19 October, 2019

उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों में बसती हैं ये जनजातियां

नवीन चंद्र नौटियाल //

उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के समाज में अन्य के साथ ही कई जनजातियां भी सदियों से निवासरत हैं। इनमें भोटिया, जौनसारी, जौनपुरी, रंवाल्टा, थारू, बोक्सा और राजी जातियां प्रमुख हैं। अब तक इतिहास से संबंधित प्रकाशित पुस्तकों में इनका काफी विस्तार से वर्णन भी मिलता है। ऐसी ही कुछ किताबों से पर्वतीय राज्य की जनजातियों को संक्षेप में जानने का प्रयास किय गया है।

भोटिया जनजाति : 
उत्तराखंड की किरात वंशीय भोटिया जनजाति का क्षेत्र कुमाऊं- गढ़वाल से लेकर तिब्बत तक फैला हुआ है। भोटिया समुदाय के लोग अपनी जीवटता, उद्यमशीलता और संस्कृतिक विशिष्टता और विभिन्नता के लिए जाने जाते हैं। मध्य हिमालय की भोटिया जनजाति इसी क्षेत्र की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की जनजातियों में सर्वाधिक विकसित हैं। उनकी खुशहाली और समृद्धि गैर- जनजातीय लोगों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण है।

भोटिया वास्तव में एक जाति न होकर कई जातियों का समुदाय है। यह मध्य- हिमालयी क्षेत्र की सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है। इस समुदाय में मारछा, तोल्छा, जोहारी, शौका, दारमी, चौंदासी, ब्यांसी आदि जातियों के लोग शामिल हैं। कश्मीर के लद्दाख में इन्हें भोटा और हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में इन्हें भोट कहा जाता है। इनकी भाषा तिब्बती भाषा से मिलती- जुलती होने के कारण इन्हें उत्तराखंड के मूल निवासी रहे खसों में भी शामिल नहीं किया जा सकता है। भोटिया लोगों के भारत-तिब्बत सीमा पर बसे होने के कारण इनकी भाषा में तिब्बती प्रभाव होना स्वाभाविक है।

गढ़वाल में मारछा जनजाति के मूल गांव माणा, गमसाली, नीति और बम्पा हैं। जबकि तोल्छा लोगों के मूल गांव कोसा, कैलाशपुर, फरकिया, मलारी, जेलुम, फाक्ती, द्रोणागिरी, लाता, रैणी, सुराई ठोठा और सुबाई आदि हैं। सुबाई, मल्लगांव और सुक्की जैसे कुछ गांवों में दोनों जातियों की मिश्रित आबादी निवास करती है। तोल्छा जाति के लोग स्वयं को ऊंची जाति का मानते हैं।

अधिकतर जनजातियां ‘जल, जंगल, जमीन’ के समीप रहकर पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर रहते हैं और प्रकृति के रक्षक और मददगार भी साबित होते हैं। परन्तु भोटिया समुदाय के लोगों के साथ ऐसा नहीं देखा जाता है। भोटिया वास्तव में आजीविका के लिए एक घुमन्तु और व्यापारिक मानव समूह रहा है। भारत और तिब्बत के बीच में रहने और दोनों भू-भागों व्यापार करने के लिए उन्हें एक ऐसी विलक्षण भाषा की जरुरत पड़ी जो कि दुनिया के अन्य क्षेत्रों में न बोली जाति हो। न ही दूसरा व्यापारिक वर्ग उसे समझता हो। इसीलिए इनकी बोली को सांकेतिक भाषा भी कहा गया है। अलग-अलग क्षेत्रों के भोटिया लोगों के जनजीवन, बोली-भाषा और रहन-सहन में बहुत अंतर दिखाई देता है।
कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जिले के धारचुला क्षेत्र में रहने वाली ‘रं’ भोटिया जाति, मुनस्यारी क्षेत्र की शौका भोटिया जाति, गढ़वाल मंडल के चमोली जिले की नीति-माणा घाटी में रहने वाली रोंग्पा भोटिया जाति और उत्तरकाशी जिले की भटवाड़ी तहसील में रहने वाली जाड़ भोटिया जातियों की बोलियों में बहुत अंतर दिखाई देता है।

