31 May, 2019

अथश्री प्रयाग कथाः सिविल सेवा परीक्षा के प्रतियोगियों पर रोचक उपन्यास

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- गंभीर सिंह पालनी//

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे युवाओं को लेकर हिन्दी में लिखे गए उपन्यासों ‘डार्क हॉर्स’ (लेखकः नीलोत्पल मृणाल) तथा ‘अल्पाहारी गृहत्यागी’ (लेखकः प्रचंड प्रवीर) की सूची में हाल ही में एक और नये उपन्यास का नाम जुड़ गया है; यह उपन्यास है श्री ललित मोहन रयाल का नया उपन्यास ‘अथश्री प्रयाग कथा ’। जहां एक ओर ‘अल्पाहारी गृहत्यागी’ उपन्यास में आई.आई.टी. की प्रवेश-परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों की दुनिया का चित्रण है तो ‘डार्क हॉर्स’ उपन्यास शानो-शौकत वाली नौकरी आई.ए.एस. की अभिलाषा लिये प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे ग्रेजुएट/पोस्ट ग्रेजुएट युवाओं की ज़िंदगी और उनके संघर्षों को लेकर है।

श्री ललित मोहन रयाल का नया उपन्यास ‘अथश्री प्रयागकथा’ भी सिविल सेवा के  लिए चुने जाने हेतु प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे युवाओं की ज़िंदगी और उन के संघर्षों को लेकर है। ‘डार्क हॉर्स’ उपन्यास में जहां दिल्ली के मुखर्जी नगर व उसके आस-पास रह रहे ऐसे प्रतियोगी छात्रों की दुनिया है तो ‘अथश्री प्रयाग कथा’ में इलाहाबाद में रहकर संघर्ष कर रहे ऐसे छात्रों का संसार हमें देखने को मिलता है।

‘अथश्री प्रयाग कथा’ उपन्यास की चुटीली भाषा और अनूठा शिल्प पाठक को इस तरह बांध लेते हैं कि 175 पृष्ठों की इस पुस्तक को पढ़ना शुरू करने के बाद इसे पूरा पढ़े बिना रुकना मुमकिन नहीं। इस पुस्तक को पढ़ने से हमें पता चलता है, “प्रतियोगी परीक्षा का नशा बड़ी जल्दी चढ़ता है और उतरता बड़ी मुश्किल से है। साथ ही इस शहर का नशा, अगर एक बार चढ़ जाये तो ताउम्र हैंगओवर बना रहता है।”  

इस उपन्यास में हमें राज्यारोहण की अभिलाषा लेकर भारी संख्या में टिड्डी दल की तरह इलाहाबाद आने वाले लड़के मिलते हैं। पैसेंजर-एक्सप्रेस ट्रेनों में लदे, यहाँ तक की आरक्षित सीटों पर भी कब्जा जमाये छोकरे, गाँव-गिरांव से लेकर , कस्बाई शहरों तक के हिन्दी पट्टी के विभिन्न प्रान्तों के नौजवानों का संगम। कुछ संयुक्त परिवार की आशाओं को पूरा करने आये हुए तो कुछ अपने परिवार को दारिर्द्य से उबारने का सपना सँजोये। कुछ ‘इलाकाई मेधावी’ हैं जो झण्डा गाड़ने के इरादे से आये हुए  हैं, तो कुछ यशोलिप्सा की नीयत से। कुछ गरीब घरों से आए हुए हैं तो कुछ धन-धान्य से लैस, प्रचुर मात्रा में अनाज और आशीर्वाद भी साथ में लिए।

इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो कम होनहार हैं लेकिन ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं, कुछ ऐसे हैं कि मिडिल स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक अव्वल-ही-अव्वल। .....कुछ ऐसे हैं कि उन्हें देवासुर संग्राम से लेकर, आज तक का डाटा, सब जुबानी याद। कई तो धुरंधर खैनीबाज। 

जरा इन लड़कों के रहने की व्यवस्था पर नजर डालिएः
“दस-बाई-दस के कमरों में, छह बाई तीन के तख्त पर जूझते छात्र। पटखाट या फोल्डिंग पलंग पर आसान जमाये, हठयोगी की तरह, किस्मत को चुनौती देते छात्र। इस शहर में, इस पॉश्चर में, सहस्रों मिल जाते हैं। ...तीसरी मंजिल पर भी कक्ष। वस्तुतः वे कक्ष थे ही नहीं। स्टोर अथवा टूटी-फूटी सामग्री को फेंकने का स्थान रहा होगा, जिसे झाड-पोंछ कर कक्ष का स्वरूप दे दिया गया हो।”

दस-बाई-दस के इन कमरों को लड़के पार्टनरशिप में लेते हैं। “सौ वर्ग फीट क्षेत्रफल का विभाजन, दो महत्वाकांक्षी सरदारों के बीच ऑटोमैटिकली हो जाता है। ....वे एक- दूसरे का क्लेश हरते हैं। दूसरे के अनजान अतीत की जानकारी रखते हैं । एक-दूसरे के ‘टॉप सीक्रेट ’जानते हैं, तो ‘ट्रेड सीक्रेट’ भी। यदि दोनों नौसिखिये बछड़े हैं तो साथ-साथ गिरते हैं। रो-धोकर, फिर से ठोस रणनीति बनाते हैं। ...’घास की रोटी खाएँगे, भूमि-शयन करेंगे’ श्रेणी के जज़्बात, छलकने लगते हैं।”

इन लड़कों का बहुत- ही सजीव चित्रण उपन्यास में हमें देखने को मिलता है। इसकी एक बानगी देखियेः
पिज्जा को खाकर गँवई पृष्ठभूमि से आया लड़का कहता है, “ई होत है पिज्जवा। ई तो हम गउँवा में ढेर खाए रहे। रोटिया के अंदर प्याज-टमाटर-धनिया भर-भर के खूब खाये रहे।” 

इन कमरों में रहने वाले लड़कों द्वारा आपस में पालियाँ नियत कर दी गयी थीं। एक खाना बनाएगा तो दूसरा बर्तन मांजेगा, चक्रीय क्रम में। रोस्टर व्यवस्था कड़ाई से लागू। इस तरह के माहौल में रहते हुए ये लड़के बहुत पुराने रेडियो पर बी.बी.सी., वॉयस ऑफ अमेरिका, परिक्रमा, सुर्खियों से आगे, स्पॉटलाइट आदि प्रोग्राम दिल थामकर सुनते हैं। किसी के खाँसने या छींकने का विघ्न भी बर्दाश्त नहीं। इस ‘अट्टालिका अरण्य’ में विलासिता की एकमात्र सामग्री ‘विविध भारती’ के प्रोग्राम ही मनोरंजन के साधन थे।

जो लड़के सफलता की आस में कई-कई बरस से यहाँ जमे हुए हैं, उन्हें स्वाभाविक तौर पर ‘सीनियर’ या ‘गुरु’का दर्जा प्राप्त है। जाहिर है, वे जूनियर लड़कों के सामने ज्ञान भी बघारते हैं और रौब भी गाँठते हैं।

इन लड़कों की “अपनी महत्वाकांक्षा का कैनवास भी छोटा-मोटा नहीं है, बहुतै बड़ा है। कुर्सी चाहिए, तो सिर्फ और सिर्फ आबनूस की। बहुत हुआ तो बर्मी टीक - सागौन की। इस से नीचे स्टैंडर्ड नहीं गिरा सकते।  नो कोंप्रोमाइज , जीवन में सब कुछ कर सकते हैं; बस इस मामले में समझौता नहीं कर सकते। लोहा-लक्कड़ और प्लास्टिक की कुर्सी तो कहीं भी मिल जाती है। रेलवे स्टेशन और पालिका दफ्तर के बाहर, पार्क में तो हमेशा लगी रहती है।

वे अब वापस नहीं लौट सकते। विफल होकर वापस लौटना कायरता है, पीठ दिखाना है। वे सब कुछ कर सकते हैं, पीठ नहीं दिखा सकते। ऐसे मौकों पर उनके अंदर का मध्ययुगीन सिपाही जाग्रत हो उठता है, जो प्रतिबद्धता याद दिलाता रहता है; शहीद होंगे तो इसी रणभूमि में होंगे। ‘होगा कि नहीं होगा‘ का पेंडुलम लगातार झूलता रहता है, जो मन को डगमगा जाता है। वापस लौटना मुमकिन नहीं। ऐसा किए तो भरोसा खो बैठेंगे - परिवार और समाज दोनों का। खैर, समाज की तो ऐसी-की-तैसी। परिवार की नज़रों में गिरने से सचमुच भय लगता है और उस से ज्यादा भय, अपनी नजरों में गिरने से।”

