03 February, 2018

‘गीतेश’ की कविताओं में बच्चे सा मचलता है ‘पहाड़’


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युवा ‘गीतेश सिंह नेगी’ का प्रारंभिक परिचय गढ़वाली कवि, गीतकार, गजलकार, जन्म-फिरोजपुर, मूल निवास- महरगांव मल्ला, पौड़ी गढ़वाल, संप्रति- भू-भौतिकविद, रिलायंस जियो इन्फोकॉम लि. सूरत है। इस सामान्य परिचय में निहित असाधारणता की सुखद अनुभूति से आपको भी साझा करता हूं। जब गढ़वाल के ठेठ पहाड़ी कस्बों में पैदा होने से लेकर वहीं जीवनयापन कर रहे युवा निःसंकोच सबसे कहते हैं कि उन्हें गढ़वाली बोलनी नहीं आती है, तो लगता है हमारे समाज में लोकतत्व खत्म होने के कगार पर है, पर ‘घुर घुघुती घुर’ किताब के हाथ में आते ही मेरी इस नकारात्मकता को ‘गीतेश’ के परिचय ने तड़ाक से तोड़ा है। लगा पहाड़ी समाज में लोकतत्व अपने मूल स्थान में जरूर लड़खड़ाया होगा, पर दूर दिशाओं में वह मजबूती से उभर भी रहा है। जन्म, अध्ययन और रोजगार में पहाड़ का सानिध्य न होने के बाद भी ठेठ पहाड़ी संस्कारों को अपनाये ‘गीतेश’ प्रथम दृष्ट्या मेरी कई सामाजिक चिंताओं को कम करते नजर आते हैं।

‘गीतेश सिंह नेगी’ की कविता, गीत और गजल अक्सर पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलती हैं। उनकी ‘वू लोग’ कविता मुझे विशेष पंसद है। परंतु इस कविता संग्रह की गढ़वाली कविताओं को तल्लीनता से पढ़ने और समझने के बाद उनकी बहुआयामी दृष्टि से रूबरू हुआ हूं। आज के युवाओं में अपनी मातृभूमि के प्रति भावनाओं का ऐसा अतिरेक बहुत कम देखने को मिलता है। ‘गीतेश’ का मन ‘जैसे उड़ी जहाज को पंछी, पुनि-पुनि जहाज पै आवे’ की तरह दुनिया-जहान की दूर-दूर की उड़ान के बाद ठौर लेने पहाड़ की गोद में ही सकून पाता है।

उनकी कविताओं की नियति भी ‘पहाड़’ में ही रचने-बसने की है। तभी तो ‘गीतेश’ की कविताएं ‘पहाड़ीपन’ से बाहर निकल ही नहीं पाती हैं। यह भी कह सकते हैं कि ‘पहाड़’ ‘गीतेश’ की कविताओं का प्राणतत्व है। वो खुद भी घोषित करते हैं कि ‘एक दिन ही इन्नु नि आई कि मी पहाड़ से छिट्गि भैर या पहाड़ मि से छिट्गि भैर गै ह्वोल’। ‘गीतेश’ की कविताओं में ‘पहाड़’ बच्चा बनकर मचलता या रूठता है, दोस्त की तरह गलबहिंया डाले दिल्लगी करता है तो अभिभावक की भांति दुलारता या डांटता हुआ दिखाई देता है। हर किरदार में ‘गीतेश’ का पहाड़ परफैक्ट है पर साथ में फिक्रमंद भी है।


‘गीतेश’ व्यावसायिक तौर पर वैज्ञानिक हैं। यही कारण है कि उनकी कविताएं भावनाओं के भंवर से बाहर आकर समाधानों की ओर रूख करने में सफल हुई हैं। ‘गीतेश’ की अधिकांश कविताएं अतीत के मोहजाल में हैं जरूर, पर भविष्य के प्रति वे सजग भी हैं। ‘गीतेश’ कविताओं में बिम्बों को रचने और मुखर करने के सल्ली हैं। उन्होने कविताओं में विविध बिंबों के माध्यम से समसामयिक सरोकारों की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति की है। ‘गीतेश’ की जीवन शैली पहाड़, प्रवास और परदेश के व्यापक फलक में गतिशील रही है। यही कारण है कि उनकी कविताएं अनेक दिशाओं में प्रवाहमान हैं। ‘गीतेश’ गीतकार और गजलकार भी हैं। लिहाजा उनकी कविताओं में गीतात्मकता अपने आप ही जगह बना लेती है।

