30 June, 2013

बाबा केदार के दरबार में

जगमोहन 'आज़ाद'// 
खुद के दुखों का पिटारा ले
खुशीयां समेटने गए थे वो सब
जो अब नहीं है...साथ हमारे,
बाबा केदार के दरबार में
हाथ उठे थे...सर झुके थे
दुआ मांगने के लिए...बहुत कुछ पाने के लिए
अपनो के लिए-
मगर पता नहीं...बाबा ने क्यों बंद कर ली-आंखे
हो गए मौन-
मां मंदाकिनी भी गयी रूठ ...और...फिर..
सूनी हो गयी कई मांओं की गोद
बिछुड़ गया बूढे मां-पिता का सहारा
उझड़ गयी मांग सुहानगों की
छिन गया निवाला कई के मुंह से


ढोल-दमाऊ-डोंर-थाली
लोक गीत की गुनगुनाहट
हो गयी मौन....हमेशा-हमेशा के लिए,
कुछ नम् आँखे
जो बची रह गयी....खंड-खंड हो चुके
गांव में...
वो खोज रही है...उन्हें
जो कल तक खेलते-कुदते थे
गोद में,खेत-खलिहान में इनके,
असंख्य लाशों के ऊपर...चिखते-बिलखते हुए
बाबा केदार के दरबार में...

किसको समेट
किस-किस को गले लगा कर
समेटे आंसू...इनके अंजूरी में अपने
किसी मां की गोद में लेटाएं
उनकी नहीं गुहार
किस पिता को सौंपे...उसका उजास कल
किन बूढी नम् आखों को दे
सहारा दूर तक चलते रहने का
कितने गांव बसाएं...कितने घरों को जोड़े
तिनका-तिनका जोड़
जो जमीजोद हो गए...
बाबा केदार के दरबार में...

मुश्किल बहुत मुश्किल है
इन आसूओं को समेटना
अंजूरी में अपनी
मुश्किल तो यह भी बहुत है
कि कैसे उन बूढ़ी नम् आंखों के सामने
लेटा दें उस इकलौती लाश को
जो इनसे कल ही तो आशीर्वाद ले
गयी थी...दो जून की रोटी कमाने
बाबा केदार के दरबार में...

कैसे बताएं
उन आश भरी टकटकी लगायी उन निगाहों को
कि...जिनकी रहा वो देख रही है
वो अब कभी नहीं आयेगें लौटकर
बहों में उनकी...उन्हें नहीं बचा पाये
मंदाकिनी के तीव्र बेग के सामने
बाबा केदारा की दरबार में...
...मगर उनके बिछूड़ो-
उनके आंखों के तारों की लाशों पर
खड़े होकर...कुछ सफेद पोश धारी
चीख रहे है...चिल्ला रहे है...
सांत्वना दे रहे है...बूढी नम् आंखों,उजड़ी मांगों को
कि हमने...अपनी पूरी ताकता झोंक कर
हवाई दौरो के दमखम पर
मुआवजे के मरहम पर
तुम्हारे असंख्या रिश्तों को-
असंख्य आंसूओं को बचा लिया है
ज़मी पर गिरने से...
जिनमें-कुछ गुजराती है...कुछ हिन्दु कुछ मुस्लमान
कुछ सीख-ईसाई के भी...
हमने समेट लिया इन सबके दुःखों को
खुद में....हमेशा के लिए
बाबा केदार के दरबार में...