भोटिया जनजाति के लोग अन्य हिमालयी जनजातियों की तरह खेती और वनों पर आश्रित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने व्यापार को अपनी आजीविका का आधार बनाया। उत्तरकाशी से लेकर पिथौरागढ़ तक के सारे सीमान्त क्षेत्र में भोटिया समुदाय की बस्तियां प्रायः छोटी और छितरी हुई दिखाई देती हैं। ये स्वयं को खस राजपूत मानते हैं।

उत्तराखंड की जनजातीय विविधता में भी भोटिया जनजाति में जितनी सांस्कृतिक विविधता मिलती है, उतनी किसी अन्य जनजाति में नहीं मिलती। पिथौरागढ़ के भोटिया जहां शौक और फिर ब्यांसी, जोहारी और दारमी या रं कहलाते हैं, वहीं गढ़वाल के भोटिया मारछा, तोलछा और जाड़ जातियों के नाम से जाने जाते हैं। ये ना स्वयं को क्षत्रिय वंशी मानते हैं बल्कि इनके नाम भी अन्य क्षत्रिय जातियों की ही तरह होते हैं। गढ़वाल के मारछा, तोलछा और जाड़ ने गंगाड़ी क्षत्रियों की रावत, राणा, नेगी, कुंवर और चौहान जैसी उपजातियों भी अपनाई हुई हैं।

पलायन का असर समूचे उत्तराखंड में देखा जा सकता है। जब गढ़वाल और कुमाऊं दोनों ही मंडलों से असंख्य लोग पहाड़ों को छोड़कर मैदानी इलाकों की ओर पलायन कर रहे हैं, भोटिया जनजाति बहुल क्षेत्रों में भी पलायन का असर देखा जा सकता है। तिब्बत सीमा से लगी नीति घाटी के रैणी, लाता, सूकी, गुरपक, भल्ला गांव, फागती जुम्मा, द्रोणागिरी, गरपक, जेलम, संगला, कोषा, मलारी, कैलाशपुर, महरगांव, फरकिया, बम्पा, गमसाली और नीति जैसे गांवों में अब पुरानी रौनक नहीं रह गयी है। भोटिया जनजाति के इन गांवों में लगभग 60 प्रतिशत लोग निचली घाटियों में ही स्थायी रूप से बस गए हैं और ग्रीष्मकाल में लगभग 40 प्रतिशत लोग ही इन गांवों में लौटते हैं।

जौनसारी : 
जौनसारी गढ़वाल की प्रमुख जनजाति रही है। गढ़वाल के इन जनजाति बहुल क्षेत्र को जौनसार कहा जाता है। वास्तव में जौनसारी कोई जाति नहीं है बल्कि जौनसार- बावर क्षेत्र की विभिन्न उप- जातियों का एक समूह है। अपनी सांस्कृतिक विलक्षणता के कारण यह क्षेत्र हमेशा चर्चित रहा है। देहरादून जिले की चकराता, त्यूनी और कालसी तहसीलों के विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में फैला जौनसार भू-भाग गढ़वाल के कई विकासखंडों का स्पर्श करता है।

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर से लेकर देहरादून जिले की चकराता तहसील और उत्तरकाशी जिले के हिमाचल प्रदेश से लगे मोरी ब्लॉक तक की जनजातीय पट्टी में लगभग एक ही प्राचीन मानव समूह के लोग निवास करते हैं। इनमें टिहरी जिले का जौनपुर भी शामिल है। यहां आज भी पाण्डव या महाभारतकालीन सभ्यता के अंश मौजूद हैं। मूलतः ये लोग आयुद्धजीवी खस माने जाते हैं। इनके त्यौहारों और परंपराओं में युद्ध का अंश मौजूद रहता है।

जौनसारी गढ़वाल का सबसे बड़ा जनजातीय समूह माना जाता है। जौनसार-बावर के तीन उपखंड हैं- जौनसार, लोहखंडी और बावर। इस क्षेत्र का नाम जौनसार बावर कैसे पड़ा, इसमें विद्वानों का अलग-अलग मत है। यमुना के इस पार बसने वाले को जौनसार और पावर नदी के पार बसने वालों को पावर से बावर पुकारा जाता है। कुछ साहित्यकार जौनसार को यावान्सार का रूप मानते हैं क्योंकि इतिहास में यह क्षेत्र यवनी शासक के अधीन रहा है। नामकरण का कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन जौनसार-बावर क्षेत्र यमुना व टौंस नदी के मध्य एक द्वीप के समान है। यहां दो ब्लॉक चकराता और कालसी और तीन तहसीलें चकराता, कालसी और त्यूणी हैं।

