09 May, 2016

दुनियावी नजरों से दूर, वह 'चिपको' का 'सारथी'

दुनिया को पेड़ों की सुरक्षा के लिए 'चिपको' का अनोखा मंत्र देने और पर्यावरण की अलख जगाने वाले 'चिपको आंदोलन' के 42 साल पूरे हो गए हैं। इस आंदोलन की सबसे बड़ी 'यूएसपी' थी, पर्वतीय महिलाओं की जीवटता और निडरपन। मात्रशक्ति ने समूची दुनिया को बता दिया था, कि यदि वह ठान लें तो कुछ भी असंभव नहीं।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस आंदोलन को अपने मुकाम तक पहुंचाने में चिपको नेत्री गौरा देवी, बाली देवी और रैणी- रिगड़ी गांव की महिला मंगल दल सदस्‍यों समेत धौलीगंगा घाटी के दर्जनों गांवों के लोगों का उल्‍लेखनीय योगदान रहा। साथ ही चिपको नेता चंडी प्रसाद भट्ट, हयात सिंह बिष्‍ट, वासुवानंद नौ‍टियाल आदि अनेकों लोगों ने आंदोलन में कामयाब भूमिका अदा की।
समूचा विश्‍व चिपको आंदोलन की कामयाबी से अचंभित रहा और आज भी है। मगर, इस सबके बीच जिस व्‍यक्ति की बदौलत आज चिपको आंदोलन विश्‍व मानचित्र पर अपनी ध्‍वजा को लहराए हुए है। वह 'सारथी' दुनिया की नजरों से हमेशा दूर ही रहा। बिलकुल हम बात कर रहे हैं, कॉमरेड गोविंद सिंह रावत की। जिनको जाने बिना चिपको आंदोलन की गौरवगाथा को अधूरा ही माना जाएगा।
देश की दूसरी रक्षापंक्ति के रूप में प्रसिद्ध सीमांत जनपद चमोली स्थित जोशीमठ विकासखंड अंतर्गत नीति घाटी के कोषा गांव में 23 जून 1935 को गोविंद सिंह रावत का श्रीमति चंद्रा देवी और श्री उमराव सिंह रावत के घर जन्म हुआ। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी गोविन्द सिंह रावत का जीवन बेहद कठिनाइयों और संघर्षों में बीता। जब वह महज चार साल के थे, तो उनकी माता इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गई थी। इस घटना ने गोविन्द सिंह को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। पारिवारिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह दस वर्षों तक स्कूल नहीं जा पाये। जैसे- तैसे उन्होंने प्राथमिक की पढ़ाई गांव में, फिर आठवीं तक की पढ़ाई नंदप्रयाग में हासिल की।
इसके बाद उनकी आगे की पढ़ाई बीच में ही छुट गई। मगर, मन में पढ़ने की चाहत कम नहीं हुई, और मन विद्रोह को आतुर हो उठा। इसी बीच उनके पिता जैसे ही व्‍यापार के लिए तिब्बत गए (उन दिनों भारत- तिब्बत का व्‍यापार नीति दर्रे से होता था), अनुकूल मौका देखकर वह घर छोड़कर पौड़ी गढ़वाल अंतर्गत बुआखाल आ गये। जहां उन्होने फलों की एक छोटी दुकान खोली। साथ ही कुछ दिनों के बाद पास में ही मेस्मोर इंटर कालेज में किसी तरह से दाखिला भी ले लिया। परिणामस्वरूप 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण हुए।
इसके बाद गोविंद सिंह रावत ने इस बार बुआखाल में फलों की बजाए पान की दुकान खोली। साथ ही आगे की पढ़ाई के लिए पौड़ी टोल पोस्ट पर 15 रूपये महीने में नौकरी भी की, और छोटे बच्चों को पढ़ना भी शुरू किया। धुन के पक्के गोविन्द सिंह को तब झटका जब वह इंटर पहले साल में ही फेल हो गये। फिर उन्होंने मेहनत की और 1960 में 25 साल की उम्र में इंटर पास किया। 12वीं पास करने के तत्काल बाद चमोली में पटवारी पद की भर्ती खुली, तो गोविन्द सिंह परीक्षा पास करके 1963 पटवारी बन गए। इसी बीच तिब्बत व्‍यापार भी बंद हो गया। गोविन्द सिंह का मन नौकरी में नहीं लगा। 1964 में ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी।