अपने सपनों को सँजोये इलाहाबाद में डटे हुए इन लोगों की स्थिति यह है कि वे जिस खेल में अब  शामिल हो चुके हैं, उसे अधूरे में छोड़ कर वापस घर नहीं भाग सकते। वापसी की तो सोच भी नहीं सकते। इन के इतने वर्षों से इलाहाबाद में डटे होने के कारण अब घर वाले भी संयम खोने लगे हैं। बार-बार पूछते हैं, “कब तक हो जाएगा?” दूसरी तरफ रिश्तेदार घर वालों को बिन मांगी सलाह दे जाते हैं,” बचवा ऊंचा सपना देखा है, पाना आसान नहीं। ऐसा न हो कि सपना, सपना ही रह जाये।” जब रिश्तेदार घर वालों को भरमा नहीं पाते तो स्वरोजगार का विकल्प सुझाते हुए अपने कमाऊ पूत का बखान करने लगते हैं जिस से घर वाले उनके बहकावे में आकर और भी विचलित हो जाते हैं।

कुछ लड़कों को परीक्षा भी एक किस्म की युद्धभूमि जान पड़ती है। इस के लिए तैयारी करने के विविध तरीके हैं। एक सज्जन तो प्रतियोगिता से संबन्धित विशेष किताब को वहाँ से पढ़ना शुरू करते थे, जहां पर हॉलोग्राम चस्पा रहता है, असली-नकली का भेद बताने वाला। ....फिर ऑफसेट प्रिंटिंग प्रैस वगैरह से पारायण शुरू करते थे और वहाँ तक, जहां पर बारकोड नंबर, आई.एस.बी.एन. नंबर छपा रहता है। ....रीतिकालीन ग्रन्थों को भरपेट पढ़ते थे। शृंगार का सम्पूर्ण रस खींच लेने में वे विलक्षण थे, लगभग सांस्कृतिक दस्यु।

ऐसा रस - भरा वातावरण भला क्यों न हो, जब वहाँ ऐसे सीनियर मौजूद हों, जो सलाह देते हों कि चित्त का स्वभाव ही है चंचलता। चिकित्सकीय लिहाज से भी यह उचित जान पड़ता है कि हृदय अगर किसी ‘दीगर’ के पास रेहन अथवा गिरवी पर रखा हो, तो हृदयाघात का सवाल ही पैदा नहीं होता। दिल का दौरा पड़ने का टंटा खत्म।

उपन्यास लेखक की डेढ से दो दशक पुरानी स्मृतियों को सँजोये हुए है, जब वह स्वयं भी इलाहाबाद में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी किया करता था। सिविल सेवा परीक्षा के तीनों चरणों प्री, मेन तथा इंटरव्यू से जुड़े प्रसंगों को भी लेखक ने पुस्तक में अत्यंत रोचक प्रवाह के साथ समेटा है।

उपन्यास में लोकोक्तियों, मुहावरों और सूक्तिनुमा वाक्यों का प्रयोग बहुत ही शानदार अंदाज में किया गया हैः “इतने अरसे से तो घुइयाँ ही छील रहे हैं”, “उसका जन्म, धनु राशि के मूल नक्षत्र में हुआ था, एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा”, “तभी उन का एक मुंहलगा चेला, आगे को बढ़ आया। संभवतः वह नीम-हकीम रहा होगा”, “हौसला, उनका बढ़ा-चढ़ा हुआ है। सातवें आसमान पर है।”, “छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता”,  “प्रकृति संतुलन कैसे साधती है, परिवर्तन से”, “पथ की बाधाओं से कभी विचलित नहीं होना चाहिए। जीवन में बहुत सी परस्पर असंबद्ध घटनाएँ घट जाती हैं”, “जब वे झुंड में नए नवेले आए थे, हर ओर सींग फँसाते रहते थे”, “जमाना खराब है, जिल्द देखकर किताब खरीदने का रिवाज है”,  “मछली, पानी कब पीती है, पड़ोसी मछली तक को कानोंकान खबर नहीं हो पाती”,  “धार्मिक ज्वार भी कभी - कभी उद्देश्य देखकर उमड़ता है। ” “दो सीट और होती तो बेड़ा पार हो जाता”,  “तुम रहे घोंघा के घोंघा।”

संस्मरणात्मक शैली मे लिखा गया यह उपन्यास एक वरिष्ठ लोक - सेवक के द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के दौरान जिये हुए अनुभवों और देखे हुए संसार को पूरी जीवंतता के साथ समेटे हुए है । समस्त पात्रों और प्रसंगों के चित्रण बड़े ही सजीव बन पड़े हैं।

इन प्रतियोगियों में से कोई उपन्यास का नायक नहीं है बल्कि सभी प्रतियोगी  नायक हैं। फिर भी अखिलेश का जिक्र यहाँ जरूरी है जो कि इस बार परीक्षा में सफल होने के बाद इंटरव्यू देकर इलाहाबाद जाने के बजाय अपने गाँव लौट आए हैं “उत्तम खेती मध्यम बान” का विकल्प अपनाने, चूंकि इस आखिरी प्रयास में अब सफल होने की धुंधली उम्मीद भी बाकी न थी। खरीफ का सीजन था। रोपनी चल रही थी। आपाद -मस्तक मिट्टी, कीचड़ में सने अखिलेश झुककर फावड़ा चलाने में तल्लीन हैं कि उन्हें ऑल इंडिया रेंकिंग में नवें रेंक में चुने जाने का समाचार मिलता है। अखिलेश को कुछ नहीं सूझता कि खुशी कैसे मनाएँ। एक मन तो कर रहा था कि इन्हीं खेतों में लोट लगाएँ और बार - बार लगाएँ पर इस उद्दाम भावना को उन्होने जैसे - तैसे जज़्ब कर लिया था।

उपन्यास का अंत आते-आते ऐसे ही एक प्रतियोगी दीपक सिंह भी मेधा सूची में मनवांछित स्थान पा जाते हैं। कीर्तिमान स्थापित करते हैं। जो इन्हें नहीं जानते, उन्हें इस परिणाम पर आश्चर्य होता है। जो इन्हें जानते थे, उन्होने कहा, “यह तो होना ही था।”

उपन्यास की भाषा इलाहाबादी फ्लेवर लिए हुए है जिसका अपना विशेष स्वाद पाठक नहीं भूल पाता। इस अविस्मरणीय कृति के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं।
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समीक्षित पुस्तक :
अथश्री प्रयाग कथा (उपन्यास ), पेपर बैक संस्करण,
लेखक : ललित मोहन रयाल,
मूल्य 200 रुपये,
प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स,
4/19 आसफ अली रोड,
नई दिल्ली, 110002

समीक्षक :  गंभीर सिंह पालनी, 26-ए, दानपुर, वाया रुद्रपुर- 263153 (उधमसिंहनगर) उत्तराखंड. (मोबाइल- 9012710777)

30 May, 2019

राजशाही को हम आज भी ढो रहे

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डॉ. अरुण कुकसाल/- 
’हे चक्रधर, मुझे मत मार, घर पर मेरी इकत्या भैंस है जो मुझे ही दुहने देती है। हे चक्रधर, मुझे मत मार, घर पर मेरे बूढ़े पिता हैं। तू कितना निर्दयी है चक्रधर जो हमारी प्रार्थना को भी अनुसुना कर रहा है। चक्रधर, तेरी गोली से कोई सामने मर कर गिर रहा है तो बहुत से जान बचाने के लिए युमुना नदी में कूद रहे हैं।’ तिलाड़ी विद्रोह पर आधारित लोकगीत का भावानुवाद।

तिलाड़ी विद्रोह (30 मई,1930) की 89वीं पुण्यतिथि पर यमुना के उन 100 से अधिक बागी बेटों को नमन और सलाम जिन्होंने अपने समाज के प्राकृतिक हक-हकूकों के लिए टिहरी राजशाही के सामने झुकने के बजाय जान देना बेहतर समझा और आज उन्हीं वीरों के हम वशंज तथाकथित जनतंत्र की खाल ओढ़े पहाड़ के जंगलों को मात्र तमाशाबीन बन धूं-धूं कर जलते हुए देखने को विवश हैं।

’तिलाड़ी विद्रोह’ को याद करते हुए रवांई के ‘सरबड़ियाड़’ क्षेत्र की यात्रा 
(13-16 जुलाई 2016) का एक भाग ...

