April 2020 ~ BOL PAHADI

29 April, 2020

अलविदा इरफान! इतनी भी जल्दी क्या थी..

https://www.bolpahadi.in/2020/04/blog-post-goodbye-Irfan-khan.html
प्रबोध उनियाल

फिल्म अभिनेता इरफान खान का यूं चले जाना स्तब्ध करता है। उनके जज्बे से लगने लगा था कि वह अपनी यह लड़ाई जीत लेंगे। जीतकर आए भी लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। गिनतियों में ही इरफान जैसे प्रतिबद्ध कलाकार सिनेमा को मिलते हैं। अभिनय हो या बीमारी की जंग उन्होंने हमेशा अपना जज्बा कायम रखा। यही वजह रही कि वे कई निर्देशकों की पहली पसंद थे।

अभिनय की और बारीकियां भले ही उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से सीखी हों लेकिन उनके व्यक्तित्व में कला का एक संपूर्ण व्यक्ति जैसे जन्मजात ही रहता हो। सीधा, सपाट और चेहरे में गंभीरता लिए यह कलाकार कुछ अलग सा ही दिखता था। एक गंभीर और प्रतिभावान कलाकार का यूं चले जाना उदास करता है।

इरफान खान ने अपने कैरियर की शुरुआत टेलीविजन से की और फिर यह सफर 50 से अधिक फिल्मों तक जारी रहा। द वॉरियर, मक़बूल, हासिल, लंच बॉक्स और पान सिंह तोमर आदि फिल्मों में उन्होंने कई यादगार किरदार निभाए। ‘अंग्रेजी मीडियम’ उनकी हालिया प्रदर्शित फिल्म थी।

असमय ही इरफान के चले जाने से भारतीय और विश्व सिनेमा के साथ सिने प्रेमी खासकर उनके किरदारों से बेइंतिहा प्यार करने वाले बेहद दुखी हैं। अब उनकी फिल्में ही उनकी यादों को जिंदा रखेंगी। अलविदा दोस्त!
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26 April, 2020

मारियो वार्गास ल्योसा की कृति ‘किस्सागो’ का परिचय

https://www.bolpahadi.in/2020/04/blog-post-introduction-mario-vargas-lyosa-novel.html

  •  ● डॉ. अतुल शर्मा


    ‘किस्सागो’ मारियो वार्गास ल्योसा का महत्वपूर्ण उपन्यास लातिन अमरीकी देश ‘पेरु’ के आदिवासियों पर आधारित है। आधुनिक विकास और नदी, पर्वत, सूरज, चांद, दुष्ट आत्माओं; की एक के बाद एक निकलती कथाओं का सिलसिला है। विषम परिस्थितियों से जूझते और बार-बार स्थानांतरित होने को विवश बंटे हुए माचीग्वेरा समाज को जोड़ने वाली कड़ी है- ‘किस्सागो’ यानि ‘आब्लादोर उपन्यासकार एक किरदार के रुप में उपस्थित है।’ आदिवासी जीवन पर केन्द्रित होने के नाते उपन्यास में बीसियों पेड़, पौधे, पशु, पक्षी, नदियों, पहाड़ों, देवताओं, दानवो के नाम आते हैं।

    उपन्यास में कथाओं का सिलसिला जारी रहता है। एक जगह वे लिखते हैं- ‘चिन्ता मत करो किस्सागो! अगर ऐसा ही है तो जीवन बदल डालो। एक जगह ठहर कर अपना परिवार बसा लो अपनी झोपड़ी बनाओ, जंगल साफ करो और अपने खेतों की देखभाल करो। तुम्हारे बच्चे हो जाएंगे। भटकते हुए किस्सागो का जीवन छोड़ दो।’ वे आगे चलकर कहते हैं- ‘तुम उस औरत को अपना सकते हो जो शान्त और समझदार है। वह तुम्हारी मदद करेगी रसोई बनाने, सूत कातने में सबसे ज्यादा होशियार है या तुम्हें अगर पसन्द हो तो मेरी सबसे छोटी बेटी को भी अपना सकते हो।’

