25 April, 2019

जब दहकते अंगारो के बीच नाचते हैं जाख देवता


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रूद्रप्रयाग जनपद के गुप्तकाशी क्षेत्र के अन्तर्गत देवशाल गांव में चौदह गांवों के मध्य स्थापित जाखराजा मंदिर में प्रतिवर्ष बैशाख महीने के आरंभ में जाख मेले का भव्य आयोजन किया जाता है। मेला शुरू होने से दो दिन पूर्व से भक्तजन बड़ी संख्या में नंगे पांव, सिर में टोपी और कमर में कपड़ा बांधकर लकड़ियां, पूजा व खाद्य सामग्री एकत्रित करने में जुट जाते हैं।
इसके साथ ही भव्य अग्निकुंड तैयार किया जाता है। इस अग्निकुंड के लिए ग्रामीणों के सहयोग से लगभग 100 कुंतल लकड़ियों से कोयला बनाया जाता है।

मेले के पहले दिन बैसाखी पर्व पर रात्रि को अग्निकुंड व मंदिर के दोनों दिशाओं में स्थित देवी देवताओं की पूजा-अर्चना के बाद अग्निकुंड में रखी लकड़ियों पर अग्नि प्रज्वलित की जाती है जो पूरी रात भर जलती रहती है। जिसकी रक्षा में नारायणकोटी व कोठेडा के ग्रामीण रात्रिभर जागरण करके जाख देवता के नृत्य के लिए अंगारे तैयार करते रहते हैं।

अगले दिन जाख भगवान के पश्वा इन दहकते हुए अंगारों के बीच में नृत्य करतें हैं। जब जाख भगवान के पश्वा नंगे पांव इन दहकते अंगारों में नृत्य करते है तो सभी श्रद्धालुओं के सिर श्रद्धा से झुक जाते हैं। और जाख महाराज के जयकारे से पूरा मंदिर परिसर गूँज उठता है साथ ही भगवान की दैवीय शक्ति से भक्तों का साक्षात्कार होता है।

केदार घाटी के संस्कृतिकर्मी लखपत सिंह राणा मान्यताओं के हवाले से बताते है कि जाख देवता यक्ष व कुबेर के रूप में भी पूजे जाते हैं। उनके दिव्य स्वरूप की अलौकिक लीला प्रतिवर्ष अग्निकुंड में दहकते अंगारों पर नृत्य करते हुए दिखती है। अतिवृष्टि एवं अनावृष्टि से बचने के लिए भी जाख देवता की पूजा-अर्चना की जाती है। जिस भक्त को जाखराजा का आशीर्वाद मिलता है। उसकी मनोकामना अवश्य पूर्ण हो जाती है। कोठेड़ा गाँव से दोपहर में देवता की कंडी जाती है। फिर जाख के लिंग का श्रृंगार होता है। रात को चारों दिशाओं की पूजा होती है भोजन बनता है और फिर मूँडी में अग्नि प्रज्वलित की जाती है

प्रस्तुति- संजय चौहान

24 April, 2019

उत्तराखंड में भी फिल्म पत्रकारिता जरूरीः मदन डुकलाण

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(गढ़वाली-कुमांउनी फिल्म समीक्षा ने अभी कोई विशेष रूप अख्तियार नहीं किया है। इस विषय पर गढ़वाली साहित्यकार,  संपादक, नाट्यकर्मी, अभिनेता श्री मदन मोहन डुकलाण से फोन पर वरिष्ठ साहित्यकार भीष्म कुकरेती की बातचीत)

भीष्म कुकरेती- गढ़वाली फिल्म पत्रकारिता के बारे में आपका क्या ख़याल है?
मदन डुकलाण- जी, जब प्रोफेस्नालिज्म के हिसाब से गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म निर्माण ही नहीं हो पाया तो गढ़वाली-फिल्म पत्रकारिता में भी कोई काम नहीं हुआ।

