बसन्त ~ BOL PAHADI

12 August, 2010

बसन्त



बसन्त
हर बार चले आते हो
ह्‍यूंद की ठिणी से निकल
गुनगुने माघ में
बुराँस सा सुर्ख होकर

बसन्त
दूर डांड्यों में
खिलखिलाती है फ्योंली
हल्की पौन के साथ इठलाते हुए
नई दुल्हन की तरह

बसन्त
तुम्हारे साथ
खेली जाती है होली
नये साल के पहले दिन
पूजी जाती है देहरी फूलों से
और/ हर बार शुरू होता है
एक नया सफर जिन्दगी का

बसन्त
तुम आना हर बार
अच्छा लगता है हम सभी को
तुम आना मौल्यार लेकर
ताकि
सर्द रातों की यादों को बिसरा सकूं
बसन्त तुम आना हर बार॥

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

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