Tuesday, February 28, 2012

भाषाई विरासत को बचाना बड़ी चुनौती

धाद : लोकभाषा एकांश द्वारा आयोजित  ”आखिर कैसे बचेंगी लोकभाषाएं  ” व्याख्यान माला-4

समाज और सरकार दोनों स्तरों पर उत्तराखंड की लोकभाषाओं की निरन्तर अनदेखी होती रही है जिसका नतीजा है के कुमाऊंनी और गढ़वाली दोनों भाषाएं अपने मूल से कटने लगी हैं। मौजूदा वक्त में भाषायी विरासत को बचाये रखना एक बड़ी चुनौती है। ये बातें सामने आईं देहरादून में हुए एक संगोष्ठी में। अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर धाद : लोकभाषा एकांश की ओर से “आखिर कैसे बचेंगी लोक भाषाएं ” व्याख्यान माला – 4 के तहत ये आयोजन किया गया था। प्राथमिक शिक्षा  में लोक भाषाओं की प्रासंगिता' विषय पर ये संगोष्ठी राजेश्वर नगर सामुदायिक केंद्र , सहस्रधारा रोड में आयोजित की गई थी।

हिमालयी  लोकभाषाओं पर शोधकर्ता डाo कमला पन्त ने मुख्य वक्ता के रूप में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि हमारी लोकभाषाओं में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो अन्य भाषाओं में नहीं हैं | आज के वैश्विकरण के दबाव  में इन भाषाओं पर मंडरा रहे खतरे के प्रति हमें सजग होकर अपनी मातृभाषाओं के विकास  के लिये  इस रचनात्मक आन्दोलन  को आगे बढ़ाना चाहिए  |

धाद के संस्थापक लोकेश नवानी ने आधार वक्तव्य देते हुए कहा कि उत्तराखंड भारत का भिन्न भाषायी क्षेत्र है जिसमे गढ़वाली और कुमाउनी दो प्रमुख लोक भाषाएं हैं परन्तु समाज और सरकार दोनों स्तरों पर उत्तराखंड कि लोकभाषाओं कि निरन्तर अनदेखी होती रही है | फलतः ये भाषाएं अपने मूल से कटने लगी  हैं| आज भाषायी विरासत को बचाने एवं उसके विकास के उद्देश्य से धाद ने लोकभाषा आन्दोलन का सूत्रपात किया है |

मातृभाषा दिवस की पूर्व संध्या पर आदित्य राम नवानी लोकभाषा साहित्य सम्मान से सम्मानित एवं ‘ उत्तराखंड खबर सार ‘  के सम्पादक श्री विमल नेगी ने  यूनेस्को की  एक भाषा रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा की दुनिया में 96 % लोग 4 % भाषाओं को बोलते हैं और ठीक इसके उलट 96 % भाषाओं को 4 % लोग ही बोलतें हैं | इससे स्पष्ट है की बड़ी भाषाएं छोटी भाषाओं को हजम करने में लगीं हैं |
धाद के केंद्रीय समन्वयक श्री तन्मय ममगाईं ने कहा की हाल  ही मैं प्रथम संस्था द्वारा जारी कि गयी असर 2011 की रिपोर्ट बताती है की उत्तराखंड की लगभग 67 प्रतिशत विद्यार्थियों  की स्कूली भाषा और मात्रभाषा भिन्न है इसलिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या के अनुसार  लोकभाषाओं को प्राथमिक शिक्षा का हिस्सा बनाने की बात अविलम्ब प्रारंभ होनी चाहिए।

धाद लोकभाषा एकांश के सचिव श्री शांति प्रकाश ज़िज्ञासु ने व्याख्यान माला  की रुपरेखा श्रोताओं  के सम्मुख रखते हुए  कहा की प्राथमिक,माध्यमिक एवं विश्वविद्यालय स्तर पर लोकभाषाओं को उचित स्थान दिलाने ले लिये एक संगठित भाषायी आन्दोलन की आवश्यकता है |

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डाo कुटज भारती ने कहा की वस्तुतः  धाद का लोकभाषा आन्दोलन चतुर्मुखी  है | हमें स्वयं परिवार के बीच अपनी मातृभाषाओं में संवाद को प्राथमिकता देनी होगी तथा समाज को उसके मूल्यों के प्रति जागरूक करना होगा | संगोष्ठी को अन्य वक्ताओं ने भी संबोधित किया  जिनमें  आदित्यराम  नवानी लोकभाषा सम्मान से नवाजे गए डाo हयात  सिंह  रावत (सम्पादक  :  पहरू ,अल्मोड़ा), कवि जगदीश जोशी (कालाढूंगी,नैनीताल), युवा कवि गीतेश सिंह नेगी (मुंबई), डाo राजेन्द्र बलोधी  (देहरादून) आदि प्रमुख थे। कार्यक्रम का संचालन लोकभाषाविद डाo  अरविन्द गौड़ ने किया | साहित्यकार तोताराम ढौंढीयाल ने आमंत्रित अतिथियों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया|

कार्यक्रम में अनेक बुद्धिजीवियो, कलाकारों एवं साहित्यकारों ने शिरकत कि जिनमे ख्याति प्राप्त रेखा चित्रकार बी.मोहन नेगी (पौड़ी), गणेश वीरान (पौड़ी), नवीन नौटियाल, जीतेन्द्र जुयाल, कवियत्री बीना कंडारी, दिनेश कुकरेती (कोटद्वार), कवि धनेश कोठारी (ऋषिकेश), बी.बी.एस. रावत (कोटद्वार), रणजीत सिंह पायल, श्रीमती कमला टम्टा, शूरवीर सिंह नेगी, कृष्ण चन्द्र उनियाल, डी.एस.डोभाल, शैलेन्द्र भंडारी, विन्नी उनियाल, एन.के.शाह, धीरेन्द्र गाँधी, आर.के.ध्यानी, सतेन्द्र रावत आदि मुख्या श्रोता कार्यक्रम में उपस्थित थे । 
- तन्मय ममगाईं

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