भीष्म कुकरेती- पर समाचार पत्रों में गढ़वाली-कुमाउनी फिल्मों के बारे में समाचार, विश्लेष्ण तो छपता ही है!
मदन डुकलाण- कुकरेती जी! अधिकतर सूचना या विश्लेषण फिल्मकारों द्वारा पत्रकारों को पकड़ाया गया होता है, जो आप पढ़ते हैं।

भीष्म कुकरेती- आप गढ़वाली फ़िल्मी पत्रकारिता की कितनी आवश्यकता समझते हैं?
मदन डुकलाण- गढ़वाली-कुमाउनी फिल्मों के लिए विशेष पत्रकारिता की  आवश्यकता अधिक है। गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म उद्योग को बचाने और इसे प्रोफेसनल बनाने के लिए गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म जर्नलिज्म की अति आवश्यकता है।

भीष्म कुकरेती- आधारभूत फिल्म विश्लेषण पर ही बात की जाय कि किस तरह एक फिल्म का विश्लेषण किया जाना चाहिए?
मदन डुकलाण- सर्वप्रथम तो पहले ही खंड में फिल्म के बारे में एक पंक्ति में विश्लेषक की राय या विचार इंगित हो जाना चाहिए।

भीष्म कुकरेती- जी हां! फिल्म समालोचना की यह प्रथम आवश्यकता भी है। इसके बाद?
मदन डुकलाण- सारे आलेख में समालोचनात्मक रुख होना ही चाहिए।

भीष्म कुकरेती- जी और ..?
मदन डुकलाण- पत्रकार विश्लेषक को फिल्म के सकारत्मक व नकारात्मक पक्षों को पाठकों के सामने रखना चाहिए।

भीष्म कुकरेती-अपाठकों के सामने क्या-क्या लाना आवश्यक है?
मदन डुकलाण- तुलनात्मक रुख फिल्म समालोचना हेतु एक आवश्यक शर्त है कि पाठक के सामने फिल्म को किसी अन्य फिल्म या विज्ञ विषय के साथ जोड़ा जाय या फिल्म की तुलना की जाय जिससे पाठक फिल्म समालोचना के साथ जुड़ सके।

भीष्म कुकरेती- जी हां, तुलनात्मक रुख की उतनी ही आवश्यकता है जितनी फिल्म के बारे में राय। फिल्म  विश्लेषक को कथा के बारे में कितना बताना जरूरी है?
मदन डुकलाण- फिल्म विश्लेषक को कथा की सूचना देनी जरूरी है, किन्तु अधिक भी नहीं। जो सीक्रेट/गोपनीय पक्ष हों उन्हें ना बताकर उन गोपनीय बातों के प्रति पाठक का आकर्षण पैदा कराना चाहिए।

भीष्म कुकरेती-जी !
मदन डुकलाण- फिर टैलेंट, प्रतिभा, कौशल को समुचित या अनुपातिक प्रतिष्ठा, प्रशंसा या देनी चाहिए।

भीष्म कुकरेती- जी हां, प्रतिभा के बारे में ही फिल्म विश्लेषण का एक मुख्य कार्य है!
मदन डुकलाण- विश्लेषण बातचीत विधि में हो तो सर्वोत्तम।

भीष्म कुकरेती-हां बातचीत विधि पाठकों को आकर्षित करती है और बातचीत की स्टाइल पाठकों की मनोवृति के हिसाब से ही होनी चाहिए!
मदन डुकलाण- समीक्षक को फिल्म या एलबम को शब्दों द्वारा फिल्म-एलबम के वातावरण को पुनर्जीवित करना ही सही समीक्षा की निशानी है।

भीष्म कुकरेती-जी! पाठकों को कुछ ना कुछ आभास हो जाना चाहिए की फिल्म या एलबम का वातावरण कैसा है!
मदन डुकलाण- समीक्षक को अपने विचार नहीं थोपने चाहिए।

भीष्म कुकरेती-  आपका अर्थ है कि फिल्म समीक्षा के वक्त समीक्षक को किसी वाद को आधार बनाकर समीक्षा नहीं करनी चाहिए?
मदन डुकलाण- ईमानदारी तो समीक्षा में हो, किन्तु तुच्छता नहीं होनी चाहिए।

