26 September, 2017

दोस्तों की जुगलबंदी ने दिखाई रोजगार की राह

 उत्तराखंड को प्रकृति ने बेपनाह सौंदर्य से लकदक किया है। हरसाल हजारों लोग इसी खूबसूरती के दीदार को यहां पहुंचते हैं। विश्व विख्यात फूलों की घाटी, हिमक्रीड़ा स्थल औली, झीलों की नगरी नैनीताल, पहाड़ों की रानी मसूरी, मिनी स्विट्जरलैंड पिथौरागढ़, कौसानी आदि के बाद सैलानी जब चोपता-दुग्लबिटा पहुंचते हैं, तो कश्मीर जैसी यहां की सुंदरता को देखकर अवाक रह जाते हैं। उन्हें विश्वास नहीं होता, कि वाकई उत्तराखंड में कोई जन्नत है।

यही कारण है कि रुद्रप्रयाग जनपद में चोपता-दुग्लबिटा आज देश विदेश के सैलानियों की पहली पसंद बन गया है। प्रचार प्रसार और सुविधाओं के अभाव के चलते एक दशक पहले तक यहां गिने चुने पर्यटक ही पहुंचते थे। जिन्हें जानकारी भी थी, वह भी यहां जाने से कतराते थे।

मगर, इस जगह को लाइमलाइट में लाने के लिए 2007 में दो दोस्तों ने हिमालय जैसे हौसले के साथ पहल की। वह थे रुद्रप्रयाग अंतर्गत उखीमठ ब्लाक के किमाणा गांव के भारत पुष्पवान और चमोली गोपेश्वर के मनोज भंडारी। गोपेश्वर में अचानक मुलाकात के दौरान भारत ने मनोज से चोपता-दुग्लबिटा में ईको टूरिज्म पर चर्चा की। विचार विमर्श के बाद उन्होंने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। सबसे पहले ईको टूरिज्म पर बेसिक जानकारी जुटाई। प्रोजेक्ट के लिए विभागों से मदद मांगी। एक-दो विभाग तैयार भी हुए, लेकिन जानकारी के अभाव में वह भी पीछे हट गए। तब उन्होंने खुद ही अपनी मंजिल की तरपफ बढ़ने का निर्णय लिया।

उन्हें सबसे पहले चोपता-दुग्लबिटा में जमीन और धन की जरूरत थी। किसी तरह एक लाख का कर्ज जुटाया और चोपता-दुग्लबिटा में ऊषाडा ग्राम पंचायत की जमीन लीज पर ली। तत्कालीन सरपंच और ग्राम प्रधान ने इस शर्त पर अपने बुग्याळ और पंयार की भूमि दी कि वह यहां प्रकृति से छेड़छाड़ किए बिना अपना कारोबार शुरू करेंगे, उनके द्वारा यहां किसी तरह का सीमेंट का निर्माण नहीं किया जाएगा। पिफर उन्होंने उच्च गुणवत्ता के चार टैंट, स्लीपिंग बैग और अन्य सामान जोड़ा।

इस दौरान उन्होंने स्थानीय युवकों को साथ जोड़ने के प्रयास किए, मगर उन्हें पागल समझकर साथ नहीं आया। खैर, अपनी धुन के पक्के और हिमालय जैसे हौसले वाले भारत और मनोज ने हार नहीं मानी। बेसिक तैयारियों के बाद उनके सामने सैलानियों को यहां तक लाने की चुनौती थी। 2007 से 2010 तक उन्होंने सड़क इस ओर आने वाले पर्यटकों को आमंत्रित किया, पर कोई दुग्लबिटा में रुकने को तैयार नहीं हुआ। इसीबीच टूर ऑपेरेटर एजेंसियों से भी संपर्क साधा। देश दुनिया में हजारों मेल भेजे और मैगपाई नाम की एक वेबसाइट बनाई। करीब तीन साल मेहनत के बाद आखिरकार उनकी जुगलबंदी रंग लाई।

