16 October, 2019

विलक्षण था आचार्य चक्रधर जोशी का जीवन


गिरधर पंडित //

आचार्य पंडित चक्रधर जोशी मूलतः दाक्षिणात्य ब्राह्मण परिवार से थे। यहां पर यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि देवप्रयाग में बहुतायत ब्राह्मण दक्षिण भारत से हैं। जिनका संबन्ध आर्यों की पंच द्रविड़ शाखा से है। जोशी परिवार भी उसी में से है। 

हिंदी तिथियों के अनुसार आचार्य जी का जन्म वामन द्वादशी को हुआ था। जोशी परिवार दक्षिण भारत में कहां से आये थे इस पर देवप्रयाग के बहुभाषाविद, संस्कृत के कवि नाटककार बहुमुखी प्रतिभा के धनी पं. मुरलीधर शास्त्री के अनुसार :-
‘आंध्र प्रदेशे शुभ गौतमी तटे, धान्यै युते कांकरवाड़ ग्रामें
कौण्डिल्य गोत्रे द्विजवर्य गेहे, जातो हनुमासन विदुषाम वरिष्ठ।’
(स्मृति ग्रन्थ से)
आंध्रप्रदेश के गोदावरी जिले के कांकरवाड नामक ग्राम से जोशी जी के पूर्वज कौण्डिल्य गोत्रीय ब्राह्मण दामोदर भट्टारक (दक्षिण में विद्वान के लिए भट्टारक शब्द प्रयुक्त होता है जो उत्तर में आकर खासकर देवप्रयाग में भट्ट हो गया) देवप्रयाग आकर बसे थे। 

दामोदर के वासुदेव, वासुदेव के हनुमान, हनुमान के व्यंकट रमण और जयकृष्ण पुत्र हुए। व्यंकट रमण अल्पायु हुए। जयकृष्ण के लक्ष्मीधर और खुशहाली राम दो पुत्र हुए। दोनों ज्योतिष और कर्मकांड में पारंगत थे। लक्ष्मीधर के दो पुत्र चक्रधर और पृथ्वीधर हुए।

जब आचार्य जी का अवसान हुआ तो देवप्रयाग में सभी को एक प्रकाशपुंज के बुझने का दुःख तो हुआ ही पर साथ ही एक परंपरा का अवसान भी दिखाई दिया। देवप्रयाग के तंत्र सम्राट, लेखक व कवि आचार्य जितेंद्र भारती ने जोशी जी के अवसान के बाद जो शंका व्यक्त की थी उस समय वही कहा जा सकता था। उन्हीं के शब्दों में :-
‘यंत्र वेधशाला में खड़े हैं, मुंह बाए हुए
पूछते हैं विलख कहां चक्रधर चला गया
पुस्तकों के पन्ने खुले बंद, पूछने लगे हैं
कुछ तो बताओ कहां चक्रधर चला गया।’
(स्मृति ग्रन्थ से)

सचमुच कुछ समय तक यही सत्य था परिवार आघात से उभर नही पा रहा था, यंत्रों पुस्तकों और संग्रहीत दुर्लभ वस्तुओं पर धूल की परतें चढ़ रही थी। ऐसा कोई कद्रदान शिष्य भी उन्हें उपलब्ध नहीं हुआ था जो इस निधि और परंपरा को संभालता और आगे बढ़ाता। हर तरफ अंधेरा ही था। लंबी अवधि तक नक्षत्र वेधशाला के आभा मंडल पर धुंध ही व्याप्त रहा।

पाठकों को यह भी विदित हो कि आचार्य जी प्रसिद्ध आध्यात्मिक साधक भी थे। जिन्होंने बदरीनाथ के चरण पादुका नामक स्थल जो ऋषिगंगा के किनारे पर है, वर्षों तक साधना भी की थी। जिस समय उन्हें डायबटीज ने घेरा था तब यह बीमारी असाध्य सी थी। जोशी जी का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था, परंतु लगता है उन्होंने तब ही तय कर लिया था कि ऐनकेन प्रकारेण ज्योतिष, शोध आदि की परंपरा को तो जीवित ही रखना होगा। शायद इसीलिए उन्होंने बिना जाहिर किये अपने जीते जी अपनी बौद्धिक परंपरा को दो भागों में बांट लिया था। जिसके दो पक्ष थे :- भौतिक और आध्यात्मिक, कर्मकांड और ज्योतिष। 

इसी क्रम में उन्होंने अपने बड़े पुत्र सुधाकर को पाश्चात्य शिक्षा की तरफ मोड़ दिया था। जिन्होंने कुछ समय तक व्यवसाय कर वेधशाला को थामने का प्रयास किया, किंतु शुगर की बीमारी से उनकी किडनी जबाब दे गई और वे जल्द ही चले गए। द्वितीय पुत्र दिवाकर ने पौरोहित्य का काम संभाला, परन्तु विवाह के कुछ समय बाद एक पुत्री को जन्म देकर वे भी स्वर्गवास हो गये। याने परिवार पर एक के बाद एक दुःख का पहाड़ टूटता गया। 

जैसा कि हम परंपरा विभाजन की बात कर रहे थे। निश्चय ही जोशी जी ने अपनी अंतर्दृष्टि से भांप लिया था कि शेष दो पुत्र प्रभाकर और भास्कर ही उनकी असली विरासत आगे बढ़ाएंगे। इसीलिए उन्होंने तृतीय पुत्र प्रभाकर को सामाजिक एवमं व्यवहारिक अध्ययन के मार्ग पर लगा लिया। साथ ही प्रभाकर से एक हस्तलिखित समाचार पत्रिका का कार्य शुरू करवा दिया। बिना किसी औपचारिक घोषणा के उन्हें पुस्तकालय प्रवंधन में डाल दिया। 

सबसे छोटे पुत्र भास्कर को पारंपरिक संस्कृत शिक्षा की ओर मोड़ दिया था। यद्यपि नगर को अभी भी आशा की कोई किरण नजर नही आ रही थी, पर किसी तरह संघर्ष और हिम्मत कर इन दोनों भाइयों ने वेधशाला की परंपरा को संभालना प्रारम्भ कर दिया। जिसके बाद प्रभाकर ने एमए तथा पीएचडी हिंदी में कर नौकरी के बजाय वेधशाला की सांसारिक परंपरा को जारी रखने का निश्चय किया और लेखन अध्ययन और पत्रकारिता को ही अपना जीवन बनाया। 

दूसरी तरफ भास्कर ने आचार्य परीक्षा पास कर कर्मकांड, ज्योतिष और साधना के क्षेत्र में प्रसिद्धि हासिल की। भास्कर में शुरू से ही सन्यासी प्रवृत्ति रही, वह हर साल बदरीनाथ में महाप्रभु की बैठक में, जो शिवालय के पीछे है, साधना में लीन रहते थे। उन्होंने कथा प्रवचन भी करना प्रारम्भ किया। कथा करते समय उनकी नजर हमेशा स्वयं और पुस्तक में रहती थी। कभी वे श्रोताओं की तरफ नहीं देखते। न कभी हंसी, मजाक या असामयिक प्रसंग छेड़ते। आज उनमें आचार्य जी की प्रत्यक्ष छवि नजर आती है। स्वभाव से सौम्य अभिमान रहित और सच्चे साधक लगते हैं।

संकटों से पार पाकर दोनों भाईयों ने वेधशाला को उसका वैभव लौटा दिया। वही पुरानी रौनक, वही आगंतुकों का जमावाड़ा, उनका आतिथ्य आदि सब लौटा ही नही, ऊंचे आयाम तक पहुंच गया। यह भी प्रमाणित कर दिया कि आचार्य जी के जाने के बाद न वेधशाला के यंत्र खड़े मुहं बाए हुए हैं, बंद हैं बल्कि आगंतुक व शोध छात्र वहां अध्य्यन के लिए आते रहते हैं और मुफ्त आवास और प्रसाद स्वरूप भोजन भी पाते हैं। वह भी पूरी तरह पारिवारिक वातावरण में। 

इस परम्परा को जीवित रखने में अगर किसी का सच्चा योगदान है तो वह है आचार्य स्व. पं. चक्रधर जोशी जी की धर्मपत्नी श्रीमती विद्या देवी की। जो प्रारम्भ से ही परिवार और अतिथि सत्कार, सेवा को अपनी साधना में चुकी है। जीवन के इस अन्तिम पड़ाव पर भी  उनकी सेवा वृत्ति यथावत है। निश्चय ही वे पूज्यनीय एवम अनुकरणीय है।

अंत मे चलते चलाते एक घटना जो वेधशाला की निस्वार्थ सेवा परंपरा से जुड़ी है उसका उल्लेख करना भी जरूरी है। क्योंकि आचार्य जी ने जो खुद मुझे अपने श्रीमुख से सुनाई थी कि :-
‘एक बार दक्षिण भारत का एक निर्धन युवा साधु सर्दी की रात में पैदल देवप्रयाग पहुंचा। अमूमन सर्दियों में पहाड़ में लोग आठ बजे तक भोजन कर निपट जाते हैं। होटल भी बंद हो जाते है। यह साधु भूखा था। किसी ने इसे वेधशाला के रास्ते लगा दिया। वहां भोजन देर से ही होता है। करीब 10 बजे के बाद वह साधु भटकता हुआ वेधशाला पहुंचा। लेकिन अंधेरे में नीचे खेत में गिर गया। पैरों पर उसके खरोंच आ गई थी। गिरते ही वह जोर से चिल्लाया  कारण कि वह गेट से अंदर दाखिल नहीं हो सका, बन्द होने के कारण।

उसकी आवाज सुन जोशी जी ने कारिंदों से उसे ऊपर लाने को कहा। इतने में जोशी की दया मूर्ति पत्नी भी वहां आ गई तुरन्त  आचार्य जी ने उनसे कहा- ’सुधाकर की माजी यह तो बहुत ऊंचे दर्जे का फकीर हैं हमारे भाग्य से भगवान ने इन्हें यहां भेज दिया। इसके लिए पहले तो गर्म पानी करो, फिर भोजन बनाओ ऐसे लोगों की सेवा दुर्लभ होती है। आचार्य जी की पत्नी बिना किसी प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त किये तुरन्त सहर्ष आदेश पालन कर पानी ले आयी। जोशी जी ने अपने हाथों से उस साधु को तौलिया भिगाकर पोंछा फिर तेल मालिश की और भोजन कराया। अचार, पापड़, घी, दही सब भोजन में था। फिर उसके सोने की व्यवस्था भी की।’ 

जब यह वृत्तांत मैंने सुना तो उनसे सवाल किया बुढ़ाजी (पिता के मामा) क्या वह सचमुच में पहुंचा हुआ, ऊंचे स्तर का संत था? तो आचार्य जी मुस्कराए और बोले ’यह अच्छे भोजन की आस लेकर आया था। अगर मैं उसे महिमामंडित नहीं करता तो कारिंदे और परिवारजंन श्रद्धा और उत्साह से सेवा नहीं करते। इसलिए उसे उच्चकोटि का संत बताना पड़ा। जीवन में ऐसी सेवा से बढ़कर कोई पूजा नही है।’ आप आश्चर्य करेंगे कि आचार्य जी बहुत अच्छे मजाक भी कर लेते थे। जो समसामयिक और सटीक होते थे। 

यह था आचार्य जी के जीवन का एक और पहलू। जो भी हो  वेधशाला आज पहले से अधिक आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। उस महान विभूति को जितना याद किया जाय कम ही है। उसे शत-शत नमन।


गिरधर पंडित 

19 September, 2019

पहाड़ के गांवों की ऐसी भी एक तस्वीर

https://www.bolpahadi.in/2019/09/blog-post19-a-picture-of-mountain-villages-narendra-kathait.html
नरेंद्र कठैत//

          साहित्यिक दृष्टि से अगर उत्तराखण्ड की आंचलिक पृष्ठभूमि को स्थान विशेष के परिपेक्ष्य में देखना, समझना चाहें तो इस श्रेणी में पहाड़ से गिने-चुने कलमकारों के नाम ही उभरकर सामने आते हैं। कुमाऊं की ओर से पहाड़ देखना, समझना हो तो टनकपुर से चिल्थी, चम्पावत, लोहाघाट, घाट होते हुए पिथौरागढ़ तक शैलेश मटियानी अपनी कहानियों के साथ ले जाते हैं। गढ़वाल की ओर से साहित्यकार मोहन थपलियाल, विद्यासागर नौटियाल, कुलदीप रावत, सुदामा प्रसाद प्रेमी हमें घुंटी-घनसाली, पौखाळ, डांगचौरा, श्रीनगर, कांडा, देलचौंरी, बिल्वकेदार, कोटद्वार, गुमखाल, कल्जीखाल, दूधातोली, मूसागली जैसे कई स्थान विशेष के न केवल नामों से बल्कि कहीं न कहीं उनके इतिहास भूगोल से भी हमें जोड़कर रखते हैं। 

