Tuesday, April 17, 2018

हमरु गढ़वाल

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कवि श्री कन्हैयालाल डंडरियाल
खरड़ी डांडी
पुन्गड़ी लाल
धरती को मुकुट
भारत को भाल
हमरु गढ़वाल

यखै संस्कृति - गिंदडु, भुजयलु, ग्यगुडू, गड्याल।
सांस्कृतिक सम्मेलन - अठवाड़।
महान बलि - नारायण बलि।
तकनीशियन - जन्द्रों सल्ली।
दानुम दान - मुकदान।
बच्यूं - निरभगी, मवरयूं - भग्यान।

परोपकारी - बेटयूं को परवाण।
विद्वान - जु गणत के जाण।
नेता - जैन सैणों गोर भ्यालम हकाण।
समाज सुधारक - जैन छन्यू बैठी दारू बणाण।
बडू आदिम - जु बादीण नचाव।
श्रद्धापात्र - बुराली, बाघ अर चुड़ाव।

मार्गदर्शक - बक्या।
मान सम्मान - सिरी, फट्टी, रान।
दर्शन - सैद, मशाण, परी, हन्त्या।
उपचार - कण्डली टैर, जागरदार मैर, लाल पिंगली सैर।
खोज - बुजिना।
शोध - सुपिना।

उपज - भट्ट अर भंगुलो।
योजना - कैकी मौ फुकलो।
उद्योग - जागर, साबर, पतड़ी।
जीवन - यख बटे वख तैं टिपड़ी।
व्यंजन - खूंतड़ों अर बाड़ी।

कारिज - ब्या, बर्शी, सप्ताह।
प्रीतिभोज - बखरी अर बोतल।
पंचैत - कल्यो की कंडी, भाते तौली।
राष्ट्रीय पदक - अग्यल पट्टा, पिन्सन पट्टा, कुकर फट्टा।

बचपन - कोठयूं मा।
जवनी - पलटन, दफ्तर, होटल।
बुढ़ापा - गौल्यूं फर, चुलखंदयूं फर।
आशीर्वाद - भभूते चुंगटी।
वरदान - फटगताल, नि ह्वे, नि खै, नि रै, घार बौड़ी नि ऐ।

आयात - खनु, खरबट, मनीऑर्डर।
निर्यात - छवाड़ बटे छवाड़ तैं बाई और्डर।

शुभ कामना
भगवान सबु तैं
यशवान, धनवान,
बलवान बणों
पर मी से बकै ना।

फक्कड़ कवि श्री कन्हैयालाल डंडरियाल जी की एक रचना।

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