पौड़ी में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात पेशावर कांड के नायक वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली और कई अन्य क्रांतिकारी लोगों से हुई थी। जिनके विचारों का उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उन्हें भी समाज को समझने और किताबों को पढ़ने शौक लग गया। धीरे-धीरे इसी शौक ने उन्हें जीवन में लोगों के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी। उनका झुकाव भारतीय कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी की तरफ रहा। इसलिए उन्होंने सन् 1969 में पार्टी ज्वाइन कर ली। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जनहित से जुडे़ छोटी बड़ी समस्याओं के निराकरण के लिए उन्होंने लोगों को एकजुट करना शुरू कर दिया।
इसी बीच चुनाव के दौरान उन्हें अपने जनपद के सामाजिक तानेबाने को करीब से जाने का मौका मिला। दो फरवरी 1973 को उन्हें जोशीमठ विकासखंड का पहला प्रमुख चुना गया। इस दौरान मलारी सड़क मार्ग निर्माण में लोगो की कृषि भूमि काटी गई थी, लेकिन मुआवजा नहीं मिला था। गोविन्द सिंह ने ग्रामीणों को मुआवजा दिलाने के लिए शासन-प्रशासन से मांग की, साथ ही बदरीनाथ दौरे पर आई तत्कालीन गढ़वाल कमिश्‍नर कुसुमलता मित्तल से भी वार्ता की। इस दौरान वह कमिश्‍नर से भी भीड़ गए और उनका घिराव कर दिया। कमिश्नर के जबाबजानते हो हम कमिश्नर हैं, के उत्तर मेंगोविंद सिंह की बात कमिश्नर जी हम भी जनता हैं, की यादें आज भी पुराने लोगों के जेहन में तरोताजा है।
इसी दौर में गढ़वाल परिक्षेत्र में जंगलों को काटने का ठेका दे दिया गया था। रामपुर-फाटा से लेकर मंडल और रैणी के जंगलों के पेड़ों को काटने का ठेका साइमन एंड गुड्स कम्पनी को दिया गया था। जंगल काटने को लेकर पूरे गढ़वाल में लोगों में असंतोष था। अप्रैल 1973 में श्रीनगर में आयोजित गोष्टी में गोविंद सिंह को इसके बारे में विस्तार से पता चला। गोष्टी में चंडी प्रसाद भट्ट ने उन्हें बताया की रैणी का जंगल भी चार लाख 71 हजार में बिका है- इसको बचाने की सोचो। तब दोनों ने परिचर्चा कर पेड़ों को बचाने के लिए रणनीति तैयार की।
पहले मंडल के जंगलों को काटने के खिलाफ आवाज बुलंद हुई, और फिर रामपुर फाटा के जंगलों को बचाने में ग्रामीणों को कामयाबी मिली। इसी वर्ष मई में गोपेश्वर में एक वन संरक्षण पर एक वृहद सम्मलेन आयोजित हुआ। जिसमें गोविन्द सिंह ने सबको बड़े गौर से सुना और उस पर मंथन भी किया। जिसकी परणिति यह हुई कि रातों रात जनजागरूकता को एक पंपलेट तैयार हो गया। जिसमे लिखा था'आ गया लाल निशान, लुटने वाले हो सावधान', 'लिपटो, झपटो और चिपको'। सबकी सहमति से अक्तूबर 1973 में पीले कागज में इसे लाल अक्षरों से छापा गया।
इसके बाद कॉ. गोविंद सिंह रावत ने जोशीमठ से लेकर रैणी गांव के आसपास यानि नीति घाटी के दर्जनों गांवों की पदयात्रा शुरू की। पीले पंपलेट बांटते हुए चेलेंजर माइक से लोगों को पेड़ बचाओ, पहाड़ बचाओ की अलख जगाने लगे। साथ ही लोगों को जंगलों के कटान से तय नुकसान भूस्खलन, पानी, चारा संकट की जानकारियां दी। उन्‍होंने परवाह नहीं की कि कौन सुन रहा है और कौन नहीं। उन्‍होंने जनजागृति की मुहिम जारी रखी। शुरुआती दौर में कई लोगों ने उन्हें पागल तक समझा। लेकिन धीरे-धीरे उन्‍हें भी जंगलों की अहमियत समझ में आने लगी।