वो रहा तिलाड़ीसेरा रवांई ढंडक का चश्मदीद गवाह
13 जुलाई, 2016 
.......देर शाम रात्रि विश्राम के लिए बड़कोट से गंगनानी (5 किमी.) की ओर चलना हुआ। ‘पलायन एक चिंतन’ अभियान के सक्रिय सदस्य विजयपाल रावत भी अब हमारे साथ हैं। विजय बातों-बातों में बताते हैं कि रवांई में एक कहावत है ‘दुनिया सरनौल तक है उसके बाद बड़ियाड है।’ मतलब यह कि सरनौल गांव के बाद ऐसा लगता है कि हम किसी नयी और अनोखी दुनिया में जा रहे हैं।

विजय सरनौल तक पहले गए हुए हैं, पर पैदल। अब तो सरनौल तक गाडी जाती है। आज के रात्रि ठिकाने पर पहुंचे तो नजर आया ’वन विश्राम गृह, गंगनानी, कुथनौर रेंज’। आपने स्वः विद्यासागर नौटियाल जी का उपन्यास ‘यमुना के बागी बेटे’ पढ़ा है? विजय उत्सुकता से प्रदीप से पूछतें हैं। नहीं, पर अब पढ़ना चाहता हूं, प्रदीप ने कहा। मुझे याद आया, अरे हां, यही तो वो डाकबंगला है, जहां पर टिहरी राजशाही के तत्कालीन दीवान चक्रधर जुयाल ने अन्य राजकर्मियों के साथ मिलकर तिलाडी विद्रोह (30 मई 1930) की साज़िश रची थी।

‘यमुना के बागी बेटे’ उपन्यास में इस डाकबंगले का प्रमुखता से जिक्र है। टिहरी रियासत के इतिहास का वो काला पन्ना याद करते ही सिरहन महसूस होती है। इस 100 साल पुराने डाकबंगले को नया स्वरूप दिया गया है। पर बंगले की आत्मा तो वही होगी, मैंने सोचा। रात इस बंगले में सोने का रोमांच अब और बढ़ गया है। रवांई के लोगों के उस विद्रोह पर बात चल ही रही थी कि खबर आयी कि सरबडियाड़ क्षेत्र के 12 ग्रामीणों को पेड़ों को काटने के जुर्म में आज ही गिरफ्तार किया गया है। माजरा क्या है ? यह समझने में कुछ देर लगी।

उसके बाद तो हर किसी के मोबाइल घनघनाने लगे। बात यह सामने आयी कि बड़ियाड़ क्षेत्र के लिए गंगटाडी पुल से सर बड़ियाड गांव़ को वर्ष 2008 में स्वीकृत 12 किमी. की सड़क के अब तक भी न बनने के विरोध स्वरूप किन्हीं ग्रामीणों ने प्रस्तावित सड़क के आर-पार के सैकडों पेड़ धराशायी कर दिए थे। पता लगा कि बड़ियाड़ क्षेत्र की ओर जाने वाली यह पहली सड़क होगी। 8 साल से सड़क आने की उत्सुकता और धैर्य जब जबाब दे गया तो ग्रामीणों का आक्रोश इस रूप में सामने आया।

पेड़ काटने की जानकारी वन विभाग के अधिकारियों के संज्ञान में आने पर आज ग्रामीणों पर कार्रवाई हुई है। प्रदीप टम्टा (सांसद, राज्यसभा) उच्च अधिकारियों से बात करके यह समझाते हैं कि ग्रामीणों की मंशा कोई गलत नहीं थी। स्वीकृत सडक का 8 साल तक न बनना उनके प्रति एक अन्याय ही है। आखिरकार, देर रात पकडे गये 12 ग्रामीणों को छोडने में सहमति बन ही जाती है।
रात को सोने से पहले की गप-शप को विराम देते हुए विजयपाल रावत ’तिलाड़ी कांड’ में दीवान चक्रधर जुयाल की क्रूरूरता पर बने लोकगीत को पूरी लय-ताल से सुना रहे हैं-

’ऐसी गढ़ी पैंसी, मु ना मा्रया चक्रधर मेरी एकत्या भैंसी,
तिमला को लाबू, मु ना मा्रया चक्रधर मेरा बुड्या बाबू,
भंग कू घोट, कन कटु चक्रधर रैफलु को चोट,
लुआगढ़ी टूटी, कुई मरगाई चक्रधर कुई गंगा पड़ौ छुटी....

’मतलब तो बता भाई, इस गीत का’ मैंने कहा। मतलब ये है भाई सहाब लोगों कि ’ढंडकी (राजशाही के विरुद्ध आन्दोलनकारी) गोलीबारी के दौरान कह रहे हैं कि ’हे चक्रधर मुझे मत मार घर पर मेरी इकत्या भैंस है जो मुझे ही दुहने देती है। हे चक्रधर, मुझे मत मार मेरे पिता बहुत बूढ़े हैं। तू कितना निर्दयी है चक्रधर, जो हमारी प्रार्थना को भी अनसुना कर रहा है। चक्रधर, तेरी गोली से कोई सामने मर कर गिर रहा है, तो बहुत से जान बचाने के लिए यमुना नदी में कूद रहे हैं।’

अब बसकर विजय भाई, कहीं रात को सपने में हमें भी न कहना पड़े कि ’चक्रधर, मुझे मत मार, सोने दे यार’। और वाकई, रवांई ढंडक के इस कुख्यात बंगले में रात को अजीबो-गरीब सपने आते रहे। सुबह बंगले के चौकीदार ने कहा ’हां साब, ऐसा यहां रात रुकने वाले सभी साब बोलते हैं।’

14 जुलाई, 2016
.....बड़कोट के पास ही यमुना पर बने पुल को पार करके तीखी चढ़ाई की एक धार पर पंहुचते ही विजय ने कहा ‘वो रहा तिलाड़ीसेरा रंवाई ढंडक का चश्मदीद गवाह’। (30 मई, 1930 को तिलाड़ीसेरा में तिल रखने की भी जगह नहीं थी। 10 दिन पहले 20 मई 1930 को राड़ी डांडा में हुए गोलीकांड का गुस्सा सारे रंवाई के लोगों में था।
लिहाजा सैकड़ों की संख्या में रंवाई के रवांल्टा टिहरी राजशाही के खिलाफ निर्णायक जंग लड़ने को उस दिन तिलाड़ीसेरा में जमा हुए थे। पर वे कुछ कर पाते उससे पहले ही राजा के करिन्दों ने एकत्रित भीड़ पर गोलियां चला दी, जिससे 100 से ज्यादा लोग मारे गये थे। बहुत से आंदोलनकारियों ने जान बचाने के लिए पास बहती यमुना नदी छलांग लगा दी, पर गदगदाई यमुना के तेज प्रवाह में वे न जाने कहां समा गये।

बताते हैं कि बाद में राजशाही के कारिदों ने यहां-वहां बिखरे शहीद ग्रामीणों को स्वयं ही नदी में प्रवाहित कर दिया था। ताकि गोलीकांड के सबूत मिटा कर घटना की भयावहता को कम दिखाया जा सके। परन्तु टिहरी राजशाही का क्रुर सच छुप नहीं पाया। बाद में इस घटना को उत्तराखण्ड का ‘जलियांवाला कांण्ड’ कहा जाने लगा।)

भाई लोगों, जहां हम खडे़ हैं, यहीं इसी धार से राजा के सैनिकों ने 30 मई, 1930 को ढंडकियों पर कई राउण्ड गोलियां चली थी। धांय-धांय, धांय-धांय। कुछ गिरे, कुछ इधर-उधर भागे, तो कुछ ने यमुना नदी में छलांग लगाई जान बचाने को पर बदकिस्मत जान गवां बैठे। यमुना के उन बागी बेटों को सलामी देते तिलाड़ी सेरा की ओर मुखातिब विजय हमें उस घटना के बारे भी और भी बताते जा रहें हैं। इसी धार के पास बडकोट महाविद्यालय का नवनिर्मित परिसर लगभग तैयार होने को है।

विजय बड़कोट महाविद्यालय छात्रसंघ के वर्ष 2004-05 में अध्यक्ष रहें हैं और बढ़िया बात यह है कि उन्हीं के कार्यकाल में यह परिसर स्वीकृत हुआ था। प्रदीप कहते हैं, बधाई ! विजय, यह कालेज तो तुम्हारा विजय पथ है।..........