जगमोहन 'आज़ाद'

क्या फर्क पड़ता है

ये इतनी लाशें
किस की हैं
क्यों बिखरी पड़ी हैं
ये बच्चा किसका है
मां को क्यों खोज रहा है....मां मां चिलाते हुए
दूर उस अंधेरे खंडहर में
वो सफेद बाल...बूढी नम आंखें
क्यों लिपटी हैं
एक मृत शरीर से
क्यों आखिर क्यों बिलख रही है
नयी नवेली दुल्हन
उस मृत पड़े शरीर से लिपट,लिपट कर



क्यों ज़मींदोज़ हो गए
गांव के गांव
कल तक जिन खेत-खलिहानों में
खनकती थी
चूड़ियां बेटी बहुओं के हाथों में
गुनगुनाते थे...लोक गीत
फ्योली-बुरांश के फूल भी
वो क्यों सिसक रहे हैं...वहां
जहां कल तक वो खिलखिलाते थे....
ढोल-दमाऊ-डोंर-थाली

आखिर क्यों मौन...हो गए
क्यों कर ली बंद आंखें
देवभूमि के देवताओं ने
बाबा केदार के दरबार में....
इस मौन से,इस टूटने-बिखरने से
उनको
क्या फर्क पड़ता है
जो सुर्ख सफेद वस्त्र पहन
गुजर रहे हैं
इन लाशों और खंडहर हो चुकी ज़मीं के ऊपर से
जो खुद को सबसे बड़ा हितैषी बता रहे हैं
खंड-खंड हो चुके,घर-गांव का....
देश की बात करने वाले ये चेहरे
इन लाशों पर खड़े होकर
सीना चौड़ाकर...करते है बयान-बाजी
कि
हमने अपने कुछ आंसूओं को समेट लिया है
अंजुरी में अपनी...
बाकि बिखर गए तो हम क्या करें...
इनके
घर की दीवारें तो अब और अधिक
चमचमाएंगी
इनके घर में रखे पुराने टीवी
एलईडी टीवी की शक्ल में हो जाएंगे तब्दील
इनके बच्चे....विदेशों के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में शिक्षार्थ जाएंगे
इनकी पुरानी खटारा गाड़ी
नयी-नयी गाड़ियों के काफिले में हो जायेगी तब्दील
....और....
मॉडर्न सोफों पर लेट
-सी रूमों में बैठकर
देखेंगे...ये सब उन लाशों को...आंसुओं को...
उजड़ चुकी मांगों को,सूनी मांओं की गोद को
टूटे-बिखरे घरों को-
जिन्हें...अभी-अभी एक आपदा ने लिया है-आगोश में अपनी...जिनके साथ होने का कर रहे हैं
दावा ये ... चमचमाते कैमरों के सामने खडे हो
बाबा केदार के दरबार में...

इन्हें
क्या फर्क पड़ता है
असंख्य रिश्तों के टूट जाने,बिखर जाने से
असंख्य लाशों के सड़ जाने,गल जाने से
इनके लिए तो ये लाशें,इन लाशों पर
चीखते-बिलखते लोगों
खुशियां लेकर आयी है,वरदान बनकर आयी है
इन्हीं लाशों पर चलकर तो
ये अब खुद के लिए नयी ज़मीन तैयार करेंगे
खुद के भविष्य को उज्जवल बनाएंगे
....और...
एक दिन हम भी सब कुछ भूल कर
इनके उज्जवल भविष्य में शामिल हो जाएंगे...क्या फर्क पड़ता है।

जगमोहन आज़ाद

28 June, 2013

वाह रे लोकतंत्र के चौथे खंभे

मित्रों कभी कभी मुझे यह सवाल कचोटता है कि आखिर हम पत्रकारिता किसके लिए कर रहे हैं। निश्चित ही इसके कई जवाब भी कई लोगों के पास होंगे। मगर जब मैं कवरेज को भी खांचों में बंटा देखता हूं, तो दिमाग सन्‍न रह जाता है।

ऐसा ही एक वाकया हाल के दिनों में देखने को मिला, केदारनाथ त्रासदी में बचे लोगों को ऋषिकेश लाया जा रहा था। हर अखबारनवीस, टीवी रिपोर्टर दर्द से सनी मार्मिक कहानियों को समेट रहा था, क्‍योंकि डेस्‍क की डिमांड चुकी थी। दर्द को बेचकर ही शायद पाठकों के दिलों तक पहुंचने का सवाल था।