भीष्म कुकरेती- हां यह बात भी फिल्म समीक्षा के लिए आवश्यक आयाम है!
मदन डुकलाण- फिल्म समीक्षक को ध्यान रखना चाहिए कि अपने पाठकों और समीक्षीत फिल्म के प्रति बराबर उत्तरदायी है।

भीष्म कुकरेती-हां समीक्षक कई उत्तरदायित्व सम्भालता है। 
मदन डुकलाण- समीक्षा संक्षिप्त पर व्यापक प्रभाव देय होनी ही चाहिए।

भीष्म कुकरेती-जी!
मदन डुकलाण- समीक्षा किसी को अनावश्यक प्रभाव डालनी वाली न हो याने विद्वतादर्शी न हो।

भीष्म कुकरेती- गढ़वाली-कुमाउनी फिल्मों के समीक्षक का अन्य  भाषाओं जैसे हिंदी फिल्म समीक्षा से अधिक उत्तरदायित्व है, इस पर आपका क्या कहना है?
मदन डुकलाण- क्षेत्रीय फ़िल्में या नाटक हमेशा एक ना एक संक्रमणकाल से गुजरते रहते हैं, अतः क्षेत्रीय कला समीक्षक उस कला को पाठकों, दर्शकों की रूचि बनाये रखने का उत्तरदायित्व भी निभाता है।

भीष्म कुकरेती- इसीलिए आप कहते हैं कि गढ़वाली-कुमांउनी फिल्म व एलबमों के लिए एक विशेष फिल्म समीक्षा संस्कृति आवश्यक है?
मदन डुकलाण- जी हां, गढ़वाली-कुमांउनी फिल्म-एलबम समीक्षा की विशेष संस्कृति आवश्यक है।
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प्रस्तुति- भीष्म कुकरेती

23 April, 2019

सिर्फ ‘निजाम’ दर ‘निजाम’ बदलने को बना उत्तराखंड?

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धनेश कोठारी/
युवा उत्तराखंड के सामने साढे़ 17 बरस बाद भी चुनौतियां अपनी जगह हैं। स्थापना के दिन से ही राज्य के मसले राजनीति की विसात पर मोहरों से अधिक नहीं हैं। राज्य के स्वर्णिम भविष्य के दावों के बावजूद अब तक कारगर व्यवस्थाओं के लिए किसी तरह की नीति अस्तित्व में नहीं है। बात मूलभूत सुविधाओं बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा या संस्कृति, खेल, फिल्म, पर्यटन, भूमि क्रय-विक्रय, खनन, आबकारी, उद्योग, स्थानान्तरण, रोजगार, पलायन और स्थायी राजधानी आदि पर किसी तरह का ‘खाका’ सरकार के पास होगा, उम्मीद नहीं जगती। अब तक राज्य में जो घोटाले चर्चाओं में रहे उनपर क्या कार्रवाई हुई, कौन दोषी था, किसे जेल हुई, यह सब भी आरोपों- प्रत्यारोपों तक ही सीमित दिखता है। भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ने की बात के बाद भी ‘लोकायुक्त’ के वजूद में आने का इंतजार ही है।

इसबीच यदि कुछ खास हुआ है, तो वह यह कि इस छोटे से अंतराल में उत्तराखंड में चार बार सत्ता का हस्तांतरण हुआ ओर नौ बार आठ मुखिया जरूर गद्दीनसीन हुए हैं। लेकिन चेहरों की अदला-बदली के बावजूद कार्यशैली में बदलाव आता नहीं दिखा। सिहांसन पर जिसने भी एंट्री ली राज्यवासियों के दर्द से दूर ही रहा। हां पूर्ववर्ती सरकारों के फैसलों को बदलने, अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को गढ़ने और वोट बैंक को साधने के लिए किसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। सरकारें अपनी बतौर बड़ी उपलब्धि यह तो बताती हैं कि राज्य में प्रति व्यक्ति आय गुजरात से भी अधिक एक लाख 60 हजार हो चुकी है। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि इस अरसे में राज्य पर कर्ज बढ़कर 50 हजार करोड़ से अधिक हो गया है। तब भी आर्थिक मजबूती के लिए कोई ठोस प्लान राज्य के पास नहीं।