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डॉ. अरुण कुकसाल

29 May, 2019

‘खुद’ अर ‘खैरि’ की डैअरि (diary)


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समीक्षक -आशीष सुन्दरियाल / 
संसार की कै भि बोली-भाषा का साहित्य की सबसे बड़ी सामर्थ्य होंद वेकी संप्रेषणता अर साहित्य की संप्रेषणता को सबसे बड़ो कारण होंद वे साहित्य मा संचारित होण विळ संवेदना, प्रकट होण वळा भाव। अर भाव एवं भावोनुभूति की शब्दों का माध्यम से अभिव्यक्ति से रचना होंद कविता की। या फिर इनो भि ब्वले सकेंद कि कविता तैं जन्म देंद ‘भाव’, वो भाव जो जन्म ल्हेंदी ‘मन’ मा, जै खुणि गढविळ मा ब्वलदां हम ‘ज्यू’।

‘ज्यू त ब्वनू च’ कविता संग्रह मा भी हम तैं कवि अनूप रावत का ज्यू याने मन मा जन्म ल्हेंदा भाव अर यूं भावों से जन्म ल्हेदीं कविता ही नजर औंदिन्। अर शायद ये ही कारण से गढविळ का वरिष्ठ साहित्यकार मदन मोहन डुकलान यीं किताब की भूमिका को शीर्षक रखदन ‘क्वांसा पराणै कुंगलि कविता’ याने भावुक हृदय की कोमल कविताएं।

‘ज्यू त ब्वनू च’ कवि अनूप रावत की पैलि पुस्तक च अर अपणा ये पैला कविता संग्रह मा वो बनि- बनि की बावन कविताओं तै ल्हेकि पाठकों का समणि औणा छन। कवि को मूल स्वर पयालन च जनकि यीं पुस्तक का वास्ता द्वी शब्द लिखद दौं वरिष्ठ साहित्यकार दिनेश ध्यानी जी भी रेखांकित कर्ना छन। पर दगड़ मा कवि जन्मभूमि का प्रति वेको प्रेम, वखा समाज से वेको जुड़ाव अर वखै संस्कृति से वेको लगाव तैं भी लगातार अपणी रचनाओं का माध्यम से अभिव्यक्त कर्नू च। वे तैं अपणा घर-गौं की ‘खुद’ लगणी च अर इलै वो ल्यखणू किः

ज्यू त ब्वनू च कि
सट्ट से जौं ब्वे की खुचिलि मा
सब दुःख विपदौं तै बिसरि
पर क्य कन मी दूर परदेश
अर मेरि ब्वे च दूर डांडा घार

-‘ज्यू त ब्वनू च’ बटे

कवि अनूप रावत भले आज भैर ऐकि रैणू च पर वेको ज्यू (मन) आज भी पहाड़ मा हि च। पहाड़ का प्रति आज भी वो सचेत च। वखै हर साहित्यिक, सामाजिक व राजनैतिक घटना पर वेकि पैनी नज़र च। तबि त उतराखण्ड राज्य को अपेक्षित विकास नि ह्वे यीं बात से कवि को युवा हृदय आक्रोशित च अर वो जनप्रतिनिधियों से सीधा सवाल कर्नू च कि-

खैरि खांदा-खांदा गरीब मिटिगे
गरीबी मिटेली, ब्वाला कब तक
देरादूण बल खूब हूणी च बैठक
विधायक जी पहाड़ आला, ब्वाला कब तक

- ‘ब्वाला कब तक’ बटे

हर छ्वटा बड़ा काम मा शराब को प्रचलन आज उत्तराखण्ड मा आम बात ह्वेगे। ‘सूर्य अस्त अर पहाड़ मस्त’ की समस्या से त्रस्त पहाड़ी समाज की यीं वेदना से अनूप रावत को कवि हृदय भी अछूतो नी च। दारू दैंत्य पर कवि अनूप लिखद कि...

यीं निरभै दारूल मेरू गौं-मुलुक लुटियाली
पींण वलों की डुबै, बेचण वलों की बणैयाली
पक्की बिकणी च खुलेआम बजारों मा
कच्ची बणणी च दूर डांडा धारू मा
बणीं मवसी यीं दारुल घाम लगैयाली

-‘निरभै दारु’ बटे

शराब का दगडै़-दगड़ कन्या भ्रूण हत्या, दहेज व अन्धविश्वास जनी कतनै सामाजिक बुराइयों पर भी ये कविता संग्रह मा अनूप रावत की कलम चलयीं च। दगड़ मा वो चकबन्दी जना जनजागृति अर सामाजिक चेतना का मुद्दा पर भी चुप नी बैठदा।

युवा कवि हूणा का नाता उम्मीद छै कि कुछ श्रृंगार रस की कविता ये संग्रह मा होली पर ये मामला मा शायद अनूप अभि जरा पैथर च, पर ब्यंग्य व हास्य रस की कुछ कविता ज़रूर यीं पोथि मा पढ़णा खुणि मिलदन्। जनकि-

बजार गयुं तो गजब देखा
चौमीन मोमो बर्गर बिकते देखे
च्या बणाएगा अब तो कौन
पेप्सी लिम्का कोक बैठि पीते देखे
हकबक तो तब रै गया मैं जब
ह्यूंद में आईसक्रीम खाते देखे

-‘कतगा बदल गया अब उत्तराखण्ड’ बटे

भाषा-शैली की दृष्टि से ‘ज्यू च ब्वनू च’ मा भौत ही सरल अर आम बोलचाल की भाषा को इस्तेमाल कवि अनूप रावत को कयूं च। कखि कखिम वूंकी स्थानीय बोली को प्रभाव ज़रूर च, पर नयी पीढ़ी आसानी से बींग जावा कवि इनो प्रयास करदो नज़र आणू च। तबि त इंग्लिश अर हिन्दी का शब्द भी यत्र-तत्र दिखे जंदिन। दगड़ मा कुछ नया बिम्ब व प्रतीक भी यीं पोथि मा प्रयोग हुयां छन जो कि नया जमना अर नयी सदी का हिसाब से स्वाभाविक भी छन अर सटीक भी।

कुल मिलैकि, 52 कविताओं को यो कविता संग्रह 21वीं सदी का एक युवा कवि की गढ़-साहित्य सृजन का यज्ञ मा पैली अग्याल़ च अर उम्मीद च कि वो अपणी यीं सृजन यात्रा तैं निरन्तर अगनै बढाणा राला अर साहित्य को भण्डार भ्वर्ना राला।
इनी शुभकामनाओं का दगड़-

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समीक्षक -आशीष सुन्दरियाल

28 May, 2019

कही पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो

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जनकवि- डॉ. अतुल शर्मा/

गांव-गांव में नई किताब लेके चलो
कहीं पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो।

हर आंख में सवाल चीखता रहेगा क्या
जवाब घाटियों में बंद अब रहेगा क्या
गांव-गांव में अब पैर को जमा के चलो
कहीं पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो।

भ्रष्ट अन्धकार का समुद्र आयेगा
सूर्य झोपड़ी के द्वार पहुंच जायेगा
आंधियों के घरों में भी जरा जा के चलो
कही पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो।

तेरी जुबान का सागर तो आज बोलेगा
ये गांव के गली के राज सभी खोलेगा
दिलों की वादियों में गीत का एक बहा के चलो
कहीं पे आग कहीं पे नदी बहा के चलो।

डॉ. अतुल शर्मा, एक परिचय
- प्रसिद्ध जनकवि, विभिन्न राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों के मंचों पर सक्रिय उपस्थिति व गीत प्रचलित।
- उत्तराखंड आंदोलन सहित विभिन्न जनांदोलन में रचनात्मक भागीदारी।
- स्वतंत्र लेखन, कविता, कहानी, उपन्यास व नाटकों पर चालीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।
- स्वाधीनता संग्राम सेनानी एवं कवि श्रीराम शर्मा ‘प्रेम पर आधारित पांच पुस्तकों का संपादन, वाह रे बचपन (संपादित) विशेष चर्चित।
- जनकवि डॉ. अतुल शर्मा विविध आयाम : डॉ. गंगाप्रसाद विमल व डॉ. धनंजय सिंह द्वारा संपादित कवि के कृतित्व पर प्रकाशित उल्लेखनीय दस्तावेज।

इंटरनेट प्रस्तुति- धनेश कोठारी

‘काफल’ नहीं खाया तो क्या खाया?


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देवेश आदमी/-

'काफल' (वैज्ञानिक नाम-मिरिका एस्कुलेंटा - myrica esculat) एक लोकप्रिय पहाड़ी फल है। इस फल में अनेकों पौस्टिक आहार छिपे होते है। खनिज लवणों से भरपूर यह फल मानव जीवन से जुड़ा हुआ है। काफल दुनियां का अकेला फल है जिस पर 9 महीने के फूल (बौर) आने के बाद फल लगते है। उत्तरी भारत के पर्वतीय क्षेत्रों (उत्तराखंड, हिमाचल) और नेपाल के हिमालयी तलहटी क्षेत्र में पाया जाने वाला एक वृक्ष है। जो कि सदाबहार होता है, काफल का फल चैत्र माह में लगता है।

काफल पर फूल जेठ माह में आ जाते हैं। काफल के पेड़ पर फल खत्म होने के 1 महीने बाद फूल आ जाते हैं। इसके पेड़ काफी बड़े होते हैं, ये पेड़ ठण्डी जगहों में होते हैं। काफल के पेड़ मानव आबादी के इर्दगिर्द होते है। इसका छोटा गुठली युक्त बेरी जैसा फल गुच्छों में आता है। जब यह कच्चा होता है तो हरा दिखता है और पकने के बाद लाल हो जाता है। इसका खट्टा-मीठा स्वाद बहुत मन को भाने वाला और पेट की समस्याओं में बहुत लाभकारी होता है। यह पेड़ अनेक प्राकृतिक औषधीय गुणों से भरपूर है।

