18 August, 2019

गढ़वाली भाषा का शब्द वैभव


संकलन- नवीन नौटियाल //
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गढ़वाल को 'मध्य हिमालय' के नाम से भी जाना जाता है। इतिहास में इस 'मध्य हिमालयी' क्षेत्र में कोल, भील, किरात, नाग, आर्य, द्रविड़ आदि अनेक जातियों का निवास रहा है। वर्तमान समय में प्रचलित गढ़वाली भाषा पर इन जातियों के शब्दों का प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है। 

● खस जाति से आए शब्द –
नखरु, बेड़, बुजण, बूखु, बेथ, बैंदार, लैंदु आदि।

● तिब्बती-बर्मी समुदाय से आए शब्द –
पंखी, फंचि/फंचु. अंगड़ि, गौथ, चराण, उस्ययूँ आदि।

● आस्त्रिक मूल के शब्द –
कपाळ, बोई, दाड़िम, छेमी, टिमरु, बेडू, रिंगाळ आदि।

● मुंडा जाति  से आए शब्द –
गाड/गाड़, दिदा, ढुंगु, थोरुडु, ढांग आदि।

● नाग जाति से आए शब्द –
नागनाथ, नागणी, नागपुर आदि।

● किरात जाति से आए शब्द –
सितोनस्यूँ, गगवाड़स्यूँ, खत्यूं, बिग्ड्यूं, महासू, धरासू, झंगोरा, काफळ आदि।

● संस्कृत भाषा से आए शब्द –
दूण, माणु, पाथु, पोरु, परार, परसि, परस्यों, सट्टि, क्वादु/कोदु, आदु, दथुडु आदि।

● तद्भव शब्द –
अखोड़, कंदूड़, औतु, उणदु, काख. घुंडु, घीण, तीस, नौण, संगुडु आदि।

● प्राकृत मूल के शब्द –
लुकणु, भोळ, पौणु, उब्ब, बौड़ि, जोन, सिंगणु आदि।

● अपभ्रंश मूल के शब्द –
माटु, नौळी, ज्वान, पुथड़ो, छैल, चौक, लिसू, स्वाळी, चौकलु आदि।

● पाली मूल के शब्द –
गरु, खुद आदि।

● गुजराती और मारवाड़ी के प्रभाव वाले शब्द –
अग्यार, बार, तैर, चौद, पंदर, अठार आदि।

● राजस्थानी के प्रभाव वाले शब्द –
किवाड़, हिरण, सपूत, कपूत, डाकण, आछरी, घोल, पाणी, बैण, हिटण आदि।

● अरबी-फ़ारसी के प्रभाव वाले शब्द –
जगा, जनानि, जैदाद, दसकत, बैम, सौलियत आदि।

● अंग्रेजी प्रभाव वाले शब्द-
लालटेन, फुटबौल, पिनसन, डरैबर, पलटन, इस्कूल, मास्टर आदि।

● तमिल से आए शब्द –
चंड/चंडि, छानी, कोट, हुड़को, ओडु, ब्वे, कुड़ी आदि।

● कन्नड़ से आए शब्द –
संटाण, भुक्कि, गुंडु, खज्जि, खाड, घुटकि/घुटगि, काँठो आदि।

● तेलुगु से आए शब्द –
बिसौंण, रांड, बाटो/बाठु, गड्डी, पुटगु/प्वटुगु, कणखिला, कुटलु आदि।

स्रोत:-
1. गढ़वाली भाषा और उसका लोकसाहित्य - डॉ. जनार्दन प्रसाद काला
2. उत्तराखंड की लोकभाषाएँ : गढ़वाली/कुमाऊँनी/जौनसारी - डॉ. अचलानंद जखमोला
3. गढ़वाली - केशवदत्त रुवाली
4. भारतीय संस्कृति का संदर्भ: मध्य हिमालय - डॉ. गोविंद चातक
5. गढ़वाली भाषा के अनालोचित पक्ष - डॉ. अचलानंद जखमोला