आलम यह है कि कर्मचारियो के वेतन, भत्तों और एरियर देने के लिए सरकार को बाजार से कर्ज पर कर्ज उठाना पड़ रहा है। जो कि 4000 करोड़ से आगे पहुंच चुका है। दूसरी तरफ सरकारी महकमों में हजारों रिक्त पदों के बाद भी प्रदेश में बेरोजगारों की तादाद 10 लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। आपदा से तहसनहस केदारनाथ धाम तो संवर गया, किंतु केदार घाटी के प्रभावित गांवों में जीवन अब भी आपदा के घावों से कराह ही रहा है। राज्य की स्थायी राजधानी का मसला अब भी अधर में है।

सवाल यहीं नहीं ठहरते, बल्कि आवाज देते हैं कि राज्य आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को कब और कौन सजा दिलाएगा, यूपी के साथ परिसंपत्तियां का बंटवारा ईमानदारी से कब तक पूरा होगा, पलायन पर किस तरह से रोक लगेगी, भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए लोकायुक्त कब वजूद में आएगा, जीरो टॉलरेंस की बात नारों से निकल कर हकीकत में बदलेगी, घोटालों के दोषी कब तक सींखचों के भीतर होंगे, विजन डॉक्यूमेंट के मुद्दे जमीन पर कब तक अवतिरत होंगे या विजन भर ही रहेंगे। या फिर सब पर अंधेरा ही कायम दिखता रहेगा !!

गढ़वाली फिल्मों में हिंदी फिल्मों की भौंडी नकलः नरेंद्र सिंह नेगी

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(प्रख्यात लोकगायक/साहित्यकार श्री नरेंद्र सिंह नेगी से फोन पर साहित्यकार श्री भीष्म कुकरेती की बातचीत)

भीष्म कुकरेती - नेगीजी नमस्कार आज पौड़ी में या कहीं और ?
नरेंद्र सिंह नेगी- नमस्कार कुकरेती जी। आज मैं अभी एक समारोह हेतु श्रीनगर आया हूं। कहिये।

भीष्म कुकरेती- नेगीजी! गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म उद्योग पर बातचीत करनी थी। समय हो तो ..
नरेंद्र सिंह नेगी- हां कहिये! वैसे गढ़वाली फिल्में कुमांउनी फिल्मों के मुकाबले अधिक बनी हैं। जबकि कुमाऊं में अंतरराष्ट्रीयस्तर के राजनेता, वैज्ञानिक, सैनिक अधिकारी, संगीतकार, चित्रकार, साहित्यकार, कलाकार हुए हैं किन्तु यह एक बिडम्बना ही है कि कुमाउनी फिल्में ना तो उस स्तर की बनी और ना ही संख्या की दृष्टि से समुचित फ़िल्में बनीं।

भीष्म कुकरेती- गढ़वाली व कुमांउनी फिल्मों का स्तर कैसा रहा है?
नरेंद्र सिंह नेगी- देखा जाए तो अमूनन स्तरहीन ही रहा है। हिंदी के कबाडनुमा फिल्मों की नकल रही है गढ़वाली व कुमांउनी फ़िल्में। असल में उत्तराखंडी फिल्म उद्योग में सांस्कृतिक और सामजिक स्तर के  अनुभवी लोग आये ही नहीं। जब आप क्षेत्रीय फिल्म या एलबम बनाते हैं तो पहली मांग होती है कि वह क्षेत्रीय सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक वस्तुस्थिति को दिखाये। किन्तु शुरू से ही गढ़वाली-कुमांउनी फ़िल्में या तो भावनात्मक दबाब या रचनाकारों का हिंदी फिल्म उद्योग में आने के लिए बनायी गयीं और यही कारण है कि कुमांउनी-गढ़वाली फिल्मों ने वैचारिक  स्तर व कथ्यात्मक स्तर पर कोई विशेष क्या कोई छाप छोड़ी ही नहीं। असल में हिंदी की सडक छाप फिल्मों की भौंडी नकल ने कुमांउनी-गढ़वाली फिल्मों को लहूलुहान किया।