गर्मियों में लगने वाले ये फल पहाड़ी इलाकों में विशेष रूप से लोकप्रिय है। पहाड़ां से काफल का अस्तित्व जिस दिन खत्म हो गया उसी दिन पहाड़ों में मानव जीवन भी खत्म हो जाएगा। जर्मनी, फ्रांस व अमरीका में काफल पर शोध किया गया तो पता चला कि सब से बेहतरीन रंग काफल के फल, पत्तों व छाल से बनते हैं। काफल का रंग आसानी से नहीं छूटता है

काफल की छाल से कब्ज, नकसीर, वाइरल फीवर जैसी बीमारियां ठीक होती है। काफल के तनों पर जमी बरसाती शैवाल एक प्रकार का मसाला है जिस का नाम कल्पासी भी है। यह शैवाल आंतों के रोगों में भी दवाई बनाने के काम आता है।

विशेषकर उत्तराखंड की अगर हम बात करें, जिसे देवभूमि कहा जाता है, यहां पर 500 से भी अधिक प्राकृतिक वनस्पतियों, औषधियों का भण्डार है।

काफल में बहुत सारे के प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं- 
1- इस प्राकृतिक फल में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट तत्व पेट से संबंधित रोगों को खत्म करते हैं।
2- इसकी पत्तियों में फ्लावेन -4'-हाइड्रोक्सी-3 ग्लाइकोसाइड्स और मैरिकिट्रिन पाया जाता है।
3- दांतून बनाने से लेकर, चिकित्सा के अन्य कार्यों में इसकी छाल का उपयोग सदियों से होता रहा है।
4- इस फल का रस शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देता है।
5- कब्ज हो या एसिडिटी आप काफल खाएं, इससे पेट की समस्या खत्म होती है।
6- यदि आप काफल के पेड़ की छाल से निकलने वाले सार को दालचीनी और अदरक के साथ मिलाकर इसका सेवन करते हो तो आप पेचिश, बुखार, अस्थमा और डायरिया आदि रोगों से आसानी से बचाव कर सकते हैं।
7- इसकी छाल को सूंघने से आंखों के रोग व सिर का दर्द आदि रोग ठीक हो सकते हैं।
8- काफलड़ी चूर्ण इसकी छाल से बने हुए चूर्ण को  कहा जाता है। इसमें अदरक व शहद का रस मिलाकर पीते हो तो इससे आपकी गले की बीमारियां व खांसी के अलावा सांस से संबंधित रोग भी आसानी से ठीक हो सकते हैं।
9- इसके साथ ही इसके तेल व चूर्ण को भी अनेक औषधियों के रूप में उपयोग में लाया जा रहा है।

            जब भी आप काफल खाएं या काफल तोड़ें पेड़ की टहनियां न तोड़ें..., जंगलों में आग न लगाएं। कहीं आग लग रही हो तो तुरंत बुझाने की कोशिश करें। वन विभाग व पुलिस को सूचित करें। वनों में आग लगाकर किसी का भला नही होता है। प्राकृतिक संपदा जलकर राख हो जाती है। जलस्रोत सुख जाते है। इससे काफल का अस्तित्व भी खतरे में पहुंच जाएगा। रसीले काफल खाने है तो जंगलों को बचाना होगा।
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देवेश आदमी

17 May, 2019

नक्षत्र वेधशाला को विकसित करने की जरूरत


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अखिलेश अलखनियां/-
सन् 1946 में शोधार्थियों और खगोलशास्त्र के जिज्ञासुओं के लिए आचार्य चक्रधर जोशी जी द्वारा दिव्य तीर्थ देवप्रयाग में स्थापित नक्षत्र वेधशाला ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भेंट है।

आचार्य चक्रधर जोशी जी ने भूतपूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री गणेश मावलंकर की प्रेरणा से सन् 1946 में नक्षत्र वेधशाला की नींव डाली थी। ताकि यहां ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन करके लोग लाभ ले सकें। साथ ही उन्होंने बड़े परिश्रम से भारत के कोने-कोने में भ्रमण करके अनेक ग्रन्थ, पांडुलिपियां और महत्वपूर्ण पुस्तकें संग्रहित की। जिसके चलते नक्षत्र वेधशाला अपने अनूठे संग्रह के कारण क्षेत्रीय और देशी-विदेशी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र रहा है।

नक्षत्र वेधशाला में जर्मन टेलीस्कोप, जलघटी, सूर्यघटी, धूर्वघटी, बैरोमीटर, सोलर सिस्टम, राशि बोध, नक्षत्र मंडल चार्ट, दूरबीनें आदि समेत कई हस्तलिखित ग्रन्थ, भोज पत्र, ताड़ पत्र और दर्शन, संस्कृति, विज्ञान, ज्योतिष से सम्बंधित अनेक प्रकार का साहित्य मौजूद है। मगर, मौजूदा वक्त में इनका सही ढंग से उपयोग नहीं हो पा रहा है।
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इसका एक कारण सरकार की अनदेखी है। समुचित रखरखाव के अभाव में यहां मौजूद बहमूल्य धरोहरें नष्ट होती जा रही हैं और संबंधित विषयों के जानकारों, जिज्ञासुओं और साहित्य प्रेमियों को भी इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। लिहाजा, जरूरी है कि इस स्थान को “साहित्यिक पर्यटन“ स्थल के रूप में विकसित किया जाए। ताकि देश दुनिया के इन विषयों के शोधार्थियों और जिज्ञासुओं तक इसकी जानकारी पहुंच सके।

सरकार इस ओर ध्यान दे तो “साहित्यिक पर्यटन“ स्थल एक ऐसा कदम होगा, जिससे नक्षत्र वेधशाला में संग्रहित उपकरणों व साहित्य की उचित व्यवस्था भी हो सकेगी और यह सैलानियों, साहित्यप्रेमियो, शोधार्थियों के आकर्षण का केंद्र भी बन सकेगा।

उत्तराखंड की कमाई का एक बड़ा हिस्सा पर्यटन विपणन से भी आता है। इसीलिए सरकार लगातार टूरिज्म डेवलपमेंट पर भी काम कर रही है। आध्यात्मिक पर्यटन (Spiritual tourism) की तर्ज पर साहित्यिक पर्यटन जहां नक्षत्र वेधशाला को मजबूती देगा, वहीं दूसरी और यहां पर्यटकों की आवाजाही से स्थानीय रोजगार के अवसर भी विकसित होंगे।

15 May, 2019

अतीत की यादों को सहेजता दस्तावेज


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- संस्मरणात्मक लेखों का संग्रह ‘स्मृतियों के द्वार’
- रेखा शर्मा

‘गांव तक सड़क क्या आई कि वह आपको भी शहर ले गई।’ यह बात दर्ज हुई है हाल ही में प्रकाशित संस्मरणात्मक लेखों के संग्रह ‘ स्मृतियों के द्वार’ द्वार में। प्रबोध उनियाल ने अपने संपादकीय में लिखा कि- ‘स्मृतियों के द्वार’ एक पड़ताल है या कह लीजिए कि आपके गांव की एक डायरी भी। संग्रह में शामिल लेखक मानवीय संवदेनाओं के प्रति सचेत हैं। वह अतीत में लौटकर अपनी संस्कृति, विरासत, घर, समाज, रिश्ते-नाते, पर्यावरण, जल, जंगल जमीन आदि को अपने लेखों में सहेजते हैं।

डॉ. शिवप्रसाद जोशी के आलेख ‘मेरे घर रह जाना’ में लिखा है कि- गांव के भवन की स्मृति में बहुत सघन है। वहीं पर भैंस पर चढ़ने और फिसलन भरी उसकी पीठ और सींगों को दोनों हाथ से पकड़ने का दृश्य उभरा है। वह सलमान रुश्दी, रघुवीर सहाय, मंगलेश डबराल को कोड करते हैं और कहते हैं कि ‘वो खोये हुए समय के कुहासे में खोये हुए शहर का एक खोया हुआ घर है।’

संग्रह में डॉ. अतुल शर्मा का आलेख ‘जहां मैं रह रहा हूं’ में गढ़वाल, कुमाऊं के नौले धारे और बावड़ियों की संस्कृतियों को शोधपूर्ण तरीके से सहेजा गया है। वे लिखते हैं ‘सोचता हूं कि इन सूखे कुंओं में क्या कभी पानी आ सकेगा?’ दूसरे आलेख में एक विशिष्ट चरित्र ‘खड़ग बहादुर’ का अद्भुत शब्दचित्र खींचा गया है। डॉ. सविता मोहन ‘स्मृति में मेरा गांव’ आलेख में ‘ढौंड’ गांव में अपने बचपन को याद करती हैं। वे लिखती हैं- ‘पूरा गांव बांज, बुरांस, चीड़, हिंस्यालु, किनगोड़, घिंगारु के वृक्षों से आच्छादित था। कविता का एक अंश मां से जुड़ी आत्मीयता को सहेजता है।

