07 September, 2019

अरे! यु खाणू बि क्य- क्य नि कराणू! (गढ़वाली व्यंग्य)

नरेन्द्र कठैत // 

खाणू जैका हथ मा आणू, दुन्या मा वी राणू। अर जैका हथ मा खाणू नि आणू, वू रोणू, गंगजाणू। पर जु खाणू, वू खैकि तागत अजमाणू, खयां मा बि हौर हत्याणू, बच्यूं-खुच्यूं गंमजाणू, गबदाणू, खपाणू, मर्जी औणी हौर्यूं खुणी बि लि जाणू। कबि इन बि सुण्ण मा आणू कि मनखी खाणू त खूब खाणू पर वेकु खयूं झणी कख जाणू? अर कबि बल खाणू त खाण चाणू पर खाणू वेका गौळा उंद नि जाणू। कबि इन बि ह्वे जाणू कि खलौण वळा तैं अण्दाज हि नि आणू किलैकि खाण वळो त मिस्ये जाणू पर कथगा खाण न वू बताणू न बिंगाणू। इन मा यि होणू कि खाणू बणौण वळो थकी चूर ह्वे जाणू पर खाण वळो  खाब खताड़ी रै जाणू। अर कबि इन बि होणू कि खै-खैकि वेकि धीत नी भ्वरेणी, वू बल अधीतू रै जाणू। 

बक्किबात खयां खाणू मा बि बल वेकु च्यूं खाणू ज्यू जाणू।  कबि  खाणू त खूब ठूस ठासी खुब्याणू पर वे पचाण हि नि आणू। तब बल उंद-उब होणू। कति दौं त जथगी दौं खाणू उथगी दौं भैर उक्याणू। कबि खै-खैकि अस्यो-पस्यो, पीड़न जख-तख लमडाणू। आतुरि मा प्वटगी पर कबि कडु तेल अर कबि चुल्लौ खारु लगाणू। भैर-भित्र दिवाल्यूं पकड़ि-पकड़ी बड़ि मुस्कल मा आणू-जाणू। पर मजाल क्या कि कक्खि उठुण-बैठण मा वे घत्त आणू। जब बि कबि वे क्वी पुछणू-तछणू -दिदा! कनू च सरेल? क्या च होणू? जबाब देंद दौं सब्द वेका गौळों  पर रै जाणू। ब्वनू क्य इन बोला गबळाणू। गबळ्यूं कैकि समझ मा बि नि आणू। होंद-कर्द तैं कुपथन वू घपनाघोर बिमार प्वड़ जाणू। तुमारु ले बोल! कख छौ तब चौबिस घड़ि बस खाणू! खाणू! खाणू!

क्य ह्वे? कन ह्वे? क्य होणू?
बिमार च बल! इन सुण्ण मा आणू। हे वीं! तू सुणणी छै! चुची! सुख मा जावा चा नि जावा पर दुख मा खबर कनू जरुर जाणू। यि सोची तैं खबर लेणू हर क्वी वेका ओर-पोर गर्र कट्ठा होणू। छुटू-बडू वे पर अपड़ि सलाऽ अजमाणू। अलाणू डागडर, बैद फलोणू, ज्वी मिलणू वे मा हि वू अपड़ि नब्ज-नाड़ी दिखाणू। कक्खि बल वेकु छंद प्वड़णू, कक्खि समझ मा हि नी आणू। पर मर्द कु बच्चा वू बि चुप कख राणू। आपस मित्र्वी सौ-सलाह पर दवै मंगाणू, किस्म-किस्मै जड़ि-बोट्यूं घोटणू, तौं चबाणू, थैंचणू, खाणू। पर इथगा पर्बि वे बिस्वास जमा नि होणू। खट्टी-मिट्ठी दवयूंन वे जादा हि बैम होणू। पीठ पैथर हर क्वी ब्वनू- वे तैं कैन समझाणू!  वू त अपड़ा बुबै बि नि माणू। अरे फूका क्य! हमारा बुबो क्य जाणू! परेज मा त वेन अफु राणू। हमारि भौं वू खूब होंदू चा नि होंदू। तुम हि बतावा दवै कु असर क्य चटचटाक होंदू? सुद्दि क्या! बस एक ही काम जाणी खाणू! खाणू! खाणू!