          दरअसल नाम विशेष से मजबूती के साथ जुड़ी पहाड़ की ये शृंखलाएं ठेट गांवों तक चली जाती हैं। इनकी संख्या सौ-पचास में नहीं अपितु सैकड़ों में है। खोळा, कठुड़, अठूड़, कोट, श्रीकोट, पोखरी, कांडई, डांग, चोपड़ा, नौ गौं, बैध गौं, पाली, बागी इत्यादि नामों के तो एक नहीं अपितु कई-कई गांव पहाड़ की कंदराओं में हैं। प्रथमतः स्थान विशेष से जुड़े ये नाम ही हमारी कला, साहित्य, संस्कृति, शिल्प के आधारभूत स्तंभ रहे हैं। 

          मां ने किसी स्थान विशेष में स्थायित्व हेतु आधारभूत वस्तुओं का संग्रह किया तो आंचलिकता का पुट मिला- ब्वेन जोड़ी (बैंज्वाड़ी), मां ने खेतों की निराई- गुड़ाई की तो नाम सामने आया- ब्वेन गोड़ि (बैंगोड़ि), गहरे स्थान में कोई गांव स्थित है तो नाम मिलता है- गैर गौं, गांव ऊंचे धरातल पर है तो- वुंचुर। धार पर अवस्थित है तो- धर गौं। 

          पहाड़ के साथ दो नाम और जुड़े हैं- धार और खाळ। हर एक धार और हर एक खाळ पहाड़ की रीढ़ हैं। सबका अपना अलग नाम, अपना अलग इतिहास, अपना अलग भूगोल है। कहने का तात्पर्य यही है कि हर एक स्थान विशेष के नाम के पीछे कुछ न कुछ मूलभूत कारण अवश्य रहे हैं।

          किंतु आधारभूत ढ़ाचों की मूल संरचना को नकारते हुए कपितय बुद्धिजीवियों में मूल स्थानों के नामों के परिर्वतन की एक होड़ सी मची है। इस होड़ में पिछले दो दशकों में कई गांवों, स्थानों का नाम परिर्वतन किया जा चुका है। गौं के स्थान पर पुर और नगर शब्द सुशोभित हो गए हैं। 

          गढ़वाली भाषा में एक लोकोक्ति प्रचलित है- ‘कुंडी जौं कि पाबौ।’ अर्थार्थ पहले कुंडी गांव जाऊं या पाबौ गांव।’ यह लोकोक्ति कंडवालस्यूं पट्टी में कुंडी और पाबौ नाम के आस-पास सटे दो गांवों से सन्दर्भित है। क्योंकि पौराणिक काल में कुंडी गांव में देवस्थल था और पाबौ गांव में राजा का थान। इस तरह दुविधा के सन्दर्भ में ‘कुंडी जौं कि पाबौ’ लोकोक्ति कुंडी तथा पाबौ दो गांवों के इतिहास, भूगोल की ओर भी सदियों से हमारा ध्यान खींचती रही है। लेकिन अब यह लोकोक्ति लुप्त होने की कगार पर है। क्योंकि इस लोकोक्ति में सन्दर्भित पाबौ गांव का नाम पवनपुर लिखा जाने लगा है। 

          ‘इस स्थान पर ज्यादा हवा चलती है, इसलिए पवनपुर नाम रखा गया।’ नई पीढ़ी का यह तर्क कहीं से भी तर्कसम्मत नहीं लगता। यदि एक ही नाम के कई गांव हैं तो प्रत्येक गांव की अपनी अलग मौलिक पहचान है। प्रश्न विचारणीय है कि यूं नाम परिवर्तन से क्या साहित्य, संस्कृति, कला से जुड़े सन्दर्भ खण्डित नहीं होंगे? 

          यह लिखने में कदापि संकोच नहीं कि मूल आधारभूत ढाचों, सन्दर्भो के साथ इस भांति की छेड़छाड़ से गांव अब गांव न रहे। अब संस्कृति संरक्षण का वह प्रसंग ही समझ से परे लगता है जिसकी छाया में रहते हुए भी हम स्थानीय उत्पाद कंघी, सूप, नकचुंडी, कनगुच्छी के निर्माण शिल्प भी सुरक्षित नहीं रख पाये। इस उठापटक के बीच आज भले ही संस्कृति की सनातनता टूटी न हो पर वह बेबस अवश्य है।

          खैर, एक ओर जहां मूल नामों के साथ छेड़छाड़ जारी है वहीं इन्हीं पहाड़ों के बीच से आस-पास सटे हुए कुछेक ऐसे गांव मेरे संज्ञान में आये हैं जिनके नामोल्लेख के अंत में कुछेक वर्णों का अद्भुत संयोग देखने को मिलता है। 

‘ळा’ एवं ‘ड़ा’ वर्णों का आकारान्त संयोग देखिए-
कोट - कोटसाड़ा, खल्लू - चमराडा, उळळी - मरोड़ा, कुंडा - मरोड़ा, सीकू - भैंसोड़ा, नगर - मिरचौड़ा, सल्डा - कंडोळा, कांडा - चमरोड़ा, डांग - अगरोडा, ल्वाली - गगवाड़ा, कोटी - कमेड़ा इत्यादि।

ऐसे ही इकारांत संयोग यूं दिखता है-
जमळा - मिन्थी, बाड़ा - पिसोली, धरी - पोखरी, कंडी - मुछियाळी, च्वींचा - बैंज्वाड़ी, क्यार्क - सिरोळी आदि-आदि।

         उल्लेखनीय है कि दो गांवों का एक साथ नामोल्लेख करते समय भी प्रथम वर्णित गांव का ही पहले उच्चारण किया जाता है। आस-पास सटे दो गांवों के नामोल्लेख में वर्णों के इस संयोग के पार्श्व में कुछ न कारण अवश्य होगें। 

          प्रश्न चिचारणीय है कि क्या उक्त गांवो की नींव रखते हुए हमारे पुर्वजों द्वारा उच्चारण विषयक संयोग का ध्यान रखा गया? या राम-सीता, कृष्ण-गीता, गंगा-यमुना, बद्री-केदार, घर-द्वार की तरह ये नाम भी हमारी बोल-चाल, आचार-व्यवहार में सुविधा अनुसार स्वतः ही ढ़लते चले गए? अथवा ‘कहां नीती कहां माणा, एक श्याम सिंह पटवारी ने कहा-कहां जाना’ युक्ति की भांति ही राजस्व वसूली/ कर निर्धारण की सुविधा को देखते हुए यह युक्ति सांमती प्रथा के कारण प्रचलन में आयी? 

हो सकता है अन्य गांवों के साथ भी ऐसे ही संयोग जुड़े हों। जो भी हों हमें उनका बोध हो, उनपर गहराई से अवश्य शोध हो।
https://www.bolpahadi.in/2019/09/blog-post19-a-picture-of-mountain-villages-narendra-kathait.html

नरेंद्र कठैत

मैंने या तूने (हिन्दी कविता)

https://www.bolpahadi.in/2019/09/blog-post.html

प्रदीप रावत ‘खुदेड़' //

मैंने या तूने,
किसी ने तो मशाल जलानी ही थी
चिंगारी मन में जो जल रही थी
उसे आग तो बनानी ही थी
मैंने या तूने,
किसी ने तो मशाल जलानी ही थी।

मरना तुझे भी है
मरना मुझे भी है
यूं कब तक तटस्थ रहता तू
यूं कब तक अस्पष्ट रहता तू
फिर किस काम की तेरी ये जवानी थी
मैंने या तूने,
किसी ने तो मशाल जलानी ही थी।

रो रही धारा ये सारी है
वक्त तेरे आगे खड़ा है
तय कर तू
तुझे वक्त के साथ चलना है
या कोई नया किस्सा गढ़ना है
ये तेरी ही नहीं लाखों युवाओं की कहानी थी
मैंने या तूने,
किसी ने तो मशाल जलानी ही थी।

आकांक्षाएं ये तेरी
अति महत्वाकांक्षी हैं
आसमान में उड़ते भी जमीं पर पांव रख तू
बाज़ी हारे न ऐसा एक दांव रख तू
हारी बाज़ी तुझे बनानी थी
मैंने या तूने,
किसी ने तो मशाल जलानी ही थी।

तुफानों के थमने तक सब्र रख तू
ज़िंदा है तो पड़ोस की खबर रख तू
अपने अधिकारों में कब तक मदहोश रहेगा
पर कर्तव्यों के प्रति कब तक खामोश रहेगा
कुछ तो जिम्मेदारी तुझे उठानी थी
मैंने या तूने,
किसी ने तो मशाल जलानी ही थी।
bol pahadi

(युवा प्रदीप रावत ‘खुदेड़’ कवि होने के साथ ही सामाजिक सरोकारों के प्रति भी बेहद सजग रहते हैं। उनकी कविताओं और सामायिक लेखों में यह दिखाई भी देता है।)

08 September, 2019

गढ़वाल की राजपूत जातियों का इतिहास (भाग-1)

bol pahadi

संकलनकर्ता- नवीन चंद्र नौटियाल //
उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र में निवास करने वाली राजपूत जातियों का इतिहास भी काफी विस्तृत है। यहां बसी राजपूत जातियों के भी देश के विभिन्न हिस्सों से आने का इतिहास मिलता है। इसी से जुड़ी कुछ जानकारियां आपसे साझा की जा रही हें।

क्षत्रिय/ राजपूत :- गढ़वाल में राजपूतों के मध्य निम्नलिखित विभाजन देखने को मिलते हैं -
1. परमार (पंवार) :- परमार/ पंवार जाति के लोग गढ़वाल में धार गुजरात से संवत 945 में आए। इनका प्रथम निवास गढ़वाल राजवंश में हुआ।

2. कुंवर :- इन्हें पंवार वंश की ही उपशाखा माना जाता है। ये भी गढ़वाल में धार गुजरात से संवत 945 में आए। इनका प्रथम निवास भी गढ़वाल राजवंश में हुआ।

3. रौतेला :-  रौतेला जाति को भी पंवार वंश की उपशाखा माना जाता है।

4. असवाल :- असवाल जाति के लोगों का सम्बंध नागवंश से माना जाता है। ये दिल्ली के समीप रणथम्भौर से संवत 945 में यहां आए। कुछ विद्वान इनको चौहान कहते हैं। अश्वारोही होने से ये असवाल कहलाए। वैसे इन्हें गढ़वाल में थोकदार माना जाता है।

5. बर्त्वाल :- बर्त्वाल जाति के लोगों को पंवार वंश का वंशज माना जाता है। ये संवत 945 में उज्जैन/ धारा से गढ़वाल आए और बड़ेत गांव में बस गए।

6. मंद्रवाल (मनुराल) :- ये कत्यूरी वंश के राजपूत हैं। ये संवत 1711 में कुमाऊं से गढ़वाल में आकर बसे। इनको कुमाऊं के कैंत्यूरा जाति के राजाओं की सन्तति माना जाता है।

7. रजवार :- कत्यूरी वंश के वंशज रजवार जाति के लोग संवत 1711 में कुमाऊं से गढ़वाल आए थे।

8. चन्द :- ये सम्वत 1613 में गढ़वाल आए। ये कुमाऊं के चन्द राजाओं की संतानों में से एक मानी जाती हैं।

9. रमोला :- ये चौहान वंश के वंशज हैं जो संवत 254 में मैनपुरी, उत्तर प्रदेश से गढ़वाल में आए और रमोली गांव में रहने के कारण ये रमोला कहलाए। इन्हें पुरानी ठाकुरी सरदारों की संतान माना जाता है।

10. चौहान :- ये चौहान वंश के वंशज मैनपुरी से यहां आए। इनका गढ़ ऊप्पू गढ़ माना जाता था।

11. मियां :- ये सुकेत और जम्मू से गढ़वाल में आए। ये यहां के मूल निवासी नहीं थे। लेकिन ये गढ़वाल के साथ नातेदारी होने के कारण गढ़वाल में आए।

गढ़वाल में राजपूत जातियों में बिष्ट, रावत, भण्डारी, नेगी, गुसाईं आदि प्रमुख समूह हैं, जिनके अंतर्गत कई जातियां समाहित हैं।

रावत जाति के राजपूत :- गढ़वाल में रावत जाति राजपूतों की एक प्रमुख जाति मानी जाती है। इसके अतर्गत कई जातियां समाहित हैं। ये सभी रावत जातियां अलग-अलग स्थानों से आकर गढ़वाल में बसी हैं।