इस संग्रह में एक महत्वपूर्ण संस्मरणात्मक लेख है प्रसिद्ध कवियत्री रंजना शर्मा का- ‘बांस की कलम से कंप्यूटर तक’। उन्होंने अपने पिता स्वाधीनता संग्राम सेनानी श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’ के गांव दोस्पुर पहुंचकर अद्भुत अहसास का संस्मरण प्रस्तुत किया है। लिखती हैं- ‘संस्कारों की नदी सी है जो वर्तमान में अपना रास्ता तय कर बहती जा रही है।’

इस पुस्तक में जगमोहन रौतेला का लेख ‘बरसात में भीगते हुए जाते थे स्कूल’ बहुत सहज और बेहतरीन है। वह रवाही नदी और गमबूट का जिक्र भी करते हैं। ये लेख पहाड़ की और बचपन की यादें समेटे हुए है। महेश चिटकारिया का लेख ‘मूंगफली की ठेली से शुरू जिंदगी’ में रामलीला शुरू होने से पहले मूंगफली बेचना और संघर्षशील जीवन जीते हुए भारतीय स्टेट बैंक के बड़े अधिकारी होने तक की कथा उकेरी गई है।

हरीश तिवारी का लेख- ‘पिता के जीवन से मिली सीख’ एक दस्तावेज है। वे लिखते हैं- ‘11 जनवरी 1948 को नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी शहीद हुए थे। उस आंदोलन में मेरे पिता देवीदत्त तिवारी और त्रेपन सिंह नेगी भी मौजूद थे। संग्रह में डॉ. सुनील दत्त थपलियाल ने एक मार्मिक लेख लिखा है- ‘मेले में मां के दिए दो रुपये’। इसमें वे लिखते हैं कि ‘रास्ते भर दो रुपये से क्या-क्या खरीदूंगा यही उधेड़बुन मेरे बचपन में चलती रही। जलेबी, मूंगफली, नारियल और जाने क्या-क्या।

‘स्मृतियों के द्वार’ पुस्तक में धनेश कोठारी ने लिखा है ‘शहर में ढूंढ़ रहा हूं गांव’। वे लिखते हैं ‘जिन्हें अपनी जड़ों से जुड़ रहने की चाह रहती है वह जरूर कभी कभार ही सही शहरों से निकल कर किसी पहाड़ी पगडंडियों की उकाळ उंदार को चढ़ और उतर लेते हैं’। उन्होंने बहुत नई तरह से अपनी बात लिखी।

इस संस्मरणात्मक संग्रह में डॉ. राकेश चक्र का लेख ‘खिसकते पहाड़ दरकते गांव’, महावीर रवांल्टा का ‘आज भी पूजनीय हैं गांव जलस्रोत’, गणेश रावत का ‘कार्बेट की विरासत संजोये हुए छोटी हल्द्वानी’, राजेंद्र सिंह भंडारी का ‘जड़ों से जुड़े रहने की पहल’, प्रो. गोविंद सिंह रजवार का ‘जैविक खेती से जगी उम्मीद’, डॉ. श्वेता खन्ना का ‘कुछ सोचें सोच बदलें’, कमलेश्वर प्रसाद भट्ट का ‘अब पथरीले पहाड़ भी होंगे हरे भरे’, रतन सिंह असवाल का ‘मेरे गांव का गणेश भैजी’, बंशीधर पोखरियाल का लेख ‘आदर्श गांव पोखरी’ एक डाक्यूमेंशन है।

अजय रावत अजेय का लेख ‘घटाटोप अंधेरे के बीच सुबह की उम्मीद’, आशुतोष देशपांडे का ‘पिता की दी हुई कलम’ और शशिभूषण बडोनी का लेख ‘कुछ उम्मीद तो जगती है’ सकारात्मक लेख हैं। सुधीर कुमार सुंदरियाल का लेख ‘गांव भलू लगदु’ और डॉ. दिनेश शर्मा का लेख ‘लोहार मामा’ आकर्षित करता है। ज्योत्सना ने लिखा है- ‘गांव मुझे रहता है याद’

आभा काला का ‘परंपराओं से आज भी बंधा है राठ’ और सुरेंद्र उनियाल का लेख ‘कुछ छुट गए कुछ छिटक गए’ गांव के अच्छे शब्दचित्र है। आशीष डोभाल ने अपने लेख ‘पेड़ और पानी गांव की कहानी’ में सकारात्मक टिप्पणी की है। डॉ. संजय ध्यानी ने ‘निरंकार की पूजाई का उत्सव’ और शिवप्रसाद बहुगुणा का लेख ‘ हमारी सांझी विरासत’ पठनीय हैं। वहीं दुर्गा नौटियाल का लेख ‘मास्टर जी की गुड़ की भेली’ बालमन का सच्चा संस्मरण अद्भुत है।

संग्रह में ललिता प्रसाद भट्ट का लेख ‘प्रयास यदि किए जाएं’, अशोक क्रेजी का ‘रिश्ते नातों से बंधा था जीवन’, आचार्य रामकृष्ण पोखरियाल का ‘यादें जो वापसी को कहती हैं’, विशेष गोदियाल का ‘अभावों के आगे भी हैं रास्ते’, नरेंद्र रयाल का ‘हुई जहां जीवन की भोर’ और सत्येंद्र चौहान ‘सोशल’ का लेख ‘स्वयं करनी होगी पहल' प्रेरणाप्रद हैं।

काव्यांश प्रकाशन ऋषिकेश से प्रकाशित 172 पृष्ठ की इस किताब का मूल्य दो सौ रुपये है। पुस्तक में स्केच व फोटो तथा मुख्य पृष्ठ आकर्षक हैं। इसकी रुपसज्जा धनेश कोठारी ने और फोटो सहयोग मनोज रांगड़, डॉ. सुनील थपलियाल, आरएस भंडारी व शशिभूषण बडोनी ने किया है।

इंटरनेट प्रस्तुति- धनेश कोठारी

12 May, 2019

मेरि ब्वै खुणै नि आइ मदर्स डे (गढ़वाली कविता)


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पयाश पोखड़ा//

मेरि तींदि गद्यलि निवताणा मा,
मेरि गत्यूड़ि की तैण रसकाणा मा,
लप्वड़्यां सलदरास उखळजाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

सर्या राति मेरि पीठ थमथ्याणा मा,
मि सिवळणा को बेमाता बुलाणा मा,
सिर्वणा दाथि कण्डळि लुकाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

बिसगीं दूदी फर ल्वै चुसाणा मा,
पैनी हडक्यूं की माळा बिनाणा मा,
अफु रुंदा रुंदा भि मी बुथ्याणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

तातु पाणि परतिम स्यळाणा मा,
फेरि मनतता पाणिम नवाणा मा,
बाढ़ ज्वनि, बाढ़ बाढ़ करणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

धकि धैं धै कैरिक नचाणा मा,
था ले,था ले बोलिक हिटाणा मा,
खुट्यूं छुणक्या धगुलि पैराणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

मेरि जूंका की दवै ल्याणा मा,
द्यप्तों का ठौ मा मुण्ड नवाणा मा,
धौ संदकै मीथैं मंथा मा ल्याणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

खटुला फर मेरि खुटळि लगाणा मा,
डांडौं बटैकि घास लखुड़ु ल्याणा मा,
छनि म गौड़ि भैंस्यूं थैं पिजाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

गुड़ गट्टा नौणि रोटि खवाणा मा,
छंछ्या कि थकुलिम लूण रलाणा मा,
लाटा, हौरि खा, हौरि खा ब्वलणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

मेरि पाटि ब्वळख्या सजाणा मा,
अधम्यरम तक इसकोल फट्याणा मा,
इसकोल आंदा जांदा अड़ाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

किताब कौपि पिनसन ल्याणा मा,
फीसी कि इक्कैक पैसि कमाणा मा,
मास्टरु का हथ खुट्टा दबाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

दसा का इमत्यान पास करणा मा,
सर्या गौं मा भ्यलि गिंदड़ा बंटणा मा,
ऐथर नौकरि की गाणि स्याणी करणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

कर्जपात कैरि मीथैं भैर भ्यजणा मा,
अफु खै निखैकि पैसा जमा करणा मा,
च्यूड़ा अखोड़ा की कुटरि धरणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

दिन रात बौलु भुरत्या करणा मा,
स्वारा भारौं कि हींस रींस सुणणा मा,
हैळ हळ्यौ दगड़ हथपैंछि ज्वड़णा मा,
मेरि ब्वै खुण, नि आइ मदर्स डे ||