जौनसार इलाके में कई जनजातियां निवास करती हैं। गढ़वाल के देहरादून जिले की कालसी, त्यूनी और चकराता तहसीलों के अंतर्गत आने वाले जौनसार-बावर इलाके में निवास करने वाली जौनसारी जाति स्वयं एक जनजाति है। जौनसारी जनजाति का सम्बंध महाभारत काल से माना जाता है। जौनसार और बावर वैसे तो दो अलग-अलग इलाके हैं परन्तु दोनों को एक साथ संबोधित किया जाता है। जौनसार के लोग स्वयं को पाण्डवों का वंशज मानते हैं जबकि बावर के लोग स्वयं को कौरवों (दुर्योधन) का वंशज मानते हैं। इन दोनों समुदायों के मध्य आपसी व्यवहार एवं संबन्ध इतिहास में कम ही रहे हैं। दोनों जनजातियों में आपस में शादी-विवाह भी नगण्य ही रहे हैं।

जौनसार क्षेत्र सांस्कृतिक विविधता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। चकराता और कालसी ब्लॉकों में जौनसारी, टिहरी के थत्यूड़ क्षेत्र में जौनपुरी और यमुना घाटी (कमल नदी घाटी) व रवाईं उप घाटी के पुरोला और मोरी ब्लॉकों में रंवाल्टा समूह के लोग निवास करते हैं। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश के सीमान्त क्षेत्र के लोग भी रीति-रिवाज और और खान-पान की दृष्टि से जौनसारियों के सहोदर माने जाते है। जौनसारी जाति के लोगों को मंगोल और खस प्रजाति के मिश्रण वाली जनजाति माना जाता है।

जौनसार बावर में उत्तराखंड के अन्य पहाड़ी इलाकों की ही तरह वर्ण व्यवस्था प्रचलित रही है, जिनमें प्रदेश के अन्य पहाड़ी इलाकों की ही तरह खस राजपूतों और ब्राह्मणों का दबदबा रहा है। इन दोनों जातियों में भी राजपूतों का वर्चस्व अधिक रहा है। इतिहास में खस मध्य एशिया की शक्तिशाली जाति रही है। जिसने झेलम घाटी से लेकर कुमाऊं तक के समस्त क्षेत्र में अपना अधिपत्य बनाए रखा था।

जौनसारी लोग महासू देवता की पूजा करते हैं। जौनसार में विवाह को जजोड़ा कहा जाता है। जौनसार की बहुचर्चित बहुपति प्रथा और बहु पत्नी प्रथा अब लगभग लुप्त हो चुकी हैं। जौनसारी लोग बैसाखी, दशहरा, दीपावली, माघ मेला, नुणाई, जगड़ा आदि त्योहार मनाते हैं। इस क्षेत्र में दीपावली पूरे एक महीने बाद मनायी जाती है।

रंवाल्टा- जौनपुरी :
उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में हिमाचल के सिरमौर से लेकर उत्तरकाशी के मोरी ब्लॉक की बंगाण पट्टी तक  रंवाल्टा- जौनपुरी जनजातीय समूह निवास करता है। जौनसार बावर के साथ जमुना पार जौनपुर क्षेत्र है जो जौनसार के रीति-रिवाज, बोली-भाषा से मिलता- जुलता है। जिससे जौनसार की कोरुखत, बहलाड़, लखवाड़, फैटाड़ और सेली खत मिलती हैं। जौनपुर कर नैनबाग, जमुना पुल, सिलवाड़ पट्टी आदि क्षेत्र मिलते हैं। जिनमें आपस में रिश्ते भी हैं।

थारू  :
उत्तराखंड में निवास करने वाली जनजातियों में से थारू जनजाति भी एक है। ये उत्तराखंड के तराई वाले क्षेत्र से लेकर उत्तर में नेपाल तक फैले हुए हैं। इनका प्रभाव क्षेत्र ज्यादातर कुमाऊं में रहा है। गढ़वाल के कुछ सीमान्त क्षेत्रों में थारू जनजाति के लोग मिल जाते हैं। यह जनजाति कृषि पर आधारित जनजाति रही है। इन्होंने तराई क्षेत्र की उपजाऊ ज़मीन को अपना कर्म- क्षेत्र चुना और धरती- पुत्र बन गये।