दो तीन दिन कहानियां समेटी गई, पीड़ा की गाढ़ी चाशनी में डूबोकर परोसी भी गई, मगर तभी एक मित्र ने बताया कि डिमांड में चेंज गया है। अब ऐसे शहरों, प्रदेशों के लोग तलाशे जाएं जहां उनके पेपरों का सर्कुलेशन है। सो यदि गुजरात, कर्नाटक, राजस्‍थान, पश्चिम बंगाल का कोइ्र वापस लौटा व्‍यक्ति कराहता भी मिला तो उसकी अनेदखी होनी शरू हो गई। केवल सर्कुलेशन वाले क्षेत्रों के लोग ही टारगेट किए गए। उन्‍हीं को कुरेदा गया, उन्‍हीं से बायलाइन स्‍टोरियां निकाली गई। 

अब क्‍या समझें कि पत्रकारिता किसके लिए, और क्‍यों की जा रही हैं। यह दौर है जब पत्रकार अपनी संवेदना, विवेक पर कलम नहीं चला रहा है बल्कि बाजार की तर्ज पर सिर्फ डिमांड भर पूरी कर रहा है। ताकि अमुख इलाकों के लोग भी जान जाएं की फलां-फलां अखबार न्‍यूज चैनल ने सबसे पहले उनके लोगों के दर्द को उन तक पहुंचाया, और वह उनका मुरीद हो जाए।

22 June, 2013

बाबा, बाबा आप कहां हैं..

उत्‍तराखंड में जलप्रलय के बाद मचा तांडव हमारे अतीत के साथ ही भविष्‍य को भी बहा ले गया है। कहर की विनाशकता को पूरा देश दुनिया जान चुकी है, मदद को हाथ उठने लगे हैं, सहायता देने वालों के दिल और दरवाजे हर तरफ खुल गए हैं। मगर अफसोस कि अभी तक हरसाल योग के नाम पर विदेशियों से लाखों कमाने वाले बाबा, पर्यावरण संरक्षण और निर्मल गंगा के नाम पर लफ्फाजियां भरी बैठकों का आयोजन करने वाले बाबा, गंगा की छाती पर अतिक्रमण करने वाले बाबा, सरकारी जमीनों और मदद की फिराक में रहने वाले बाबा, पीले वस्‍त्रधारी संस्‍कृत छात्रों के बीच चमकने वाले बाबा, कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। 

आखिर वह अब हैं कहां.. क्‍यों नहीं आए वह अब तक त्रासदी के दर्द को कम करने के लिए, क्‍यों नहीं खुले अब तक उनके खजाने, क्‍यों नहीं भेजी उन्‍होंने अब तक अपनी (तथाकथित) गंगा बचाओ अभियान की फौज मदद के लिए, क्‍यों शोक जताने के लिए सिर्फ एक पेड़ लगाकर इतिश्री कर ली उन्‍होंने, कहां चला गया उनका विभिन्‍न 'टी' वाला प्रोग्राम। कोई अब भी इनके आभामंडल में घिरा रहे तो अफसोस ही जताया जा सकता है।

बंधुओं बात सिर्फ किसी एक बाबा कि नहीं, बल्कि उत्‍तराखंड की धरती से हरसाल मठ मंदिरों में जमकर, तीर्थों में जमीन कब्‍जाने वाले, गद्दियों के लिए लड़ने वाले, आलीशान और फाइव स्‍टार जैसी सुविधाओं वाले आश्रमों और धर्मशालाओं में रहकर अंधभक्‍तों की गाढ़ी कमाई बटोरने वाले बाबा भी दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं। उनके सदावर्त चलने वाले भंडारे भी कहीं गायब हो गए हैं। आम आदमी भी मदद को हजार पांच सौ का चेक राहत कोष को दे रहा है, मगर इनके खजाने की चाबी जाने कहां गुम हो गई है।

