26 April, 2018

हमें सोचना तो होगा...!!


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दिल्ली में निर्भया कांड के बाद जिस तरह से तत्कालीन केंद्र सरकार सक्रिय हुई, नाबालिगों से रेप के मामलों पर कड़ी कार्रवाई के लिए एक नया कानून अस्तित्व में आया। 2014 में केंद्र में आई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने भी ऐसे मामलों पर कार्रवाई की अपनी प्रतिबद्धताओं को जाहिर किया, तो लगा कि देश में महिला उत्पीड़न और खासकर रेप जैसी वारदातों पर समाज में डर पैदा होगा। जो कि जरूरी भी था। मगर, एनसीआरबी के आंकड़े इसकी तस्दीक नहीं करते। समाज में ऐसी विकृत मनोवृत्तियों में कानून का खौफ आज भी नहीं दिखता।

                हाल ही में कठुआ (जम्मू कश्मीर) में महज आठ साल, सूरत (गुजरात) में 10 साल, सासाराम (बिहार) में सात साल की बच्चियों से गैंगरेप और रेप, उन्नाव (उत्तरप्रदेश) में नाबालिग से कथित बलात्कार प्रकरण में स्थानीय विधायक का नाम जुड़ना, मौजूदा हालातों को आसानी से समझा दे रहे हैं। यहां सवाल यह नहीं कि ऐसी वारदातों को रोकने और मुजरिमों को सजा देने में सरकारें फेल हुई हैं। बल्कि यह है कि पीड़ितों को न्याय दिलाने की बजाए जम्मू कश्मीर और उत्तर प्रदेश में जिस तरह से रेप के आरोपियों को बचाने के लिए समूह सड़कों पर उतरे, वह चिंतनीय है। राजनीतिक दलों के कई लोगों ने भी ऐसे समय में संवेदनशीलता दिखाने की बजाए बेहद शर्मनाक और गैर मर्यादित ढंग से टिप्पणियां कीं। नतीजा, उन्नाव मामले तो में कोर्ट को भी सख्त लहजे में अपनी बात कहनी पड़ी।

                पिछले दिनों केंद्र सरकार ने बलात्कार की वारदातों पर अंकुश लगाने के मकसद से अध्यादेश लाकर पॉक्सो एक्ट में बदलाव किया है। जिसके हिसाब से 12 साल तक की बालिका से रेप पर सीधे फांसी तजवीज की गई है। साथ ही अन्य उम्र की महिलाओं के साथ रेप पर भी सजा की अवधि को बढ़ा दिया है। ऐसे मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की बात भी केंद्र सरकार ने कही है। लिहाजा, कानून में सख्ती एक अच्छा कदम है। मगर, यह भी तब तक नाकाफी ही मानें जाएंगे, जब तक क्रियान्यन में कड़ाई नहीं बरती जाए।

                दूसरी तरफ यह भी जरूरी है कि समाज खुद आगे आकर ऐसी विकृतियों को हतोत्साहित करने के लिए निष्पक्षता से आगे आए। सो सरकारों के अलावा समाज को भी इस दिशा में सोचना तो होगा...!!

आलेख- धनेश कोठारी

19 April, 2018

नई इबारत का वक्त


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हाल के वर्षों में पहाड़ों में रिवर्स माइग्रेशन एक उम्मीद बनकर उभरा है। प्रवासी युवाओं का वापस पहाड़ों की तरफ लौटना और यहां की विपरीत स्थितियों के बीच ही रास्ता तलाशने की कोशिशें निश्चित ही भविष्य के प्रति आशान्वित करती हैं, तो दूसरी तरफ पहाड़ों में ही रहते हुए कई लोगों ने अपने ही परिश्रम से अनेकों संभावनाओं को सामने रखा है। यदि उनकी इन्हीं कोशिशों को बल मिला और युवाओं ने प्रेरणा ली, तो पलायन से अभिशप्त उत्तराखंड के पर्वतीय हिस्सों में आने वाला वक्त एक नई ही इबारत लिखेगा।

                दरअसल, आजादी के बाद ही उत्तरप्रदेश का इस हिस्सा रहे उत्तराखंड के पर्वतीय भूभाग को भाषा और सांस्कृतिक भिन्नता के साथ अलग भौगोलिक कारणों से पृथक राज्य के रूप में स्थापित करने की मांग शुरू हो हुई थी। कुछ समय बाद रोजगार की कमी के चलते यहां से शुरू हुए पलायन ने इस मांग को और भी गाढ़ा किया। नतीजा, दशकों पुरानी मांग पर सन् 1994 में स्वतःस्फूर्त पृथक राज्य आंदोलन का संघर्ष निर्णायक साबित हुआ। नौ नवंबर 2000 को अलग राज्य के रूप में पर्वतीय जनमानस का एक सपना पूरा हुआ।