दिसम्बर 1973 में गोविंद सिंह रावत एक सम्मेलन में शिरकत करने टिहरी गए। जहां उन्होंने लोगों को चमोली में जंगल बचाने की मुहीम के बारे विस्तार से बताया, और जागरूक होने को कहा। साथ ही मार्च महीने तक रैणी के जंगल को बचाने के लिए लोगों एकजुट किया। गोविन्द सिंह यह मुहिम उस वक्‍त काम आई, जब प्रशासन ने सोची समझी रणनीति के तहत 14 सालों से अटके मुआवजे के लिए रैणी के पुरूषों को चमोली तहसील में बुलाया गया, और दुसरी तरफ ठेकेदार साइमन गुड्स के मजदूरों ने रैणी के जंगलों पर धावा बोल दिया। तब जिसके प्रतिकार में गौरा देवी की अगुवाई में रैणी की महिलाओं ने अपने हरे भरे जंगलों को बचाने के लिए अनोखा रास्‍ता अपनाया। वह पेड़ों से चिपक गई। मातृशक्ति  के हौसले के आगे ठेकेदार के मजदूरों ने हार कर वापसी कर रुख किया।
कॉ. गोविन्द सिंह रावत द्वारा पूर्व में गांव-गांव पहुंचकर जंगलों को बचाने का जो संदेश प्रसारित किया गया था, आखिरकार वही काम आया। भले उस दिन गोविन्द सिंह और अन्य लोग रैणी में न रहें हों। लेकिन उनकी जगाई अलख रंग लाई। जिसे भुलाया नहीं जा सकता है। इसके बाद चिपको की जीत पर जोशीमठ में एक विशाल जुलूस भी निकाला गया। इस कामयाबी के उपरांत रैणी जांच समिति बनी। जिसमें चंडी प्रसाद भट्ट और गोविन्द सिंह रावत को सदस्य बनाया गया। उनकी संस्तुतियों के आधार पर जंगलों का कटान रोक दिया गया। जो 'चिपको आंदोलन' की ही जीत थी। इसके बाद 'चिपको' रैणी से निकलर देश-दुनिया में चमक बिखेरने लगा और गोविन्द सिंह चिपको से इतर छीनो-झपटो में लग गए।
एक फरवरी तक 1978 तक गोविंद सिंह रावत ब्लाक प्रमुख रहे। 1980 में वन अधिनयम के विरोध में भी वह खुलकर आगे आये। 1979 में गौचर में आयोजित उत्तराखंड क्रांति दल के ऐतिहासिक सम्मलेन में उन्हें भी बुलावा भेजा गया था। 19 नवंबर 1988 को वह दोबारा जोशीमठ के ब्लाक प्रमुख चुने गए, और दिसंबर 1996 तक इस पद पर बने रहे। उन्‍होंने अलग उत्‍तराखंड राज्य निर्माण के आन्दोलन में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। आंदोलन में उनके द्वारा बदरीनाथ से ऋषिकेश तक कई मर्तबा दीवार लेखन भी किया गया।
ताउम्र पहाड़ के हितों के लिए लड़ते रहे गोविंद सिंह के साथी हुकुम सिंह रावत कहते हैं कि उनके जैसा सरल, कर्मठ, जुझारू और निस्वार्थ व्‍यक्ति आज शायद ही कहीं मिले। लोगो की मांगों के लिए वे जोशीमठ में एक पत्थर पर बैठकर घंटों चैलेंजर से अवगत कराते थे। ब्लाक प्रमुख रहते हुये भी उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं किया। जिसकी बानगी उस समय उनके घर में जाकर देखी जा सकती थी। बिल्कुल सामान्य जीवन। उनका एक ही उद्देश्य था कि जनसमस्याओं को कैसे दूर किया जाए।
हुकुम सिंह रावत आगे कहते हैं कि बस एक ही कमी थी, एक लक्ष्य पूरा होते ही दूसरे लक्ष्य को पाना। जिस चिपको आंदोलन ने दुनिया को हैरत में डाला। उसकी सफलता को उन्होंने कभी भी भुनाया न। बल्कि चिपको की सफलता के बाद दूसरे कार्यों की ओर मुड़ गए। यही कारण है कि चिपको की चमक में जोशीमठ का गोविन्द सिंह रावत आज भी देश और दुनिया की नजरों से दूर है। जीवनपर्यंत लोगों के लिए लड़ने वाले गोविन्द सिंह रावत 21 1998 को दुनिया से विदा हुए।
वास्तव में पेड़ों पर अंग्वाल से लेकर चिपको का सफर बहुत जादुई भरा रहा हो, लेकिन इसको सफल बनाने में कई लोगों का हाथ रहा है। जिनमें गोविन्द सिंह रावत का योगदान अमूल्य है, इसे भुलाया नहीं जा सकता है।