संकलन- नवीन नौटियाल
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15 August, 2019

निःसंग जी के बहाने वर्तमान संदर्भ पर दो शब्द


नरेन्द्र कठैत //
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श्री शिवराज सिंह रावत निःसंग जी पर अभिनन्दन ग्रंथ और वर्तमान सन्दर्भ में दो शब्द!
पाश्चात्य कलमकारों ने इस देवभूमि से जो कुछ समेटा उसका आंकलन करने के लिए किसी कलमकार की लिखी यह पंक्ति  ‘धनुष भी उनके, बाण भी उनके, अपनी केवल आंख’ ही पर्याप्त है। कौन नहीं जानता एटकिन्सन हो या ग्रियसन, दोनों ने वर्णित सामग्री अपनी तात्कालीन आंख अर्थात अपने मातहतों के माध्यम से ही जुटाई। किन्तु क्या कारण है कि आज भी हम भूत-पिचास-अयेड, बांज-बुरांस, घास-पात को पहचानने के लिए इ.टी. एटकिन्सन और अपनी भाषा की व्यवहारिकता जानने के लिए ग्रियसन का मुंह ताकते हैं।

जबकि एटकिन्सन महोदय ने जो भौगोलिक, सांस्कृतिक जानकारी दी है उनसे ज्यादा प्रमाणिक विवेचन महीधर शर्मा बड़थ्वाल जी ने अपनी पुस्तक ‘गढ़वाल में कौन’ में किया है। महीधर शर्मा बड़थ्वाल, जिनके पास अपनी आंख के सिवाय दूसरी कोई आंख थी ही नहीं। एक स्थान पर महीधर शर्मा जी ने लिखा भी है कि ‘विभिन्न परिस्थितियों और कौटुम्बिक क्लेशों के कारण मेरे इस कार्य में बाधा होती रही; बल्कि मुद्रण के समय पुस्तक के पू्रफ भी मैंने अस्वस्थ स्थिति में ही पढ़े।’ इसी पुस्तक पर उन्हें न्यायालयी प्रक्रिया से भी गुजरना पड़ा। एक अकेला, सब कुछ झेला। आज कितने विर्मर्शोंं में महीधर शर्मा बड़थ्वाल जी पर चर्चा होती है? प्रश्न विचारणीय है!

ग्रियसन महोदय का ही संदर्भ लें तो ग्रियसन महोदय ने जितना श्रम और कल्पना, हमारी भाषाओं को विभक्त करने में व्यय किया, उतना यदि देवभूमि की भाषाओं के विकास में लगाते तो आज उत्तराखण्डी भाषाओं का स्वरूप ही कुछ और होता। किन्तु यह विडम्बना ही है कि ग्रियसन की ओर ताकती हमारी वे आंखे आज भी दृष्टिभ्रम की स्थिति में हैं। कई बार तो हम ग्रियसन की विभक्तिकरण की कल्पना से इतना आगे निकल जाते हैं कि हमें यह भी ध्यान नहीं रहता कि इतने टुकड़ों में विभक्त कर हम अपनी मातृभाषा के किस स्वरूप को आठवीं सूची तक पहुंचाना चाहते हैं?

आश्चर्य है! खेत की बात करते हैं। लेकिन खेत की चिंता नहीं! चिंता है तो उपज को ही नकार जाते हैं! उपज को सिरे से नकारने की बात कितनी अव्यवहारिक है सोचा ही नहीं! यह स्वभावगत जटिलता है या खीज? इसको बेध्यानी में घटी घटना भी कैसे मान लें? मालूम नहीं, कौन से रास्ते को पकड़कर इस खेत तक पहुंचे हैं लेकिन जिस खेत में भव्य इमारत खड़ी की जानी है उसके लिए इतना तंग गलियारा? क्या भाषा को आठवीं अनुसूची तक पहुंचने का यही मार्ग है? ऐसे निठल्ले चिन्तन का क्या लाभ जिसमें स्वयं ही झुलस जाने का अंदेशा है।