मगर, उनकी सोच के विपरीत तकलीफें कम होने की बजाए और भी बढ़ीं। जिस पलायन से पार पाने की उम्मीदें थीं, वह राज्य निर्माण के बाद और भी अधिक तेज हुई। उनके सपने नए राज्य में अवसरवादी राजनीति की भेंट चढ़ गए। पहाड़ी घरों में पिछले 17 सालों के अंतराल में सबसे अधिक ताले लटके। अधिकांश पलायन शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के साथ बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते सामने आया।

अब, देशभर से सुख सुविधाओं और अपनी महंगी नौकरियों को छोड़कर कुछ युवाओं ने वापसी का रुख किया और यहां मौजूदा स्थितियों में नई राहें खोजी हैं, तो जरूरत है कि सरकारें भी उनके रास्तों को समझे। नीतियों के निर्धारण में उनके अनुभवों और उनके सुझावों को शामिल करे। जो कि खुद राजनीतिक दलों के लिए मुनाफे का ही सौदा होगा।

आलेख- धनेश कोठारी

बारहनाजा : पर्वतजनों के पूर्वजों की सोच की उपज


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डा0 राजेन्द्र डोभाल
उत्तराखंड एक पर्वतीय राज्य तथा अनुकूल जलवायु होने के कारण एक कृषि प्रधान राज्य भी माना जाता रहा है। सामान्यतः उत्तराखंड मे विभिन्न फसलो की सिंचित, असिंचित, पारंपरिक और व्यसायिक खेती की जाती है। चूंकि स्वयं में कई पीढ़ियों से उत्तराखंड की खेती को पारंपरिक दृष्टिकोण से देखता आया हूं, अब पारंपरिक खेती पद्धतियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखने की कोशिश करता हूं, कि क्या हमारी पारंपरिक खेती की पद्धतियो में वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी था या केवल समय की आवश्यकता थी।

जहां तक मैं समझता हूं कि हर कृषक की तरह खेती की मूलभूत आवश्यकता परिवार तथा पशुधन के भरण-पोषण की ही रही होगी। तत्पश्चात जलवायु अनुकूल फसलों का चयन, उत्पादन तथा कम जोत भूमि में संतुलित पोषण के लिए अधिक से अधिक फसलों का समन्वय तथा समावेश कर उत्पादन करना ही रहा होगा। निःसन्देह बारहनाजा जैसे कृषि पद्धति में फसलों का घनत्व बढ़ जाता है तथा वैज्ञानिक रूप से उचित दूरी का भी अभाव पाया जाता है, परन्तु कम जोत, असिंचित खेती की दशा सभी पोषक आहारों की पूर्ति के साथ पशुचारा तथा भूमि उर्वरता को बनाए रखना भी काश्तकारों के लिए जटिल विषय रहा होगा। इन्हीं सब को दृष्टिगत रखते हुए एक अत्यंत प्रचलित एवं महत्वपूर्ण पारम्परिक खेती पद्धति विकसित हो गई, जिसे बारहनाजा के नाम से जाना जाता है।

जैसा कि नाम से ही विदित होता है कि बारहा अनाजों की मिश्रित खेती जिसे मुख्यतः चार या पांच श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। अनाज जैसे मंडुआ, चौलाई, उगल, ज्वान्याला तथा मक्का जो कि कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, लोह तथा ऊर्जा के प्रमुख स्रोत माने जाते हैं तथा पशुचारे के लिए भी प्रयुक्त किये जाते हैं। दलहनी फसलों मे राजमा, उड़द, लोबिया, भट्ट तथा नौरंगी आदि जो कि प्रोटीन का मुख्य स्रोत मानी जाती हैं। तिलहनी फसलों मे तिल, भंगजीर, सन्न तथा भांग जो तेल व खल एवं रेशा उत्पादन के लिए प्रयुक्त होती हैं। सब्जियों में उगल, चौलाई तथा मसाले में जख्या आदि, फलों के रुप में पहाडी ककड़ी का उत्पादन किया जाता है।