    इसके बाद उस बेटी का मार्मिक प्रसंग आता है। वह ऐसे है- वह छोटी बेटी नहीं रही। मर गई और मरने से पहले वह बड़बड़ा रही थी- ‘मै दूसरों के क्रोध का का कारण नहीं बनना चाहती। क्रोधित हो वो कहेंगे इसी के कारण अब हमारे पास कोई किस्सागो नही है।’ यानि किस्सागो होने की जरुरत का अतिरेक दिखाई देता है।

    ऐसी ही घटनाएं हैं इस उपन्यास में। यह अद्भुत और पठनीय होने के साथ-साथ जीवन को प्रस्तुत करता है। वर्ष 2010 के नोबल पुरुस्कार विजेता इस लेखक का यह सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। राजकमल प्रकाशन से छपा यह उपन्यास महत्वपूर्ण पुस्तक  परिचय के लिए इसीलिए चुना है।

    उपन्यास- किस्सागो
    लेखक- मारियो वार्गास ल्योसा
    हिंदी अनुवाद- शंपा शाह
    प्रकाशन- राजकमल

    https://www.bolpahadi.in/2020/04/blog-post-introduction-mario-vargas-lyosa-novel.html

    (पुस्तक परिचय के लेखक डॉ. अतुल शर्म जाने माने जनकवि व साहित्यकार हैं।)

    24 April, 2020

    जब देहरादून आए थे राष्ट्रीय कवि 'दिनकर'

    (राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि पर विशेष)

    https://www.bolpahadi.in/2020/04/blog-post-jab-dehradun-aaye-the-rashtriya-kavi-dinkar.html


    - डॉ. अतुल शर्मा 

    मेरे नगपति! मेरे विशाल! 
    साकार दिव्य गौरव विराट
    पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल

    मेरी जननी के हिम किरीट


    मेरे भारत के दिव्य भाल।

    मेरे नगपति मेरे विशाल।

    राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर जी की यह प्रसिद्ध कविता “हिमालय के प्रति“ एक कालजयी कविता है। दिनकर जी हिन्दी काव्य साहित्य के सूर्य है। छायावादी युग के बाद प्रगतिवादी काव्यधारा में उनका विशेष स्थान तो है ही पर स्वाधीनता सेनानी के रुप में भी उनका अवदान है। 

    मुझे याद है कि 70 के दशक में देहरादून में आयोजित एक कवि सम्मेलन के मंच पर अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर जी विराजमान थे। साथ में देश के प्रसिद्ध कवि मौजूद थे। उनकी कविता सुनकर ऐसा लग रहा था कि मानां एक युग हुंकार रहा हो। खादी का धोती कुर्ता दिव्य ललाट तेजस्वी आंखें। दिनकर जी का सानिध्य मंच पर और उसके बाद भी मिला अपने पिता स्वतंत्रता सेनानी कवि श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’ के साथ। तब उन्होंने एक बात कही थी कि कविता प्रयोजनमूलक होनी चाहिए।

    युग के सच्चे मार्गदर्शक थे दिनकर जी। उनकी यह कविता आज स्मरण करता हूं तो लगता है कि यह कालजयी कवि यूग- युगों तक जीवित रहेगा...

    सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी।
    मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है

    दो राह समय के रथ का धर्धर नाद सुनो

    सिहांसन खाली करो कि जनता आती है।

    कवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 1908 में और निधन 1974 में हुआ। उनके काव्य संग्रह में ‘रेणुका’, ‘हुंकार‘, ‘रसवंती’ शामिल हैं। जबकि ‘कुरुक्षेत्र’,  ’रश्मिरथी और उर्वशी उनके प्रबंध काव्य संग्रह हैं।

    हिन्दी काव्य साहित्य में सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, रामधारी सिंह दिनकर और महादेवी वर्मा आदि महत्वपूर्ण नाम हैं जिनसे युग की पहचान होती है। 

    उन्हें पद्मभूषण सम्मान प्रदान किया गया। ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुए। उन्होंने भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार और भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति पद को भी सुशोभित किया था। दिनकर जी आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। देहरादून मे दिनकर जी का आना एक ऐतिहासिक साहित्यिक घटना है। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उन्हें नमन करते है।