भीष्म कुकरेती- आप क्यों हिंदी फिल्मो पर जोर दे रहे हैं?
नरेंद्र सिंह नेगी- कुकरेती जी! हिंदी फिल्मों में कमोवेश हिंदी भाषा भारतीय है पर कोई भी हिंदी फिल्म हिन्दुस्तान की संस्कृति और समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करती और जब हम डी ग्रेड हिंदी फिल्मों की भौंडी नकल करेंगे तो हमें कबाड़ ही मिलेगा कि नहीं?

भीष्म कुकरेती- हां यह बात तो सत्य है कि अधिसंख्य हिंदी फ़िल्में पलायनवादी याने एक अलग किस्म के समाज को दिखलाती रही हैं।
नरेंद्र सिंह नेगी- और जब गढ़वाली-कुमांउनी रचनाकार एक काल्पनिक समाज की प्रतिनिधि हिंदी फिल्मो की उलजलूल नकल पर फिल्म बनाएगा तो विचारों के स्तर पर बेकार ही फ़िल्में बनेंगी। आप ही ने एक उदाहरण दिया था की ’कभी सुख कभी दुःख’ फिल्म में गढ़वाली गावों में डाकू घोड़े में चढ़कर डाका डाल  रहे है.. अभी एक गढ़वाली डीवीडी फिल्म रिलीज हुई,  जिसमें गढ़वाल के गांव में खलनायक की टीम दुकानदारों से हफ्ता वसूली कर रही है। अब एक बात बताइये! गढ़वाल या कुमाऊं के गावों में आज भी साहूकारी व दुकानदारी के अति विशिष्ठ सामजिक नियम हैं और दुकानदार समाज का उसी तरह का सदस्य है, जिस तरह एक लोहार या पंडित।यदि कोई दुकानदारों से हफ्तावसूली करे तो क्या गांव वाले हिंदी फिल्मों की तरह चुप बैठ सकते हैं? मैदानी और पहाड़ों में सामाजिक व मानसिक दोहन (एक्सप्लवाइटेसन) बिलकुल अलग-अलग किस्म के हैं। फिर इस तरह की बेहूदगी गढ़वाली-कुमांउनी फिल्मों में दिखाई जायेगी तो ऐसी फ़िल्में ना तो वैचारिक दृष्टि से ना ही उद्योग की दृष्टि से दर्शकों को लुभा पाएगी। प्यार के मामले में भी संवेदनशीलता की जगह फूहड़ता... इश्क को फिल्मों में रूमानियत की जगह अजीब और अनदेखा नाटकीयता से फिल्माया जाता है।

भीष्म कुकरेती- कई लोगों ने मुझसे बात की कि यदि गढ़वाली-कुमांउनी फिल्मों को पटरी पर लाना है तो उन्हें अंतरराष्ट्रीयस्तर की वैचारिक फ़िल्में बनानी पड़ेंगी।
नरेंद्र सिंह नेगी- जी हां मैं भी इसी विचार का समर्थक हूं कि जब तलक कुमांउनी-गढ़वाली फिल्मों में सत्यजीत रे सरीखे समाज और संस्कृति से जुड़े संवेदनशील रचनाकार नहीं आयेंगे तब तक इसी तरह की हिंदीनुमा क्षेत्रीय भाषाओं में बनेंगी। सत्यजीत रे ने बंगाली फिल्मों को बंगाली बाणी दी। मै एक उदाहरण देना चाहूंगा कि किस तरह हमारे क्षेत्रीय फिल्म रचनाकार हिंदी फिल्मों के मानसिक गुलाम हैं। मैंने एक गढ़वाली फिल्म में म्यूजिक व बैक ग्राउंड म्यूजिक दिया। लड़ाई के एक दृश्य में मैंने डौंर-थाली से डौंड्या नर्सिंग नृत्य संगीत शैली में बैकग्राउंड म्यूजिक दिया। सारे दिनभर मुंबई के एक स्टूडियो में मैंने यह म्यूजिक रिकॉर्ड किया। पर जब मैंने फिल्म देखी तो वह बैकग्राउंड म्यूजिक गायब था व हिंदी फिल्मों के स्टॉक म्यूजिक का ढिसूं-ढिसूं म्यूजिक डाला गया था।      