नतीजा, आज यहां आने वाले पर्यटकों में देश के अलावा इटली, यूएसए, इंग्लैंड, नार्वे आदि के सैलानी भी शामिल हैं। मैगपाई ईको टूरिज्म कैंप में वह पर्यटकों को ट्रेकिंग, एडवेंचर, माउंटेनिंग, रॉक क्लाइम्बिंग, स्कीइंग, बर्ड वाचिंग, पैराग्लाडिंग, योगा समेत कई गतिविधियों को संचालित करते हैं। साथ ही केदारनाथ, तुंगनाथ, देवरियाताल, फूलों की घाटी, नीति मलारी घाटी, हरकीदून, गंगोत्री, सहित कई स्थानों के भ्रमण की सुविधाएं भी प्रोवाइड कराते हैं।

दोनों दोस्तों की पहल का परिणाम है, कि जो लोग पहले इन वीरान बुग्याळों और पंयारों में जाने से भी हिचकते थे, यहां ईको टूरिज्म के उनके निर्णय को पागलों वालो पफैसला बताते थे, उनके से कई अब यहां खुद भी ईको टूरिज्म कैंप बनाकर रोजगार से जुड़ चुके हैं।

मनोज भंडारी और भारत पुष्पवान की इस जुगलबंदी से सापफ है कि चाहत हो तो वीरानों में भी बहार लाई जा सकती है। यहां रोजगार सृजित किया जा सकता है। पहाड़ में उनकी यह कोशिश रिवर्स माइग्रेशन की उम्मीदों को भी पंख लगा सकती है।


पहाड़ों में सपने हो सकते हैं साकार
राजनीति विज्ञान में पीजी मनोज भंडारी और गणित व समाजशास्त्र में पीजी भारत पुष्पवान को हिमालय, बुग्याल, पेड़ पौधों, पक्षियों, वन्यजीवों, और अपने पहाड़ से बेहद प्यार है। उनका कहना है कि हम दोनों के विचारों में समानता के चलते ही यह सब संभव हो सका। शुरूआत में हमें भी यह रास्ता कठिन लगा, लेकिन हमने हार नहीं मानी। 10 साल पहले चोपता दुगलबिटा में ईको टूरिज्म शुरू करने के हमारे निर्णय को हरकोई बेकूफी भरा फैसला मानता था। हम पहाड़ में रहकर ही रोजगार जुटाने के पक्ष में थे। बकौल भारत मेरे पिताजी ने हमेशा हौसला दिया। वह कहते थे कि जो भी काम करो मेहनत और दिल से करो। पीछे मुड़कर मत देखो, सफलता जरुर मिलेगी। युवा खुद पर विश्वास करें, तो इन पहाड़ में ही अपने सपनों को साकार किया जा सकता है। युवाओं को धारणाओं को तोड़ना होगा, तो सरकार को भी ईको टूरिज्म के लिए युवाओं की मदद को आगे आना होगा। तभी पलायन जैसी त्रासद स्थिति से निपटा जा सकता है।

सैलानियों को खूब भाते हैं पहाड़ी व्यंजन
मैगपाई कैंप में पर्यटकों के लिए उनकी पसंदीदा डिशेज के साथ ही स्थानीय उत्पादों से बने भोजन को भी परोसा जाता है। जिसमें मंडवे की रोटी, गहथ का साग, झंगोरे की खीर, चौंसा, कापलू, भट्ट का राबडू, लिकुड़े की सब्जी, लाल चावल का भात, राजमा, तोर की दाल, भंगजीरे की चटनी, ककड़ी का रायता आदि शामिल हैं। सीजन में उन्हें काफल और बुरांस का जूस भी उपलब्ध कराया जाता है। मनोज कहते हैं पर्यटकों को पहाड़ी व्यंजन खूब भाते हैं। बताया कि वह आसपास के ग्रामीणों से ही स्थानीय दालें और अन्य उत्पादों को खरीदते हैं। इससे ग्रामीणों को भी अच्छी खासी आमदनी हो जाती है।


आलेख- संजय चौहान

25 September, 2017

अगर हम किताबें नहीं पढ़ेंगे...