किन्तु निठल्ले चिन्तन से दूर हमारे बीच कुछ ऐसी प्रखर मेघा के चिन्तन शील व्यक्ति भी हैं जो अपनी लेखनी के बल पर बरबस ध्यान आकृष्ठ करते हैं। इन्ही चेतना शील व्यक्तियों के मध्य प्रखर मेघा के धनी आदरणीय श्रीयुत शिवराज सिंह रावत निःसंग  अपनी दमदार लेखनी की उपस्थिति से जब-तब अवगत कराते रहे हैं।

गोपेश्वर के विद्धतजनों यथा डॉ. भगवती प्रसाद पुरोहित एवं अनुज डॉ. चरण सिंह केदारखण्डी ने वर्तमान भाषायी मौखिक मुहिम की अंधड़ से दूर ऋषि परम्परा के मनीषी निःसंग जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित ‘अभिनन्दन ग्रंथ’ को अंतिम सोपान तक पहुंचाया, इसके लिए दोनों विद्वतजनों के साथ उनके इस यज्ञ में जुड़े समस्त बुद्धिजीवियों का साधुवाद!

यू ंतो धर्म, दर्शन, साहित्य, संस्कृति पर निःसंग जी की अनेकों पुस्तकें हैं। किन्तु विन्सर पब्लिशिंग कं0 से प्रकाशित ‘भाषा तत्व और आर्य भाषा का विकास’ भाषा संबन्धी जानकारी के लिए एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसी पुस्तक में भाषा शास्त्री ग्रिसयन के संबन्ध में आपने लिखा है कि -‘यद्यपि डॉ. जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने मध्य पहाड़ी गढ़वाली-कुमाउंनी भाषा को हिन्दी की किसी अन्य भाषा की विभाषा मानकर इसके अपुष्ट पक्ष को सिद्ध करने प्रयास किया है परन्तु मध्य हिमालय के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रयुक्त प्राकृत संस्कृत भाषा के अनगिनत शब्द इन्हीं पहाड़ी भाषा के शब्द भण्डार से निकलकर मानवीय संस्कृति के साथ निःसरित होकर समस्त भारत में फैली और अनेक प्रान्तों की भाषा के निर्माण में सहयोगी सिद्ध हुई। इस ओर डॉ. गियर्सन का ध्यान नहीं गया।’

निःसंग जी ग्रिसयन के इस भाषाई विभेद को मात्र उच्चारण का भेद मानते हैं। आपने स्पष्ट लिखा कि ‘उच्चारण भेद से गढ़वाली ने कई रूप धारण किये हैं। प्राचीन काल में भी यही प्रवृत्ति रही है। इसका कारण... भौगोलिक बनावट, जलवायु की विविधता और दूर-दूर तक दिनों महीनों की पैदल यात्रा आदि रहा है।’ कटु सत्य है।

वहीं एक अन्य स्थान पर ग्रियसन की भाषाई कांट-छांट पर व्याख्या और शोधकर्ताओं के संदर्भ में निःसंग जी के ये शब्द भी विचारणीय हैं। आपने लिखा ‘भाषाविदों ने, भाषायी सर्वेक्षण में, डॉ. गियर्सन के भाषायी धुवीकरण पर ही अपना भाषायी चिन्तन केन्द्रित किया है, ऐसा प्रतीत होता है। वे इस विश्वास को पालते रहे कि, भारत में आर्य बाहर से आये। यही कारण है कि वे मध्य भाषाओं का सम्बन्ध कभी महाराष्ट्र प्राकृत से जोड़ते रहे तो कभी शौरसेनी और कभी आवन्ती से। इन्ही निराधार सिद्धान्तों को वे पाठकों के ऊपर थोपते रहे। यह भी एक कारण है कि गढ़वाली भाषा भारतीय संविधान की आठवीं सूची में स्थान नहीं पा सकी।’ इतना गम्मीर विवेचन शायद ही किसी अन्य भाषा शास्त्री ने किया हो। 