‘घुघुती’ पहाड़ी चिडिया है। बिल्कुल शांत, सरल और एकाकी। गहरी नीरवता में भावनाओं के उद्वेग को बताने में तल्लीन। उसे परवाह नहीं, कि कोई उसे सुन रहा है कि नहीं। वह तो सन्नाटे को तोड़ती निरंतर ‘घुघुती-घुघूती’ आवाज को जिन्दा रखती है। उसके भोलेपन के कारण ही पहाड़ी भाषा में ‘घुघुती’ लाड-दुलार को अभिव्यक्त करने वाला शब्द प्रचलन में है। बच्चे से खूब-सारा प्यार जताने के लिए उसे ‘म्यार घुघुती’ बार-बार सयाने कहते हैं।

‘गीतेश’ ने माना है कि ‘घुघुती’ जैसा भोलापन, तल्लीनता और एकाग्रता ही ‘पहाड़’ को जीवंत और ‘पहाड़ी’ को खुशहाल बना सकता है। ‘घुर घुघुती घुर’ पहाड़ की वीरानगी में सकारात्मकता की निरंतर गूंजने वाली दस्तक है। अब सुनना, न सुनना या फिर सुनकर अनसुना करना ये तो नियति पर है।

बहरहाल, ‘गीतेश सिंह नेगी’ के प्रथम गढ़वाली कविता संग्रह ‘घुर घुघुती घुर’ में 59 कविताएं हैं। इसकी हर कविता अनुभवों की उपज है। उनमें कल्पना की उड़ान से कहीं अधिक यथार्थ की गहराई है। पाठकों को उनके दायित्वबोध को बताती और समझाती कविताएं व्यंग के संग गंभीर भी हो चली हैं। ‘गीतेश सिंह नेगी’ की कविताएं साहित्यकारों के साथ पहाड़ के नीति- निर्धारकों यथा- नेता, अफसर, सामाजिक कार्यकत्ताओं को स्वः मूल्यांकन के लिए पसंद की जायेगी। बशर्ते उन तक यह पुस्तक पहुंचे। ‘गीतेश’ जी और धाद प्रकाशन, देहरादून को गढ़वाली साहित्य को ‘घुर घुघुती घुर’ जैसी उत्कृष्ट कविता संग्रह से समृद्ध करने के योगदान के लिए बधाई और शुभ-कामना।

कविता संग्रह- घुर घुघुती घुर
कवि- गीतेश सिंह नेगी’
मूल्य- ₹ 150/-
प्रकाशक- धाद प्रकाशन, देहरादून

समीक्षक - डॉ. अरुण कुकसाल

पहाड़ फिर करवट ले रहा है

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पहाड़ फिर करवट ले रहा है। युवा चेतना के साथ। वह बेहतर समाज के सपने संजोना चाहता है। वह समतामूलक समाज के साथ आगे बढ़ना चाहता है। उसकी यह उत्कंठा नई नहीं है। बहुत पुरानी है। सदियों की। दशकों की। प्रकृति प्रदत्त भी है। परंपरागत भी। ऐतिहासिक पड़ाव इसकी गवाही देते हैं। यह छटपटाहट फिर युवाओं में देखने को मिल रही है। रुद्रप्रयाग में। रुद्रप्रयाग तो एक प्रतीक है। गैरसैंण को लेकर भले ही यहां के युवक ज्यादा सक्रिय हों, लेकिन उनके स्वर पूरे उत्तराखंड़ में सुनाई दे रहे हैं। अलग-अलग रूपों में। अलग-लग मंचों पर। कहीं टुकड़ों में तो कहीं सामूहिक। कहीं गीत-संगीत में तो कहीं कविताओं में। कहीं सृजन में तो कहीं रंगमंच में।