जहां एक ओर पर्वतीय क्षेत्र अपनी विविधता, पृथकता और अस्थिर पारिस्थितिक तंत्र के लिए जाने जाते हैं। वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों ने यहां की बदलती जलवायु, मुख्यतः अनियमित वर्षा चक्र, सीमित भूमि संसाधन, भूमि क्षरण इत्यादि को ध्यान मे रखते हुए प्रतिकूल परिस्थितियों में भी प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ-साथ, अपने निजी अनुभवों के आधार पर एक विशेष कृषि प्रणाली विकसित की जो इन सभी प्राकृतिक समस्याओं से निपटने में कारगर साबित हुई है। इसका आभास स्थानीय किसानों को बहुत पहले से ही था। साथ ही फसलों की गुणवत्ता व उत्पादकता में वृद्धि, पहाड़ की भौगोलिक सरंचना, जलवायु आदि को ध्यान में रखते हुए इस प्रणाली का चयन सर्वथा उपयुक्त रहा।

यदि संपूर्ण बारहनाजा प्रणाली पर एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखा जाय तो कई वैज्ञानिक पहलू उजागर होते हैं। जैसे दलहन फसलों के अंतर्गत राजमा, लोबिया, भट्ट, गहत, नौरंगी, उड़द और मूंग के प्रवर्धन के लिए मक्का लगाया जाता है। जो बीन्स के लिए स्तम्भ या आधार की आवश्यकता को पूरा करते हैं। साथ ही दलहनी फसलों मे वातावरणीय नाईट्रोजन स्थिरीकरण का भी अदभूत गुण होता है, जो मिट्टी की उर्वरकता को बनाए रखने और नाइट्रोजन को फिर से भरने में मदद करती है। जिसे अन्य सहजीवी फसलें उपयोग करती है। जबकि फलियां प्रोटीन का समृद्ध स्रोत होती हैं। पोषण सुरक्षा प्रदान करने के अलावा कैल्शियम, लोहा, फास्फोरस और विटामिन में समृद्ध होते हैं।

सब्जियां, टेनड्रिल बेअरिंग जैसे कददू, लौकी, ककड़ी आदि भूमि पर फैलकर, सूरज की रोशनी को अवरुद्ध करके, खरपतवार जैसे अवांछित पौधे को रोकने में मदद करती है। इन टेनड्रिल वाइन्स बेलों की पत्तियां एक लिविंग मल्च के रूप में मिट्टी में नमी बनाए रखने हेतु माइक्रोक्लाइमेट का निर्माण करती है। बेल के कांटेदार रोम कीटों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। मक्का, सेम और टेनड्रिल वाइन्स में जटिल कार्बोहाइड्रेट, आवश्यक फैटी एसिड और सभी आठ आवश्यक एमिनो एसिडस इस क्षेत्र के मूल निवासियों की आहार संबन्धी जरूरतें पूरी करने में सहायक सिद्ध होते हैं।

राईजोस्पिफयर में उपस्थित माइक्रोबियल विविधता का प्रबंधन भी एक दीर्घकालिक सस्टेनेबल फसल उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक ही प्रकार की फसल का सतत् फसल प्रणाली द्वारा उत्पादन, मिट्टी में मौजूद सहजीवी, सूक्ष्मजीवों की संख्या को प्रभावित कर मिटटी की उर्वरता को कम करता है तथा एकल फसल में प्रचूर मात्रा में पोषक पौधे की उपलब्धता होने के वजह से कीट व्याधि का प्रकोप सर्वथा अधिक देखा गया है।

उत्तरी चीन के एक शोध कार्य के अनुसार दस स्प्रिंग फसलों को मोनोकल्चर प्रणाली व चार अन्य फसलों को इंटरक्रॉपिंग प्रणाली द्वारा उगाया गया और इन फसलों के राईजोस्पिफयर में मौजूद जीवाणु समुदाय की विविधता का तुलनात्मक अध्ययन किया गया जिससे यह ज्ञात हुआ कि एकमात्र फसल प्रणाली के मुकाबले, इंटरक्रॉपिंग के तहत राईजोस्पिफयर मिट्टी में उपस्थित जीवाणु समुदाय की विविधता व फसल की उत्पादन क्षमता में वृद्धि के बीच संभावित संबंध हैं।