भीष्म कुकरेती- आखिर क्या कारण है कि गढ़वाली-कुमांउनी फ़िल्मी रचनाकार  हिंदी फिल्मों के नकल कर रहे हैं।
नरेंद्र सिंह नेगी- प्रथम कारण, तो गढ़वालियों और कुमांउनी फिल्म रचनाकारों व समाज दोनों को काल्पनिक हिंदी फिल्मों का वातावरण मिलता है तो हर क्षेत्रीय फिल्म रचनाकार इस हिंदी फिल्म के तिलस्म को तोड़ पाने में असमर्थ ही है।

भीष्म कुकरेती- इस समस्या का  निदान?
नरेंद्र सिंह नेगी- जब तक कुमांउनी-गढ़वाली फिल्म उद्यम में संस्कृति व समाज को पहचानने वाले संवेदनशील कथाकार, पटकथाकार व फिल्म शिल्पी एक साथ नहीं प्रवेश करेंगे तो विचारों की दृष्टि से गढ़वाली-कुमांउनी फिल्म व एलबम इसी तरह की काल्पनिक ही होंगी। फिल्म कई कलाओं व तकनीक का अनोखा संगम है अतः संवेदनशील रचनाकारों की टीम ही विचारों की दृष्टि से इस खालीपन को दूर कर सकते हैं। 

भीष्म कुकरेती- नेगीजी आजकल गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म-एलबम उद्योग का क्या हाल है?
नरेंद्र सिंह नेगी- कुकरेती जी बहुत ही बुरा हाल है। नई टेक्नोलॉजी याने इंटरनेट और डीवीडी से पैनड्राइव पर डाउनलोडिंग से गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म-एलबम उद्योग ठप ही पड़ गया है।

भीष्म कुकरेती- अच्छा इतना बुरा हाल है?
नरेंद्र सिंह नेगी- अजी! इतना बुरा हाल है कि कई म्यूजिक कम्पनियों ने म्यूजिक उद्योग बंदकर तंबाकू-गुटका पौच बेचने का धंधा शुरू कर दिया है।

भीष्म कुकरेती- क्या कह रहे हैं आप?
नरेंद्र सिंह नेगी- हां जब क्षेत्रीय म्यूजिक से मुनाफ़ा ही नहीं होगा तो म्यूजिक कंपनियां दूसरा धंधा शुरू करेगे ही कि नहीं?

भीष्म कुकरेती- पर कॉपीराइट के नियम तो हैं?
नरेंद्र सिंह नेगी- भीष्म जी! नियम तो हैं पर न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल और लम्बी है कि कोई भी उद्योगपति न्यायालयों के झंझटों में नहीं पड़ना चाहता।

भीष्म कुकरेती- फिर कुछ ना कुछ समाधान तो ढूंढना ही होगा।
नरेंद्र सिंह नेगी- अभी तो फिल्मकर्मियों को नई तकनीक द्वारा असंवैधानिक तरीकों से नकल का कोई तोड़ नहीं मिल रहा है।

भीष्म कुकरेती- आपका मतलब है अब म्यूजिक कम्पनियां गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म-एलबम निर्माण कर ही नहीं पाएंगी?
नरेंद्र सिंह नेगी- नहीं टी सीरीज जैसी बड़ी कम्पनियों के लिए तो अभी भी यह बाजार मुनाफ़ा दे सकता है। क्योंकि उन्हें वितरण के लिए केवल गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म-एलबमों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। फिर कुछ छोटी याने आज आई कल गई कम्पनियां मर- मरकर इस उद्योग को चलाती रहेंगी।