जो लोग किताबें नहीं पढ़ते, वे अंततः राम-रहीम को जन्म देते हैं। हमारे समाज में राम-रहीम पैदा होते हैं, क्योंकि हम किताबों को सिर्फ नौकरी पाने के लिये पढ़ते हैं। हम अगर किताब पढ़ेंगे तो हमारे आसपास राम-रहीम जन्म नहीं ले पायेंगे। हम अगर किताब पढ़ेंगे तो लालबहादुर शास्त्री और माणिक सरकार जैसे नेताओं को जन्म देंगे। अगर हम किताब पढ़ेंगे तो धर्म और राजनीति का घालमेल नहीं होने देंगे। लफ्फाजों के बहकावे में नहीं आयेंगे।

हम अगर किताब पढ़ेंगे तो भ्रष्टाचार खत्म होने लगेगा। हम अगर किताब पढ़ेंगे तो सही के लिए लड़ने लगेंगे। हम अगर किताब पढ़ेंगे तो उदार और मानवीय बनते जायेंगे। हमारे दुःख और भ्रम दूर होते जायेंगे। हम अगर अच्छी किताबें पढ़ेंगे तो अपने भारत को श्रेष्ठ बना सकेंगे। हम अगर किताब नहीं पढ़ेंगे तो हमारे आसपास गुस्से और नफरत से भरे हुए लोग बढ़ते चले जायेंगे और हम फिजूल में छोटी-छोटी बातों में लड़ने लगेंगे। हम अगर किताब नहीं पढ़ेंगे तो घृणा और दुश्मनी की बात करने लगेंगे।

हम अगर अच्छी किताबें नहीं पढ़ेंगे तो लोगों को मारने लगेंगे। हम अगर किताब नहीं पढ़ेंगे तो प्रेम, करुणा की बात करने वालों से नफरत करने लगेंगे। हम अगर किताब नहीं पढ़ेंगे तो तालिबान में बदल जायेंगे और अपने देश को अफगानिस्तान बना देंगे।


-          दिनेश कर्नाटक

21 September, 2017

अस्पताल

सुविधा त सबि छन यख
अजगाल अस्पताल मा
डागटर च
दवे च
कंपौंडर च
यख तक कि
नर्स अर आया भि च
पर हां !

इतगा जरूर च कि
जब डागटर रैंद
तब दवे नि रैंदी
अर जब दवे रैंद,
तब कम्पौंडर रैंद/ कपाळ पखड़ि बैठ्यूं
अफ्फुई म्वन्नु रैंद जैर्ल
त हौरूं कि क्य स्वचण वेन
बक्कि
नर्स अर आया कु क्य ब्वन
वो त भग्यान
कन हि लगीं छन
अपणी नौकरी/
ये दुर्गम इलका मा।

आशीष सुन्दरियाल

19 September, 2017

खाली होते गांवों से कैसे बचेगा हिमालय !


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पलायन रोकने की न नीति न प्लानतो फिर हिमालय दिवस पर कोरे संकल्प क्यों?
उत्तराखंड में हाल में हिमालय को बचानेपर केंद्रित जलसे जोश ओ खरोश से मनाए गए। सरकार से लेकर एनजीओ, सामाजिक संगठनों, स्कूली छात्रों, सरकारी, गैर सरकारी कार्मिकों, पर्यावरणविदों और धर्मगुरुओं की चिंता, चिंतन, शपथ, संकल्प अपने पूरे शबाब पर रहे। एसी होटल, कमरों से लेकर स्कूलों के प्रांगण, सरकारी और गैर सरकारी दफ्तरों में शपथ (संकल्प) लेते चित्र अगले दिन के अखबारों में निखरकर सामने आए।


हिमालय दिवस के आयोजनों से एकबारगी ऐसा लगा कि अब हिमालय को बचाने का विचार निश्चित ही अपनी परिणिति तक पहुंच जाएगा। मगर, यह क्या? तय तारीखें बीतते ही सूबे में सब कुछ पहले जैसे ढर्रे पर चल निकला। तो क्या हिमालय को सिर्फ आठ नौ दिन ही बचाना था, उससे पहले या उसके बाद हिमालय को बचाने की जरूरत ही नहीं