भ्यलि सिराणी नौकरि लगणा मा,
मीथैं अपणा खुटौं खड़ा करणा मा,
हुणत्यळि आस की फंचि उठाणा मा,
मेरि ब्वै खुण, नि आइ मदर्स डे ||
पेंटिंग साभार- सरोजनी डबराल ‘सरु’

हर साल बर्सफल द्यखाणा मा,
सिरफळ थै मोळि पैराणा मा,
जलम पतड़ा थैं पिठै लगाणा मा,
मेरि ब्वै खुण, नि आइ मदर्स डे ||

मैकु नौनि ब्वारी ख्वज्याणा मा,
बामणा का घौर आणा जाणा मा,
मीथै सीरा मकोट पैराणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

अपणि नथुलि बुलाक त्वड़ाणा मा,
ब्वारी खुणै गुलोबन्द बणाणा मा,
सात फूल्यूं मा पीना लगाणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

नौना कु बिगरैलि ब्वारी ल्याणा मा,
लछमि ऐलि हमर खल्याणा मा,
सर्या जिंदगि की खैरि बिसराणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

नौना ब्वारी को परदेस जाणा मा,
रंत रैबार चिठि पतरि नि आणा मा,
टपरांदा सासा लग्यां पराणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

जिंदगि की जग्वाळ करणा मा,
न म्वरणा मा अर ना बचणा मा,
आंदा-जांदा म्यारु बाटु ह्यरणा मा,
मेरि ब्वै खुणै, नि आइ मदर्स डे ||

इंटरनेट प्रस्तुति- धनेश कोठारी

लोकभाषा के एक भयंकर लिख्वाड़ कवि (व्यंग्य)


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ललित मोहन रयाल//
लोकभाषा में उनका उपनाम ’चाखलू’ था, तो देवनागरी में ’पखेरू’। दोनों नाम समानार्थी बताए जाते थे। भयंकर लिख्वाड़ थे। सिंगल सिटिंग में सत्तर-अस्सी लाइन की कविता लिख मारते, जो कभी-कभी डेढ़-दो सौ लाइन तक की हद को छू जाती थी। क्या मजाल कि, कभी उनका सृजन-कर्म थमा हो। जितना लिखते थे, समूचा-का-समूचा सुना डालते। बचाकर बिल्कुल भी नहीं रखते थे, झूम-झूमकर सुनाते।

खुद को ’कालजयी’ बताते थे, शायद इसलिए कि बस एकबार ही सही, अगर वे किसी तरह मंच तक पहुंच गए और खुदा-न-खास्ता माइक उनके हत्थे चढ़ गया, तो फिर उस पर लगभर कब्जा ही कर लेते थे। एडवर्स पजेशन टाइप का कब्जा। बिना भूमिका बांधे डाइरेक्ट कविता दागना शुरू कर देते। एकबार शुरू जो हुए, तो फिर घंटों जुबानरुपी तलवार को वापस म्यान में नहीं धरते थे। माइक छुड़ाने में पसीना छुड़ा देते। उन्हें मना करने के लिए मनाने में, आयोजकों को नाकों चने चबाने पड़ते थे। माइक को कसकर जकड़े रहते थे। कुल मिलाकर, उन्होंने समय-सीमा की कभी परवाह नहीं की।

माइक बाएं हाथ से थामते थे और दनादन कविता सुनाते जाते। दाएं हाथ को फ्री रखे रहते थे, जो अपने बाद वाले नंबर के कवि अथवा आयोजकों (जिस-जिस को रोड़ा समझते थे) को मंच पर चढ़ने से थामने के काम आता था। न जाने कहां से उस हाथ में, घड़ी-दो घड़ी के लिए दैवीय सी ताकत आ जाती।

अगर कवि नया- नवेला हुआ, तो आसान पड़ता था। मात्र दायें हाथ को वाइपर की तरह हिला- हिलाकर उनका काम बन आता। बाईचांस खांटी हुआ, तो धींगामुश्ती, झूमाझटकी, धकेलने तक का काम उसी हाथ से ले लिया करते थे। अगर कवि अदावत करने वाला निकाला, तो गर्दनियां दांव भी उसी हाथ से दे जाते थे। अगर धुर विरोधी हुआ, तो उसी हाथ से टेंटुवा दबाने की सक्रिय चेष्टा तक उतारू हो जाते।

हाथ के इशारे से बाद के कवियों को बुरी तरह डपटते। रोकते-टोकते रहते थे। इतना सबकुछ होने के साथ-साथ, खुद बेलगाम होकर काव्य-पाठ जारी रखते थे। क्या मजाल कि, इन अवरोधों के मध्य कभी उनकी कविता में रंचमात्र का भी व्यतिक्रम आया हो। कविता घन-गर्जन की तरह धांय-धांय चालू रहती।

बकौल नेक्स्ट कवि, “अरे! वे निर्बगिकि छ्वीं ना लगावा। औरु तै वु कवि समजदु नी। सबू तै ज्वाड़-जुत्त करदू रैंदु। चटेलिक गाळी द्यौंदू। अपणि दस-बीस बर्स पुराणि कविता त बोदू, आज प्रभा कुण ल्याखी मीन। ताजी-ताजी रचीं छाई। बिल्कुल फ्रेश। झूट्टू नंबर एक।“
(अरे भाई साहब, उस अभागे की चर्चा मत छेड़ो। अपने सिवा, वह किसी को कवि समझता ही नहीं। सबको अनाप-शनाप बोलता है। धाराप्रवाह गालियां देता है। अपनी दस-बीस बरस पुरानी कविता को कहता है, आज सुबह-सुबह लिखी है। रचना एकदम फ्रेश है। झूठा कहीं का।)

उनका काव्य-पाठ बरसों तक एक ही मीटर पर चलता रहा। वही लय-छंद-ताल। और तो और, भाव भी वही। दूसरी कविता कब शुरू हुई, श्रोताओं को इसका पता ही नहीं चल पाता था। उस लय-ताल पर तो उनका इतना एकाधिकार सा था कि, सब-की-सब एक ही कलेवर की जान पड़ती थी।

मजे की बात यह होती थी कि, वे आयोजन स्थल पर उतनी ही देर तक रुकते थे, जब तक उनका नंबर ना आ जाए। माइक को हसरत भरी निगाहों से देखते रहते थे। टकटकी लगाकर पोडियम पर पैनी नजर रखते। प्रतिद्वंद्वियों पर कड़ी निगाह रखते। कहीं ऐसा न हो कि, कोई और बीच में ही भांजी मार ले। इस कारोबार में ऐसा होते, उन्होंने खूब देखा था। दूर की बात क्या, जब-जब मौका मिला, खुद उन्होंने इस हुनर को बखूबी भुनाया।

बस एक बार अगर उनका नंबर आ गया, तो कोई माई का लाल उनसे नंबर नहीं छुड़ा सकता था। वे कोई कसर छोड़ते भी नहीं थे। सारा-का-सारा उड़ेल डालते। भयंकर तबाही मचाते थे। ऐसी तबाही, जिसमें राहत- बचाव की जरा भी गुंजाइश बाकी नहीं छोड़ते थे। उनका सरोकार सिर्फ इतने तक ही सीमित रहता था। विषय वही-के-वही- ’गद्दारों का खात्मा’, ’कुछ खास मुल्कों की आंख नोचने का जज्बा।’ ’खास हो गया, नाश हो गया’ टाइप काव्य।

बकौल उनके हमदर्द- हमराज कवि, “कन तब। अपणि सुणैक वु कंदुण्यों पर फोन लगैकि ठर्र-ठर्र कैरिक भैर निकळ जांदू अर गेट पर पौंछिक मुट्ठी पर थूक। पिछनै द्यखदु नी।“
(अपनी कविता सुनाने के बाद, वह कान पर फोन सटाकर, मटक-मटककर गेट तक पहुंचता है। उसके बाद, वहां से सरपट दौड़ लगाता है। एकबार भी पीछे मुड़कर नहीं देखता।)

उनका यह बर्ताव, समकालीनों को खूब खलता रहा। लेकिन बेचारे कर भी क्या सकते थे। मन मसोसकर रह जाते। शीघ्र ही उनके बारे में यह मशहूर हो चला था कि, वे हाहाकारी टाइप की कविता सुनाते हैं, वो भी एकदम रोबोटिक नाटकीयता के साथ। बाकायदा, दोनों उंगलियां पैनी करके आंखें नोचने का सीधा प्रसारण कर डालते थे। जैसाकि तब तक होता आया था, धीरे-धीरे उनके खिलाफ, अनायास ही एक खेमा डिवेलप होता चला गया। जिसकी उन्होंने कभी बाल बराबर भी परवाह नहीं की।