ठीक ब्वना छन लोग, वे तैं कैन समझाणू। स्यो च बिराणी मत्यू बक्यों मा बि जाणू। भित्र देबी-द्यब्तौं कु ब्यांरु वू भैर अला-बला मा सारु खुज्याणू। झणी कै-कैकि धात-जैकार, छौळ-झपेटू पुजाणू। मी छौं! मी छौं! जैकु नौ कबि नि सूणी वू बि नाचि-नूची, हमारा मुंड मा खुटू धर जाणू। 

अरे दिदा! बक्यो काम क्या? सीधी सि बात बकै लगाणू। वेन बि झाड़-झपोड़ मा पैथर क्यां खुणी राणू? कुछ खाण वेन, कुछ खडयाणू। ज्वी आणू वी मजा मा पान चबाणू। बीड़ी, सिगरेटौ धुंवा उड़ाणू। लगोठ्या-बोगड्या, काळा सफेद मुरगौं कटवाणू। अरे बक्या बुबौ क्य जाणू। वेका हि सोरा-भार्यूं अर चच्ची-बोड्यूं कि घात उबडाणू। क्वी भलू माणू चा बुरु, सुरु बिटि आखिर तक हमतैं त एक हि ऐटम नजर आणू। खाणू! खाणू खाणू! 

अर सुणा त सहि ! यि बि सुण्ण मा आणू कि बक्यो इलाज बि वेकि समझ मा नि आणू। अब मनै गेड़ खुलवाणू वू कति जोस्यूं मा आणू-जाणू। पर जोस्यूं का पतड़ौं मा बि बल वेकि किस्मत मा खाणू हि खाणू आणू। हर क्वी पतडु यि बताणू कि वेन सौ साल ऐथर तक जाणू, खूब होणू अर खूब खाणू राणू। यिं बात सूणी तैं वेकु एक पौ हौर खून बढ़ जाणू। मालु म नि झणी कै द्यब्ते किरपन वू टकटुकु होणू। अर फेर एक हि रट लगाणू- खाणू! खाणू! खाणू। 

ऐंचै लैन पढ़ी तैं त यी लगणू कि मनखी सर्रा जिन्नगी बस खाणू हि खाणू!  पर जैकि किस्मत मा जथगा ह्वलू वेन उथगि त खाणू। अमर त न कैन होणू न कैन राणू। इलै कबि इन बि होणू कि क्वी मनखी खूब कमाणू, जोड़-जाड़ जाणू पर अपड़ि उमर खै नि जाणू। 

अर कबि इन बि दिख्ण मा आणू कि जनि गफ्फा वेका गिच्चा पर जाणू तबार्यूं वे खुणी फट जमराजौ बुलावा ऐ जाणू। खाणू छट्ट छुटी तैं वेका गौळै  पर रै जाणू। तबारि देखी इन लगणू जन अन्न भ्वर्दि दौं क्वी माणू बीच मा हि पट्ट बंद ह्वे जाणू। अर कति दौं इन बि होणू कि मनखी खाणू त खाण चाणू पर वेकू कंठ ऐन मौका पर म्वर जाणू। आंखा ताड़ा, हथ-खुट्टा ऐड़ा, सर्रा सरेलौ खून चस्स चुस्येकि वू मड़के जाणू। सीन देखी समणा वळो  हकदक रै जाणू। तथगा पर्बि बि अब क्य होणू! जु कबि स्वचेंदू नि वू ह्वे जाणू। ब्वल्द-बच्योंद, हिटदा -हिटदि बि मनखी उखरै जाणू। फिर्यूं रै जाणू बिचारौ तैं खाणू!

हे रां! जाण वळों  बिचारु त जमराजा पैथर झणी कख जाणू पर बाद मा वेकु सरु कमायूं धमायूं क्वी न क्वी कन नि खाणू। तुमारु ले बोल! जाण वळों त चल्गी आखिर कब तक रोणू-बिबलाणू? बच्यां छन जु वून कन नि राणू, कन नि खाणू। 

पर हमारि समझ मा यू किलै नि आणू कि जु मनखी खाणू वू बि जाणू अर जु नि खाणू वू बि नि राणू। यिं बात तैं ज्ञानी-ध्यानी हर क्वी इन बतलाणू कि आणू -जाणू न कबि मनख्या बस मा छौ न कबि  मनख्या हथ मा राणू। त क्य एक ही ऐटम च ज्यां का पैथर मनखी रगर्याणू। वो च - खाणू! खाणू अर खाणू!