प्रस्‍तुति- संजय चौहान 
(चिपको आन्दोलन के 42 बरस पूरे होने पर विशेष लेख) 

05 May, 2016

'जग्वाळ' से शुरू हुआ था सफर

uttarakhand
उत्‍तराखंडी फिल्‍मों का सफरनामा
4 मई का दिन उत्‍तराखंड के लिए एक खास दिन है। जब दुनिया में सिनेमा के अन्‍वेषण के करीब सौ साल बाद 1983 में पहली आंचलिक फीचर फिल्‍म 'जग्‍वाळ' प्रदर्शित हुई। यह इतिहास रचा नाट्य शिल्‍पी पाराशर गौड़ ने। तकनीकी कमियों के बावजूद पहली फिल्‍म के नाते 'जग्वाळ' को औसत रिस्‍पांस मिला। इसके बाद बिन्देश नौडियाल ने 1985 में 'कबि सुख कबि दु:ख' प्रदर्शित की।

जो कि कमजोर कथानक के चलते दर्शकों को कतई आकर्षित नहीं कर सकी।
1986 का साल जरुर आंचलिक सिनेमा के लिए उत्‍साहजनक रहा। मुंबई के उद्यमी विशेश्वर नौटियाल ने तरनतारन धस्‍माना के निर्देशन में उत्‍तराखंड को पहली सबसे कामयाब फिल्‍म 'घरजवैं' दी। इस फिल्‍म ने आंचलिक सिनेमा को नई उम्‍मीद भी दी। जिसकी बदौलत उत्‍तराखंड सिनेमा का यह सफर 33 साल पूरे कर चुका है।
सन् 1986 में ही शिवनारायण रावत निर्मित और तुलसी घिमीरे निर्देशित फीचर फिल्‍म 'प्‍यारू रूमाल' सिनेमाघरों में लगी। जो कि नेपाली फिल्‍म 'कुसमई रुमाल' से गढ़वाली भाषा में डब मात्र थी। इसी साल एक और फीचर फिल्‍म 'कौथिग' परदे पर साकार हुई। कौथिग को बेहद सधी हुई कथावस्‍तु, सुमधुर गीत संगीत, अभिनय और अच्‍छे निर्देशन के लिए याद किया जाता है। यह फिल्‍म जयदेव शील ने शक्ति सामंत के शागिर्द रहे चरण सिंह चौहान के निर्देशन में बनाई। वहीं, बद्री आशा फिल्‍मस के बैनर पर सुरेंद्र सिंह बिष्‍ट द्वारा निर्मित व निर्देशित गढ़वाली फिल्‍म 'उदंकार' भी रिलीज हुई।
उत्‍तराखंड के आंचलिक सिनेमा के इतिहास में वर्ष 1987 को भी खास तौर पर याद रखा जाएगा। इस साल कुमाउनी भाषा की पहली फिल्‍म 'मेघा आ' रिलीज की गई। इसका निर्माण जीवन बिष्‍ट व निर्देशन काका शर्मा ने किया था। सन् 1990 में किशन पटेल निर्मित और सोनू पंवार द्वारा निर्देशित एक और गढ़वाली फिल्‍म 'रैबार' दर्शकों तक पहुंची। 1992 में निर्माता सीताराम भट्ट ने मनोज कुमार के अस्सिटेंट रहे नरेश खन्‍ना के निर्देशन में 'बंटवारू' को रिलीज किया।
1993 में चरण सिंह चौहान के दिग्‍दर्शन में उर्मि नेगी द्वारा गढ़वाली फिलम ' फ्यूंली' को प्रदर्शित किया गया। 1996 में ग्‍वाल दंपति ने चंद्र ठाकुर के निर्देशन में 'बेटी ब्‍वारी' फिल्‍म बनाई। 1997 में निर्माता नरेंद्र गुसाईं व निर्देशक नरेश खन्‍ना की फीचर फिल्‍म 'चक्रचाळ' रिलीज हुई। चक्रचाळ को भी दर्शकों में खासा सराहा गया।1998 में 'ब्‍वारी होऊ त इनि होऊ' का निर्माण सूर्यप्रकाश शर्मा और निर्देशन महावीर नेगी ने किया। महावीर नेगी के निर्देशन में 'सतमंगळया' नामक फिल्‍म भी प्रदर्शित हुई।