भीष्म कुकरेती- मतलब व्यापार की दृष्टि से आज का गढ़वाली-कुमाउनी फिल्म-एलबम निर्माण घाटे का सौदा है।
नरेंद्र सिंह नेगी- आज की स्थिति से तो यही लगता है।

भीष्म कुकरेती- नेगी जी ! मैं सोच रहा था कि नई तकनीक से क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को फायदा होगा किन्तु...
नरेंद्र सिंह नेगी- देखिये इंटरनेट और डाउनलोडिंग तकनीक से क्षेत्रीय भाषाई म्यूजिक या फ़िल्में दूर-दूर भारत के शहरों में व विदेशों में बसे प्रवासियों को सुलभ हो गईं। यह एक बहुत फायदा भाषा को हुआ किन्तु इससे फिल्म और म्यूजिक एलबम निर्माण तो ठप हो गया कि नहीं? जब उत्पादन का निर्माण ही नहीं होगा तो फिर भविष्य में बिखरे उत्तराखंडियों को कहां से फिल्म दर्शन व संगीत उपलब्ध होगा?

भीष्म कुकरेती- मतलब सामजिक जुम्मेवारी यह है कि उत्तराखंडी लोग स्वयं ही अनुशासित हो कापीराइट का उल्लंघन ना करें और नकली डीवीडी ना खरीदें!
नरेंद्र सिंह नेगी- आदर्शात्मक हिसाब से सही है किन्तु...

भीष्म कुकरेती- इसका अर्थ हुआ कि राज्य सरकार को कुछ करना चाहिए?
नरेंद्र सिंह नेगी- किस सरकार की बात कर रहे हैं आप? जिस राज्य के एक मुख्यमंत्री संस्कृत को राजभाषा घोषित करें और दूसरे मुख्यमंत्री उर्दू को राजभाषा घोषित करें? पर दोनों राष्ट्रीय दलों के मुख्यमंत्रियों को लोकभाषाओं की कतई चिंता ना हो। उस राज्य में आप क्षेत्रीय भाषाई फिल्म-एलबम उद्योग की सरकारी सहयोग-प्रोत्साहन की कैसे आशा कर सकते हैं? हां कोई फिल्म अकादमी बने तो...

भीष्म कुकरेती- तो वहां समाज सरकार पर दबाब क्यों नहीं बनाता।
नरेंद्र सिंह नेगी- आप सरीखे संवेदनशील लोग इधर-उधर बिखरे हैं। मै या अन्य रचनाकार सभाओं में फिल्म उद्योग को सरकारी संरक्षण, प्रोत्साहन की बात अवश्य करते हैं किन्तु हमारी राजनैतिक जमात सोई नजर आती है।

भीष्म कुकरेती- पर कुछ ना कुछ उपाय तो अवश्य करने होंगे
नरेंद्र सिंह नेगी- हां! फिल्म रचनाकार, कलाकार, समाज व सरकार सभी इस दिशा में एक सोच से काम करें तो यह उद्योग बच सकता है।

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भीष्म कुकरेती- जी धन्यवाद! मुझसे बात करने के लिए मैं आपका आभारी हूं।


मनखि (गढ़वाली-कविता) धर्मेन्द्र नेगी

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विकास-विकास चिल्लाण लैगे
मनखि बिणास बुलाण लैगे

घौ सैणैं हिकमत नि रैगे वेफर
हिंवाळ आँखा घुर्याण लैगे

उड्यार पुटग दम घुटेणूं वींकू
गंगाळ अब फड़फड़ाण लैगे

धुंआर्ंवळनि पराण फ़्वफ़सेगे वेको
अगास मुछ्यळा चुटाण लैगे

छनुड़ा खन्द्वार, गोर सड़क्यूंमा
स्यु ढ़िराक बग्वाळ मनाण लैगे

धर-धरों मा मोबैल टावरों देखी
चखल्यूं को पराण घुमटाण लैगे

निरजी राज हुयूं छ यख ’धरम’
स्यु सुंगर कूड़्यूं तैं कुर्याण लैगे

-         धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ, पौड़ी गढ़वाळ


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