12. दिकोला रावत :- दिकोला रावत की पूर्व जाति (वंश) मरहठा है। ये महाराष्ट्र से संवत 415 में गढ़वाल में आए और दिकोली गांव को अपना बनाया।

13. गोर्ला रावत :- गोर्ला रावत पंवार वंश के वंशज हैं जो गुजरात से संवत 817 में गढ़वाल आए। गोर्ला रावत का प्रथम गांव गुराड़ माना जाता है।

14. रिंगवाड़ा रावत :- इन्हें कैंत्यूरा वंश का वंशज माना जाता है। जो कुमाऊं से संवत 1411 में गढ़वाल आए। इनका प्रथम गढ़ रिंगवाड़ी गांव माना जाता था।

15. बंगारी रावत :- बंगारी रावत बांगर से संवत 1662 में गढ़वाल आए। बांगरी का अपभ्रंश बंगारी माना जाता है।

16. बुटोला रावत :- ये तंअर वंश के वंशज हैं। ये दिल्ली से संवत 800 में गढ़वाल आए। इनके मूलपुरुष बूटा सिंह माने जाते हैं।

17. बरवाणी रावत :- ये तंअर वंश के वंशज मासीगढ़ से संवत 1479 में आए। इनका गढ़वाल में प्रथम  निवास नैर्भणा क्षत्रिय था।

18. जयाड़ा रावत :- ये दिल्ली के समीप किसी अज्ञात स्थान से गढ़वाल में आए। गढ़वाल में इनका प्रथम गढ़ जयाड़गढ़ माना जाता था।

19. मन्यारी रावत :- इनके मूल स्थान के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये लोग गढ़वाल की मन्यारस्यूं पट्टी में बसने के कारण मन्यारी रावत कहलाए।

20. जवाड़ी रावत :- इनका प्रथम गांव जवाड़ी गांव माना जाता है।

21. परसारा रावत :- ये चौहान वंश के वंशज हैं जो संवत 1102 में ज्वालापुर से आकर सर्वप्रथम गढ़वाल के परसारी गांव में आकर बसे।

22. फरस्वाण रावत :- मथुरा के समीप किसी स्थान से ये संवत 432 में गढ़वाल आए। इनका प्रथम गांव गढ़वाल का फरासू गांव माना जाता है।

23. मौंदाड़ा रावत :- ये पंवार वंश के वंशज हैं जो संवत 1405 में गढ़वाल में आकर बसे। इनका प्रथम गांव मौंदाड़ी गांव माना जाता है।

24. कयाड़ा रावत :- इन्हें पंवार वंश का वंशज माना जाता है। ये संवत 1453 में गढ़वाल आए।

25. गविणा रावत :- इन्हें भी पंवार वंश का वंशज माना जाता है। गवनीगढ़ इनका प्रथम गढ़ था।

26. लुतड़ा रावत :- ये चौहान वंश के वंशज हैं जो संवत 838 में लोहा चांदपुर से गढ़वाल आए। इनमें पुराने राजपूत ठाकुर आशा रावत और बाशा रावत थोकदार कहलाते थे।

27. कठेला रावत :- कठेला रावत राजपूत जाति के बारे में पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी जी लिखते हैं कि “इनका मूल वंश कठौच/कटौच और गोत्र काश्यप है और ये कांगड़ा से गढ़वाल में आकर बसे हैं। ऐसा माना जाता है कि इनका गढ़वाल राजवंश से रक्त सम्बंध रहा है। इनकी थात की पट्टी गढ़वाल में कठूलस्यूं मानी जाती है। कुमाऊं के कठेला थोकदारों के गांव देवाइल में भी ‘कठेलागढ़’ था।”

28. तेरला रावत :- ये गुजड़ू पट्टी के थोकदार माने जाते हैं।

29. मवाल रावत :- गढ़वाल में इनकी थात की पट्टी मवालस्यूं मानी जाती है। इनका मूल निवास नेपाल तथा ये कुंवर वंश के माने जाते हैं।

30. दूधाधारी रावत :- ये बिनोली गांव, चांदपुर के निवासी माने जाते हैं।

31. मसोल्या रावत :- पंवार पूर्व जाति के वंशज मसोल्या रावत धार के मूल निवासी हैं जो गढ़वाल में बसे हैं।

इसके अलावा जेठा रावत, तोदड़ा रावत, कड़वाल रावत, तुलसा रावत, मौरोड़ा रावत, गुराडी रावत, कोल्ला रावत, घंडियाली रावत, फर्सुड़ा रावत, झिंक्वाण रावत, मनेसा रावत, कफोला रावत जातियों के बारे में अभी जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है।

बिष्ट जाति के राजपूत :- गढ़वाल में बिष्ट जाति राजपूतों में गिनी जाती है, इसके अंतर्गत कई अन्य उपजातियां/ उपसमूह आते हैं जो यह प्रदर्शित करते हैं कि बिष्ट जाति किसी एक समूह से नहीं बल्कि कई अन्य जातियों से मिलकर बनी है। ये सभी जातियां कई वर्ष पूर्व अलग-अलग स्थानों से आयी और गढ़वाल में बस गयी।

32. बगड़वाल बिष्ट :- बगड़वाल बिष्ट जाति के लोग सिरमौर, हिमाचल से संवत 1519 में गढ़वाल आए और तत्पश्चात यहीं के निवासी हो गए। इनका प्रथम गढ़ बगोडी/ बगोड़ी गांव माना जाता है।

33. कफोला बिष्ट :- ये लोग यदुवंशी लोगों के वंशज माने जाते हैं, जो इतिहास में कम्पीला नामक स्थान से गढ़वाल में आए और फिर यहीं के मूल निवासी हो गए। इनकी थात पौड़ी गढ़वाल जिले की कफोलस्यूं पट्टी मानी जाती है।

34. चमोला बिष्ट :- पंवार वंशी चमोला बिष्ट जाति के लोग उज्जैन से संवत 1443 में गढ़वाल में आए। गढ़वाल के चमोली क्षेत्र में बसने के कारण ये चमोला बिष्ट कहलाए।

35. इड़वाल बिष्ट :- इन्हें परिहार वंशी माना जाता हैं। ये कि दिल्ली के नजदीक किसी अज्ञात स्थान से संवत 913 में गढ़वाल में आए और ईड़ गांव के निवासी होने के कारण इस नाम से प्रसिद्ध हुए।

36. संगेला/संगला बिष्ट :- संगेला/संगला बिष्ट जाति के लोग गुजरात क्षेत्र से संवत 1400 में गढ़वाल में आए।
37. मुलाणी बिष्ट :- मुलाणी बिष्ट लोगों को कैंत्यूरा वंश का वंशज माना जाता है। ये कुमाऊं क्षेत्र से संवत 1403 में गढ़वाल आए और मुलाणी गांव में बस गए।

38. धम्मादा बिष्ट :- ये चौहान वंश से सम्बंधित हैं। ये दिल्ली के मूल निवासी थे जो कि गढ़वाल में बस गए।

39. पडियार बिष्ट :- ये परिहार वंश के वंशज माने जाते हैं। ये धार क्षेत्र से संवत 1300 में गढ़वाल में आए।

40. साबलिया बिष्ट :- ये सूर्यवंशी वंश के वंशज और उपमन्यु गोत्र के लोग हैं कत्यूरियों की संतान माने जाते हैं। ये पहले उज्जैन से गढ़वाल की साबली पट्टी में आये और उसके बाद कुमाऊं गए। इसके अलावा तिल्ला बिष्ट, बछवाण बिष्ट, भरेला बिष्ट, हीत बिष्ट, सीला बिष्ट के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है।

भण्डारी जाति के राजपूत :- भण्डारी जाति के लोगों को राजपूत जाति के अधीन रखा जाता है।

41. काला भंडारी :- ये काली कुमाऊं के मूल निवासी माने जाते हैं।

42. पुंडीर भंडारी :- पुण्डीर वंशीय भण्डारी जाति के लोग मायापुर के मूल निवासी थे जो संवत 1700 में गढ़वाल आए।
इसके अतिरिक्त तेल भंडारी और सोन भंडारी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है।

नेगी जाति के राजपूत :-

43. पुण्डीर नेगी :- पुण्डीर नेगी संवत 1722 में सहारनपुर से आकर गढ़वाल में बसे। रतूड़ी जी के अनुसार, पृथ्वीराज रासो में ये दिल्ली के समीप के होने कहे गए हैं।

44. बगलाणा नेगी :- बगलाणा नेगी बागल क्षेत्र से संवत 1703 में गढ़वाल आए। इनका मुख्य गांव शूला माना जाता है।

45. खूंटी नेगी :- ये संवत 1113 में नगरकोट-कांगड़ा, हिमाचल से आकर गढ़वाल में बसे। गढ़वाल में इनका प्रथम गांव खूंटी गांव है।

46. सिपाही नेगी :- सिपाही नेगी संवत 1743 में नगरकोट-कांगड़ा, हिमाचल से गढ़वाल में आए। सिपाहियों में भारती होने से इनका नाम सिपाही नेगी पड़ा।

47. संगेला नेगी :- ये जाट राजपूत जाति के वंशज हैं। ये संवत 1769 में सहारनपुर से आकर गढ़वाल में बसे। संगीन रखने से ये संगेला नेगी कहलाए।

48. खड़खोला नेगी :- ये कैंत्यूरा जाति के वंशज मने जाते हैं। ये कुमाऊं से संवत 1169 में गढ़वाल आए यहां के खड़खोली नामक गांव में कलवाड़ी के थोकदार रहे। इसीलिए खड़खोली नाम से प्रचलित हुए।

49. सौंद नेगी :- इनकी पूर्व जाति (वंश) राणा है। ये गढ़वाल में कैलाखुरी से आए और गढ़वाल के सौंदाड़ी गांव में बसने के कारण सौंद नेगी के नाम से जाने गए।

50. भोटिया नेगी :- ये हूण राजपूत जाति के वंशज हैं जो हूण देश से आकर गढ़वाल में बसे।

51. पटूड़ा नेगी :- पटूड़ी गांव में बसने के कारण ये पटूड़ा नेगी कहलाए।

52. महरा/ म्वारा/ महर नेगी :- इनकी पूर्व जाति (वंश) गुर्जर राजपूत है। ये लंढौरा स्थान से आकर गढ़वाल में बसे।

53. बागड़ी/ बागुड़ी नेगी :- ये संवत 1417 में मायापुर स्थान से आकर गढ़वाल में बसे। बागड़ नामक स्थान से आने के कारण ये बागड़ी/ बागुड़ी नेगी कहलाए।

54. सिंह नेगी :- बेदी पूर्व जाति से सम्बद्ध सिंह नेगी  संवत 1700 में पंजाब से आकर गढ़वाल में बसे।

55. जम्बाल नेगी :- ये जम्मू से आकर गढ़वाल में बसे हैं।

56. रिखल्या/ रिखोला नेगी :- रिखल्या/ रिखोला राजपूत नेगी डोटी, नेपाल के रीखली गर्खा से आए और छंदों के आश्रय में रहे। रीखली गर्खा से आने के कारण ही इनका नाम रिखल्या/ रिखोला नेगी पड़ा।

57. पडियार नेगी :- ये परिहार वंश के वंशज है। जो संवत 1860 में दिल्ली के समीप से गढ़वाल में आए।

58. लोहवान नेगी :- इनकी पूर्व जाति (वंश) चौहान है। ये संवत 1035 में दिल्ली से आकर गढ़वाल के लोहबा परगने में बसे और यहीं के निवासी हो गए।

59. गगवाड़ी नेगी :- गगवाड़ी नेगी जाति के लोग संवत 1476 में मथुरा के समीप के क्षेत्र से आकर गढ़वाल के गगवाड़ी गांव में बसे।

60. चोपड़िया नेगी :- ये लोग संवत 1442 में हस्तिनापुर से आकर गढ़वाल के चोपड़ा गांव में बसे।

61. सरवाल नेगी :- सरवाल नेगी जाति के लोग संवत 1600 में पंजाब से आकर गढ़वाल में बसे।