आपकी उक्त पुस्तक में ‘वाणी की व्युत्पति, स्वर तंत्रियां और ध्वनि’, वैदिक संस्कृति में स्वर और व्यजनों की स्थिति’, शब्द की उत्पति, अक्षर और उनके जन्मदाता, अंक और उनके जन्मदाता, सृष्टि रचना, आर्य सभ्यता और भाषा की उत्पति, आर्य भाषा और उसका प्रभाव, आर्य भाषा का काल विभाजन, गढ़वाली भाषा और उसकी साहित्यिक परम्परा, गढ़वाली भाषा के शब्द स्रोत, ‘गढ़वाली, हिन्दी और पाणिनी का व्याकरण’, गढ़वाली भाषा की उत्पति और उसका विकास,  हिन्दी का स्रोत-प्राकृत पहाड़ी अपभ्रंश, लिपि और उसका विकास’, भोटिया संस्कृति और भाषा’, ‘राष्ट्र भाषा हिन्दी और उसकी वर्तमान स्थिति’, तथा अन्य अनेकों अध्यायों में भाषा विषयक गूढ़ जानकारी एवं वैदिक, संस्कृत, राजस्थानी, गुजराती, बंगाली, सिन्धी, मराठी, नेपाली, पंजाबी तथा अंग्रेजी, अरबी, फारसी, तुर्की, पुर्तगाली, तिब्बती-बर्मी विदेशी भाषाओं के शब्दों के साथ गढ़वाली भाषा के शब्दों की साम्यता एवं ध्वन्यात्मक, आदिम जातीय शब्दों का वृहद विवेचन समाहित हैं।

ल़ अथवा ळ अक्षर की व्यवहारिकता पर आपने लिखा कि ‘महर्षि माण्डव्य, जो पाश्चात्य दार्शनिक सुकरात के भी गुरू रहे हैं, ने यहां तपश्चर्या की। वर्णमाला में गढ़वाली ल, ळ जैसे अक्षरों का अनुसंधान इन्होंने ही किया था।’  

आप गढ़वाली ही नहीं अपितु हिन्दी और संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान हैं। हिन्दी को केन्द्र में रखकर इसी पुस्तक के एक अंश में  आपने लिखा है कि ‘हिन्दी भाषा की रूपरेखा तैयार करते समय भाषाविदों द्वारा मध्य हिमालय की पहाड़ी बोली-भाषा को महत्वपूर्ण स्थान न देना, आज भी चुभन पैदा करता है। हिन्दी शब्दकोश का भण्डार जिन मौलिक शब्दों से भर रहा था, उनमें मध्य हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों गढ़वाली, कुमाउंनी, नेपाली एवं त्रिगर्त देशी भाषाओं का दुर्लभ संयोग रहा है। शब्द निर्माण और समान संप्रयोजन का वही रूप गढ़वाली भाषा में परिरक्षित होने से हिन्दी की उत्पति भारत की भाषा के रूप में हुई।’

इसी संदर्भ में एक अन्य स्थान पर शब्द दिये हैं कि ‘इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्राचीनकाल में गंगा और यमुना के बीच का देश अन्तर्वेदि या मध्यदेश कहलाता था। जिसके अन्तर्गत मध्य हिमालय के पहाड़ी प्रदेश गढ़वाल, कुमांउ, कुरूक्षेत्र, कांगड़ा, जौनसार, नेपाल, प्रयाग एंव विन्ध्या आदि आते हैं। प्राकृत संस्कृत, वैदिक काल के अति निकट की भाषा होने से, इन क्षेत्रों की बोली-भाषा रही है किन्तु भाषाविदों ने इन पहाड़ी प्रदेशों की मौलिक भाषा तत्वों में स्थान देने के बजाय यह जताने का प्रयास किया कि मध्य पहाड़ी कोई भाषा ही नहीं। परिणामस्वरूप संस्कृत के स्रोत और हिन्दी की मौलिकता को एक धक्का लगा। उसके निर्माण में मौलिकता का अभाव होने से उसे भाषा-सागर में कई थपेड़े सहन करने पड़े।’ 