2001 में सावित्री रावत ने सुशील बब्‍बर के निर्देशन में रामी बौराणी के कथानक पर आधारित गढ़वाली फिल्‍म 'गढ़ रामी बौराणी' को प्रदर्शित किया गया। 2002 में अविनाश पोखरियाल ने 'किस्‍मत' रिलीज की। जिसे तब सबसे महंगी फिल्‍म माना गया। 2003 में बलविंदर सिंह ने 'जीतू बगड्वाळ' को सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया। 2003 में ही निर्माता अनिल जोशी व निर्देशक अनुज जोशी की फीचर फिल्‍म 'तेरी सौं' परदे पर आई। जो कि उत्‍त़राखंड आंदोलन में मुज्‍जफरनगर कांड की कहानी पर आधारित थी। इसी साल अर्श मलिक प्रोडक्‍शन के बैनर पर गढ़वाली फिल्‍म 'चल कखि दूर जौला' को रिलीज किया गया।
2004 में माहेश्‍वरी फिल्‍मस् की फिल्‍म 'औंसी की रात' प्रदर्शित हुई। वहीं उत्‍तरांचल फिल्‍मस् के बैनर पर 'मे‍री गंगा होली त मैंमु आली' को रिलीज किया गया। वर्ष 2004-05 में ही उत्‍तरा कम्‍युनिकेशन के बैनर तले मुकेश धस्‍माना की फिल्‍म 'मेरी प्‍यारी बोई' का निर्माण किया गया। इसी दौरान हिंदी से गढ़वाली में डब फिल्‍म 'छोटी ब्‍वारी' भी प्रदर्शित हुई। 2005 में कैलास द्विवेदी निर्मित गढ़वाली फिल्‍म 'किसमत अपणी अपणी' दर्शकों के सामने आई। वहीं अंकिता आर्ट के बैनर पर रिलीज फिल्‍म 'संजोग' को भी दर्शकों ने देखा।
2006 में लंबे अंतराल के बाद कुमाउनी भाषा में दूसरी फिल्‍म 'चेली' रिलीज हुई। जिसका निर्माण कमल मेहता द्वारा किया गया था। 2007 में सुदर्शन शाह ने कुली बेगार प्रथा पर आधारित कुमाउनी फिल्‍म 'मधुलि' को दर्शकों तक पहुंचाया। इसी साल भास्‍कर रावत ने गढ़वाली फिल्‍म 'अपणु बिराणु' का निर्माण भी किया। सन् 2008 में अजय शर्मा निर्मित व अनिल बिष्‍ट निर्देशित गढ़वाली फिल्‍म 'मेरो सुहाग' आई। जबकि 'जगवाळ' के निर्माता पाराशर गौड़ द्वारा प्रवासी मित्र के साथ इसी वर्ष रंगकर्मी श्रीश डोभाल के निर्दशन में 'गौरा' को प्रदर्शित किया।
सन् 2009 में निर्माता माधवानंद भट्ट व राजेश जोशी के निर्देशन में गढ़वाली व कुमाउनी में एक फिल्‍म रिलीज की गई। ब्रह्मानन्द छिमवाल, गोपाल उप्रेती  बद्री प्रसाद अंथवाल द्वारा निर्मित व राजेन्द्र बिष्ट निर्देशित कुमाउनी फिल्म 'याद तेरी ऐगे' भी इसी वर्ष दर्शकों ने देखी। वहीं संतोष शाह निर्देशित व हीरासिंह भाकुनी, कुल रावत और खालिद द्वारा निर्मित कुमाउनी फिल्‍म 'अभिमान' को भी प्रदर्शित किया गया।
इसके बाद लंबे समय बाद 2015 में निर्माता उर्मि नेगी ने नरेश खन्‍ना के निर्देशन में शराब की विभीषिका पर केंद्रीत फिल्‍म 'सुबेरौ घाम' को दर्शकों तक पहुंचाया। इसी साल मोहनी ध्‍यानी पाटनी की 'ल्‍या ठुंगार' भी रिलीज हुई। जिसे बंबई और दिल्ली के साथ ही गढ़वाल क्षेत्र में भी जबरदस्‍त रिस्‍पांस मिला। 2016 में नरेश खन्‍ना खुद निर्माता के रूप में उतरे हैं। अप्रैल में उनके द्वारा भाई बहन के प्रेम और खनन के गोरखधंधे पर आधारित फिल्‍म 'भुली ऐ भुली' को रिलीज किया गया है।