62. घरकण्डयाल नेगी :- ये पांग, घुड़दौड़स्यूं के निवासी माने जाते हैं।

63. कुमयां नेगी :- ये कुमैं, काण्डा आदि गांवों में निवास करते हैं।

64. भाणा नेगी :- ये पटना के मूल निवासी हैं।

65. कोल्या नेगी :- ये जाति कुमाऊं से आकर गढ़वाल के कोल्ली गांव में बस गयी।

66. सौत्याल नेगी :- ये जाति डोटी, नेपाल से आकर गढ़वाल के सौती गांव में बस गयी।

67. चिन्तोला नेगी :- ये चिंतोलगढ़ के मूल निवासी हैं।

68. खडक्काड़ी नेगी :- ये मायापुर से आकर गढ़वाल में आकर बसे हैं।

69. बुलसाडा नेगी :- कैंत्यूरा पूर्व जाति के वंशज बुलसाडा नेगी कुमाऊं के मूल निवासी हैं।

इसके अतिरिक्त नीलकंठी नेगी, नेकी नेगी, जरदारी नेगी, हाथी नेगी, खत्री नेगी, मोंडा नेगी आदि के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है।

गुसाईं जाति के राजपूत

70. कंडारी गुसाईं :- कंडारी गुसाईं जाति के लोग मथुरा के समीप किसी स्थान से संवत 428 में गढ़वाल आए। इन्हें कंडारी गढ़ के ठाकुरी राजाओं के वंश की जाति माना जाता है।

71.  घुरदुड़ा गुसाईं :- घुरदुड़ा गुसाईं जाति के बारे में रतूड़ी जी लिखते हैं कि “ये लोग स्वयं को लगभग नवीं शताब्दी में गुजरात के मेहसाणा से आया हुआ मानते हैं। इनके मूलपुरुष का नाम चंद्रदेव घुरदेव बताया जाता है। गढ़वाल में एक पूरी पट्टी इनकी ठकुराई पट्टी है। कुमाऊं में ये लोग गढ़वाल से ही गए हैं।”

72. पटवाल गुसाईं :- पटवाल गुसाईं जाति के बारे में माना जाता है कि ये प्रयाग से संवत 1212 में गढ़वाल में आए। गढ़वाल के पाटा गांव में बसने से इनके नाम से ही गढ़वाल के एक पट्टी का नाम पटवाल स्यूं पड़ा।

73. रौथाण गुसाईं :- ये संवत 945 में रथभौं दिल्ली के समीप किसी अज्ञात स्थान से आकर गढ़वाल में बसे।

74. खाती गुसाईं :- पौड़ी गढ़वाल में खातस्यूं खाती गुसाईं जाति की थात की पट्टी मानी जाती है।

ठाकुर जाति के राजपूत

75. सजवाण ठाकुर :- महाराष्ट्र से आए मरहट्टा वंश के सजवाण ठाकुर जाति के लोग गढ़वाल में आए और यहीं के निवासी हो गए। ये प्राचीन ठाकुरी राजाओं की संतानें मानी जाती हैं।

76. मखलोगा ठाकुर :- पुण्डीर वंशीय मख्लोगा ठाकुर संवत 1403 में मायापुर से गढ़वाल के मखलोगी नामक गांव में आकर बसे और तत्पश्चात वहीं के निवासी हो गए।

77. तड्याल ठाकुर :- इनका प्रथम गांव तड़ी गांव बताया जाता है।

78. पयाल ठाकुर :- ये कुरुवंशी वंश से सम्बद्ध हैं। ये हस्तिनापुर से आकर गढ़वाल के पयाल गांव में बसे।

79. राणा ठाकुर :- ये सूर्यवंशी वंश वंशज हैं जो कि संवत 1405 में चितौड़ से गढ़वाल में आकर बसे।

अन्य राजपूत

80. राणा :- नागवंशी वंश से सम्बंधित राणा राजपूत जाति के लोग हूण देश से आकर गढ़वाल में बसे। इन्हें गढ़वाल के प्राचीन निवासियों में से एक माना जाता है।

81. कठैत :- कटोच वंश के वंशज कठैत जाति के लोग कांगड़ा, हिमाचल से आकर गढ़वाल में बस गए।

82. वेदी खत्री :- ये खत्री वंश के वंशज हैं जो संवत 1700 में नेपाल से गढ़वाल आए।

83. पजाई :- पजाई राजपूतों को कुमाऊं का मूल निवासी माना जाता है।

84. रांगड़़ :- ये रांगड़़ वंश के वंशज हैं जो सहारनुपर से गढ़वाल में आकर बस गए।

85. कैंत्यूरा :- ये कैंत्यूरा वंश के हैं जो कुमाऊं से गढ़वाल में आए।

86. नकोटी :- ये नगरकोटी वंश के वंशज हैं जो नगरकोट, कांगड़ा से गढ़वाल में आए। गढ़वाल के नकोट गांव में बसने के कारण ये नकोटी कहलाए।

87. कमीण :- इनके बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।

88. कुरमणी :- इनके मूलपुरुष का नाम कुर्म था संभवतः उनके नाम से ही ये कुरमणी कहलाए।

89. धमादा :- इन्हें पुराने गढ़ाधीश की संतानें माना जाता हैं।

90. कंडियाल :- इनका प्रथम गांव कांडी था इसीलिए ये कंडियाल कहलाए।

91. बैडोगा :- बैडोगा जाति के लोगों का प्रथम गांव गढ़वाल का बैडोगी गांव माना जाता है।

92. मुखमाल :- इनका प्रथम गांव मुखवा या मुखेम गांव माना जाता है।

93. थपल्याल :- ये थापली गांव, चांदपुर में बसने के कारण थ्पल्याल कहलाए।

94. डंगवाल :- डंगवाल जाति के राजपूत गढ़वाल के डांग गांव के निवासी हैं।

95. मेहता :- यह जाति दरअसल वैश्य है जो कि संवत 1590 में पानीपत से गढ़वाल आयी।

96. रणौत :- इसे सिसोदियों की एक शाखा माना जाता है जो कि राजपुताना से गढ़वाल में आयी।

97. रौछेला :- ये जाति दिल्ली से गढ़वाल में आयी।

98. जस्कोटी :- ये जाति सहारनपुर, उ.प्र. से आकर गढ़वाल के जसकोट नामक गांव में आकर बस गयी।

99. दोरयाल :- ये द्वाराहाट, कुमाऊं के निवासी माने जाते हैं।

100. मयाल :- ये कुमाऊं के मूल निवासी माने जाते हैं।

-----------------------------------------------------
सन्दर्भ :-
1. गढ़वाल का इतिहास - प. हरिकृष्ण रतूड़ी, संपा. - डॉ. यशवंत सिंह कठोच
2. गढ़वाली भाषा और उसका लोकसाहित्य - डॉ. जनार्दन प्रसाद काला
3. गढ़वाल हिमालय : इतिहास, संस्कृति, यात्रा एवं पर्यटन  - रमाकांत बेंजवाल
-----------------------------------------------------
संकलनकर्ता - नवीन चन्द्र नौटियाल
शोधार्थी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
मूल निवासी- गांव - रखूण, पट्टी - सितोनस्यूं, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड)
वर्तमान निवासी- जनकपुरी, नई दिल्ली।।

07 September, 2019

अरे! यु खाणू बि क्य- क्य नि कराणू! (गढ़वाली व्यंग्य)

नरेन्द्र कठैत // 

खाणू जैका हथ मा आणू, दुन्या मा वी राणू। अर जैका हथ मा खाणू नि आणू, वू रोणू, गंगजाणू। पर जु खाणू, वू खैकि तागत अजमाणू, खयां मा बि हौर हत्याणू, बच्यूं-खुच्यूं गंमजाणू, गबदाणू, खपाणू, मर्जी औणी हौर्यूं खुणी बि लि जाणू। कबि इन बि सुण्ण मा आणू कि मनखी खाणू त खूब खाणू पर वेकु खयूं झणी कख जाणू? अर कबि बल खाणू त खाण चाणू पर खाणू वेका गौळा उंद नि जाणू। कबि इन बि ह्वे जाणू कि खलौण वळा तैं अण्दाज हि नि आणू किलैकि खाण वळो त मिस्ये जाणू पर कथगा खाण न वू बताणू न बिंगाणू। इन मा यि होणू कि खाणू बणौण वळो थकी चूर ह्वे जाणू पर खाण वळो  खाब खताड़ी रै जाणू। अर कबि इन बि होणू कि खै-खैकि वेकि धीत नी भ्वरेणी, वू बल अधीतू रै जाणू। 

बक्किबात खयां खाणू मा बि बल वेकु च्यूं खाणू ज्यू जाणू।  कबि  खाणू त खूब ठूस ठासी खुब्याणू पर वे पचाण हि नि आणू। तब बल उंद-उब होणू। कति दौं त जथगी दौं खाणू उथगी दौं भैर उक्याणू। कबि खै-खैकि अस्यो-पस्यो, पीड़न जख-तख लमडाणू। आतुरि मा प्वटगी पर कबि कडु तेल अर कबि चुल्लौ खारु लगाणू। भैर-भित्र दिवाल्यूं पकड़ि-पकड़ी बड़ि मुस्कल मा आणू-जाणू। पर मजाल क्या कि कक्खि उठुण-बैठण मा वे घत्त आणू। जब बि कबि वे क्वी पुछणू-तछणू -दिदा! कनू च सरेल? क्या च होणू? जबाब देंद दौं सब्द वेका गौळों  पर रै जाणू। ब्वनू क्य इन बोला गबळाणू। गबळ्यूं कैकि समझ मा बि नि आणू। होंद-कर्द तैं कुपथन वू घपनाघोर बिमार प्वड़ जाणू। तुमारु ले बोल! कख छौ तब चौबिस घड़ि बस खाणू! खाणू! खाणू!

क्य ह्वे? कन ह्वे? क्य होणू?
बिमार च बल! इन सुण्ण मा आणू। हे वीं! तू सुणणी छै! चुची! सुख मा जावा चा नि जावा पर दुख मा खबर कनू जरुर जाणू। यि सोची तैं खबर लेणू हर क्वी वेका ओर-पोर गर्र कट्ठा होणू। छुटू-बडू वे पर अपड़ि सलाऽ अजमाणू। अलाणू डागडर, बैद फलोणू, ज्वी मिलणू वे मा हि वू अपड़ि नब्ज-नाड़ी दिखाणू। कक्खि बल वेकु छंद प्वड़णू, कक्खि समझ मा हि नी आणू। पर मर्द कु बच्चा वू बि चुप कख राणू। आपस मित्र्वी सौ-सलाह पर दवै मंगाणू, किस्म-किस्मै जड़ि-बोट्यूं घोटणू, तौं चबाणू, थैंचणू, खाणू। पर इथगा पर्बि वे बिस्वास जमा नि होणू। खट्टी-मिट्ठी दवयूंन वे जादा हि बैम होणू। पीठ पैथर हर क्वी ब्वनू- वे तैं कैन समझाणू!  वू त अपड़ा बुबै बि नि माणू। अरे फूका क्य! हमारा बुबो क्य जाणू! परेज मा त वेन अफु राणू। हमारि भौं वू खूब होंदू चा नि होंदू। तुम हि बतावा दवै कु असर क्य चटचटाक होंदू? सुद्दि क्या! बस एक ही काम जाणी खाणू! खाणू! खाणू!

ठीक ब्वना छन लोग, वे तैं कैन समझाणू। स्यो च बिराणी मत्यू बक्यों मा बि जाणू। भित्र देबी-द्यब्तौं कु ब्यांरु वू भैर अला-बला मा सारु खुज्याणू। झणी कै-कैकि धात-जैकार, छौळ-झपेटू पुजाणू। मी छौं! मी छौं! जैकु नौ कबि नि सूणी वू बि नाचि-नूची, हमारा मुंड मा खुटू धर जाणू। 

अरे दिदा! बक्यो काम क्या? सीधी सि बात बकै लगाणू। वेन बि झाड़-झपोड़ मा पैथर क्यां खुणी राणू? कुछ खाण वेन, कुछ खडयाणू। ज्वी आणू वी मजा मा पान चबाणू। बीड़ी, सिगरेटौ धुंवा उड़ाणू। लगोठ्या-बोगड्या, काळा सफेद मुरगौं कटवाणू। अरे बक्या बुबौ क्य जाणू। वेका हि सोरा-भार्यूं अर चच्ची-बोड्यूं कि घात उबडाणू। क्वी भलू माणू चा बुरु, सुरु बिटि आखिर तक हमतैं त एक हि ऐटम नजर आणू। खाणू! खाणू खाणू! 