खाणू! खाणू अर खाणू! पर इन नि स्वच्यां मनखी अपड़ो धरम-धुरम नि निभाणू। जरा बता! रात-दिन लंगर वू क्यां खुणी लगाणू? बड़ा-बड़ा मात्मौं, गरीब गुरबौं, छुटा नौनौं, कन्यों जिमाणू। पर स्वच्ण वळि  बात त या च कि जु खाणू वू खलाणू क्य वे तैं वू उपजाणू? लंगर त बल वू रुप्यों का बल पर च लगाणू। सुणणू तैं त यू बि सुण्ण मा आणू  कि  वू बि कै हैंकै मूणी मा च खाणू।  कौन सि वू सबि भूखा, नंगौं पकड़ि-पकड़ी लाणू। वेन त दुन्या तैं लंगर लगांयू दिखाणू। वेकि भौं क्वी खाणू चा नि खाणू।

खाणू बि हर कैका भाग मा कख राणू? जै नि मिलणू खाणू वू आज बि भूखन म्वर जाणू। भूख क्या होंदि वां तैं त भूखू हि जाणू कि भूख मिट्ठी होंदि कि खाणू? पूछा कबि कै भूखा तैं? पुछुण मा क्या जाणू? जबाब मिल जालू- खाणू त आंख्यूं का ऐथर घुमणू। मिल जालू अगर त भूखौं रोस खाणन दब जाणू। भूख मिठी कि खट्टी वीं दिखणू को जाणू?
यनैकि कि भूख सि भौत बड़ि चीज च - खाणू!

खाणू! खाणू! खाणू! पर बरतै पैली सर्त च भूखू राणू, खाणू नि खाणू। नहे-धुये कि सीधू मंदिर जाणू। ध्यान कनू य घंटी बजाणू। पर छैं च क्वी जु यिं सर्त निभाणू? कुजाणी-कुजाणी तब तांकि परमेसुर हि जाणू कु खाणू अर कु नि खाणू? 
एक दिन खाणू खांद-खांद क्वी छौ समझाणू- भुला! मैमान बणी कबि कैका यख नि जाणू।
हमुन जबाब दे -किलै जी मैमान त भगवान होंदू।
-भगवान वो अपड़ि मौ होंदू। 
-अरे एक-द्वी दिन खलौण मा क्य जांदू? 
-हैंका दिन त रुसाड़ा मा बि हर क्वी भांडू एक हि ढौळ लगांदू।
-क्या ढौळ लगांदू?
-कि स्यू किलै नि जाणू? स्यू किलै नि जाणू?
-सूणी तैं क्य वू चल जाणू?
-बिल्कुल जाणू।
-अर खाणू?
-अगनै जख वेकि किस्मत ह्वलि वख ह्वलू वू खाणू।

हरि ओम ! हरि ओम ! 
-नमो नारैण! नमो नमो!
-मात्मा जी क्या च होणू?
-बच्चा! क्य होणू? हांडी चढ़ीं च। चेला खाणू बणोणू।
-मात्मा जी! एक सवाल मी मनख्यूं कि तिरपां बिटि पूछुण चाणू! अगर तुमारि इजाजत मिलू।
-पूछो बच्चा! जो पुछणा है पूछो?
-मात्मा जी! सवाल यो च कि मनखी जब यिं धरती मा आणू वू खाणू हि किलै खुज्याणू? वू पाणी प्येकि य हवा खैकि किलै नि रै जाणू?
-बच्चा जब मनखी खाणू च तब हि त वू बच्यूं राणू।
-बच्यूं क्यां खुणी राणू?
-हमारु क्य हमतैं त कुछ  न कुछ मिल हि जाणू। पर वे पूछादि जु आखिर तक खाणै आस मा भूखन म्वर जाणू।
-वू किलै म्वर जाणू?
-इलैकि य त खाणू नि राणू य वू खाण त चाणू पर वेका पेट मा खाणू नि जाणू। 
-अच्छा एक बात हौर बता मनखी बच्यूं राणू तब बि खाणू अर नि बच्यूं राणू तब बि वेका ऐथर खाणू हि किलै आणू?
-किलैकि  एक ही चीज च जु मनखी  बचाणू। वेकु नौ च- खाणू!  देखली जोगी ह्वेकि बि हमुन मंगणू जाणू। क्यांकू?
-समझ ग्यों! बस-बस समझ ग्यों - खाणू!