दरअसल, हिमालय को बचाने की फिक्र तो की जा रही है, परंतु हिमालय को किस तरह से खतरा है, उसके समाधान क्या हैं, इस पर सिर्फ बातें ही बातें हो रही हैं। कौन, कब से उन रास्तों पर आगे बढ़ेगा, क्या रोड मैप होगा, उसमें सामाजिक सरोकार पर भी फोकस होगा या हवा हवाई अभियान से इतिश्री कर ली जाएगी। यह सब अभी तक नेपथ्य में ही है। हाल के जश्न ए हिमालय बचाओ में भी इसी तरह की रस्में पूरी होती दिखी।

                खैर! इससे जुड़ा बड़ा सवाल यह है कि क्या हम खाली होते पहाड़ी गांवों, उजड़ते और आग से झुलसते जंगलों, मंचों पर भाषणों की जबरदस्त परफारमेंस और स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ) की कागजी कार्यवाहियों मात्र से हिमालय को बचा लेंगे? जी नहीं! हमें इससे आगे सोचने के साथ उसके समाधान के लिए जमीन पर भी जुटना होगा।

जानकारों बताते हैं कि उत्तराखंड में 70 के दशक से शुरू पलायन आज भी यथावत जारी है। राज्य गठन के बाद इसमें और भी तेजी आई। पहाड़ के करीब 70 प्रतिशत लोग दूसरे राज्यों का रुख कर चुके हैं, जबकि लगभग 30 फीसदी का तो अपने मूल स्थान से नाता ही टूट चुका है। पिछले दो दशकों में 25 से 100 वाले गांव पूरी तरह खाली हो गए हैं।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक पहाड़ की आबादी 53 फीसद से घटकर 48 फीसद रह गई। एक अध्ययन के मुताबिक पलायन करने वाले 52 प्रतिशत आबादी में सर्वाधिक संख्या युवाओं की रही। जिनकी औसत आयु 30 से शुरू होकर 49 फीसदी तक है। सरकारी आंकड़ों में ही 2.5 लाख घरों में ताले लटक चुके हैं।

यह सब रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा के अभाव के चलते होना माना गया है। यूपी के दौर से अब तक की सरकारों ने कभी भी संजीदगी से पहाड़ों में रोजगार सृजन की दिशा में सोचा ही नहीं। हर चुनाव के दौरान युवाओं को रोजगार के जुमले जरूर थमाए गए, उसके बाद उन्हें पूरा करना तो दूर विचार तक नहीं हुआ। नतीजा, पलायन से सीधा जुड़ा रोजगार इस खाई को लगातार बढ़ा रहा है।

सरकारें हिमालय को बचाने की बातें तो हमेशा ही करती रही हैं, मगर उसके समाधान के लिए न कभी रणनीतियां बनाई, न ही कोई आधारभूत शोध ही कराया। ताकि पलायन से खाली होते गांवों, हिमालय पर उनके असर, सुरक्षा में ग्रामीणों की भूमिका आदि पर कोई निष्कर्ष सामने आ सके, तो फिर आलीशान मंचों पर चमचमाती कैमरा लाइटों के बीच हिमालय बचाओके इस राग का क्या औचित्य रह जाता है? सरकारी, गैरसरकारी चिंतक वर्ग सोचिएगा जरूर!!

आलेख- धनेश कोठारी

14 September, 2017

उत्तराखंड की जांबाज बेटियां विश्व परिक्रमा को रवाना

उत्तराखंड की दो जांबाज बेटियां लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी और पायल गुप्ता भारतीय नौसेना के बेहद महत्वपूर्ण मिशन नाविक सागर परिक्रमाके लिए रवाना हो गई हैं। नौसेना के छह सदस्यीय नाविक दल की सदस्य ये दो बेटियां, अगले छह महीने में लगभग 22 हजार नॉटिकल मील की समुद्री दूरी नापते हुए पृथ्वी का चक्कर पूरा करेंगी।


सागर परिक्रमा का यह मिशन 17 मीटर लंबी नौका आईएसएनवी तारिणीमें पूरा किया जाएगा। नौका पूरे यात्राकाल में चार बंदरगाहों पर इंधन के लिए रुकेगी। रविवार दोपहर ढाई बजे गोवा में रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस दौरान गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर भी मौजूद थे।