अर सुणा त सहि ! यि बि सुण्ण मा आणू कि बक्यो इलाज बि वेकि समझ मा नि आणू। अब मनै गेड़ खुलवाणू वू कति जोस्यूं मा आणू-जाणू। पर जोस्यूं का पतड़ौं मा बि बल वेकि किस्मत मा खाणू हि खाणू आणू। हर क्वी पतडु यि बताणू कि वेन सौ साल ऐथर तक जाणू, खूब होणू अर खूब खाणू राणू। यिं बात सूणी तैं वेकु एक पौ हौर खून बढ़ जाणू। मालु म नि झणी कै द्यब्ते किरपन वू टकटुकु होणू। अर फेर एक हि रट लगाणू- खाणू! खाणू! खाणू। 

ऐंचै लैन पढ़ी तैं त यी लगणू कि मनखी सर्रा जिन्नगी बस खाणू हि खाणू!  पर जैकि किस्मत मा जथगा ह्वलू वेन उथगि त खाणू। अमर त न कैन होणू न कैन राणू। इलै कबि इन बि होणू कि क्वी मनखी खूब कमाणू, जोड़-जाड़ जाणू पर अपड़ि उमर खै नि जाणू। 

अर कबि इन बि दिख्ण मा आणू कि जनि गफ्फा वेका गिच्चा पर जाणू तबार्यूं वे खुणी फट जमराजौ बुलावा ऐ जाणू। खाणू छट्ट छुटी तैं वेका गौळै  पर रै जाणू। तबारि देखी इन लगणू जन अन्न भ्वर्दि दौं क्वी माणू बीच मा हि पट्ट बंद ह्वे जाणू। अर कति दौं इन बि होणू कि मनखी खाणू त खाण चाणू पर वेकू कंठ ऐन मौका पर म्वर जाणू। आंखा ताड़ा, हथ-खुट्टा ऐड़ा, सर्रा सरेलौ खून चस्स चुस्येकि वू मड़के जाणू। सीन देखी समणा वळो  हकदक रै जाणू। तथगा पर्बि बि अब क्य होणू! जु कबि स्वचेंदू नि वू ह्वे जाणू। ब्वल्द-बच्योंद, हिटदा -हिटदि बि मनखी उखरै जाणू। फिर्यूं रै जाणू बिचारौ तैं खाणू!

हे रां! जाण वळों  बिचारु त जमराजा पैथर झणी कख जाणू पर बाद मा वेकु सरु कमायूं धमायूं क्वी न क्वी कन नि खाणू। तुमारु ले बोल! जाण वळों त चल्गी आखिर कब तक रोणू-बिबलाणू? बच्यां छन जु वून कन नि राणू, कन नि खाणू। 

पर हमारि समझ मा यू किलै नि आणू कि जु मनखी खाणू वू बि जाणू अर जु नि खाणू वू बि नि राणू। यिं बात तैं ज्ञानी-ध्यानी हर क्वी इन बतलाणू कि आणू -जाणू न कबि मनख्या बस मा छौ न कबि  मनख्या हथ मा राणू। त क्य एक ही ऐटम च ज्यां का पैथर मनखी रगर्याणू। वो च - खाणू! खाणू अर खाणू!

खाणू! खाणू अर खाणू! पर इन नि स्वच्यां मनखी अपड़ो धरम-धुरम नि निभाणू। जरा बता! रात-दिन लंगर वू क्यां खुणी लगाणू? बड़ा-बड़ा मात्मौं, गरीब गुरबौं, छुटा नौनौं, कन्यों जिमाणू। पर स्वच्ण वळि  बात त या च कि जु खाणू वू खलाणू क्य वे तैं वू उपजाणू? लंगर त बल वू रुप्यों का बल पर च लगाणू। सुणणू तैं त यू बि सुण्ण मा आणू  कि  वू बि कै हैंकै मूणी मा च खाणू।  कौन सि वू सबि भूखा, नंगौं पकड़ि-पकड़ी लाणू। वेन त दुन्या तैं लंगर लगांयू दिखाणू। वेकि भौं क्वी खाणू चा नि खाणू।

खाणू बि हर कैका भाग मा कख राणू? जै नि मिलणू खाणू वू आज बि भूखन म्वर जाणू। भूख क्या होंदि वां तैं त भूखू हि जाणू कि भूख मिट्ठी होंदि कि खाणू? पूछा कबि कै भूखा तैं? पुछुण मा क्या जाणू? जबाब मिल जालू- खाणू त आंख्यूं का ऐथर घुमणू। मिल जालू अगर त भूखौं रोस खाणन दब जाणू। भूख मिठी कि खट्टी वीं दिखणू को जाणू?
यनैकि कि भूख सि भौत बड़ि चीज च - खाणू!

खाणू! खाणू! खाणू! पर बरतै पैली सर्त च भूखू राणू, खाणू नि खाणू। नहे-धुये कि सीधू मंदिर जाणू। ध्यान कनू य घंटी बजाणू। पर छैं च क्वी जु यिं सर्त निभाणू? कुजाणी-कुजाणी तब तांकि परमेसुर हि जाणू कु खाणू अर कु नि खाणू? 
एक दिन खाणू खांद-खांद क्वी छौ समझाणू- भुला! मैमान बणी कबि कैका यख नि जाणू।
हमुन जबाब दे -किलै जी मैमान त भगवान होंदू।
-भगवान वो अपड़ि मौ होंदू। 
-अरे एक-द्वी दिन खलौण मा क्य जांदू? 
-हैंका दिन त रुसाड़ा मा बि हर क्वी भांडू एक हि ढौळ लगांदू।
-क्या ढौळ लगांदू?
-कि स्यू किलै नि जाणू? स्यू किलै नि जाणू?
-सूणी तैं क्य वू चल जाणू?
-बिल्कुल जाणू।
-अर खाणू?
-अगनै जख वेकि किस्मत ह्वलि वख ह्वलू वू खाणू।

हरि ओम ! हरि ओम ! 
-नमो नारैण! नमो नमो!
-मात्मा जी क्या च होणू?
-बच्चा! क्य होणू? हांडी चढ़ीं च। चेला खाणू बणोणू।
-मात्मा जी! एक सवाल मी मनख्यूं कि तिरपां बिटि पूछुण चाणू! अगर तुमारि इजाजत मिलू।
-पूछो बच्चा! जो पुछणा है पूछो?
-मात्मा जी! सवाल यो च कि मनखी जब यिं धरती मा आणू वू खाणू हि किलै खुज्याणू? वू पाणी प्येकि य हवा खैकि किलै नि रै जाणू?
-बच्चा जब मनखी खाणू च तब हि त वू बच्यूं राणू।
-बच्यूं क्यां खुणी राणू?
-हमारु क्य हमतैं त कुछ  न कुछ मिल हि जाणू। पर वे पूछादि जु आखिर तक खाणै आस मा भूखन म्वर जाणू।
-वू किलै म्वर जाणू?
-इलैकि य त खाणू नि राणू य वू खाण त चाणू पर वेका पेट मा खाणू नि जाणू। 
-अच्छा एक बात हौर बता मनखी बच्यूं राणू तब बि खाणू अर नि बच्यूं राणू तब बि वेका ऐथर खाणू हि किलै आणू?
-किलैकि  एक ही चीज च जु मनखी  बचाणू। वेकु नौ च- खाणू!  देखली जोगी ह्वेकि बि हमुन मंगणू जाणू। क्यांकू?
-समझ ग्यों! बस-बस समझ ग्यों - खाणू!

खूब छयां भैजी! खूब चलणी च गिरस्थी? 
-बस सौब प्रभ्वी किरपा च।
-भैजी एक बात बतावा दि! मनखी खाणू तैं आणू अर म्वरु न इलै वू खाणू। मलब यि कि मनखी फकत टिक्णू तैं खाणू। बक्कि दुन्या मा वू क्य फरकाणू?
-कन क्य फरकाणू? वेकि कुटुम्बदारि क्य क्वी हौरि खलाणू?
-कुटुम्बदारि तैं बि त वू खाणू हि त खलाणू।
-नौनौ अढ़ाणू-पढ़ाणू!
-नौनौ तैं बि वू इलै हि त अढ़ाणू-पढ़ाणू कि वून अगनै जैकि कनक्वे खाणू। तुमतैं मालुम तन मा क्य होणू?
-क्य होणू?
-तन मा यु होणू कि अढ़ायूं-पढ़ायूं त सौब काम ऐ जाणू पर कुटळो चलाणू, गैंती-सबळो  उठाणू, घौण बजाणू, हौळ  लगाणू  कै तैं बि नि आणू। 
-देखा जी  क्वी आणू चा जाणू, कैका बांठा क्वी क्य लिजाणू।
-पर सवाल चो च कि मनख्यू खयूं क्य काम आणू?
-जब मनखी खाणू तब हि त वो अपड़ा हथ खुटौं हिलाणू। पुछणै त वे पूछादि जु सुदिद खड़ा-खड़ी खाणू पचाणू।
-को च वू सुदिद खड़ा-खड़ी  खाणू पचाणू?
-जै सुदिद खाणू मिल जाणू?
-जन्कि इबारि तुमारि नजर मा कू आणू?
-जन्कि स्यू डाळू  ! 
-डाळू  ! वू क्या खाणू?
-अब तांकि तुम जाणा य स्यू डाळू  जाणू।

डाळू  तड़तुडु  झपन्याळु खडु । सोची अगर ये कुछ पुछलू त कुछ न कुछ कन नि समझालू। भै! य त वू कुछ ब्वलू य चुप रालू। क्या पता अपड़ि फौंकी-फांक्यूं हिलालू। सेर-बाघ जन धम्म खाणू त नि आलू। नजीक जैकी डाळू  पूछी- दिदा! सच-सच बतौ तू क्य छै खाणू?

-खाणू! त्यरा बुल्यां पर त मी हैंसणू बि नि आणू। सच बतलौं! मी बुरै कि मौ छौं खाणू! अरे! दिखणां नि छै सर्रा जिन्नगि भर मी एक हि जगा मा रै जाणू। न म्यरु कक्खि आणू न जाणू। जु भुयां माटा मा छुट जाणू वू म्यरु खाणू। वा रै मनख्या लड़ीक वे झड्या-तड़या पर्बि तू नजर लगाणू। आखिर ये मनखिन य दुन्या लेकि कख जाणू?  

-हमतैं परमेसुरा खुटा दियां छन जी! हमुन त जख मर्जी आलि तख जाणू। पर तू बतौ एक हि जगा मा बैठि-बैठी त्यरु खयूं क्य काम आणू?

-वा रे मनखी! यि बात तैं तू मी पुछणू? तू त म्वरि तैं बि कुछ  काम नि छै आणू? क्वी त्वे खडै जाणू, क्वी फूक जाणू। एक दिन बि क्वी त्वे भित्र नि रखणू। म्यरु त ज्यूंदा मा बि अर म्वरि बि लीसू-छिलबिटू तक काम आणू। पर त्वे कैन समझाणू। तू त ज्यूंदा मा बि मी चुंगन्याणू, म्यरा फल बीज छै खाणू। म्यरा धोरा धरम बैठी थौ बिसाणू, ठण्डी हवा खाणू । फिर्बि त्यरि हथ्यूं कु चैन नी, जख मर्जी औणी तख छै कच्याणू। अर कति दौं तू इथगा पर्बि चुप नि होणू। मी पर धम्म आग छै पिलचै जाणू। न हथ, न खुट्टा, आखिर मिन कख जाणू? त्वी बतौ क्य छौं मी त्यरु खाणू? इलै हि त ब्वलेंदू कि तू धरती मा बोझ बढ़ाणु छै आणू। 

-त धरती मा क्य मनखिन नि राणू?
-किलै नि राणू! पर य बात त्वे तैं कैन समझाणू कि जथगा मिलणू च उथगी मा खुस राणू। आखिर मा सौब इक्खि छुट जाणू। कुछ नि लिजाणू। जन नंगू आण तनि नंगू जाणू। बस एक ऐटम च बल जु त्यरा बांठौ रै जाणू।

-क्या रै जाणू?
-खाणू!