    (इस दुर्लभ चित्र में राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व कवि श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’, सोम ठाकुर, बालकवि बैरागी, डॉ. पार्थ सारथि डबराल आदि मौजूद।)

    https://www.bolpahadi.in/2020/04/blog-post-jab-dehradun-aaye-the-rashtriya-kavi-dinkar.html

    लेखक डॉ. अतुल शर्मा जाने माने जनकवि व साहित्यकार हैं। 

    फोटो स्रोत- ‘अग्नि पुरुष’ पुस्तक से

    मील का पत्थर साबित हुई थी ‘27 डाउन’

    https://www.bolpahadi.in/2020/04/27-hindi-film-27-down-proved-to-be-a-milestone.html

    प्रबोध उनियाल । 

    फिल्म ‘भुवन शोम’ की कामयाबी के बाद हिंदी सिनेमा के इतिहास में व्यवसायिक सिनेमा के समांतर नए सिनेमा का विकास तेजी से हुआ। फार्मूला फिल्मों की जकड़ से बाहर निकालकर तब नए सिनेमा के आंदोलन में कई बेहतरीन फिल्में बनाई गईं। उन बेहतरीन फिल्मों में से एक फ़िल्म थी ‘27 डाउन’। 

    युवा निर्देशक अवतार कृष्ण कौल की यह एकमात्र निर्देशित फिल्म थी जिसे 1974 में सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि जब फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो तभी अवतार कृष्ण कौल एक दुर्घटना के शिकार हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। असमय ही नया सिनेमा ने एक प्रतिबद्ध और प्रतिभावान निर्देशक खो दिया। 

    ‘27 डाउन’( 27 Down ) में निर्देशक ने प्रत्येक दृश्य को प्रतीकात्मक अर्थ देकर फिल्म को बेहतरीन बना दिया। रेलवे स्टेशनों की जिंदगी, रेल का पटरियों में दौड़ना, बनारस की सड़कें और और नायक संजय की जिंदगी में पटरियों पर दौड़ते जीवन का एकाकीपन फिल्म को अविस्मरणीय बना देता है।

    फिल्म की कहानी प्रसिद्ध साहित्यकार रमेश बख्शी के उपन्यास ’अट्ठारह सूरज के पौधे’ पर आधारित है। नायक के अपने सपने हैं लेकिन पिता के कठोर अनुशासन के कारण उसके सपनों की उड़ान में विराम लग जाता है। फिल्म का नायक संजय 27 डाउन में टिकट कलेक्टर है। संजय के पिता भी रेलवे में है और इंजन ड्राइवर हैं। रेल के डिब्बों में भागती जिंदगी के साथ एक दिन अचानक रेल में ही नायक की मुलाकात नायिका से होती है। फिल्म की नायिका शालिनी बेहद संवेदनशील है और मुंबई में नौकरी करती है। उसकी कमाई से ही उसके घर का खर्चा चलता है।

    नायक शालिनी से विवाह करना चाहता है लेकिन उसके पिता उसके सपने को पूरा नहीं होने देते और नायक संजय का विवाह एक ऐसी युवती से कर देते हैं जो दहेज में चार भैंसे लेकर आती है। इसके बाद की कहानी बेहद रोचक है। लेकिन फिलहाल संजय तब तक चलती फिरती रेलगाड़ी में ही अपना घर बना लेता है।

    फिल्म में एमके रैना और नायिका की भूमिका उस समय की मेनस्ट्रीम की जानी-मानी कलाकार राखी ने अदा की है। बेहद कम बजट पर तैयार यह फ़िल्म, नये सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई।

    https://www.bolpahadi.in/2020/04/27-hindi-film-27-down-proved-to-be-a-milestone.html

    लेखक प्रबोध उनियाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

    Film Photo Source - google

    22 April, 2020

    पृथ्वी दिवस पर घरों में बंद दुनिया


    https://www.bolpahadi.in/2020/04/blog-post-the-world-is-closed-in-houses-on-earth-day.html