खासबात कि नाविक दल का नेतृत्व उत्तराखंड की बेटी वर्तिका जोशी कर करी हैं। वर्तिका ने बताया कि गोवा से शुरू यह अभियान आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फॉकलैंड होते हुए वापस गोवा में ही पूरा होगा। इस दल में प्रदेश की दो बेटियों का शामिल होना उत्तराखंड के लिए गौरव का विषय है। टीम में वर्तिका और पायल के अलावा लेफ्टिनेंट कमांडर प्रतिभा जामवाल, पी स्वाति, लेफ्टिनेंट एस विजया देवी और बी ऐश्वर्या भी शामिल हैं।

हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी टीम से मुलाकात कर उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दी थी। इस यात्रा के लिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी टीम को शुभकानाएं दी हैं।

वर्तिका ऋषिकेश और देहरादून की है पायल

लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी तीर्थनगरी ऋषिकेश की रहने वाली हैं। उनकी स्कूली शिक्षा श्रीनगर और ऋषिकेश में हुई। वर्तिका के पिता डा. पीके जोशी हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर में प्रोपफेसर और मां अल्पना जोशी पीजी ऑटोनोमस कॉलेज ऋषिकेश में प्रवक्ता हैं। वर्तिका आईआईटी दिल्ली से एमटेक कर 2010 में नौसेना में अधिकारी बनीं थीं। इससे पहले वह ब्राजील के रियो डि जिनोरियो से दक्षिण अप्रफीका के केपटाउन तक पांच हजार नॉटिकल मील का समुद्री अभियान भी तय कर चुकी हैं। पायल गुप्ता देहरादून के रेसकोर्स की रहने वाली हैं। उनके पिता विनोद गुप्ता व्यवसायी तथा माता नीलम गृहणी हैं। देहरादून के कारमन स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने देहरादून से बीटेक किया और इसके बाद नौसेना में नियुक्ति हासिल की।

13 September, 2017

स्वैच्छिक चकबंदी और बागवानी के प्रेरक बने ‘भरत’

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उत्तरकाशी जिले के नौगांव विकासखंड अंतर्गत हिमरोल गांव के भरत सिंह राणा अपने क्षेत्र में लोगों को स्वैच्छिक चकबंदी के लिए प्रेरित कर मिसाल बन रहे हैं। जगह-जगह बिखरे खेतों की चकबंदी कर विभिन्न प्रजाति के फल पौधों का रोपण किया, पॉली हाउस, ड्रिप एरीगेशन, पाइप लाइन, दो सिंचाई हौजों का निर्माण करके बागवानी शुरू की है।

एक और जहां भरत सिंह लोगों को स्वैच्छिक चकबंदी के लिए प्रेरित कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर कृषि बागवानी के लिए मिसाल कायम कर रहे हैं। उन्होंने बंजर पड़ी जमीन पर एक हेक्टेयर का चक गांव वालों के साथ सटवाराकरके बनाया है। अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए उन्होंने इस जमीन पर जो कर दिखाया, वह पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इसी एक हेक्टेयर भूमि पर वह पिछले कुछ वर्षों से वैज्ञानिक तरीके से बागवानी, सब्जी उत्पादन, जड़ी-बूटी, सगंधीय पौध, हर्बल चाय, कई प्रकार के फूल, मत्स्य पालन आदि कई तरह के नगदी फसलों की खेती कर रहे हैं। जिसको देखने के लिए भारत के ही नहीं बल्कि इंग्लैंड, नीदरलैंड, नेपाल आदि देशों से भी ग्रुप आते रहते हैं।