प्रस्‍तुति- भीष्‍म कुकरेती, मुंबई।

(साभार व मूल संदर्भ : मदनमोहन डुकलाण, चंद्रकांत नेगी, विपिन पंवार, एमएम मेहता के साथ मेरा पहाड़ डॉट कॉम टीम व हिलीवुड पत्रिका) 

03 May, 2016

पुष्‍कर की 'मशकबीन' पर 'लोक' की धुन

चेहरे पर हल्की सफ़ेद दाढ़ी... पहाड़ी व्‍यक्तित्व और शान को चरितार्थ करती हुई सुंदर सी मूछें... सिर पर गौरवान्वित महसूस कर देने वाली पहाड़ी टोपी... साधारण पहनावा और वेषभूषा... ये पहचान है, विगत 45 बरसों से मशकबीन के जरिये लोकसंस्कृति को संजोते, सहेजते पुष्कर लाल की। जो अकेले ही शादी ब्याह से लेकर, मेले, कौथिगों और धार्मिक अनुष्ठानों में अपनी ऊँगलियों के हुनर के जरिये पहाड़ की लोकसंस्कृति की विरासत को बचाए हुये हैं।

उत्‍तराखंड के जनपद चमोली की प्रसिद्ध निजमुला- गौना ताल की घाटी में बसा एक खुबसूरत गांव है गाड़ी। गाड़ी गांव ही पुष्कर लाल का पैतृक गांव है। उम्र के 64 वें पड़ाव पर पहुँच चुके पुष्कर आज भी बड़ी शिद्दत से अपनी विरासत के संरक्षक बने हुए हैं। बचपन में ये अपने दादा जी के साथ हिमालयी बुग्यालों में बकरियों को चुगाने जाया करते थे। जहां इन्हें अपने दादा जी से बासुंरी की धुन सिखने को मिली। वह धुन इन्हें इतनी भायी, कि वो उनकी जिंदगी का हिस्‍सा ही बन गई।
अक्सर बुग्यालों में एक जगह पर ही रहकर वह बासुंरी की धुन के जरिए बकरियों को इधर से उधर ले आते थे। 19 साल की उम्र में इन्होंने एक मशकबीन ख़रीदी और तब से जो सिलसिला शुरू हुआ, आज भी वो बदस्तूर जारी है। दो बेटे और तीन बेटियों के पिता पुष्कर लाल कहते हैं, कि जो सुकून और आनंद पहाड़ की लोकसंस्कृति में आता है वो अन्यत्र नहीं। लेकिन न तो नीति नियंताओ ने और न हाकिमों ने कभी उनकी सुध ली। बड़ी पीड़ा होती है कि नौजवान पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर होते जा रहें हैं। अगर ऐसा ही हाल रहा तो आने वाले समय में आपको मशकबीन पहाड़ी संस्‍कृति के सरोकारों की बजाए केवल किताबों में ही दिखाई देगी।
सरकारें लोकसंस्कृति और परम्परागत बाध्‍ययंत्रों के संरक्षण और संवर्धन को लेकर हवा हवाई बाते करती रही हैं, हकीकत यह है कि लोकसंस्कृति और उसकी विरासत को किसी तरह से बचा रहे लोग आज बड़ी मुफलिसी में गुजर बसर कर रहें हैं। बकौल पुष्‍कर- वो तो हम लोग अन्य स्रोतों के जरिये अपने परिवार का भरण पोषण करतें हैं। अन्यथा मशकबीन के जरिये परिवार के लिए तो केवल और केवल दो दिन के ही भोजन का बंदोबस्त हो पाता है। ऐसे में कोई कैसे इस ओर दिलचस्‍पी ले।
लम्बी देर तक पुष्कर लाल के साथ गुफ्तगू करने के बाद उनके चेहरे पर पड़ी झुरियां उनके दर्द को साफ़ परीलक्षित करती हैं। आगे कहतें हैं कि जब तक शरीर साथ दे रहा है, तब तक इस धरोहर को बचाने की कोशिश करूँगा, और जब शरीर ही साथ नहीं देगा तो फिर आप खुद ही समझ सकते हैं....।
पुष्‍कर मशकबीन के बारे कहते हैं कि हमारी संस्कृति में इससे बेहतरीन बाध्‍ययंत्र और कोई नहीं। इसकी धुन से ही पूरा वातावरण अपनी अनुपम छटा बिखेरता है। वे अब तक देहरादून, रानीखेत, हल्द्वानी, श्रीनगर, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी सहित कई स्थानों में मशकबीन के जरिये लोगो को मंत्रमुग्ध कर चुकें हैं। 64 साल की उम्र में भी उनका लोकसंस्कृति के लिए मशकबीन बजाना अद्भुत, जबरदस्त और अकल्पनीय है।