क्‍या इनके अंधभक्‍तों की अब भी आंखें नहीं खुलेंगी। या फिर वे बाबा के चमत्‍कारों के भ्रम में ही खुद को ठगाते रहेंगे। शहरी विकास मंत्री जी अपनी गंगोत्री के घाव भरने के लिए ही मांग लीजिए इन बाबाओं से जिनकी आप अब तक आराधना करते आए हैं। सीएम साहब आप तो बाबाओं के धोरे जाकर हमेशा रिचार्ज होने की बातें कहते रहे हैं, अब इन्‍हें भी समझाईए कि इन अभागे पहाड़ों को भी कुछ रिचार्ज कर दें। जो इस देवभूमि की बदौलत उन्‍होंने बटोरा है।


आलेख- धनेश कोठारी

20 June, 2013

मूर्ति बहने का राष्ट्रीय शोक

         ऋषिकेश में एक मूर्ति बही तो देश का पूरा मीडिया ने आसमान सर पर उठा लिया। खासकर तब जब वह न तो ऐतिहासिक थी, न पौराणिक। 2010 में भी मूर्ति ऐसे ही बही थी। जबकि राज्‍य के अन्‍य हिस्‍सों में हजारों जिंदगियां दफन हो चुकी हैं। तब भी मीडिया के लिए मूर्ति का बहना बड़ी खबर बनी हुई है। मजेदार बात कि यह क्लिप मीडिया को बिना प्रयास के ही मिल गए। आखिर कैसे.. जबकि ऋषिकेश में राष्‍ट्रीय मीडिया का एक भी प्रतिनिधि कार्यरत नहीं है। एक स्‍थानीय मीडियाकर्मी की मानें तो यह सब मैनेजिंग मूर्ति के स्‍थापनाकारों की ओर से ही हुई।

अब सवाल यह कि एक कृत्रिम मूर्ति के बहने मात्र की घटना को राष्‍्ट्रीय आपदा बनाने के पीछे की सोच क्‍या है। इसके लाभ क्‍या हो सकते हैं.. कौन और कब पहचाना जाएगा, या कब कोई सच को सामने लाने की हिकमत जुटाएगा। क्‍या मीडिया की भांड परंपरा में यह संभव है। 


किसी के पास यदि इसी स्‍थान की करीब डेढ़ दशक पुराना फोटोग्राफ्स हो तो काफी कुछ समझ आ जाएगा कि क्‍या गंगा इतनी रुष्‍ट हुई या उसे अतिक्रमण ने मजबूर कर दिया। अब एकबार फिर गंगा और मूर्ति के नाम पर आंसू बहेंगे, और कुछ समय बाद कोई राजनेता, सेलिब्रेटी तीसरी बार नई मूर्ति की स्‍थापना को पहुंचेगा। और आयोजित समारोह में निर्मल गंगा और पर्यावरण संरक्षण की लफ्फाजियां सामने आएंगी। जिसे स्‍थानीय और राष्‍ट्रीय मीडिया एक बड़ी कवायद और उपलब्धि के रूप में प्रचारित करेगा। 


धन्‍य हो ऐसे महानतम मीडिया का.....


आलेख- धनेश कोठारी

08 June, 2013

मैं, इंतजार में हूं


मैं, समझ गया हूं
तुम भी, समझ चुके हो शायद
मगर, एक तीसरा आदमी है
जो, चौथे और पांचवे के -
बहकावे में आ गया है
खुली आंखों से भी
नहीं देखना चाहता 'सच'

मैं और तुम विरोधी हैं उसके
कारण, हम नहीं सोचते उसकी तरह
न, वह हमारी तरह सोचता है

रिक्‍त शब्‍द भरो की तरह
हम खाली 'आकाश' भरें, भी तो कैसे
सवाल कैनवास को रंगना भर भी नहीं
पुराने चित्र पर जमीं धूल की परतें
खुरचेंगे, तो तस्‍वीर के भद्दा होने का डर है

मैं, इंतजार में हूं
एक दिन हिनहिनाएगा जरुर
और धूल उतर जाएगी उसकी
काश...
हमारा इंतजार जल्‍दी खत्‍म हो जाए
रात गहराने से पहले ही......

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी 

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