भाषा के सार तत्वों से सम्माहित इस पुस्तक के साथ ही निःसंग जी की ‘भारतीय जीवन दर्शन और सृष्टि का रहस्य, विविध धर्मों में मानव अधिकार सहित अन्य अनेकों पुस्तकें सारग्रभित, शोधपरक एंव संग्रहणीय हैं। साथ ही वृहद त्रिभाषी शब्दकोश (गढ़वाली-हिन्दी-अंग्रेजी) के सह-सम्पादन में आपने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उम्र के इस पड़ाव पर विस्मृति की छाया   स्वाभाविक है। लेकिन इधर से -‘निःसंग जी!’ का नामोचारण सुनते ही तुरन्त संज्ञान ले लेतेे हैं।

कुशल क्षेम हेतु अभी कुछ दिन पूर्व फोन किया- ‘निःसंग जी प्रणाम! कैसा है आपका स्वास्थ्य?’ उनके श्री मुख से सुनाई दिया-‘ ओ हो! कठैत जी! अभी आपसे पहले नागो मोहन माली से बात कर रहा था!‘ दिमाग में प्रश्न कौंधा-‘ नागो मोहन माली?’ भला ये कौन व्यक्ति है? पूछ ही लिया-‘ निःसंग जी नागो मोहन माली कौन हैं?’  थोड़ा हंसे! सांस को थामा! और जबाब साफ-साफ सुनाई दिया-‘ कठैत जी! ये दक्षिण भारतीय हैं। मिले कभी नहीं पर कहते हैं मेरे पाठक हैं। अक्सर फोन पर कुशल क्षेम पूछ लेते हैं!’

कल 12 अगस्त को गोपेश्वर शहर में सम्पन्न होन वाले निःसंग जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित ‘अभिनन्दन ग्रंथ’ के लोकार्पण के निमित्त भेजे गये निमंत्रण पत्र के एक वाक्य पर नजर टिक गई। लिखा है -‘उत्तराखण्ड सहित भारत भर में हजारों साहित्य रसिकों ने उनके लेखकीय अवदान से लाभ उठाया है।’ कहना प्रयाप्त होगा कि नागो मोहन माली जी निःसंग जी के उन्हीं हजारों साहित्य रसिकों के बीच से एक सौभाग्यशाली होंगे।

उम्र के नौवें दशक को पूर्ण करने के बाद भी सम्पूर्ण सजगता के साथ निःसंग जी की लेखनी का गतिशील रहना मां सरस्वती का ही वरदहस्त है। कामना करता हूं निःसंग जी की लेखनी में आगे भी निरन्तरता बनी रहे।

निःसंग जी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर केन्द्रित ‘अभिनन्दन ग्रंथ’ को साकार रूप प्रदाता डॉ. भगवती प्रसाद पुरोहित एवं डॉ. चरण सिंह उत्तराखण्डी अपने इस श्रम साध्य कार्य के लिए एक बार पुनः हार्दिक बधाई स्वीकार करें!

व्यंगकार/कवि/समीक्षक
पौड़ी गढ़वाल

04 August, 2019

मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं...! (भाग - 2)