(लेखक गढ़वाली भाषा के सशक्त व्यंग्यकार हैं।)

05 September, 2019

45 बर्षों के बाद निकलेगी मां अनुसूया की देवरा यात्रा

https://www.bolpahadi.in/2019/09/45-years-later-anusuya-devi-devra-yatra.html
- दशहरे के दिन से होगी देवरा यात्रा की शुरूआत 
रजपाल बिष्ट // 
जनपद चमोली की मंडल घाटी में पुत्रदायिनी के रूप में विख्यात सती माता अनुसूया देवी की देवरा यात्रा की तैयारियां शुरू हो गई हैं। इसवर्ष 45 वर्ष बाद मां भगवती की उत्सव डोली देवरा यात्रा पर निकलेगी। मां भगवती अनुसूया देवी 1973-74 के बाद देवरा यात्रा पर निकल रही हैं। धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय परंपराओं में माता अनुसुया को पुत्रदायिनी माना गया है। 

45 वर्ष बाद शुरू होने वाली देवरा यात्रा का निर्णय अनुसूया मंदिर ट्रस्ट की बैठक में लिया गया। माता की मंडल घाटी के खल्ला गांव स्थित उत्सव डोली विजयादशमी के पर्व से 9 माह के लिए देवरा यात्रा पर निकलेगी। ट्रस्ट के अध्यक्ष भजन सिंह झिंक्वाण की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में यात्रा का मुहूर्त निकाला गया। 8 अक्टूवर को विजयादशमी पर्व पर देव डोली गर्भगृह से अनुसूया आश्रम पहुंचेगी। आश्रम में पूजा अर्चना के बाद देव डोली वहां से विभिन्न क्षेत्रों खासकर ध्याणियों को मिलने उनके ससुराली गांवों की यात्रा पर निकलेगी। इस दौरान देव डोली केदारनाथ, बदरीनाथ की यात्रा पर भी जाएगी। देवरा यात्रा के बाद मंडल में महाकुंभ का भी आयोजन होगा। इस यात्रा में खल्ला, मंडल, सिरोली, कोटेश्वर, बणद्वारा, बैरागना, भदाकोटी, कुनकुली, मंडोली तथा अनुसूया गांव के लोगों की सामूहिक भागीदारी रहेगी। 

इससे पूर्व 29 सितंबर से 8 अक्टूवर सिंह खल्ला गांव में मां अनुसूया देवी का पाठ आयोजित किया जाएगा। इसमें मंडल घाटी के नौ गांवों के लोग भाग लेंगे। देवरा यात्रा के लिए बनाई गई समिति के पदाधिकारियों ने यात्रा के बेहतर संचालन का संकल्प लिया। यह समिति धार्मिक कार्यों में योगदान देगी। करीब 45 वर्षों बाद मां अनुसूया देवी की देवरा यात्रा को लेकर हर तरफ उत्साह बना हुआ है। इस दौरान मां अनुसूया देवी की पूजा अर्चना कर देवरा यात्रा के बेहतर संचालन की मनौती मांगी गई।

इस दौरान ट्रस्ट के अध्यक्ष भजन सिंह झिंक्वाण ने महाप्रबंधक भगत सिंह बिष्ट, सहायक महाप्रबंधक राजेंद्र सिंह नेगी व दुर्गा प्रसाद सेमवाल, प्रबंधक महाबीर सिंह बिष्ट व हरेंद्र बिष्ट, सचिव देवेंद्र बत्र्वाल, सहसचिव रविंद्र सिंह नेगी, कोषाध्यक्ष कुंवर सिंह नेगी, सहायक कोषाध्यक्ष धीर सिंह बिष्ट, दर्शन सिंह झिंक्वाण, शिव सिंह रावत, महेंद्र सिंह राणा, सर्वेंद्र सिंह बिष्ट, योगेंद्र सिंह बिष्ट, गंगा सिंह बर्त्वाल, संतोष राणा को संकल्प दिलाया। 

वहीं देवरा यात्रा की धार्मिक मंडली में अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी को संरक्षक, चंद्रशेखर तिवारी को अध्यक्ष, जगदीश प्रसाद सेमवाल को उपाध्यक्ष, प्रदीप सेमवाल को सचिव तथा भगवती प्रसाद त्रिपाठी को सदस्य बनाया गया। कार्यक्रम में ट्रस्ट उपाध्यक्ष विनोद सिंह राणा, सचिव दिलवर सिंह बिष्ट, कोषाध्यक्ष बीरेंद्र सिंह राणा, अवतार सिंह रावत, दिगंबर सिंह बिष्ट, योगेंद्र सिंह, मनवीर सिंह, अरविंद सेमवाल, सुनील सिंह बिष्ट, पुजारी दिव्यांशु सेमवाल, पुरोहित चंद्र शेखर तिवारी मौजूद रहे। 

लेखक- रजपाल बिष्ट वरिष्ठ पत्रकार हैं। 
प्रतीकात्मक फ़ोटो - गूगल

01 September, 2019

गढ़वाल में क्या है ब्राह्मण जातियों का इतिहास- (भाग 1)

https://www.bolpahadi.in/
संकलन - नवीन नौटियाल // 

उत्तराखंड के गढ़वाल (मंडल) परिक्षेत्र में अनेकों जातियों का निवास है। उनका इतिहास हमारी धरोहर है। जरूरी है कि आज और आने वाले कल में नई पीढ़ियां भी इससे वाकिफ हों, यह प्रयास है। यहा निवासरत जातियां कैसे यहां बसे, कहां से और कब यहां आए, इन्हीं सब बिन्दुओं को इतिहास की पूर्व प्रकाशित पुस्तकों से संदर्भ सहित संकलित किया जा रहा है। इस शृंखला के पहले भाग (भाग- 01) में आइए जानते हैं गढ़वाल में निवास कर रही ब्राह्मण जातियों के विषय में- 

ब्राह्मण :- गढ़वाल में निवास करने वाली ब्राह्मण जातियों के बारे में यह माना जाता है कि 8वीं - 10वीं शताब्दी के मध्य में ये लोग अलग-अलग मैदानी भागों से आकर यहां बसे और यहीं के रैबासी (निवासी) हो गए। गढ़वाल में प्राचीन समय से ब्राह्मणों के तीन वर्ग हैं। इतिहासकारों ने उन्हें सरोला, निरोला (नानागोत्री या हसली) तथा गंगाड़ी नाम दिए हैं। राहुल सांकृत्यायन यहां के ब्राह्मणों को सरोला, गंगाड़ी, दुमागी व देवप्रयागी चार श्रेणियों में बांटते हैं। गढ़वाल की ब्राह्मण जातियों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है -

(अ) सरोला ब्राह्मण :- इसके अंतर्गत वे ब्राह्मण जातियां आती हैं जिनका मुख्य काम शादी-विवाह व अन्य शुभ-अवसरों पर सम्पूर्ण गांव-कुटुंब-भयात के लिए भात पकाना (खाना पकाना) था। इसीलिए इन्हें सरोला कहा जाता है। सरोला ब्राह्मण वे ब्राह्मण हैं जिन्हें प्राचीन समय में चांदपुर गढ़ी के राजा ने रसोई के रूप में नियुक्त किया था। ‘सर’ का सरोला ‘गाड’ का गंगाड़ी। इस उक्ति के अनुसार ऊंचे स्थानों पर रहने वाले ब्राह्मण सरोला तथा नदी घाटी के निवासी ब्राह्मणों को गंगाड़ी कहा जाने लगा। आरम्भ में सरोलों की बारह जातियां ही थीं। कहा जाता है कि नौटियालों का पूर्व पुरुष जो नौटी गांव में बसा था, गढ़ नरेशों के पूर्वज कनकपाल के साथ गढ़वाल में आया था।

1. नौटियाल :- संवत 945 में नौटियाल जाति के सरोला लोग धार मालवा से राजा कनकपाल के साथ आकर तल्ली चांदपुर के नौटी गांव में बस गए। नौटियाल जाति के लोगों के बसने के कारण ही इस गांव का नाम नौटी गांव पड़ा। नौटियाल जाति के वंशजों का आरम्भ इसी गांव से माना जाता है। जो कि राजा कनकपाल के साथ आयी थी। ढंगाण, पल्याल, मंजखोला, गजल्डी, चान्दपुरी, बौसोली नामक छह जाति संज्ञा इसी एक जाति की शाखा हैं। 

2. सेमल्टी :- इतिहासकार पं हरिकृष्ण रतूड़ी जी के अनुसार, इनके आदि पुरुष संवत 965 में वीरभूम, बंगाल से गढ़वाल के सेमल्टा गांव में आकर बसे थे। सेमल्टा गांव के निवासी होने के कारण ये सेमल्टी कहलाए।

3. मैटवाणी :- गढ़वाली आद्य गौड़ ब्राह्मण मैटवाणी गौड़ देश छखात, बंगाल से संवत 975 में गढ़वाल चांदपुर गढ़ी के मैटवाणा नामक गांव में आकर बसे। इस जाति के मूल पुरुष रूपचंद त्र्यम्बक थे।

4. गैरोला :- आद्य गौड़ सरोला ब्राह्मण गैरोला जाति के लोगों का पैतृक गांव चांदपुर में माना जाता है। इनके आदि पुरुष जयानन्द और विजयानन्द संवत 972 में गैरोली गांव में आकर बसे थे। इसी कारण ये गैरोला कहलाए।

5. चमोली :-  मूलरूप से सरोला द्रविड़ ब्राह्मण हैं, जो रामनाथ विल्हित नामक स्थान से संवत 924 में आकर गढ़वाल के चांदपुर परगने के चमोली नामक गांव में आकर बसे। यह जाति सरोलाओं में प्रमुख मानी जाती है और ‘बारह- थोकी’ समुदाय का अंग है। नंदादेवी राजजात यात्रा में इस जाति के लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

6. डिमरी :- डिमरी ब्राह्मण दक्षिण भारत के द्रविड़ ब्राह्मण माने जाते हैं। इनके मूल पुरुष राजेन्द्र और बलभद्र संतोली, कर्नाटक से आकर गढ़वाल में चांदपुर के डिम्मर गांव में आकर बस गए थे, जिसके फलस्वरूप ये डिमरी कहलाए।

7. थपलियाल :- संवत 980 में थपलियाल सरोला गौड़ ब्राह्मण जाति के लोग चांदपुर के थापली नामक गांव में आकर बस गए। थपलियाल जाति के लोग चांदपुर गढ़ी के अलावा देवलगढ़, श्रीनगर और टिहरी में भी प्रसिद्ध रहे हैं। 

8. सेमवाल :- आद्य गौड़ सरोला ब्राह्मण सेमवाल संवत 980 में वीरभूम, बंगाल से गढ़वाल के सेम गांव में आकर बसे और फिर यहीं के निवासी हो गए। इनके मूल पुरुष प्रभाकर और निरंजन थे।

9. बिजल्वाण :- गौड़ ब्राह्मण बिजल्वाण जाति के आदि पुरुष बिज्जू नामक व्यक्ति थे। जो संवत 1100 में वीरभूम, बंगाल से आकर गढ़वाल में बसे थे। संभवतः उन्हीं के नाम पर ही इस जाति का नाम बिजल्वाण पड़ा। 

10. लखेड़ा :- आद्य गौड़ सरोला ब्राह्मण लखेड़ा जाति के मूल पुरुष नारद और भानुवीर संवत 1117 में  प. बंगाल के वीरभूम से आकर गढ़वाल के लखेड़ी नामक गांव में आकर बसे। 

11. खण्डूड़ी :- गढ़वाल में सरोलाओं के बारह- थोकी समुदाय में से एक ब्राह्मण जाति खंडूड़ी मूलतः गौड़ ब्राह्मण जाति है। जिनका गढ़वाल के खंदूड़ा गांव में आगमन संवत 945 में वीरभूम बंगाल से हुआ। 

12. कोटियाल/ कोठियाल :- गौड़ ब्राह्मण कोटियाल/ कोठियाल गढ़वाल के सरोला जाति की एक प्रमुख जाति है। जो चांदपुर के कोटी गांव मैं आकर बसी थी और यहां कोटियाल अथवा कोठियाल नाम से प्रसिद्ध हुई। 

13. मैराव के जोशी :- ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण कुमाऊं से गढ़वाल में आकर बसे और यहीं के निवासी हो गए। 

14. रतूड़ी :- इस जाति को सरोला समुदाय की प्रमुख जाति माना जाता है। यह आद्य गौड़ ब्राह्मण जाति गौड़ देश से संवत 980 में गढ़वाल में आयी और चांदपुर के समीप रतुड़ा गांव में बस गयी। टिहरी के राजा के राजदरबार में वजीर पंडित रहे प. हरिकृष्ण रतूड़ी को सर्वप्रथम गढ़वाल का प्रामाणिक इतिहास लिखने का श्रेय भी जाता है।

15. नवानी :- इनकी पूर्व जाति सती थी और ये संवत 980 में गुजरात से गढ़वाल के नवन गांव में आकर बसे जिसके कारण इस जाति का नाम नवानी पड़ा।

16. हटवाल :- गौड़ ब्राह्मण हटवाल वीरभूम, बंगाल से 1059 संवत में गढ़वाल के हाटगांव में आकर बसे जिसके कारण ये हटवाल कहलाए। इनके मूल पुरुष सुदर्शन और विश्वैश्वर थे।  

17. सती :- गढ़वाल की ये सरोला जाति गढ़वाल में गुजरात से आई और चांदपुर गढ़ी में बसी है। ब्राह्मण जाति नवानी इस जाति की एक उप-शाखा है। सती जाति के लोग गढ़वाल के अलावा कुमाऊं में भी हैं।