खूब छयां भैजी! खूब चलणी च गिरस्थी? 
-बस सौब प्रभ्वी किरपा च।
-भैजी एक बात बतावा दि! मनखी खाणू तैं आणू अर म्वरु न इलै वू खाणू। मलब यि कि मनखी फकत टिक्णू तैं खाणू। बक्कि दुन्या मा वू क्य फरकाणू?
-कन क्य फरकाणू? वेकि कुटुम्बदारि क्य क्वी हौरि खलाणू?
-कुटुम्बदारि तैं बि त वू खाणू हि त खलाणू।
-नौनौ अढ़ाणू-पढ़ाणू!
-नौनौ तैं बि वू इलै हि त अढ़ाणू-पढ़ाणू कि वून अगनै जैकि कनक्वे खाणू। तुमतैं मालुम तन मा क्य होणू?
-क्य होणू?
-तन मा यु होणू कि अढ़ायूं-पढ़ायूं त सौब काम ऐ जाणू पर कुटळो चलाणू, गैंती-सबळो  उठाणू, घौण बजाणू, हौळ  लगाणू  कै तैं बि नि आणू। 
-देखा जी  क्वी आणू चा जाणू, कैका बांठा क्वी क्य लिजाणू।
-पर सवाल चो च कि मनख्यू खयूं क्य काम आणू?
-जब मनखी खाणू तब हि त वो अपड़ा हथ खुटौं हिलाणू। पुछणै त वे पूछादि जु सुदिद खड़ा-खड़ी खाणू पचाणू।
-को च वू सुदिद खड़ा-खड़ी  खाणू पचाणू?
-जै सुदिद खाणू मिल जाणू?
-जन्कि इबारि तुमारि नजर मा कू आणू?
-जन्कि स्यू डाळू  ! 
-डाळू  ! वू क्या खाणू?
-अब तांकि तुम जाणा य स्यू डाळू  जाणू।

डाळू  तड़तुडु  झपन्याळु खडु । सोची अगर ये कुछ पुछलू त कुछ न कुछ कन नि समझालू। भै! य त वू कुछ ब्वलू य चुप रालू। क्या पता अपड़ि फौंकी-फांक्यूं हिलालू। सेर-बाघ जन धम्म खाणू त नि आलू। नजीक जैकी डाळू  पूछी- दिदा! सच-सच बतौ तू क्य छै खाणू?

-खाणू! त्यरा बुल्यां पर त मी हैंसणू बि नि आणू। सच बतलौं! मी बुरै कि मौ छौं खाणू! अरे! दिखणां नि छै सर्रा जिन्नगि भर मी एक हि जगा मा रै जाणू। न म्यरु कक्खि आणू न जाणू। जु भुयां माटा मा छुट जाणू वू म्यरु खाणू। वा रै मनख्या लड़ीक वे झड्या-तड़या पर्बि तू नजर लगाणू। आखिर ये मनखिन य दुन्या लेकि कख जाणू?  

-हमतैं परमेसुरा खुटा दियां छन जी! हमुन त जख मर्जी आलि तख जाणू। पर तू बतौ एक हि जगा मा बैठि-बैठी त्यरु खयूं क्य काम आणू?

-वा रे मनखी! यि बात तैं तू मी पुछणू? तू त म्वरि तैं बि कुछ  काम नि छै आणू? क्वी त्वे खडै जाणू, क्वी फूक जाणू। एक दिन बि क्वी त्वे भित्र नि रखणू। म्यरु त ज्यूंदा मा बि अर म्वरि बि लीसू-छिलबिटू तक काम आणू। पर त्वे कैन समझाणू। तू त ज्यूंदा मा बि मी चुंगन्याणू, म्यरा फल बीज छै खाणू। म्यरा धोरा धरम बैठी थौ बिसाणू, ठण्डी हवा खाणू । फिर्बि त्यरि हथ्यूं कु चैन नी, जख मर्जी औणी तख छै कच्याणू। अर कति दौं तू इथगा पर्बि चुप नि होणू। मी पर धम्म आग छै पिलचै जाणू। न हथ, न खुट्टा, आखिर मिन कख जाणू? त्वी बतौ क्य छौं मी त्यरु खाणू? इलै हि त ब्वलेंदू कि तू धरती मा बोझ बढ़ाणु छै आणू। 

-त धरती मा क्य मनखिन नि राणू?
-किलै नि राणू! पर य बात त्वे तैं कैन समझाणू कि जथगा मिलणू च उथगी मा खुस राणू। आखिर मा सौब इक्खि छुट जाणू। कुछ नि लिजाणू। जन नंगू आण तनि नंगू जाणू। बस एक ऐटम च बल जु त्यरा बांठौ रै जाणू।

-क्या रै जाणू?
-खाणू!

(लेखक गढ़वाली भाषा के सशक्त व्यंग्यकार हैं।)

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-09-2019) को    "सोच अरे नादान"    (चर्चा अंक- 3453)   पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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