बकौल एक विरोधी खेमा- कवि, “एक बगत, मंच-संचालन मैंमु ऐग्याई। मिन स्वाची, आज बच्चाराम तै आंण दे दिए जाऊ। क्या बुन्न तब। मैन वैकु नंबर ई नी औण दीनि। वैतैं अध्यक्ष बणौणेकि घोषणा कर द्याई। ले चुसणा... जब फंसी बच्चाराम, कन अणिसणि बीतग्याई वैफर। न त घूट सकदु छाई, अर थूक भी नि सकदु छाई। वैन बतै भिनि सैकी, वैफर क्या राई बितणि। घड़ेक वैकि जिकुड़ि अबसा-फाबसी मां फंसी राई।“
(एकबार मंच-संचालन का जिम्मा मुझे मिला। मैंने सोचा, आज इसे सबक सिखा ही दिया जाए। फिर क्या था। मैंने उसका नंबर ही काट दिया। उसे कार्यक्रम-अध्यक्ष बनाने की घोषणा कर दी। बुरी तरह फंसे बच्चूराम। उन पर बहुत बुरी बीत रही थी। ना निगलते बनता था, ना उगलते। बेचारा बता भी नहीं सका, उस पर क्या-क्या बीती। घड़ी भर के लिए, उसके प्राण असमंजस में फंसे रहे।)

उनका एक खास ट्रेंड रहता था। वे अक्सर शास्त्रों से प्रसंग उठाते थे। लगे हाथ उनकी विकृत व्याख्या कर डालते, अनर्थकारी व्याख्या।
’शांताकारम भुजंगशयनम् पद्मनाभम सुरेशं।
विश्वाधारं गगनसदृश मेघवर्णं शुभांगमं।
सभा में पहले इस श्लोक को सुनाते थे। फिर उसकी अनूठी व्याख्या पेश कर जाते। “क्वी यन त बतावा कि यांकु मतलब क्या होंदु। फेर द्वी-तीन बगत खचोरि-खचोरिक पुछद। क्या बल?“
(अरे कोई तो बताओ! इसका क्या अर्थ निकलता है। सभा में सन्नाटा छाया रहता। फिर दो-तीन बार खोद-खोदकर पूछते, क्या अर्थ निकला।)“ फिर काफी देर तक घटिया कथाकारों की तरह हवा बांधे रखते। सांस खींचे रहते। फिर सहसा खजाने का पिटारा खोलते हुए रहस्योद्घाटन करते हुए बोल बैठते, “अरे! यांकु मतलब ह्वाई भैंसु।“  (अरे मूर्खों! इसका तात्पर्य है- भैंस।)

श्रोता मुंह बाए सुनते रहते। होशियार श्रोता चौकन्ने हो जाते। सोचते, जनकवि आखिर बोल क्या रहा है। आखिर कहना क्या चाहता है। इधर लोक-भाषा-कवि की विकृत टीका जारी रहती थी-
“शांताकारम्ः मल्लब भैंसु कु शांत आकार। कन शांत रैंदु तब। ब्वोला तब। देखि क्वी जानवर इन शांत? क्वी उचड़-भटग नी। वैथै पिंडू- पाणि चकाचक मिल जौ। घस्येयूं-बुस्येऊं राऊ। च्वीं-पटग नी सुणी सकदा। वै तै दुन्या सी क्या मतलब। शांत पड़्यू रैंदु।“
(शांताकारम् का तात्पर्य है, शांत आकार। भैंस कितने शांत स्वभाव की होती है। और कोई प्राणी इतने शांत स्वभाव का हो सकता है भला। उसके स्वभाव में किसी किस्म की उठापटक देखी है कभी। उसे बरोबर भूसा-चारा मिलता रहे। बस उसकी खुराक कमती ना पड़े। किसी किस्म की चूं-चपड़ नहीं सुन सकते। उसे दुनिया से क्या मतलब। एकदम शांत पड़ी रहती है।)

“भुजंगशयनम्ः खुट्टू बटोळी कि पड़्यूं रैंदु। तुमुल देखि होलु, भुज्जा उकरिक ऊंक ऐंछ, ठाठ सी पड़्यूं रैंदु। खै- पेक पोटगि भरीं राऊ, त वैकि तर्फ सी दुन्या जाऊ चरखा मा।“
(भुजंगशयनम् अर्थात् पैर समेटकर, ठाठ से उनके ऊपर लेटी रहती है। चारों भुजाओं के ऊपर विश्रामरत रहती है। खा-पीकर उदर भरा रहे, उसकी तरफ से दुनिया जाए भाड़ में।)

“पद्मनाभं- अरे, वैकि नाभिसी दूद नी निकल़्दु। बान्निकि भैंसी ह्वाऊ त छौड़ु लगौण मा क्या देर लगदि।“
(अरे! उसकी नाभि से दूध ही तो निकलता है। अच्छी नस्ल की भैंस हो, तो दुग्ध-धारा बहने में कितनी देर लगती है।)

“विश्वाधारं. मने बिस्सु दादा करौंक भैंसु भारी दुधाळ छै बल। धारु लगैकि दूद देंदु बल।“
(विश्वंभर दादा की उन्नत नस्ल भैंस है, जो धारासार दूध देती है।)

गगनसदृशं- भैंसी तै लंगण देक द्याखा जरा। द्वी-तीन बेळी वै तैं घास-पात नि द्यावा। कन तमासु मचांदु तब। कन अड़ांदू बल, द्यौरु मुंडमां उठै देंदु।“
(भैंस भूखी हो, तब देखो जरा। दो-तीन टाइम उसे घास-चारा न मिले, इतना शोर मचाएगी कि आसमान को सिर पर ही उठा लेगी।)

“मेघबरण नी बल वैकु? भैंसु कन-कन ह्वंदिन बल। क्वी बल भुरेणु होंदु, क्वी काल़ू। अरे! मि ब्वन्नु छौं, यु इस्लोक संट परसैंट भैंसी पर ल्यख्यूं छै।“
(क्या उसका मेघवर्ण नहीं होता? अरे भाई! भैंस कैसे- कैसे रंगों की होती है। कोई भूरी होती है, तो कोई काली। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि, यह श्लोक निश्चित रूप से भैंस पर ही लिखा गया है।)

एक बड़े कवि सम्मेलन में तो उन्होंने गायत्री मंत्र की अति दुर्लभ व्याख्या करके रख दी। ’ओम भूर्भुवः स्वः- यह भूरे रंग की गाय मेरी है। ’तत्सवितुर्वरेण्यं’- अन्य वर्णों की तुम्हारी है। ’भर्गो देवस्य धीमहि’- तुम मुझे भर-भरकर घी दो। ’धियो यो न प्रचोदयात’- मैं तुम को इस आशय की पर्ची देता हूं। ऐसी अनूठी व्याख्या करके उन्होंने श्रोताओं से लेकर आयोजकों तक को अचरज में डाल दिया।

लोक-भाषा कवि होने के नाते, वे लोक-संस्कृति और लोक-वाद्य की भरपूर वकालत करते रहे। ढोल- दमाऊ के प्रति उनका मोह आखिर तक बना रहा। मशकबीन पर तो जान छिड़कते थे। एक बार गांव में कोई बारात पाश्चात्य बैंड-बाजे के साथ आई, नौजवानों के लिए कौतूहल का विषय बना रहा। उन्होंने जनकवि से कहा, “अरे चिचा! बारात क्या सज-धज के आई है। बैंड-बाजे वाली बारात है।“

कविराज ने छूटते ही पाश्चात्य वाद्य-व्यवस्था को  ख़ारिज करके रख दिया, “अरे यार! बैंड तुमारि मवासि। धर्यां छन ऊंक उ बंदकुड़ कांद मा। सुर ना ताल। धोळ ऊंन घ्वल्ड- काखड़ू मा बितगचाड़ू। पौण गैंन बल धुर्पळ मा डांस कन्नू तै, अर ऊंन बल सौब पठाळ रड़ै दिनिन। रामलालैकि कुड़ि कु खंड्वार बणैकि पतातोड़ ह्वैग्येन बल।“
(अरे यार! खाक बैंड। बैंडवालों ने बंदूकनुमा बाजे कंधों पर रखे हुए हैं। ना कोई सुर न ताल। रास्ते में आते हुए उन्होंने घुरड़-काखड़ों में अफरा-तफरी मचाकर रख दी। सुनने में तो ये भी आया है कि, बाराती डांस करने को छत पर चढ़े, उन्होंने सारी पठालें खिसका दीं और रामलाल के मकान को खंडहर बनाकर चलते बने।)

कवि के कुछ हमदर्द है, जो उनसे गहरी हमदर्दी रखते हैं। कहते हैं, “अरे भाई! जैसा भी है, लोकभाषा- बोली को बचाने के लिए जी-जान से जुटा है। प्राण प्रण चेष्टा कर रहा है। अकेले सबसे मुचेहटा लिए रहता है। कम-से-कम उनके रहते, अपनी बोली-भाषा के शब्द, सुनाई तो पड़ते हैं।“

इंटरनेट प्रस्तुति- धनेश कोठारी

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