18. कंडवाल :- ये मूलतः सरोला ब्राह्मण हैं, जो गढ़वाल के कांडा गांव में बसने से कंडवाल कहलायी। कंडवाल जाति के लोग कुमाऊं के कांडई नामक गांव से चांदपुर परगने में आकर बसे थे। 

(ब) गंगाड़ी ब्राह्मण :- इसके अंतर्गत उन ब्राह्मण जातियों को रखा जाता है जिनकी व्यवहारिकता का क्षेत्र केवल अपनी बिरादरी और अपने सगे-सम्बंधियों या इसके अतिरिक्त कुछ विशेष जातियों तक ही सीमित होता है। पं. रतूड़ी जी का मानना है कि सरोला और गंगाड़ी ब्राह्मण वही ब्राह्मण हैं जिनके मूल पुरुष इस देश के आदिम निवासियों में नहीं थे। बल्कि वे लोग क्रमशः आठवीं या नवीं शताब्दी से और उसके पश्चात भी इस देश में आकर बसे, और बसते रहे। 

नानागोत्री या खस ब्राह्मण गढ़वाल के आदिम निवासी और नवागन्तुक लोगों की मिली-जुली संतान पायी जाती है, जिसके साक्षी रूप उनके आचार-विचार विद्यमान हैं, जो अब भी उनके बीच उसी तरह पाये जाते हैं। गंगाड़ी और सरोला ब्राह्मणों के गोत्र भी एक हैं और धार्मिक और लौकिक रिवाज भी एक हैं। केवल भेद इतना है कि सरोला जाति का पकाया हुआ दाल चावल सब जातियां खा लेती हैं, जबकि गंगाड़ी ब्राह्मणों का पकाया हुआ दाल चावल उनकी रिश्तेदारी में ही चलता है।  

1. बुधाणा/बहुगुणा :-  गढ़वाल में गंगाड़ी ब्राह्मणों में प्रमुख आद्यगौड़ ब्राह्मण बहुगुणा जाति सम्वत 980 में गौड़ बंगाल से गढ़वाल के बुघाणी नामक गांव में आकार बसी। बुघाणी गांव में बसने के कारण ये बहुगुणा कहलाए। बहुगुणा जाति को चौथोकी समुदाय’ (डोभाल, बहुगुणा, डंगवाल और उनियाल) के अंर्तगत रखा जाता है।

2. डंगवाल :- डंगवाल जाति के द्रविड़ मूल के गंगाड़ी ब्राह्मण संवत 982 में संतोली, कर्नाटक से डांग गांव में बसे थे। इनके मूल पुरुष धरणीधर थे।

3.  डोभाल :-  डोभाल जाति के लोग संवत 945 में संतोली, कर्नाटक से आकर गढ़वाल के डोभा गांव में आकर बसे, इसीलिए ये डोभाल कहलाए। इस जाति के मूल पुरुष कर्णजीत डोभा सर्वप्रथम वे ही डोभा गांव में आकर बसे थे।

4.  उनियाल :- संवत 981 में मिथिला से जयाचंद और विजयाचंद नामक दो पृथक गोत्री ममेरे-फुफेरे भाई श्रीनगर, गढ़वाल के वेणी गांव में आए और वहीं बस गए। वे मैथिल ब्राह्मण थे। वहीं से उनियाल जाति का आरम्भ हुआ। 
5. घिल्डियाल  :- घिल्डियाल जाति को आद्यगौड़ ब्राह्मण श्रेणी में रखा जाता है। इस जाति के लोग गौड़ देश से संवत 1100 में गढ़वाल में आकर बसे। इसलिए इनका नाम घिल्डियाल पड़ा।

6. नैथानी/नैथाणी :- नैथानी मूलरूप से कान्यकुब्ज ब्राह्मण हैं जो सम्वत 1200 कन्नौज से आकर गढ़वाल के नैथाणा नामक गांव में आकार बस गए। आपके मूलपुरुष कर्णदेव और इंद्रपाल जो सबसे पहले गढ़वाल में आए।   

7. जुयाल :- गंगाड़ी ब्राह्मणों की महाराष्ट्रीय जाति जुयाल दक्षिण भारत से जुया गांव में संवत 1700 में इनके आदि पुरुष बासुदेव और विजयानंद के निर्देशन में गढ़वाल में आयी और तत्पश्चात यहीं बस गयी।

8. सकलानी/सकल्याणी :- कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की यह शाखा सम्वत 1700 के आसपास अवध से आकर गढ़वाल के सकलाना गांव में बसी। इनके मूल पुरुष नाग देव ने ही सकलाना गांव बसाया था। कालांतर में इस जाति के नाम पर इस पट्टी का नाम भी सकलाना पट्टी पड़ा। इस जाति के लोगों को ‘पुजारी’ भी कहा जाता है। 


9. जोशी :- जोशी जाति के ब्राह्मणों की पूर्व जाति द्रविड़ मानी जाती है। ये जाति कुमाऊं से सम्वत 1700 में गढ़वाल आई और उसके बाद यहीं बस गयी। 

10.  तिवारी/तिवाड़ी :- त्रिपाठी मूल के तिवाड़ी सरोला ब्राह्मण लगभग 1700 संवत में कुमाऊं से आकर गढ़वाल के अलग-अलग हिस्सों में बस गए और तत्पश्चात वहीं के निवासी हो गए। 

11. पैन्यूली :- पैन्यूली मूलतः गंगाड़ी गौड़ ब्रह्मण हैं जो संवत 1207 में दक्षिण भारत से आकर गढ़वाल के पाण्याला गांव रमोलि में बसे थे। इनके मूल पुरुष ब्रह्मनाथ थे।

12. चंदोला :- इनकी पूर्व जाति सारस्वत है। ये पहले पंजाब से चंदोसी और उसके बाद सम्वत 1633 में गढ़वाल आए आए। इनके मूल पुरुष लूथराज माने जाते हैं। सम्भवतः चंदोसी में बसने के कारण ही ये चंदोला हुए। 

13. ढौंडियाळ/ढौंडयाल :- गढ़वाल के नरेश राजा महिपति शाह द्वारा चोथोकी समुदाय में वृद्धि करते हुए 32 अन्य जातियों को भी इस समुदाय में शामिल किया गया, जिनमें ढौंडियाल प्रमुख जाति थी। इस जाति के मूल पुरुष रूपचंद गौड़ ब्राह्मण थे जो राजपुताना से सम्वत 1713 में गढ़वाल के ढौंड गांव में आकर बस गए थे। इनके द्वारा ही ढौंड गांव बसाया गया था, जिस कारण इन्हें ढौंडियाल कहा गया।

14. नौड़ियाल/नौडियाल/नौरियाल :- ये मूलतः गढ़वाली गंगाड़ी गौड़ ब्राह्मण हैं। जो अपने मूल स्थान भृंग चिरंगा से सम्वत 1600 में गढ़वाल के नौड़ी गांव में आए और वहीं बस गए। इनके मूलपुरुष पंडित शशिधर द्वारा ही नौड़ी गांव बसाया गया था। इसी गांव के नाम पर ही इस जाति को नौडियाल कहा गया। 

15. ममगाईं :- ममगाईं मूलतः गौड़ ब्रह्मण है जो उज्जैन, महाराष्ट्र से आकर गढ़वाल में बसे और मामा के गांव में बसने के कारण ममगाईं नाम से प्रसिद्ध हुए। इस जाति के लोग मूलतः पौड़ी जिले में बसे हैं, लेकिन टिहरी और उत्तरकाशी में भी इस जाति के कुछ गांव मिलते हैं।

16. बड़थ्वाल :- बड़थ्वाल मूलतः सारस्वत ब्राह्मण हैं जो संवत 1543 में गुजरात से आकर गढ़वाल में बसे। इस जाति के मूल पुरुष पंडित सूर्य कमल मुरारी गुजरात से आकर गढ़वाल के बड़ेथ नामक गांव में बसे, बाद में इनके वंशज बड़थ्वाल नाम से प्रसिद्ध हुए। 

17. कुकरेती :- ये द्रविड़ ब्रह्मण है, जो विलहित नामक स्थान से संवत 1409 में आकर गढ़वाल में बसे और फिर यहीं के निवासी हो गए। इनके मूल पुरुष गुरुपति कुकरकाटा नाम गांव में आकर बसे थे, यही कुकरकाटा नामक गांव में बसने के कारण ही ये कुकरेती नाम से प्रसिद्ध हुए।

18. धस्माना/धस्माणा :- धस्माना गंगाड़ी गौड़ ब्राह्मण हैं। जो उज्जैन से संवत 1723 में गढ़वाल आए और धस्मण गांव में बस गए थे। इनके मूल पुरुष हरदेव, वीरदेव और माधोदास थे। 

19. कैंथोला :- कैंथोला की पूर्व जाति गुजराती भट्ट थी। ये गुजरात से संवत 1669 में अपने मूल पुरुष रामवितल के निर्देशन में गढ़वाल के कैंथोली गांव में आये और वहीं बस गए थे।

20. सुयाल :- सुयाल जाति के ब्राह्मणों के मूलपुरुष दजल और बाज नारायण गुजरात से आकर गढ़वाल के सुई गांव में बसे और यहीं के निवासी हो गए। 

21. बंगवाल :- बंगवाल गौड़ वंशीय ब्राह्मण हैं। ये सम्वत 1725 में मध्यप्रदेश से गढ़वाल के बांगा गांव में आकर में बसे और यहीं के निवासी हो गए।

22. अन्थ्वाल/अणथ्वाल :- अणथ्वाल सारस्वत ब्रह्मण हैं। जो संवत 1612 में पंजाब से गढ़वाल के अणेथ गांव में आए और तत्पश्चात यहीं के निवासी हो गए। अणथ्वाल जाति के लोग मूलतः अफगानिस्तान मूल के माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि अणथ्वाल नाम की एक जाति लाहौर, पाकिस्तान में भी रहती है, जो वहां के हिन्दू मंदिरों की पूजा सम्पन्न कराने का काम करती है।

23. बौखण्डी :- महाराष्ट्र वंशीय बौखंडी ब्राह्मण जाति विलहित से संवत 1700 में गढ़वाल आए और यहां के निवासी हुए। यह जाति स्वयं को भुकुण्ड कवि की संतान बतलाती है।

24. जुगराण/जुगड़ाण :- पांडे मूल वंश के जुगराण नामक गंगाड़ी ब्राह्मण कुमाऊं से संवत 1700 में गढ़वाल आए और यहां के जुगड़ी नामक गांव में बसने के कारण जुगड़ाण और बाद में जुगराण कहलाए।

25. मालकोटी :- गौड़ सरोला ब्राह्मण मालकोटी संवत 1700 में अज्ञात स्थान से आकर गढ़वाल के मालकोटी गांव में बस गए और मालकोटी नाम से प्रचलित हुए। इनके मूल पुरुष बालकदास थे। 

26. बलोदी :- दविड़ वंश गंगाड़ी ब्राह्मण बलोदी संवत 1400 में दक्षिण भारत से आकर गढ़वाल के बलोद नामक गांव में बसने के कारण बलोदी कहलाए।

27. घनसाला/घणसाला :- घणसाला गौड़ ब्राह्मण जाति के लोग संवत 1600 में गुजरात से आकर गढ़वाल के घनसाली अथवा घणसाली नामक गांव में बसने के कारण घनसाला अथवा घणसाला नाम से जाने गए।

28. देवरानी/देवराणी :- ये भट्ट जाति के ब्राह्मण हैं। जो संवत 1500 में गुजरात से गढ़वाल में आकर बस गए थे।
29. पोखरियाल :- ये मूलतः गौड़ ब्रह्मण हैं जो संवत 1678 में विलहित से आकर पौड़ी गढ़वाल, चमोली और टिहरी में बसने से पोखरियाल प्रसिद्ध हुए। इनके कुछ लोग नेपाल में प्रसिद्ध शिव मंदिर पशुपति नाथ में पूजाधिकारी हैं। 

30. डबराल :- डबराल महाराष्ट्र वंशीय ब्राह्मण जाति के लोग संवत 1433 में अपने मूल पुरुष विश्वनाथ और रघुनाथ के साथ गढ़वाल के डाबर गांव में आकर बसे थे।

31. सुंदरियाल :- सुंदरियाल ब्राह्मण जाति के लोग संवत 1711 में गढ़वाल आए। ये कर्नाटक वंश के ब्राह्मण हैं जो गढ़वाल के सुन्द्रोली नामक गांव में बसने के कारण सुंदरियाल कहलाए। 