    डॉ. अतुल शर्मा ।

    आज धरती को रहने योग्य बनाये रखने के संकल्प का दिन। यह सांकेतिक है। धरती पर प्रदूषण और उसके साथ उस पर भोगवादी सोच की मार। नदियाँ प्रदूषित, वायुमंडल दूषित, कटते जंगल, खेतों पर इमारतें उगना आदि बहुत सी चुनौतियों के बीच धरती दिवस का महत्व और भी ज़रुरी हो गया है।

    आग के गोले से धरती में बदलने की विस्तृत प्रक्रिया है। फिर उसपर जीवन का उदय। परिवर्तन हुए और लम्बी यात्रा के बाद यह समय आया। अब सब को क्या करना है यह सभी को सोचना और उसपर चलना है। आज के संदर्भ में स्थिति एकदम भिन्न है। पूरा विश्व घरों मे बन्द है। वायुमंडल में एक ऐसा कोरोना वायरस उपस्थित है जो जानलेवा है। उसका कोई वैक्सीन नहीं है। बस घरों में बंद रहकर ही इससे बचा जा सकता है। यह बहुत तेजी से फैलता है।

    यह वैश्विक महामारी का दौर है। महाशक्तियों ने हथियार बनाये पर इस वायरस स्वय हथियार से कम नहीं। यह कब और कैसे समाप्त होगा, यह पता नहीं। खांसी जुखाम तेज़ बुखार सांस लेने में कठिनाई इसके लक्षण देखे गए है। आईसीयू और वेन्टीलेटर के साथ इसका टेस्ट भी चुनौती बना हुआ है। डाक्टर और व्यवस्था अपने मोर्चे पर हैं। लाखों लोगों के मरने की खबर है। संख्या बढ रही है। बार-बार हाथ धोने और सोशल डिस्टेंसिंग ज़रुरी है। विश्व की यह बड़ी चुनौती दुर्भाग्यपूर्ण और त्रासद है।

    हम इसी समय में जी रहे हैं। सभी गतिविधियां बन्द है। सार्वजनिक लॉकडाउन है। ऐसा न सोचा था न पढ़ा था। वह आज सामने है। दूसरी तरफ कुछ महत्वपूर्ण सोचने का का भी वक्त है यह। विश्व घरों में बंद है और प्रकृति अपने नैसर्गिक रुप की तरफ मुड़ती दिख रही है। भारत में प्रदूषित यमुना और गंगा अविरल साफ सुथरी बहने लगी है। आकाश और पर्यावरण शुद्ध हो रहा है।

    अब फिर से हर विषय में नई दिशा में सोचना होगा। बहुत सी स्थितियों में परिवर्तन आ सकता है। सांस लेने के लिए स्वच्छ वायु भी मिलनी मुश्किल हो गई। ऐसी भोगवादी व्यवस्था बन गई जिसे बदलना जरुरी हो गया। कोरोना से एक चीज़ बदल सकती है वह है हमारी इम्यूनिटी। यह बेहद जरुरी है। इसके लिए जीवनचर्या को ही बदलना जरुरी हो गया। विकास मनुष्य के लिए आक्सीजन के लिए हो, न कि सिर्फ मुनाफे के लिए। हिमालय बचाना, विश्व बचाना और धरती बचाना जरूरी हो गया।

    अब बिजली बनानी है तो नदी को रोक दिया। सड़कें बनानी है तो पेड़ काट दिए। प्राकृतिक तौर से जीने की जगह प्रकृति को नष्ट करने में लगे लोगों को अब सोचना होगा। विकास जरुरी है और धरती और मानव सभ्यता बचा रहना भी जरुरी है। उम्मीद करनी ही चाहिए कि आज दुनियां वैश्विक महामारी से बचेगी और नए सवालों के नए उत्तर भी ढूंढ लेगी। धरती बचेगी और हम और आने वाला समय मुस्काएगा।
    https://www.bolpahadi.in/2020/04/blog-post-the-world-is-closed-in-houses-on-earth-day.html

    लेखक डॉ. अुतल शर्मा जाने माने जनकवि, साहित्यकार हैं।
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    15 April, 2020