दुर्गा नौटियाल //
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हां, मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं! मैं अब बूढ़ा हो चला हूं। लेकिन मैं इतना कमजोर भी नहीं की मृत्यु के आगे नतमस्तक हो जाऊं... मैं महाभारत के भीष्म की वह प्रतिज्ञा हूं, जो रणभूमि में बाणों की शैय्या पर लेटे हुए भी मृत्यु को अपने बस में कर सकता हूं। मैं महर्षि दधीचि हूं, जो अपनी प्राण शून्यता के बाद भी अपनी हड्डियों से बज्र का निर्माण कर सकता हूं। मैं हाड मांस का इंसान जैसा पुतला नहीं, जो छित, जल, पावक, गगन ओर समीर में विलय हो जाऊं। मैं फौलाद से गढ़ा गया हूं और कभी मिट भी गया तो फौलाद ही रहूंगा। भविष्य में मेरे कण-कण से भी फौलाद ही निर्मित होगा। मैं जड़ हूं लेकिन चेतनशून्य नहीं, मैं आदि भी हूं और अनंत भी। भौतिक रूप से मेरा ओर-छोर तुम भले ही देख पा रहे हों, लेकिन मेरी जड़ें भूतल में भी गहरी गढ़ी हैं, जो शायद किसी को नजर ना आए। मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों हूं। मैंने इस देश, प्रदेश और शहर के कई कालखंड जिए हैं। मैं एक भरपूर सदी हूं, जो अपने आप में एक संपूर्ण इतिहास है। मैं लक्ष्मण झूला सेतु हूं, जो अब बूढा हो चला हूं...

एक बूढ़े और जर्जर हो चुके लक्ष्मणझूला सेतु को आपने पिछले खंड में कितनी संजीदगी के साथ पढ़ा और जिया... मैं वास्तव में अब अपनी सार्थकता पर गर्व महसूस कर रहा हूं। मेरे पास शब्द नहीं है कि मैं किस रूप में आपका शुक्रिया अदा करूं। मैं बेशक बूढ़ा हो चला हूं, लेकिन आप लोगों के प्रेम और स्नेह ने मेरे अंदर फिर से एक अजीब सी स्फूर्ति और ताजगी ला दी है... अब मुझे लग रहा है कि मैं यूं ही खामोशी के साथ विदाई नहीं लूंगा, बल्कि आपके साथ उस एक सदी का अनुभव साझा करके जाऊंगा जिसे मैंने जिया और महसूस किया है।

जिस दिन से मुझे पता चला कि मेरे भीतर कई बीमारियां हैं, जो मुझे खोखला कर करती जा रही हैं और लोग मुझे असुरक्षित बताने लगे हैं। तबसे वास्तव में मैं भी यह महसूस करने लगा हूं कि अब मैं बूढा हो चला हूं... दोस्तों जैसे आप लोगों की सेहत की देखभाल के लिए एम्स और पीजीआई जैसे चिकित्सा संस्थान बने हैं, ठीक वैसे ही मेरे सेहत की जांच के लिए भी आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थान हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आपको अपनी जांच के लिए इन संस्थानों का रुख करना पड़ता है और मैं इस बुढ़ापे में भी अपनी जगह अटल, बेफिक्र और निश्चिंत रहता हूं। जिसे मेरी जांच करनी होगी वह स्वयं चलकर मेरे पास आएगा। मुझे पता है मेरी तरह आप अपने डॉक्टर को यह कहने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाओगे की, डॉक्टर बेटे, तू और मेरे सेहत की जांच कर... एक बार नहीं कई बार कर... यह सबसे बड़ा फर्क है जो मुझे आप जैसी आम जिंदगी से अलग लक्ष्मणझूला सेतु बनाता है। मैं यह सब इसलिए बेबाकी से कह रहा हूं कि अब कोई डॉक्टर, इंजीनियर मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन आपको बता रहा हूं कि अपने डॉक्टर के साथ ऐसा मजाक कभी मत करना। बूढ़ा बुजुर्ग हूं, इसलिए बता रहा हूं... हां ऐसी दृढ़ता तुम में भी हो सकती है, बशर्ते तुम मेरी तरह सात्विक जीवन जिओ और प्रकृति के सापेक्ष आचरण करो।

खैर, छोड़ो मैं आज अपनी प्रवृति के विरुद्ध उपदेश दे रहा हूं.. जो मैंने अपने 90 साल की उम्र में नहीं दिया। लेकिन पता नहीं क्यों... अब मुझे लगता है, कि मुझे वास्तव में मेरा बुढ़ापा ऐसा करने को विवश कर रहा है। जो भी हो मैंने भी ठानी है कि आपको वह तमाम बातें बता कर दम लूंगा, जो एक नई पीढ़ी को बताने का फर्ज एक बुजुर्ग का होता है।