स्कूलों में नौकरी में आये शिक्षकों में भी। प्रवास में रहे रहे युवाओं मे भी। विदेश चली गई प्रतिभाओं में भी। कुछ युवा प्रशासनिक अधिकारियों में भी। युवाओं के इन स्वरों को सुनने की और इस आहट को पहचाने की जरूरत है। युवाओं ने पहाड़ को नये सिरे से समझने की कोशिश की है। नये संदर्भों में। नई चेतना के साथ। इसे एक दिशा देने की जरूरत है। इनका साथ देने की थी। उत्तराखंड में युवा चेतना अलख जगाती दिख रही है। सत्तर के दशक की तरह। उसने माना कि हमारी राजनीतिक समझ ही समाज बदल सकती है। उन्होंने तत्कालीन व्यवस्था से मुठभेड़ की।

बहुत सारे आंदोलन बने। गढ़वाल विश्वविद्यालय का आंदोलन, वन आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो, राजनीतिक अपसंस्कृति के खिलाफ आंदोलन, तराई में जमीनों की लूट हो या महतोष मोड़ कांड, कमला कांड हो या शराब माफिया या फिर आपातकाल के खिलाफ भी स्वर। कार रैली को रोकने से लेकर गांवों के विकास की बात। सहकारिता की बात। विश्वविद्यालयों के अंदर से छात्रों की हुंकार। चेतना का एक नया आकाश बना था। उसी छात्र-युवा चेतना ने आज तक वैकल्पिक विचार की धारा को बनाये रखा है। सत्तर के दशक में उत्तराखंड युवा मोर्चा ने एक पर्चा निकला था, जिसमें गांव के आदमी से पूछा गया कि आप अपने सांसद या विधायक को जानते हो? गांव वाले ने कहा, ‘हमारे यहां गेहूं-चावल तो होता है लेकिन सांसद-विधायक नहीं होते।’ 

शायद फिर उत्तराखंड में यही माहौल बन रहा है। मैं इस बार अपने युवा साथियों के साथ था। रुद्रप्रयाग में। मौका था गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिये महापंचायत का। बहुत सारे साथी जुटे थे। संख्या जो भी हो, लेकिन उनमें पहाड़ को देखने का अपना नजरिया था। समस्याओं को समझने और उसके समाधान भी थे। उनके पास एक खुली खिड़की है। उनके पास एक बड़ा दरवाजा है, जिसमें कई लोग आ सकते हैं। सहमति और असहमति के बीच संवाद कायम करने की क्षमता भी है। बहस की गुजाइश भी। आगे बढ़ने के लिये संकल्प भी। प्रतिकार के लिये साहस भी। गैरसैंण तो एक बहाना है। एक मुद्दा है। गैरसैंण में हमारी भावनायें भी हैं आकांक्षायें भी। उसे हम सजाना चाहते हैं, संवारना चाहते हैं। अपने मन मुताबिक बनाना भी चाहते हैं। यही भावना लगातार हमारे हाथ से छूटते जाते पहाड़ के बारे में भी है।

हिमालय के अपने हाथ से निकल जाने के संकट हम इन युवाओं में देख सकते हैं। मैं शुरुआत रुद्रप्राग के युवाओं से ही करता हूं। जब गैरसैंण का आंदोलन चला तो यहां कुछ युवा-छात्र सक्रिय हुये। लगातार वे इस मुहिम में लगे भी हैं। यहां मोहित डिमरी हैं। लगातार लोगों को इकट्ठा कर रहे हैं। बहुत कम उम्र है अभी उनकी। लेकिन बहुत गंभीरता से वे इस मुद्दे के लिये काम कर रहे हैं। पत्रकारिता में पहले से आ गये थे। एक तरह से उन्हें विरासत में पत्रकारिता मिली है। वे हमसे पहली पीढ़ी और हमारी पीढ़ी की सामाजिक धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रदीप सती ने तो अपने को बहुत मांजा है। उनके अंदर फूटने वाला गुस्सा शायद उत्तराखंड के सरोकारों से छात्र जीवन से संचित हो रहा हो। उन्होंने दिल्ली में मुख्य धारा की पत्रकारिता से भी अपने को मांजा। बहुत तरीके से। उन्होंने देश की चर्चित पत्रिका ‘तहलका’ में काम किया है। चाहते तो आगे ही बढ़ सकते थे। दिल्ली में भी वे बैचेन ही थे। उनकी बैचेनी मुझे लगता है अब शक्ल लेने लगी है। यह हमारे लिये अच्छे संकेत हैं।