    भुवन शोम से हुई प्रयोगधर्मी सिनेमा की शुरूआत

    https://www.bolpahadi.in/2020/04/blog-post-experimental-film-bhuvan-shome.html

    - प्रबोध उनियाल  । 


    फिल्मकार मृणाल सेन द्वारा वर्ष 1969 में ‘भुवन शोम’ का निर्माण आधुनिक भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर साबित हुई। ये एक नए सिनेमा के विमर्श का आरंभ था। व्यवसायिक सिनेमा हिंदी दर्शकों के लिए एक स्वस्थ और निरापद मनोरंजन भर था। साफ-सुथरी फिल्में भी थीं जिन्हें पूरा परिवार एक साथ बैठकर देख सकता था। अपवाद हो सकता है लेकिन अधिकांश फिल्मों में कलात्मकता व बौद्धिक संवेदना कम दिखती थी। सिनेमा को लेकर मध्यमवर्गीय सोच अपने तरीके की थी। वह अभी सुदूर देहात तक नहीं पहुंचा था। उसकी पटकथा में आम जनजीवन उतना उभर कर नहीं आया।

    फिल्म ‘भुवन शोम’ को एक नए सिनेमा की शुरुआत माना जाता है। जो हिंदी दर्शकों को एक मध्यमवर्गीय सोच से खींचकर बाहर निकालने में कामयाब रही। ऐसा पहली बार हुआ जब दर्शक ‘भुवन शोम’ को देखकर इस फिल्म को अपने साथ हॉल से बाहर ले आए। स्वस्थ मनोरंजन अपनी जगह ही रहा लेकिन ‘भुवन शोम’ के बहाने यह माने जाने लगा कि फिल्में, पुस्तक या कोई भी संगीत आपको धीरे से बदलता जरूर है। अगर आप उदासीन और निष्क्रिय हैं तो यह विचार प्रवाह आपको जगाता भी है और शायद उकसाता भी है।

    यहीं से नए सिनेमा और अच्छे सिनेमा में भेद होने लगा। जानकारों का कहना है कि दरअसल सन् 1969 से पूर्व हम एक ही प्रकार का सिनेमा का निर्माण करते आ रहे थे। भारतीय दर्शकों की सिनेमा को लेकर एक विशिष्ट किस्म की मानसिकता बन चुकी थी। तब मृणाल सेन की फिल्म ‘भुवन शोम’ ने एक प्रयोगधर्मी सिनेमा की ओर राह बढ़ाई।

    फिल्म बांग्ला कहानीकार बलाई चंद मुखर्जी की कहानी पर आधारित है। नायक के किरदार में प्रसिद्ध अभिनेता उत्पल दत्त हैं। नायक रेल महकमे में एक बड़ा अधिकारी है। सख्त है और अनुशासन प्रिय भी। इतना सख्त और अनुशासन प्रिय कि रेलवे में ही काम करने वाले अपने बेटे को भी नहीं बख़्सते। शोमबाबू विधुर हैं, जाहिर सी बात है कि जीवन में बहुत ज्यादा आनंद नहीं है। जीवन शुष्क है।

    कहानी में मोड़ तब आता है जब एक दिन वे अचानक ऑफिस की चारदीवारी से बाहर निकलकर कच्छ इलाके में गांव की एक चंचल युवती से मिलते हैं। युवती का पति भी रेलवे में कर्मचारी है। देहात का धूलभरा जीवन लेकिन यहां का निश्चल सौंदर्य उनको आकर्षित करता है।

    यहां आकर शोमबाबू का नजरिया बदलने लगता है जो जीवन कभी सख्त और एकाकी था, वह जीवन धीरे से छूटने लगता है। और रेलवे का वह सख्त नौकरशाह एक अल्हड़ बच्चा बन जाता है।

    नायिका सुहासिनी मुले ने अपना फिल्मी सफर इसी फिल्म से शुरू किया था। अमिताभ बच्चन ने ‘भुवन शोम’ में पहली बार वॉयस ओवर किया था। कुल एक लाख रुपये के बजट से तैयार ‘भुवन शोम’ में उत्पल दत्त के शानदार अभिनय ने फिल्म को ऐतिहासिक बना दिया था।

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    https://www.bolpahadi.in/2020/04/blog-post-experimental-film-bhuvan-shome.html
    - लेखक प्रबोध उनियाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं
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