आपको पता है मेरा नाम लक्ष्मण झूला क्यों पड़ा..? दुनिया में मेरे जैसे जाने कितने सेतु हैं, लेकिन मुझे ही पूरी दुनिया ने क्यों इतना सम्मान और प्रेम दिया..? आज में आपको बताता हूं।

मैं जिस स्थान पर विराजमान हूं, यह भूमि देवताओं और ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है। गोमुख से निकल कर गंगा अपने साथ छोटे बड़े हिमनद, नदी और नयारों को मिलाकर पहाड़ों के बीच सर्पीले रास्तों से कलकल निनाद करते हुए यहां तक पहुंचती है। फिर यहीं से गंगा अपने उस चंचल और चपल स्वभाव को बदल कर शांत और गंभीर बहने लगती है। मानो वह इस तपोभूमि में तपस्यारत साधकों का ध्यान भंग नहीं करना चाहती हो। रामायण काल में भगवान राम के अनुज लक्ष्मण जी ने इसीलिए इस भूमि को तप के लिए चुना था। उन्होंने इसी भूमि पर आकर तप किया। तब से इस भूमि का नाम तपोवन हो गया। आपके यकीन के लिए मैं स्कंद पुराण के केदारखंड का ज़िक्र करना चाहूंगा। केदारखंड के अध्याय 123 के 25वें श्लोक में इस बात के प्रमाण काफी हद तक आपको मिल जाएंगे। गंगा की दाहिने छोर पर आज भी लक्ष्मण मंदिर स्थित है, जहां भगवान शिव लिंग रूप में विराजमान हैं। कुछ ही दूरी पर शेष मंदिर एक प्राकृतिक जल कुंड भी मौजूद है।

यहां आकर आप पुराने लोगों से उनके लक्ष्मण मंदिर से जुड़े अनुभव पूछ सकते हैं। इस मंदिर में स्थित शिवलिंग पर कभी अनगिनत सर्प लिपटे रहते थे, जो अब यदा-कदा ही सही मगर, यहां नजर आते हैं। लक्ष्मण जी को पुराणों में शेष नाग का अवतार माना गया है और सर्प भगवान शिव के आभूषण। शायद यह संयोग इन्हीं पौराणिक मान्यताओं को बल देते हैं। पुराणों में इसी स्थान पर 'इंद्र कुंड' जिसे कुछ लोग 'लक्ष्मण कुंड' भी कहते थे, कभी हुआ करता था। इस कुंड में स्नान करने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिल जाती थी। लक्ष्मण जी ने भी अपने कुष्ठ रोग के निवारण के लिए इस कुंड में स्नान किया था, ऐसा पुराणों में उल्लेख है। इस पौराणिक मान्यता से इतना तय है कि यह भूमि लक्ष्मण जी की तपोभूमि रही है।

अब सवाल यह उठता है कि इस स्थान पर सेतु (पुल) की जरूरत क्यों पड़ी..? चलो मैं यह भी प्रमाणिक तौर पर बता देता हूं। दरअसल, उत्तराखंड हिमालय के प्रसिद्ध धाम श्री बद्रीनाथ श्री केदारनाथ को पहुंचने का एकमात्र (पैदल) मार्ग यही था। पौराणिक मान्यता है कि भगवान श्री राम के अनुज लक्ष्मण ने सबसे पहले इस स्थान पर गंगा को पार करने के लिए जूट की रस्सियों की मदद से पुल का निर्माण किया था। इसके बाद भी इंसानी सभ्यता में यहां पर जूट की रस्सियों के सहारे ही पुल का निर्माण होता रहा। तब जूट की रस्सियों पर छींके के सहारे यात्री इसी गंगा को पार करते थे और आगे की यात्रा करते थे।