दीपक बेंजवाल से आप मिलते हैं तो आपके सामने विचार और गंभीरता में लिपटी पहाड़ की वह संवेदना स्फुटित होती है जो एक सार्थंक बदलाव के लिये अपने को समर्पित कर सकती है। ऊखीमठ जैसी जगह से पत्रिका निकालना और वह भी स्तरीय सामग्री के साथ अपने आप में एक चुनौती है। चुनौती ही नहीं, इस तरह का जोखिम वही उठा सकते हैं, जिनके पास संवेदनायें हों। जो समाज के मर्म को जानते-समझते हों।

अभी एक बिल्कुल नये छात्र से हमारा परिचय हुआ है सचिन थपलियाल से। वे देहरादून डीएवी कालेज के छात्र संघ महासचिव रहे हैं। उनके अंदर बदलाव की छटपटाहट है। उनके पिता लक्ष्मी प्रसाद थपलियाल हमारे हमारे गहरे मित्रों में से हैं। 

बहुत अच्छा लगा जब हमारे सीनियर रहे सुपरिचित पत्रकार राजेन टोडरिया के पुत्र लुसन टोडरिया. ने इस पूरी मुहिम में उसी तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जैसे कभी उनके पिता पहाड़ के लिये हुंकार भरते थे।

गंगा असनोड़ा के बारे में क्या कहना। वह तो पहाड़ हैं। अडिग, थपेड़ों को झेलने वाली। संकल्प और प्रतिबद्धता में लिपटी एक ऐसी नदी का प्रवाह जो बहुत शीतल होने के बावजूद रुकावटों से टकराती है। और उन लोगों को भी चेताती जो सोचते हैं कि नहरें बनाकर वह नदियों का प्रवाह रोक सकते हैं। उन्हें नहीं पता कि नदियां अपना रास्ता खुद तैयार कर लेती है। उन्होंनें छोटी उम्र में जिस तरह से पूरी दुनिया को देख लिया है, उसके सामने अब हर बात, हर एहसास हर चुनौती बहुत छोटी है, बहुत बौनी है। उन्होंने वैकल्पिक पत्रकारिता के माध्यम से ‘रीजनल रिपोर्टर’ को जिस तरह से जनपक्षीय बनाया है वह बेमिसाल है। हमारे सीनियर और बड़े भाई पुरुषोत्तम असनोड़ा की सुपुत्री हैं। यहां और भी बहुत सारे युवाओं से मुलाकात हुई। उनमें जो जज्बा है वह नई उम्मीद जगाता है।


आलेख- चारु तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार

02 February, 2018

मछेरा जाल लपेटने ही वाला है

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गढ़वाली लोक साहित्य के शिखर, डा. गोविंद चातक पर विशेष
‘जब सभ्यता बहुत सभ्य हो जाती है तो वह अपनी प्राचीनता को हीन समझ कर उससे पीछा छुड़ाना चाहती है। हम बातें तो हमेशा ‘लोक’ की करते हैं, पर व्यक्तिगत जीवन अभिजात्य वर्ग जैसा जीना चाहते हैं। गढ़वाली और कुमाऊंनी समाज में यह प्रवृत्ति ज्यादा ही असरकारी हुई है, जिस कारण उनमें ‘लोक’ का तत्व खोता जा रहा है, इतना कि अब ‘मछेरा जाल लपेटने ही वाला है।’ यह कथन था, गढ़वाली लोकसाहित्य के पुरोधा डॉ. गोंवद चातक का।