मिश्रित फसल प्रणाली मे राईजोस्पिफयर जोन में मुख्य रुप से फ्लेविसोलिबैक्टर, ल्यूटिबैक्टर, राईजोवैसिलस, क्लोरोफलैक्सी वैक्टीरियम, डेल्टा प्रोटिओबैक्टीरयम, स्यूडोमोनास तथा लाइवेनोन्सिस की अधिकता पाई गई है। साथ ही यह भी पाया गया कि ओगल, बाजरा, मिलेट, ज्वार, सोरघम व मूंगफली फसलों का इंटरक्रॉपिंग विधि द्वारा उत्पादन इन्हीं फसलों के मोनोकल्चर उत्पादन की तुलना में माइक्रोबियल समुदाय की विविधता में वृद्धि करने में अधिक प्रभावशाली साबित होता है।

चूंकि बारहनाजा बुआई तथा पकने की अवधि में मानसून भी तेज होता है तथा ढालदार खेत होने के वजह से भूमि अपरदन की आशंका बनी रहती है। जिसके लिए सम्भवतः किसानों द्वारा बारहनाजा में कुछ अधिक ऊंचाई तथा चौड़ी पत्ती वाली फसलों का चयन किया गया। जिससे तेज वर्षा सीधे जमीन पर न गिरकर चौड़ी पत्ती वाले पौधे से टकराकर छोटी-छोटी बूंदो में बदलकर नमी बनाये रखे। दलहनी फसलों की पत्तियां जमीन पर गिरकर आगामी फसलों के लिए कार्बनिक पदार्थ भी बढ़ाती है। संपूर्ण बारहनाजा पद्धति मे फसलों का चयन में भी वैज्ञानिक परख झलकती है। जिसमे कुछ कम गहरी जड़ वाली फसलों के साथ अधिक गहरी जड़ वाली फसलों का भी समावेश दिखता है। जिससे जमीन से पोषक तत्व अलग-अलग सतहों से लिए जा सकें।

एक विविध बहुउद्देशीय प्रणाली के रूप में जैसे अनाज उत्पादकता, पशुओं के लिए चारा, मिट्टी के पोषक तत्वों में वृद्धि आदि के अतिरिक्त भी इस प्रणाली की एक और दिलचस्प बात यह थी, कि मुख्य फसलों जैसे गेहूं, धान, मंडुआ, बाजरा आदि के बीज ही उपयोग में लाये जाते हैं। जबकि कटाई के उपरांत खेत में बची हुई पत्तियां व डंठल मुक्त पशुओं के लिए चारे के रूप में छोड़ दिए जाते हैं। इस प्रक्रिया में पशुओं द्वारा छोड़े गए गोबर, डंठल व मिटटी में मौजूद सहजीवी सूक्ष्मजीवों के साथ साथ मौसमी विभिन्नता जैसे बर्फ, बारिश और धूप के मिले जुले प्रभाव, इन खेतों की उर्वरता बढ़ाने में अवश्य ही फुकुओका फार्मिंग (नेचुरल फार्मिंग और डू नथिंग फार्मिग) की तरह कार्य करते हैं। सीमित भूमि पर मूल भोजन की अलग-अलग फसलें, जिनमें रबी की फसलें, दलहन, मसाले, तिलहन एवं शाक सब्जियां को एक ही खेत में उगाये जाने के संदर्भ में भी, बारहनाजा प्रणाली की अवधारणा वैज्ञानिक और टिकाऊ है।

चूंकि उत्तराखंड की खेती का अधिकतम भूभाग असिंचित है, जोत भूमि कम है एवं मानसून के दौरान उगने वाली फसलों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक था। निसंदेह रुप से हमारे पूर्वज बारहनाजा जैसी पद्धति का वैज्ञानिक व्याख्या कर पाने मे सक्षम न रहे हों, परन्तु उनके द्वारा जलवायु अनुकूल फसलों का चयन, सहवर्ति फसलों का ज्ञान, कम जोत में सभी पोषक आहारों की पूर्ति के साथ-साथ भविष्य के लिए भूमि की उर्वरकता को बनाये रखना आदि जरुर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ही दर्शाता है।

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(लेखक- महानिदेशक, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद, उत्तराखंड)



17 April, 2018

हमरु गढ़वाल

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कवि श्री कन्हैयालाल डंडरियाल
खरड़ी डांडी
पुन्गड़ी लाल
धरती को मुकुट
भारत को भाल
हमरु गढ़वाल

यखै संस्कृति - गिंदडु, भुजयलु, ग्यगुडू, गड्याल।
सांस्कृतिक सम्मेलन - अठवाड़।
महान बलि - नारायण बलि।
तकनीशियन - जन्द्रों सल्ली।
दानुम दान - मुकदान।
बच्यूं - निरभगी, मवरयूं - भग्यान।