दुनिया की अधिकांश जनजातियां वनों पर निर्भर और आखेटक संग्राहक रही हैं और कृषि पर निर्भर न होने के कारण उनके जीवन को स्थायित्व नहीं मिला। लेकिन थारू जनजाति कृषि पर आधारित होने के कारण इनके जीवन को स्थायित्व मिला है। इसीलिए थारुओं की आबादी फलती-फूलती रही है। वे आज उत्तराखंड की तराई से लेकर उत्तर-प्रदेश के पीलीभीत तक फैले हुए हैं। थारू जनजाति के बारे में इतिहासकारों और साहित्यकारों के अलग-अलग मत हैं। कोई उन्हें मंगोलियन तो कोई उन्हें किरात वंशीय मानता है। वहीं दूसरी ओर थारू जनजाति के लोग स्वयं को राजस्थान के राजपूत और राणा प्रताप के वंशज मानते हैं।

बोक्सा :
बोक्सा को मानव-विज्ञानी लोग खानाबदोश मानते थे परन्तु बोक्स समुदाय के लोगों के तराई क्षेत्र में स्थायी होने के प्रमाण भी मिलते हैं। कुछ विद्वान् इन्हें मंगोलों की नस्ल का मानते हैं तो कुछ का मानना है कि ये किरातों के वंशज हैं। इतिहासकार इन्हें थारुओं की ही एक उप-शाखा भी मानते हैं।

थारुओं की ही तरह बोक्सा भी तराई के मूल निवासी हैं। ये भी स्वयं को राजस्थान के राजपूत मानते हैं। कुछ मानव विज्ञानी इन्हें थारुओं की ही एक शाखा मानते हैं। कुछ मानव विज्ञानी उन्हें मंगोलियन मानते हैं। बोक्स तराई के अलावा कोटद्वार- भाबर और देहरादून में भी बसे हैं। इनकी एक शाखा कभी मिहिर या मेहर नाम से देहरादून में पायी जाती थी, जो अब अन्य क्षत्रियों में विलीन हो गई है। सहारनपुर हिमाचल प्रदेश में भी इनकी कुछ शाखाएं हैं।

राजी :
उत्तराखंड की कई जनजातियां धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर हैं। अधिकतर जनजातियां अपने परिवेश में रहते हुए वर्तमान परिस्थितियों के साथ संघर्ष कर रही हैं। विलुप्त होती आदिम जातियों में से एक उत्तराखंड की ‘वन राजी’ या ‘वन रौत’ जाति भी शामिल है। प्रदेश से मिहिर या मेहर जनजाति पहले ही विलुप्त हो चुकी है या फिर किसी और जाति में विलीन हो चुकी है। राजी मूलतः आदिम आखेट आधारित मानव समूह है, जिसे ‘वन रावत’ या ‘वन मानुष’ के नाम से भी जाना जाता है। वन रावत का मतलब जंगल का राजा भी होता है। राजी लोग स्वयं को अस्कोट के प्राचीन राजवंश के वंशज मानते हैं, इसलिए वे अपनी जाति रजवार भी लिखते हैं, जबकि नृवंश विज्ञानी उन्हें किरातों के वंशज मानते हैं।

सन्दर्भ ग्रन्थः-
1- उत्तराखंड : जनजातियों का इतिहास - जय सिंह रावत
2- जौनसार बावर - ऐतिहासिक सन्दर्भ  (समाज, संस्कृति और इतिहास) - टीकाराम शाह

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नई दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया में शोधार्थी श्री नवीन चंद्र नौटियाल मूलरूप से उत्तराखंड राज्य के जनपद पौड़ी गढ़वाल के कोट ब्लॉक अंतर्गत रखूण गांव, सितोनस्यू पट्टी के मूल निवासी हैं। उत्तराखंड के इतिहास, साहित्य, भाषा आदि के अध्ययन में उनकी गहरी अभिरुचि है। उनका मानना है कि नई पीढ़ी को अपने इतिहास, परंपराओं, भाषा आदि की जानकारियां जरूर होनी चाहिए। इसीलिए वह सोशल मीडिया पर ऐसी जानकारियों को साझा कर अपनी मुहिम को जारी रखे हुए हैं।

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