प्रस्‍तुति- संजय चौहान, चमोली गढ़वाल, उत्‍तराखंड 

02 May, 2016

मैं माधो सिंह का मलेथा हूँ­­­

maletha gaon uattarakhand
हुजूर!! मैं मलेथा हूँ, गढ़वाल के 52 गढ़ों के बीरों की बीरता के इतिहास की जीती जागती मिसाल। मैंने इतिहास को बनते और बदलते हुये देखागढ़वाल के बीर भड़ों की बीरता को देखा और अपनी माटी के लिए अपनों को ही मौन और बेजुबान होते भी देखा।
श्रीनगर के राजशाही साम्राज्य को देखा तो दो बार गौना ताल टूटने से लेकर मनसुना और केदारनाथ की तबाही में अलकनंदा के बिकराल रूप को देखा है मैंने। लेकिन अपनी माटी को बचाने के लिए बेजुबान और मौन सपूतों को पहली बार इतनी करीब से देखा की मेरा पूरा रोम रोम दर्द से कराह उठा।
मेरे पास जब कुछ नहीं था, तो मेरे सपूत माधो सिंह भंडारी ने मेरी बंजर और सूखे खेतों को हरा भरा करने के लिए पूरे पहाड़ को काटकर मलेथा गूल बनाई और जब उसमे पानी नहीं आया तो मुझे हरा भरा करने के लिए अपने जिगर के टुकड़े को ही कुर्बान कर दिया था। तब जाकर मेरी सुखी और बंजर धरती पर हरियाली लौट आई।
इस हरियाली ने मेरे गांव ही नहीं, अपितु हजारों-हजारों लोगों को जो ख़ुशी दी उसे में बयान नहीं कर सकती हूँ। मेरे सीडीनुमा खेत बरसों से ही मेरी पहचान रहें हैमैंने बरसों से कभी भी अपने सपूतों को खाली पेट सोने नहीं दियामैंने हर किसी के घर में अनाज का भरपूर भण्डार भरा। मेरी प्राकृतिक सुंदरता से अभिभूत होकर के ही मोलाराम ने अपनी चित्रकारी का परचम लहराया। मैंने कभी किसी के साथ द्वेष-भाव नहीं कियामैंने हर किसी को अपने हिस्से का कुछ न कुछ दियामेरे खेतों के पास जो आम के सैकड़ों पेड़ हैउसमें जब आम के फल लगते हैं तो बच्चो से लेकर पुरुषमहिलाओं और राहगीरों को उपहार में दिये। यहाँ तक की बेजुबान पक्षियों और जानवरों को भी दिये। लेकिन कभी भी मैंने इसके लिए किसी से कुछ भी नहीं माँगा।
जेठ के महीने की तपती गर्मी में मैंने इन्ही आम के पेड़ों के नीचे आमजन से लेकर मुसाफिरों और तीर्थयात्रियों को छांव की ठंडक दी। गेंहू की बालुड़ी और सट्टी की बालुड़ी में जब पंछियों का हुजूम मेरी बीच सारियों में अटखेलियाँ खेला करती हैं, तो मन प्रफुलित हो जाता है। क्योंकि ये मेरी अमूल्य निधि है। मेरे खेतों की लहलहाती धान की खुशबू ने लोगों को बताया की पहाड़ की धरती भी सोना उगलती है। बसंत की बासंती सुंदरता मेरे इन खेतों में लहलाती सरसोंआपको बसंत के आगमन का सन्देश देंती हैं। धान-गेंहूँ की गुड़ाईनिराईकटाई से लेकर मेरे इन खेतों में गोबर डालती महिलाओं-नौनिहालों की लम्बी-लम्बी कतारें ज्येठ की तपती गर्मी हो या फिर सावन की रिमझिम फुहार इस बात की प्रतीक हैं कि मेरे ये खेत धन-दौलत की डलिया हैं।
असाड़ के महीने मेरे मलेथा के सेरों में मलेथा कूल से खेतों में पानी लगाया जाता है। जिसके बाद धान की जो रोपाई की जाती है। उसमें बैलो के गले में बंधी घंटियों की खनकहाथों में हल लिए और मेरी मिटटी से लथपथ मेरे पुरुष किसान और बिज्वडे की क्यारी से धान की छोटी-छोटी पौध निकालकर खेतों में रोपती मेरी आर्थिकी और जीवन रेखाएं यानी कि महिलायें मेरी इस धरती को अपनी मेहनत से सींचती और हरा भरा करती है। मेरे इन खेतों में जैसी रोपाई होती है वैसी अन्यत्र कहीं नहीं।
मेरे ठीक सामने अलकनंदा नदी बहती हैजो अपने सुख दुःख मुझसे बांटती है। उसने हमेशा से ही मुझे हौसला दिया है। लेकिन आज मेरा हौसला भरभरा रहा है। क्योंकि आज में खुद को अकेला महसूस कर रहीं हूँ। न जाने किसकी नजर लग गई है मुझको। नीति नियंताओं ने मेरी इस सोना उगलने वाली धरती पर पत्थर कूटने वाला यंत्र (स्टोन क्रेशर) लगवाने की हिमाकत की हैवो भी एक नहीं बल्कि 5-5। लेकिन मेरी मात्रशक्ति ने उनके मंसूबों को सफल नहीं होने दिया। रवाईं-जौनपुर के तिलाड़ी वन आन्दोलनरैणी के जंगल बचाने को गौरा के चिपको आन्दोलनशराब के खिलाप बंड पट्टी के कंडाली आन्दोलन की तर्ज पर मलेथा आन्दोलन शुरू किया।