डॉ. चातक का जन्म ग्राम-सरकासैंणी, पट्टी- लोस्तु, (बडियारगड़), टिहरी गढ़वाल में 19 दिसम्बर, 1933 को हुआ था। पिता स्कूल में अध्यापक थे। गांव से दर्जा चार पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे पिता के साथ मसूरी आ गए थे। घनानंद इंटर कॉलेज, मसूरी से इंटरमीडिएट के उपरांत स्नातक इलाहबाद विश्वविद्यालय से किया। हाईस्कूल के अध्यापक प्रसिद्ध लेखक और शिक्षाविद शंभुप्रसाद बहुगुणा ने चातक जी की साहित्यिक अभिरुचि को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। जाति प्रथा से बचपन से ही मोहभंग होने कारण वे किशोरावस्था में ही गोविंद सिंह कंडारी से गोविंद चातक बन गए थे। ‘चातक पक्षी’ की तरह उनमें साहित्य सजृन की ‘प्यास’ और सामाजिक बेहतरी की ‘आस’ एक साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में आजीवन रही।


मसूरी में रहते हुए ‘हिमालय विद्यार्थी संघ’, ‘गढ़वाली साहित्य कुटीर संस्था’, ‘अंगारा’ और ‘रैबार’ पत्रिका में गोविंद चातक की प्रमुख भूमिका थी। किशोरावस्था से ही उनकी कविताएं और कहानियां प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थी। इलाहबाद से स्नातक के बाद वे मसूरी में उच्चशिक्षा के लिए प्रयत्नशील रहते हुए सामाजिक और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय थे। इस दौरान जौनपुर इलाके की लोक संस्कृति से प्रभावित होकर गढ़वाली लोकगीतों के संकलन में जुट गए। राहुल सांकृत्यान जी के सुझाव पर ‘रंवाल्टी लोकगीत और उनमें अभिव्यक्त लोक संस्कृति’ विषय पर आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

सन् 1960 से 1964 तक उन्होंने आकाशवाणी, दिल्ली में नाट्य निर्देशक एवं गढ़वाली लोक संगीत के समन्वयक के रूप में कार्य किया। वर्ष 1964 में राजधानी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में सेवानिवृति तक हिंदी प्रवक्ता पद पर सेवारत रहे। 9 जून, 2007 को उनका देहांत हो गया।


डॉ. गोविंद चातक को गढ़वाली लोकसाहित्य के शुरुवाती प्रमाणिक संकलनकर्ता एवं शोधार्थी का श्रेय जाता है। उन्होंने लोकसाहित्य के क्षेत्र में तब कार्य किया जब लोकगीतों एवं नृत्यों से जुड़े कलाकारों को यथोचित सम्मान नहीं दिया जाता था। डॉ. चातक ने लोगों की इस निम्नकोटि की अवधारणा को बदलकर बताया कि ‘लोककला और साहित्य किसी भी समाज का प्राण है जो कि बादलों से जल की तरह निकलकर घरती पर मुलायम घास को उपजा कर मानवीय जीवन को गतिशीलता प्रदान करता है’।

‘एकला चलो रे’ की नीति को अपनाते हुए गोविंद चातक ने गढ़वाली लोकसाहित्य के लोकतत्वों का साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पक्षों के दृष्टिगत मूल्यांकन कर उसकी महत्ता और उपयोगिता को प्रमाणिक तौर पर सार्वजनिक किया। गढ़वाली लोकसाहित्य के क्षेत्र में जो कार्य प्रतिष्ठित अकादमी नहीं कर सके, वह चातक जी ने करके दिखाया। शैक्षिक संस्थाओं की यह शिथिलता आज भी जारी है। उत्तराखंड बनने के 17 साल बाद भी गढ़वाली लोकसाहित्य में चातक जी जैसा मौलिक कार्य कोई अकादमी नहीं कर पायी है।