परोपकारी - बेटयूं को परवाण।
विद्वान - जु गणत के जाण।
नेता - जैन सैणों गोर भ्यालम हकाण।
समाज सुधारक - जैन छन्यू बैठी दारू बणाण।
बडू आदिम - जु बादीण नचाव।
श्रद्धापात्र - बुराली, बाघ अर चुड़ाव।

मार्गदर्शक - बक्या।
मान सम्मान - सिरी, फट्टी, रान।
दर्शन - सैद, मशाण, परी, हन्त्या।
उपचार - कण्डली टैर, जागरदार मैर, लाल पिंगली सैर।
खोज - बुजिना।
शोध - सुपिना।

उपज - भट्ट अर भंगुलो।
योजना - कैकी मौ फुकलो।
उद्योग - जागर, साबर, पतड़ी।
जीवन - यख बटे वख तैं टिपड़ी।
व्यंजन - खूंतड़ों अर बाड़ी।

कारिज - ब्या, बर्शी, सप्ताह।
प्रीतिभोज - बखरी अर बोतल।
पंचैत - कल्यो की कंडी, भाते तौली।
राष्ट्रीय पदक - अग्यल पट्टा, पिन्सन पट्टा, कुकर फट्टा।

बचपन - कोठयूं मा।
जवनी - पलटन, दफ्तर, होटल।
बुढ़ापा - गौल्यूं फर, चुलखंदयूं फर।
आशीर्वाद - भभूते चुंगटी।
वरदान - फटगताल, नि ह्वे, नि खै, नि रै, घार बौड़ी नि ऐ।

आयात - खनु, खरबट, मनीऑर्डर।
निर्यात - छवाड़ बटे छवाड़ तैं बाई और्डर।

शुभ कामना
भगवान सबु तैं
यशवान, धनवान,
बलवान बणों
पर मी से बकै ना।

फक्कड़ कवि श्री कन्हैयालाल डंडरियाल जी की एक रचना।

16 April, 2018

शुक्रिया कहना मां


आशीष जोशी ने अपनी वॉल पर एक हृदय विदारक कविता शेयर की है। रचनाकार के बारे में वह नहीं जानते पर अंग्रेजी में लिखी गई उस कविता ने कई बार रुला दिया। अपनी सीमित क्षमता के हिसाब से मैंने हिंदी अनुवाद किया है - हृदयेश जोशी

मां
घोड़े घर पहुंच गये होंगे
मैंने उन्हें रवाना कर दिया था
उन्होंने घर का रास्ता ढूंढ लिया ना मां
लेकिन मैं खुद आ न सकी

तुम अक्सर मुझे कहा करती
आसिफा इतना तेज न दौड़ा कर
तुम सोचती मैं हिरनी जैसी हूं मां
लेकिन तब मेरे पैर जवाब दे गये
फिर भी मैंने घोड़ों को घर भेज दिया था मां

मां वो अजीब से दिखते थे
न जानवर, न इंसान जैसे
उनके पास कलेजा नहीं था मां
लेकिन उनके सींग या पंख भी नहीं थे
उनके पास ख़ूंनी पंजे भी तो नहीं थे मां
लेकिन उन्होंने मुझे बहुत सताया

मेरे आसपास फूल, पत्तियां, तितलियां
जिन्हें मैं अपना दोस्त समझती थी
सब चुप बैठी रही मां
शायद उनके वश में कुछ नहीं था

मैंने घोड़ों को घर भेज दिया
पर बब्बा मुझे ढूंढते हुये आये थे मां
उनसे कहना मैंने उनकी आवाज सुनी थी
लेकिन मैं अर्ध मूर्छा में थी
बब्बा मेरा नाम पुकार रहे थे
लेकिन मुझमें इतनी शक्ति नहीं थी
मैंने उन्हें बार-बार अपना नाम पुकारते सुना
लेकिन मैं सो गई थी मां

अब मैं सुकून से हूं
तुम मेरी फिक्र मत करना
यहां जन्नत में मुझे कोई कष्ट नहीं है

बहता खूंन सूख गया है
मेरे घाव भरने लगे हैं
वो फूल, पत्तियां, तितलियां
जो तब चुप रहे
उस हरे बुगियाल के साथ यहां आ गये हैं
जिसमें मैं खेला करती थी
लेकिन वो.. वो लोग अब भी वहीं हैं मां