32. किमोटी :- ये गौड़ वंशीय गंगाड़ी ब्राह्मण बंगाल के मूल निवासी हैं जो कि संवत 1617 में अपने मूल पुरुष रामभजन किमोटा के नेतृत्व में बंगाल से गढ़वाल आए और यहीं किमोता गांव में बस गए।

33. बडोला/बुडोला :- बडोला गौड़ वंश के गंगाड़ी ब्राह्मण हैं। संवत 1798 में उज्जैन से अपने मूल पुरुष उज्जल के साथ आकर बडोली अथवा बुडोला नामक गांव में बसने से बुडोला कहलाए।

34. पांथरी :- गढ़वाल के गंगाड़ी सारस्वत ब्राह्मण पांथरी जाति के आदि पुरुष अन्थू और पंथराम संवत 1600 में जालंधर से आकर गढ़वाल के पांथर गांव में आकर बसे और पंथारी नाम से जाने जाते हैं।

35. बलोनी/ बलोणी :- बलोनी सारस्वत मूल के ब्राह्मण हैं जो जालंधर से 1776 संवत में गढ़वाल के बलोण गांव में आकर बसे और यहीं के निवासी हो गए। जीवराम इनके मूल पुरुष थे।

36. पुरोहित :- ये जम्मू कश्मीर राजपरिवार के कुल पुरोहित और वहां पुरोहिताई करते थे यही कारण है कि ये पुरोहित नाम से प्रसिद्ध हुए। इनके पहले गांव दसोली में माने जाते हैं तत्पश्चात ये नागपुर पट्टी में भी बस गए थे।

37. बडोनी/बडोणी :- बडोनी गौड़ ब्राह्मण जाति के लोग सम्वत 1600 में बंगाल से आए और बडोन गांव में बस गए। बडोन गांव में बसने के कारण ही ये बडोनी कहलाए।

38. रुडोला :- तैलंग मूल के ब्राह्मण रुडोला सिंध हैदराबाद से आकर गढ़वाल के अलग-अलग हिस्सों में बस गए।

39. सुन्याल :- अज्ञात स्थान से आकर गढ़वाल के सोनी गांव में बसने के कारण ये सुन्याल नाम से जाने गए।

40. कोटनाला :- ये गौड़ ब्राह्मण जाति बंगाल के निवासी माने जाते हैं जो बंगाल से से सम्वत 1725 में गढ़वाल के कोटी गांव में आकर बस गए। कोटी गांव में बसने के कारण ये कोटनाला कहलाए।

41. काला :- ऐसा माना जाता है कि काला जाति के लोग गढ़वाल में काली कुमाऊं क्षेत्र से आये और पौड़ी गढ़वाल के सुमाड़ी नामक गांव में बस गए।

42. कौंस्वाल :- कौंस्वाल जाति के गंगाड़ी गौड़ ब्राह्मण संवत 1722 में गढ़वाल आए और यहां के कंस्याली नामक गांव में बसने के कारण कौंसवाल कहलाए।

43. वैरागी :- गौड़ मूल के ब्राह्मण वैरागी गढ़वाल में आकर बस गए।

44. मलासी :- गौड़ वंश के मलासी ब्राह्मण अज्ञात स्थान से आकर मलासू गांव में आकर बसे।

45. फरासी :- ये द्रविड़ वंश के ब्राह्मण हैं जो संवत 1791 में दक्षिण भारत से गढ़वाल में आए और यहां के फरासू नामक गांव में बसने से फरासी नाम से जाने गए।

46. बदाणी/बधाणी :- बदाणी अथवा बधाणी कान्यकुब्ज वंश के गंगाड़ी ब्राह्मण संवत 1722 में कन्नौज से गढ़वाल आए। ये सर्वप्रथम गढ़वाल बधाण परगने में बसे इसीलिए बधाणी अथवा बदाणी कहलाए।

47. गोदुड़ा :- यह गंगाड़ी ब्राह्मण जाति पहले भट्ट थी जो संवत 1718 में दक्षिण भारत से आकर गढ़वाल में बसे। इनके मूलपुरुष गोदू थे। संभवतः उनके नाम से ही इस जाति का नाम गोदुड़ा पड़ा होगा।

48. सैल्वाल :- ये किसी अज्ञात स्थान से आकर गढ़वाल के सैल गांव में बसने के कारण सैल्वाल कहलाए।

49. कुड़ियाल :- कुड़ियाल जाति के गौड़ वंशीय ब्राह्मण बंगाल के मूल निवासी हैं जो संवत 1600 में बंगाल से यहां आए। गढ़वाल के कूड़ी नामक गांव में बसने के कारण ये कुड़ियाल कहलाए।

50. भट्ट :-  यह सामान्यतः एक प्रकार की उपाधि थी, जो राजाओं दी जाती थी। कालांतर में ये एक ब्राह्मण जाति के रूप में प्रचलित हुई। भट्ट जाति के लोग मूलतः दक्षिण भारतीय मूल के माने जाते हैं। यह गढ़वाल की एकमात्र जाति है जो सरोला, गंगाड़ी और नागपुरी ब्राह्मणों की सूची में शामिल की गयी है।

51. बौराई/बौड़ाई :- ये गौड़ वंश के ब्राह्मण हैं जो कि अज्ञात स्थान से संवत 1500 में गढ़वाल आए और वहां के बौधर या बौर गांव में बस गए।

52. मैकोटी :- कान्यकुब्ज वंश के मैकोटी गंगाड़ी ब्राह्मण संवत 1622 में कन्नौज से गढ़वाल आए। गढ़वाल के मैकोटी नामक गांव में बसने से ये मैकोटी कहलाए।

53. बिंजोला :- ये द्रविड़ वंश के ब्राह्मण हैं जिनके बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है।

54. पोखरियाल :- पोखरियाल जाति के लोग मूलपुरुष गुरुसेन के साथ संवत 1678 में विलहित से गढ़वाल में आए। गढ़वाल में पोखरी गांव में बसने के कारण ये पोखरियाल कहलाए।

55. सिलवाल :- सिलवाल जाति के ब्राह्मण द्रविड़ वंश से सम्बद्ध हैं और ये सम्वत 1600 में बनारस से आकर गढ़वाल के सिल्ला गांव में बसने से सिलवाल हुए।

(स) अन्य ब्राह्मण :- इस श्रेणी में वे सभी ब्राह्मण आते हैं जो उपर्युक्त दोनों श्रेणियों में शामिल नहीं हैं। 

बेंजवाल :- बेंजवाल कान्यकुब्ज ब्राह्मण जाति के लोग गढ़वाल के अगस्त्यमुनि क्षेत्र में बेंजी नामक गांव के निवासी हैं जो 11वीं शताब्दी में महाराष्ट्र से यहां आकर बसे। बेंजी गांव में बसने के कारण ही इन्हें बेंजवाल कहा गया। प्रसिद्ध इतिहासकार एटकिन्सन ने हिमालयन गजेटियर मैं इस जाति वर्णन किया है। ऐसा माना जाता है कि यह ब्राह्मण जाति अगस्त्य ऋषि के साथ आये 64 गोत्रीय ब्राह्मणों में से एक थी।

पंत :- ये मूलतः भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण हैं। जिनके मूल पुरुष जयदेव पंत महाराष्ट्र से 10वीं सदी में तत्कालीन राजाओ के साथ कुमाऊं में आगमन हुआ। तत्पश्चात इनके वंशज चार थोकों में विभाजित हुए जिनसे बाद में मूल कुमाऊंनी पंत ब्राह्मण जाति का आविर्भाव हुआ। बाद में इस जाति के कुछ परिवार गढ़वाल के विभिन्न इलाको में बसे और वहीं के मूल निवासी हो गए। इसके अलावा जखमोला, गोदियाल, उपाध्याय, कुकसाल/खुग्साल और खंतवाल आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं लेकिन इनके बारे में जानकारी नहीं प्राप्त हो सकी।  

सन्दर्भ :-
1. गढ़वाल हिमालय : इतिहास, संस्कृति, यात्रा और पर्यटन - रमाकांत बेंजवाल, पृष्ठ - 39
2. गढ़वाल का इतिहास - प. हरिकृष्ण रतूड़ी, संपा. - डॉ. यशवंत सिंह कठोच, पृष्ठ - 77
---------------------------------------------------------------------------------


  • नई दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया में शोधार्थी श्री नवीन चंद्र नौटियाल मूलरूप से उत्तराखंड राज्य के जनपद पौड़ी गढ़वाल के कोट ब्लॉक अंतर्गत रखूण गांव, सितोनस्यू पट्टी के मूल निवासी हैं। उत्तराखंड के इतिहास, साहित्य, भाषा आदि के अध्ययन में उनकी गहरी अभिरुचि है। उनका मानना है कि नई पीढ़ी को अपने इतिहास, परंपराओं, भाषा आदि की जानकारियां जरूर होनी चाहिए। इसीलिए वह सोशल मीडिया पर ऐसी जानकारियों को साझा कर अपनी मुहिम को जारी रखे हुए हैं।


Photo- by google

30 August, 2019

महज 4 खेतों में उगा दी 27 तरह की फसलें

https://www.bolpahadi.in/2019/08/4-27-mahaj-4-kheton-men-uga-di-27-tarah-ki-phasalen.html
महिपाल सिंह नेगी //

हिमालयी राज्य उत्तराखंड में ‘‘चिपको’’ और ‘‘बीज बचाओ’’ आंदोलन की प्रयोग भूमि जनपद टिहरी की ‘‘हेंवल घाटी’’ का रामपुर गांव। यह गांव चिपको और बीज बचाओ आंदोलन की प्रमुख कार्यकर्ता सुदेशा बहन और प्रसिद्ध पत्रकार कुंवर प्रसून का गांव भी है। हाल में मैं भी इस गांव में पहुंचा। 

यहां आकर मालूम पड़ा कि चिपको और बीज बचाओ आंदोलन से जुड़े हमारे साथी साहब सिंह सजवाण और उनकी सास सुदेशा बहन ने मिलकर बीज बचाओ के आंदोलन को सार्थकता और विस्तार देने के लिए सिर्फ चार खेतों में ही 27 तरह की फसलें उगा डाली हैं। वह भी बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल के ही। उन्होंने पारंपरिक बीजों को सिंचित और असिंचित दोनों तरह के खेतों में उपयोग किया। 

प्रेरणादायक बात यह कि यह कार्य उन्होंने आंदोलन से जुड़े रहे अपने साथी स्वर्गीय कुंवर प्रसून की स्मृति को जीवंत बनाए रखने के लिए भी किया है। स्वर्गीय प्रसून के परिवार ने भी अपने एक-दो खेत इस अभियान के लिए उन्हें सहर्ष सौंपे हैं। एक अन्य खेत गांव के ही किसी और परिवार ने दिया, जबकि एक खेत उनका पुश्तैनी है।
https://www.bolpahadi.in/2019/08/4-27-mahaj-4-kheton-men-uga-di-27-tarah-ki-phasalen.html

उनके प्रेरक प्रयोग से यहां जो 27 तरह की फसलें लहलहा रही हैं उनमें प्रमुख हैं- दलहन में नवरंगी, उड़द, मूंग, लोबिया, गहत, भट्ट, और तोर। तिलहन में तिल और भंगजीर। बारानाजा की मंडुआ, झंगोरा, कौंणी, चौलाई सहित उखड़ी धान, मिर्च, जख्या, काला जीरा, हल्दी, और अदरक। सब्जी वाली फसलों में भिंडी, टमाटर, भुजेला, अरबी, कुचैं, करेला सहित भूमि आंवला और लेमनग्रास जैसे औषधीय पौधे भी हैं। 

इनमें एक खेत तो ऐसा भी है, जिसमें 20 तरह के अनाज उगे हैं। यह सब देखकर मैं भी रोमांचित हुआ। वास्तव में चिपको और बीज बचाओ आंदोलनों से जुड़े लोग आज भी चुपचाप गांव, घर, खेत, खलिहानों से जुड़े हुए हैं। सुदेशा बहन 80 साल की हो चली हैं और अब भी खेत खलिहान में पसीना बहाती हैं।

(फोटो- साहब सिंह सजवाण और उनकी सास सुदेशा बहन खेतों में)

https://www.bolpahadi.in/2019/08/4-27-mahaj-4-kheton-men-uga-di-27-tarah-ki-phasalen.html












@ महिपाल सिंह नेगी 

Popular Posts

Blog Archive

Our YouTube Channel

Subscribe Our YouTube Channel BOL PAHADi For Songs, Poem & Local issues

Subscribe