलमन खुदेड़ इनि एक यलगार चहेणी छ ।

01 August, 2019

मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..!

laxman jhula
दुर्गा नौटियाल //
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मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..! पहचाना मुझे... क्यों नहीं पहचानोगे... आखिर आपने और आपकी पीढ़ियों ने एक नहीं बल्कि कई बार मुझे जिया है। मेरी बलिष्ठ भुजाओं पर विश्वास करके न जाने कितनी बार तुमने मेरे सहारे गंगा के इस छोर से उस छोर का सफर तय किया। आज मैं आपको बता रहा हूं... कि मैं बूढ़ा हो चला हूं...। मेरी हड्डियां अब दर्द देने लगी हैं..., मेरी कमर झुक गई है..., मेरे बाल पक गए हैं..., मैं अब पहले से ज्यादा लड़खड़ाने लगा हूं..., मेरी भुजाओं में अब वह जोर नहीं कि मैं अपनी औलादों के भार को ज्यादा देर तक थाम सकूं...। शायद आपको किसी और ने भी यह खबर सुना दी होगी...। हां! यकीन मानो मैं अब बूढ़ा हो चला हूँ...। मैंने भी जब सुना तो एक पल के लिए मुझे भी यकीन नहीं हुआ। भला कौन अपने आप को बूढा और जर्जर कहलाना पसंद करेगा। लेकिन दोस्तों यह हकीकत है, की एक दिन सभी को इस अवस्था में आना पड़ता है। खैर अब मैं बूढ़ा हो चला हूं...।

मुझे याद है जब अंग्रेजों के जमाने में सन 1927 से 29 के बीच मेरी शक्ल गढ़ी गई थी। उस जमाने की सरकार के लिए मुझे तैयार कर पाना बड़ी चुनौती थी। मगर, कोलकाता के सेठ रायबहादुर शिव प्रकाश झुनझुनवाला ने एक लाख 20 हजार रुपये की बड़ी आर्थिक मदद देकर सरकार का काम आसान कर दिया। इस झुनझुनवाला परिवार का समाज पर बड़ा उपकार रहा। इसलिए नहीं कि उन्होंने मेरे निर्माण में बड़ी आर्थिक मदद की, बल्कि इसलिए की मेरे से पहले भी इस स्थान पर एक पुल हुआ करता था। जिसे रायबहादुर शिव प्रकाश झुनझुनवाला के पिता रायबहादुर सूरजमल ने 1889 में बाबा काली कमली वाले के नाम से विख्यात स्वामी विशुद्धानंद महाराज की प्रेरणा से 50 हजार रुपए की लागत से बनवाया था। यह पुल 1923 में आई गंगा की बाढ़ में बह गया था। जिसके बाद मेरे निर्माण की कवायद शुरू हुई। मैं वह दिन कैसे भूल सकता हूं जब 11 अप्रैल 1930 को संयुक्त प्रदेश के गवर्नर मैलकम हेली ने मुझे आपकी सेवा के लिए समर्पित किया था। बस वह दिन था और आज का दिन है, जब मैं पहली बार अपने जीवन मे थकान  महसूस कर रहा हूं। हां मैं अब बूढ़ा हो चुला हूं...। 

इस बीच शायद आपको याद नहीं होगा लेकिन मुझे बखूबी याद है, मैंने हमेशा अपने होने की सार्थकता सिद्ध करने की कोशिश की। मैंने अपने 90 वर्ष के इस काल में ना सिर्फ भूगोल के दो हिस्सों को एक करने का काम किया, बल्कि देश और दुनिया की संस्कृति को आपस में घुलने-मिलने का भरपूर मौका दिया। मैं अब बूढ़ा भले ही हो गया हूं, मगर मेरी याददाश्त इंसान की तरह कमजोर नहीं है। मुझे खूब याद है कि मैंने कई पीढ़ियों को इस छोर से उस छोर तक पहुंचाया और लौटाया। मेरी उम्र के समाज ने मुझे भरपूर जिया और मुझे खुशी इस बात की है कि शायद मैंने अपनी उम्र के लोगों की चार पीढ़ियों को अपनी बाहों में दुलार दिया। आपको यकीन ना हो तो अपने घर के किसी कोने में पड़ी पुरानी एल्बम को तलाश दें, मैं छायाचित्र के रूप में आप की पीढ़ियों के साथ जरूर नजर आऊंगा। लेकिन अब मैं बूढ़ा हो चला हूं...।