समृद्धि इंसानी सभ्यता के दौर में यह क्रम सन 1889 तक जारी रहा। इसी दौर में एक प्रसिद्ध संत जिन्हें बाबा काली कमली वाले के नाम से प्रसिद्धि मिली (स्वामी विशुद्धानंद) ने तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए ऋषिकेश से लेकर बद्रीनाथ, केदारनाथ गंगोत्री-यमुनोत्री के पैदल यात्रा मार्ग पर कई पड़ाव विकसित किए, जिन्हें चट्टियों का नाम दिया गया। ऋषिकेश से बद्रीनाथ पैदल मार्ग पर सत्यनारायण मंदिर (रायवाला) के बाद ऋषिकेश, लक्ष्मण चट्टी, गरुड़ चट्टी, मोहन चट्टी, महादेव चट्टी, कांडी, व्यास चट्टी, देवप्रयाग.. और फिर आगे संपूर्ण यात्रा मार्ग पर इसी तरह के पड़ाव विकसित किए गए। यानि कि बद्रीनाथ-केदारनाथ यात्रा के लिए लक्ष्मण झूला से गंगा को पार करना होता था। जिसके लिए यहां पर पुल (सेतु) की आवश्यकता महसूस की गई होगी।

सन 1889 में इन्हीं संत बाबा काली कमली वाले की प्रेरणा से कोलकाता के सेठ रायबहादुर सूरजमल झुनझुनवाला ने इस स्थान पर 50 हजार रुपये की लागत से लोहे की रस्सियों पर एक पुल का निर्माण कराया था, जो 1923 में गंगा में आई बाढ़ में बह गया और फिर मेरे निर्माण की कवायद, जैसा कि मैं पिछले खंड में बता चुका हूं। यह सेतु वास्तव में मेरा आदि पूर्वज था। मैं विशुद्ध रूप से विज्ञान की देन हूं, इसलिए धर्म और अध्यात्म के मामले में कमजोर हूं। यह सब तो प्रसंगवश मैंने आपको बता दिया। लेकिन इसमें जो इतिहास बताया गया है, वह सत्य की कसौटी पर खरा और प्रमाणिक है। मैं अब बूढा हो चला हूं..., इसलिए अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह इतिहास बताने की कोशिश कर रहा हूं।

जहां तक आस्था का सवाल है तो मैंने आप जैसे अनगिनत लोगों के दिलों में मेरे प्रति आस्था का वह भाव देखा। आपको याद हो या ना हो मगर मुझे खूब याद है कि जब तुमने पहली दफा मेरी हथेलियों में अपने पैर बढ़ाएं, उससे पहले एक अनजान आस्था ने तुम्हारा शीश मेरे सम्मान में झुका दिया था। तुमने मेरे ऊपर बेफिक्री से गंगा पार करने से पहले जाने क्यों मुझे अपने अंतर मन से सम्मान देते हुए प्रणाम कहा था। हालांकि मैंने कभी किसी से भी ऐसी अपेक्षा नहीं की थी।

मैं अपने निर्माण से लेकर आज तक, जब मैं बूढ़ा हो चला हूं... मैंने कभी अपने स्वार्थ को नहीं जिया और ना ही अपने स्वभाव को कभी स्वार्थी होने दिया। हां यह अलग बात है कि मेरा अस्तित्व ना जाने कितने लोगों को स्वार्थी बना गया। मैंने तो हमेशा स्वयं को भूगोल के दो खंडों के बीच अखंड रखने का प्रयास किया। मेरी इस अखंडता ने मेरे आस-पास की सभ्यता को इतना सुदृढ़ बना दिया कि अब मुझे इस सभ्यता की चिंता भी सताने लगी है। चिंता इसलिए कि जो सभ्यता मेरे बलबूते सुदृढ़ हुई, संपन्न बनी, मेरे बाद ना जाने क्या परिणाम होगा। मैं कभी अंतर्मुखी और स्वपोषी नहीं रहा। इसलिए, क्योंकि मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..., मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं.., मैं लक्ष्मणझूला सेतु हूं..,

@ - दुर्गा नौटियाल, ऋषिकेश

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