आखिरकार भारी जनदबावलम्बे संघर्ष और जद्दोजहद के बाद सरकार को मेरी धरती पर लगने वाले स्टोन क्रेशर लगाने का निर्णय वापस लेना पड़ा। सब स्टोन क्रेशर के लाइसेन्स निरस्त करने पड़ेइस आन्दोलन को सफल बनाने में जो सबसे बड़ा योगदान रहा वो मेरी मात्रशक्ति का और हिमालय बचाओ के संयोजक समीर रतूड़ी का है। जिन्होंने मेरे लिए अन्न का त्याग किया। समीर के अनशन ने लोगों को मेरी याद दिलाई। लेकिन सबसे बड़ा दुःख मुझे तब हुआ जब मेरी आर्थिक और जीवन रेखायें – यहाँ की महिलाओं और समीर रतूड़ी पर आन्दोलन के एवज में मुकदमें थोपे गए। मैं हुकमरानों से पूछना और जानना चाहती हूँ कि क्या अपनी सोना उगने वाली जमीन को बचाना और उसके लिए आगे आकर आवाज बुलंद करना अपराध है, अपने भविष्य के लिए आशकिंत होना अपराध हैया फिर अपनी पुरखों की जागीर को बचाना आज गुनाह हो गयाक्या इसी की सजा मुझे मिल रही है।
इसके बिरोध में समीर रतूड़ी बिगत २० दिनों से अधिक दिनों तक अनशन भी किया। इस दौरान समीर को टिहरी जेल से लेकर जौलीग्रांट अस्पताल में जिन्दगी और मौत से लड़ना पडा। समीर के पीछे मैं और मेरी मात्रशक्‍ति‍ पहाड़ की बुलंदियों की तरह से अडिग रहे और हैं। जिसने कभी भी हारना नहीं सीखा है। इस बार भी जीत मेरी ही होगी। में हमेशा से ही लोकतंत्र की हिमायती रही हूँमाननीय न्यायालय में भी मेरी अगाढ सच्ची श्रध्‍्दा, आस्था और विश्वास रहा है। लेकिन आज भी एक यक्ष प्रश्न मेरे मन मस्तिष्क में कौंध रहा है कि ऐसी कौन सी मज़बूरी नीति नियंताओं और हुक्मरानों के समक्ष खड़ी हो गई थी, कि मेरी इस सोना उगने वाली धरती को स्टोन क्रेशर के शोर और धुंये से बदरंग करना चाहते थे। इस दौरान मेरे वो शुभचिंतक राजनीति के पुरोधा क्यों मौनवर्त धारण किए रहे। जिन्होंने मेरी धरती से ही राजनीति का कहकरा सीखा है। क्यों उन्हें मेरे बेइंतहा दर्द महसूस नहीं होता है।
गांवो को बचाने का सपना बुनने वालों से पूछना चाहती हूँ की यदि गांव के खेत ही नहीं रहेंगे तो गाँव कहाँ बचेगाआज जब एक गांव अपने साथ हो रहे अन्याय पर डटा हुआ है तो आज कहा अदृश्य हो गएँ है आपके सिपहसालारक्या जात्रा करने भर से गांव बच जायेंगेंहुकूम --- स्टोन क्रेशर लगवाने से अच्छा ये होता की मेरी इस पूरी धरती को गोद लेकर के इसमें पैदावार कैसे बढाया जा सके इस पर अनुसन्धान करतेकृषि की नई नई तकनीक का उपयोग करके नई संभावनो को तलासतेइसे पूरे प्रदेश में कृषि के एक मॉडल गांव के रूप में प्रस्तुत करते ताकि खेतों का वजूद भी रहतामेरे किसानों को भी इसका फायदा मिलता और देश-विदेशों से आने वाले लोग इसको करीब से देखते।  
मुझे पता चला है की कई लोगों की शिकायत है की मेरे नाम पर राजनीती हो रही हैलेकिन मुझे राजनीती से कोई लेना देना नहीं हैमुझे राजनीति का न तो भूगोल और न ही गणित समझ में आता हैजो लोग मुझे लेकर राजनीती करना चाह रहें है में उन्हें साफ़ लफ्जों में आगाह कर देना चाहती हूँ की मुझे राजनीती की बिसात का मोहरा मत बनाइयेमेरी पावन धरतीमेरी पहचान राजनीती का अखाडा नहीं हैये तो बीरो की तपोभूमि हैमुझे तो मेरे खेतो की खुशहाली और मेरे लोगों की खुशियाँ चाहियेइससे ज्यादा कुछ भी नहीं और अंत में मुझे कलम के लिख्वारोंजन के सरोकारों से तालुक रखने वालो से भी बहुत शिकायत है की इतिहास तुम्हे हमेशा संदेह की नजरो से देखेगा जब बरसों बाद इतिहास ये पूछेगा की मलेथा पर आकर तुम्हारी कलम इतनी खामोशलाचार और बेबस क्यों हो गई थीतुम्हारी कलम की पैनी धार क्यों कुंद हो गई थीतो फिर तुम निरुत्तर हो जाओगे।

प्रस्‍तुति- संजय चौहान, चमोली गढ़वाल

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