मैं अपनी तरुणाई से आगे बढ़ चुका था। मैं तीर्थनगरी ऋषिकेश में अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर था। मुझे अपने होने पर गुमान था। लेकिन मैंने कभी धैर्य नहीं तजा। मैं शांत और गंभीर भाव से अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा। सन 1978 मैं सिने अभिनेता अमिताभ बच्चन अपनी फिल्म 'गंगा की सौगंध' की शूटिंग के सिलसिले में यहां आए थे। अमिताभ बच्चन तब अपनी कई फिल्मों की असफलता से हताश थे। इस फिल्म में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन मेरे ऊपर (लक्ष्मणझूला पुल) पर घोड़ा दौड़ाते हुए नजर आते हैं। उनकी यह फिल्म सफल रही। इसके बाद तो बॉलीवुड की तमाम फिल्मों के साथ मेरा नाता जुड़ा। 'महाराजा', सन्यासी', 'नमस्ते लंदन', 'बंटी और बबली, गंवार (राजेन्द्र कुमार), पूर्व और पश्चिम (मनोज कुमार ), पोगा पंडित (रणधीर कपूर), पहचान (मनोज कुमार) प्रभात (कामनी कौशल), सिद्धार्थ ( शशि कपूर), गंगा की लहरें (किशोर कुमार ), स्वामी बंगाली (मिथुन चक्रवर्ती) गंगा तेरा पानी अमृत ,करम (राजेश खन्ना ) आदि... और भी ना जाने कौन-कौन सी फिल्मों और धारावाहिक में आपने मुझे महसूस किया होगा। लेकिन अब मैं बूढ़ा हो चला हूं...

सुना है कि अब मुझे असुरक्षित घोषित कर दिया गया है। मुझे सचमुच यकीन नहीं हो रहा है कि मैं बूढ़ा हो चला हूं। दोस्तों; यकीन मानिए मेरी भुजाओं में आज भी वही शक्ति है, मैं ऐसा महसूस करता हूं। लेकिन आखिर हूं तो नस्वार ही..., मैं अजर-अमर और अविनाशी नहीं हूं... यह मैं भी जानता हूं। लेकिन न जाने कौन सा रोग लग गया है। अब मेरी कमर झुकने लगी है..., हड्डियां दर्द देने लगी हैं..., मैं पहले से ज्यादा लड़खड़ाने लगा हूं...! शायद बुढ़ापा ऐसा ही होता होगा। शायद, इसीलिए कहा जा रहा है कि अब मैं असुरक्षित हूं। अब मैं बूढ़ा हो चला हूं...।

खैर मेरा जीवन इतना भर ही था, जिसे मैंने संजीदगी के साथ भरपूर जिया। हो सके तो मेरे जीवन से कुछ सीख आप भी ले लो। मैं बूढा भले हो गया लेकिन जीने, हंसने, खेलने, खिलखिलाने और मस्ती के पल मैं आज भी तलाश रहा हूं...। मैं जब तक रहूंगा, तब तक जिऊंगा, भरपूर जीऊंगा। आप मुझे याद करोगे ना..., एक बार उस तस्वीर को पलट कर देखोगे जो तुमने मेरे साथ ली थी..., उस दिन को याद करोगे जब तुम बेफिक्र होकर गंगा की उछलती-कूदती लहरों के ऊपर मेरे संग चले थे..., मुझे तो आपके साथ बिताया हर पल याद है। क्योंकि मैं लक्ष्मण झूला सेतु हूं...! मैं लक्ष्मण झूला सेतु हूं...! मैं लक्ष्मण झूला सेतु हूं...!

@ दुर्गा नौटियाल, ऋषिकेश
photo- google

सुदामा चरित नाटिका (गढवालि भाषा)

bol pahadi
नरोत्तम दास जी से प्रेरित
स्टेज मा सुदामा अर वूं कि पत्नी सुशीला टूटीं फूटीं झोपड़ि का भितर बैठ्यां छन।

सुशीला कु सुदामा से - (दोहा)

हे स्वामी जी कृष्ण तुमारा, बचपन का छन मीत ।
दीनदयाल छन प्रभु, करिल्या वूं से प्रीत ।।

गाना- लय - कैल बजै मुरूली
दुःख होयुं च अति भारी, हो स्वामी हथ जोड़िक बिनती ।
द्वारिका का नाथ स्वामि, कृष्ण जि भगवान ।
दुःख दरिद्र हरि देंदा दिन दयाल नाम ।
जावा हो स्वामी जी तुम तख, हथ जोड़िक बिनती ।

सुदामा कु सुशीला से - गाना, लय - द्वि हजार आठ भादौं का मास ।
सुण मेरी बामणि प्राण पियारि ।
समझौंदु त्वेकु तैं मेरि बामणि ।।
सुख अर दुःख होंदा जीवन का साथी ।
भगतौं का मुख से या बात नि स्वांदी ।

सुशीला कु गाना -
सूणा बामण प्राण आधार मि लांदू बिनती ,
जावा जावा जावा दुं स्वामी कृष्ण जी का पास
अन्न का कुठार द्यौला धन का भण्डार ।

सुदामा - जब तु लगिं च मेरा पैथर कि जा जा जा जाणक, त मि जौलु कृष्ण जी का पास पर ल्याण क्या च? यख त द्वि दाणि चौंळुं कि बि नि ।
सुशीला - तुम तैयार होवा अर मि पल्या खोळा कि दीदी मुंगे चौंल पैंछा गाड़ी ल्यौंदू ।

सुशीला स्टेज बटि भैर आंदि परदा बंद होंदु अर भितर पल्या खोला कि दीदी कु कमरा फेर तैयार ।