मुझे डर लगता है
ये सोचकर
उनकी बातों का जरा भी भरोसा मत करना तुम
और एक आखिरी बात
कहीं भूल न जाऊं तुम्हें बताना मैं
वहां एक मंदिर भी है मां
जहां एक देवी रहती है
हां वहीं ये सब हुआ
उसके सामने
उस देवी मां को शुक्रिया कहना मां
उसने घोड़ों को घर पहुंचने में मदद की

(अंग्रेजी में मूल कविता लिखने वाले का नाम पता नहीं है)

02 April, 2018

उत्तराखंड में आज भी जारी है ‘उमेश डोभालों’ की जंग


सत्तर के दशक में गढ़वाल विश्वविद्यालय का मेघावी छात्र उमेश डोभाल कलम के चश्के के कारण घुमन्तू पत्रकार बन गया। पीठ पर पिठ्ठू लादे दुर्गम पहाड़ों की कोख में समाये गांवों-कस्बों की धूल छानता, भूख-प्यास से बेखबर, धार-खाल की छोटी सी दुकान, खेत, घराट, धारे और दूर डांडे से घास-लकड़ी लाते पुरुषों और महिलाओं से बतियाते हुए वह वहीं बैठे-बैठे अखबारों और पत्रिकाओं के लिए गहन-गंभीर रिपोर्ट बनाता था।

एक लंबे झोले में डाक टिकट, लिफाफे, डायरी, गोंद, पेन-पेन्सिल और सफेद कागज तब उसकी बेशकीमती दौलत हुआ करती थी। वह इसी साजों-सामान को कंन्धों पर लटकाये महीनों यायावरी में रहता था। इस नाते वह चौबीसों घन्टों का पत्रकार था। पर पत्रकारिता, उसके लिए मिशन थी, व्यवसाय नहीं।

उमेश डोभाल ने पहाड़ और पहाड़ी के हालातों पर बेबाक लिखा। विशेषकर पहाड़ी जनजीवन के लिए आदमखोर बने शराब माफिया के नौकरशाह और राजनेताओं से सांठगांठ के झोल उसने कई बार उतारे। जनपक्षीय पत्रकारिता के खतरों को बखूबी जानते हुए भी वह कभी डरा और डिगा नहीं। 25 मार्च, 1988 को पौड़ी में उसके अपहरण और बाद में हत्या का यही कारण था कि वह शराब माफिया और प्रशासन की मिलीभगत पर नई रिपोर्ट लिखने वाला था।

उमेश की हत्या के बाद पहाड़ की जनता ने शराब माफिया और सरकार के खिलाफ एक लंबी स्वस्फूर्त लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई में पत्रकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, वैज्ञानिक और छात्रों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। यह आंदोलन तब के दौर में उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर प्रदेश और देश के अन्य क्षेत्रों में लम्बे समय तक गर्म रहा। परंतु चौंका देने वाली बात यह थी कि इस शराब विरोधी लड़ाई के खिलाफ शराब माफिया का जबाबी आंदोलन भी सड़कों पर उतरा। जिसने अस्सी के अन्तिम वर्षों में शराब माफिया के खौफनाक इरादों और उसकी राजनैतिक पकड़ की मजबूती का सरेआम पर्दाफाश किया था।

उमेश के जाने के 30 सालों बाद आज की तारीख में उत्तराखंड में उस जैसे पत्रकार तो न जाने कहां दफन हो गये हैं, पर हां शराब तंत्र जरूर तगड़ा हुआ है। उमेश के समय में राजनैतिक संरक्षण में शराब माफिया पनपता था। वर्तमान में शराब माफिया के संरक्षण में राजनैतिक तंत्र पनाह लिये हुए है। आज उत्तराखंडी जनजीवन में शराब का कारोबार कानून सम्मत और सामाजिक स्वीकृत की ताकत लिए हुए है।

तब से अब तक बस इतना सा फर्क हुआ है कि तब शराब चुनिंदा लोगों की आय का जरिया थी, आज शराब ही सरकार की आय का मुख्य जरिया है। आज उत्तराखंड में शराब न बिके तो सरकार की अकड़ और पकड़ को धड़ाम होने में कोई देरी थोड़ी लगेगी।

हम सालाना उमेश डोभाल स्मृति समारोह मना रहे हैं, तो दूसरी ओर शराबतंत्र के लिए उत्तराखंड में रोज ही उत्सव है। उत्तराखंड राज्य की विकास की गाड़ी उसी के बलबूते पर फर्राटा मार रही है, बल। वैसे ये कोई कहने वाली बात, ठैरी। सभी जानते हैं।

आलेख- अरुण कुकसाल

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