वर्ष 1954 में युवा गोविंद चातक की प्रतिभा को पहचानते हुए उनके प्रथम संग्रह ‘गढ़वाली लोकगीत’ की भूमिका में महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने लिखा कि ‘चातक जी गुजरात के मेघाणी (राजस्थानी लोकगीतों के विख्यात संग्रहकर्ता) की तरह अपनी तरुणाई लोकसाहित्य के संकलन के लिए समर्पित कर दीजिए। जब बारह बरस की साधना कागज पर उतर आएगी तो आपके लिए इंद्र का आसन भी डोल जायेगा।’ यह प्रसन्नता की बात है कि राहुल सांकृत्यायन से प्रेरणा पाकर चातक जी ने पूरी जीवटता और निष्ठा के साथ जीवन भर लोक साहित्य के प्रति अपना समर्पण सनक की हद तक निभाया था।

डॉ. गोविंद चातक ने अपने जीवनकाल में लोकसाहित्य एवं संस्कृति पर आधारित 25 किताबें प्रकाशित की थीं। वर्ष 1954 में ‘गढ़वाली लोकगीत’ से प्रारंभ उनकी साहित्यिक यात्रा में ‘गढ़वाली लोकगाथाएं’ (पुरस्कृत), उत्तराखंड की लोककथाएं’, ‘गढ़वाली लोकगीतः एक सांस्कृतिक अध्ययन’, ‘मध्य पहाड़ी का भाषा शास्त्रीय अध्ययन’, भारतीय लोक संस्कृति का संदर्भः मध्य हिमालय (पुरस्कृत), पर्यावरण और संस्कृति का संकट (पुरस्कृत), ‘लड़की और पेड़’ (कहानी संग्रह) प्रमुख हैं।

लोक साहित्य से इतर गोविंद चातक ने नाट्य विधा पर महत्वपूर्ण लेखन कार्य किया है। नाट्यालोचना में ‘प्रसाद के नाटकः स्वरूप और संरचना’, ‘रंगमंचः कला और दृष्टि’ ‘आधुनिक हिन्दी नाटक का मसीहाः मोहन राकेश’ उनकी चर्चित पुस्तकें हैं। उनके नाटकों में ‘केकड़े’ स्त्री-पुरुष संबधों की पड़ताल, ‘काला मुंह’ दलित वर्ग की त्रासदी, ‘दूर का आकाश’ पहाड़ी फूल ‘फ्यूंली’ की बिडम्बना, ‘बांसुरी बजती रही’ प्रेम की पीड़ा, और ‘अंधेरी रात का सफर’ टॉलस्टाय के निजी जीवन के द्वन्द्वों को दर्शाते हैं।

डॉ. गोविंद चातक के साहित्यिक कृतियों को देश के कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों शामिल किया गया है। परन्तु गढवाली लोक साहित्य की यह बिडम्बना ही है कि डॉ. गोविंद चातक के बाद इस क्षेत्र में मौलिक एवं गंभीर कार्य नहीं हुआ है। चातक भी मानते थे कि ‘गढ़वाली लोकसाहित्य के वर्तमान शोधार्थियों ने पूर्ववर्ती शोधकार्यों के पिसे आटे को ही बार-बार पीसा है, इसीलिए उनमें सामाजिक उपयोगिता नदारद है।’

गोविंद चातक दिल्ली की महानगरीय जिंदगी को छोड़कर वापस अपने गढ़वाल में ही रहना चाहते थे। उन्होंने श्रीकोट, श्रीनगर (गढ़वाल) में निवास हेतु ’देवधाम कुटी’ भी बनाई। परन्तु पहाड़ी लोगों की जानी-पहचानी नियति कि पुनः उन्हें दिल्ली में ही रहना पड़ा। मेरे साहित्यकार मित्र महावीर रवांल्टा को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि ‘...जिन्दगी डंडा लेकर मेरे पीछे पड़ी रही और मैं दौड़ता रहा। पीछे मुड़नें और सुस्ताने का अवसर नहीं मिला। जिन्दगी की राह में कांटे तो मिले ही फूल भी मिले, पर कहीं रमने का मौका नहीं मिला। कई बार प्रलोभन आए पर मैं उन्हें देखकर आगे बढ़ गया और आगे बढ़ने पर पीछे छूटती चीजें छोटी लगने लगी। ...जो नहीं मिला उसकी पीड़ा भले ही हुई हो, पर उसको भुलाने में भी मुझे देर नहीं लगी।’

आलेख- अरुण कुकसाल 

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