(पल्या खोळा कि दीदी - दोहा -)
बामणि बैंण कख बिटी, आई यख तू आज ।
झटपट बतलै दे भुलि, क्या च तेरु काज ।।
सुशीला - तेरा बामण जी आज कखि जाणा छया । दीदी ! द्वि मुट्ठि चौंल पैंछा दी दे ।

वु दीदी खुशी से द्वी मुठि चौंल देंदि अर सुशीला घौर जैक सुदामा तैं दीक वूं तैं द्वारका भेजदि ।

सुदामा जी द्वारका पौंछदा । लोगों तैं पूछीक पाण्डाल मा कृष्ण दरबार का द्वारपाल से बोलदा - दोहा -

हे चाकर जी भगवान तैं, ली जा यो रैबार ।
दीन सुदामा भैर मूं, करणु तुमारि याद ।।

द्वारपाल भितर जै कि कृष्ण से - महाराज ! भैर मूं यौक गरीब बामण आंयूं च उ अपडु नौ सुदामा बतौणू ।
कृष्ण जी सुदामा कु नाम सुणदि दरबार छोड़िक अपड़ा दगड़्या का पैरूं मा सेवा लगैक गळा मिलदा ।

कृष्ण कु सुदामा से - तर्ज - जौं भयुं कि होणि होलि ऊ कठा राला ।

पैलागु सुदामा तुम कख बे आयां,
कन खुद मिटाई त्वेन हे दगड़्या ।
आज तक यख नि आया कख रंया ?
यूं खुट्युं का हाल यन कख होंया ।
तुमारि हालत देखि औंदि दया ।

कृष्ण जी सुदामा तैं अपणा आसन मा बिठैक पाणि कि परात मंगौंदिन अर रौदा- रौंदा वूं का पैर धौंदा ।
फिर खाणौं खिलैक बैठाल्दा । फिर सुदामा से वैका बदन मा टटोलि कि बोलदा गाना -

कख लुकायो ऐ सुदामा, भाभिन भेजी छो मि कु कलेवा ।
स्कुल मा त्वेन चना चबैन, मिकु नि दीन्या अफ्वी खैन ।
देखा दुं अब त बुड्या ह्वेगेन, पुराणि आदत कखि नि गैंन ।

अर चौंलु कि पोटली मां बटि द्वि मुट्ठी चौंळ खै देंदान, तीसरी मुट्ठि खाण से पैलि रुक्मिणी कृष्ण जी कु हाथ रोकदि अर यु गाना बोलदिं - लय - नीरू घिंघोरा कि दाणि खेजा ।

स्वामि जी जरा तुम रुका दूं ,
सोचि बिचारिकि काम कनू ।
द्वि लोक दिल्या तुम दान यनू ,
अफूक नि चैंदू ठौर जनू ।

अब सुदामा - अच्छू मि अब घौर चलदू मेरी घरवाळ मेरु इन्तजार ह्वलि कनी ।
कृष्ण पाण्डाल का रस्ता तक सुदामा तैं भेजण क आंदा अर यु गाना बोदा - लय - आज चलि जौंलू , भोळ चली जौंलू, परस्यों तैं चली जौंलू.. (कबूतरी देवी)।

जावा मेरा भैजी जावा तुम घौर, नाराज ना होयां ।
भाभी जि तैं द्वि हाथ जोड़िक, परणाम बोलि दियां ।
बाटा घाटा पुन समळीक जाण, ढ्वौळ अर ढुंगु देख्या ।
कुशल रौला फिर भेंट होलि, आशीष देई जाला ।
नि होयी सेवा भक्ति हमूं से, नाराज नि होण ।
कुशल रोला फिर सेवा करला, आशीष देई जैया ।

रौंदा- रौंदि कृष्ण वापिस अपणा दरबार मां आंदा अर सुदामा जी चली जांदा । परदा बंद ।
सुदामा जी कु रास्ता मां गाना -
तरज - “तुम्ही मेरा मंदिर तु ही मेरि पूजा“ वाला गाना कि चार ।

नि जांदू नि जांदू मैं त, तती बोलि मैंन ।
बणीगे पर्वाण स्या त, जिदी करी तीं न ।
निरदयी च कृष्ण तू त नि च त्वैकु दय्या ।
चिफली च घिच्ची तेरि बोद फिर अय्या ।

स्टेज मा अनेक सेविकाओं दगडि सुशीला सजी धजी क बैठीं च ।
पाण्डाल मा भैर बे सुदामा जी आंदा अर गीत गांदा - लय - उडी जा कागा बादलों बीच  वाला गाना से मिलती जुलती

कख होली मेरी स्या टूटीं झोपड़ि,
या सुध नि रे मी तैं अपड़ि ।
क्या भूलि गौं मि बाटु वो घर कू,
कख होलि मेरी बामणि प्यारि ।

सुशीला भैर ऐक सुदामा तैं सेवा लांदि अर दोहा बोलदि -

हे स्वामी जी देखा दूं, लीला कृष्ण अपार ।
राज पाट दीले हमु कु, करली हमारु उद्धार ।

संकलक- सच्चिदानंद सेमवाल
साभार- भीष्म कुकरेती



फोटो साभार- Google

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