इसके साथ ही कृषि विभाग के सहयोग से पाली हाउस में विभिन्न प्रकार की सब्जियां तथा फल पौधों का नई तकनीकी से उत्पादन किया जाता है। बाग में लगे फल पौधे सेब, नाशपाती, आलू, पुलम, खुमानी, चुल्लू, अखरोट, सेरोल, अंगूर, नींबू, स्ट्रॉबेरी आदि के साथ-साथ सब्जियां टमाटर, बीन, आलू, फूलगोभी, बंदगोभी, चप्पन कद्दू, शिमला मिर्च, लौकी, बैंगन, गाजर, मूली, शलजम तथा शैड के भीतर मशरूम उत्पादन किया।

सगन्धीय व औषधीय पौधे- लेमन ग्रास, स्टेविया, रोजमेरी, सतावर, एलोवेरा, मारजोरम, तुलसी आदि। इनके द्वारा उत्पादित हर्बल चाय को इन्होंने बाजार में उतारा है। जिसके सामने सभी प्रकार की चाय हल्की लगती हैं। स्वाद के साथ-साथ यह निकोटिन प्रफी भी है। जिसकी बाजार में अच्छी मांग है। सबसे बड़ा काम यह है, कि इनके द्वारा अपने गांव में ही फल सब्जी प्रसंस्करण इकाई भी लगाई गई है।

भरत सिंह राणा का कहना है कि पिछले 15 वर्षों में सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं के माध्यम से हिमाचल प्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों के प्रतिष्ठानों में शैक्षिक भ्रमण करने व नई वैज्ञानिक तकनीकों को सीखने का मौका मिला। विभिन्न स्रोतों से अर्जित तकनीक का अपनी चकबंदी वाली भूमि पर प्रयोग कर रहे हैं, जिनका अच्छा लाभ मिल रहा है।

असंभव को संभव करने पर मिले कई सम्मान
इस क्षेत्र के स्वावलंबी व संघर्षशील किसान भरत सिंह राणा ने बिना किसी सरकारी मदद के ऐसा कुछ कर दिखाया जो असंभव ही नहीं नामुमकिन था। इसके लिए उन्हें जिला, प्रदेश तथा राष्ट्रीय स्तर के कई सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2016 में राज्य स्थापना दिवस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा राज्यस्तरीय कृषि पंडित सम्मान से नवाजा जा चुका है। कृषि एवं बागवानी के क्षेत्र में एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी मेंनेजमेंट एजेंसी (आत्मा) और पंतनगर विश्वविद्यालय भी कई बार इन्हें सम्मानित कर चुका है।

2012 में कृषि विभाग द्वारा जनपद स्तरीय सम्मान 2015 में राज्य स्तरीय उत्तराखंड नायक की उपाधि 2016 में राज्यस्तरीय घी संक्रांति महोत्सव सम्मान 2017 में सहकारिता विभाग उत्तराखंड द्वारा सम्मानित तथा 10 सितंबर 2013 को गुजरात कृषि समिट में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है।

साभार- प्रदीप चौहान, देहरादून।

12 September, 2017

अथ श्री उत्तराखंड दर्शनम्

नेत्र सिंह असवाल

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जयति जय-जय देवभूमि, जयति उत्तराखंड जी
कांणा गरूड़ चिफळचट्ट, मनखि उत्तणादंड जी।

तेरि रिकदूंल्यूं की जै-जै, तेरि मुसदूल्यूं की जै
त्यारा गुंणी बांदरू की, बाबा बजि खंड जी।

इक मिनिस्टर धुरपिळम् पट, एक उबरा अड़गट्यूं
हैंकू खांदम नप्प ब्वादा, धारी म्यारू डंड जी।

माट मंग ज्वन्नि व मेंहनत, मोल क्वी नी खेति कू
यू बुढ़ापा पिनसन छ, रोग जमा फंड जी।

मुंड निखोळू करिगीं बगतळ, ऊ भगत त्यरा तरि गईं
जौंकि दुयया जगा टंगड़ी, ऊंकि अकळाकंड जी।

दुख दलेदर कष्ट मिटलो, नौनु बूंण जालु जी
गांणि-स्याणि-ताणि निशिदिन, रीटिगे बरमंड जी।

परदेस अपणू देस अभि भी, अभि भि देसी’ ‘पहाड़िजी
बत्तीस सीढ़ी कुरदराकी, अभि भि घळचाघंड जी।

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