Saturday, August 04, 2018

ग़ज़ल (गढ़वाली)


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दिनेश कुकरेती (वरिष्ठ पत्रकार) -

जख अपणु क्वी नी, वख डांडा आगि कु सार छ भैजी,
जख सौब अपणा सि छन, वख भि त्यार-म्यार छ भैजी।

बाटा लग्यान नाता-पाथौं तैं, कुर्चिऽ सौब अपणि रौ मा,
जै परैं अपण्यास सि लगद, ऊ भि ट्यार-ट्यार छ भैजी।

सच त ई छ कि सिरफ दिखौ कीऽ, छपल्यास रैगे अब,
भितरी-भितरऽ जिकुड़्यों मा, सुलग्यूं अंगार छ भैजी।

जौं तिबरी-डंड्ळयों उसंकद छोड़ी, धार पोर ह्वै ग्यां हम,
सुणदौं कि अब ऊंकी जगा, सिरफ खंद्वार छ भैजी।

ब्याळ स्वीणा मा दिख्ये झळ, अर दिख्येंदी हर्चिग्ये।
कन बिसरुलु वीं तै, जिकुड़ि मा बसिं अन्वार छ भैजी।

खीसा देखी त, क्वी भि अपणु बणि जांद परदेस मा,
जु तुम द्यखणा छा मुखिड़ि परैं, झूठी चलक्वार छ भैजी।

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