Monday, August 06, 2018

उत्तराखंड में राजनीतिक महत्वाकांक्षा का फ्रंट !

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धनेश कोठारी -
उत्तराखंड की राजनीति नई करवट बदलने को है। इसबार जिस नए मोर्चे की हलचल सामने आई है, उसकी जमीन तैयार करने में कोई और नहीं बल्कि भाजपा और कांग्रेस से बागी व नाराज क्षत्रप ही जुटे हैं। इसलिए राज्य के सियासी हलकों में इस कसरत के मायने निकाले और समझाए जा रहे हैं। कुछ इसे राज्य की बेहतरी, तो कुछ मूल दलों में वापसी के लिए दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं। लिहाजा, ऐसी राजनीतिक पैंतरेबाजी के बीच उत्तराखंड में तीसरे मोर्चे पर चर्चा तो लाजिमी है।

सन् 2000 में नए राज्य उत्तराखंड (तब उत्तरांचल) के गठन के साथ ही सियासी जमीन पर भाजपा और कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय और तीसरी ताकत के तौर पर यूकेडी को सामने रखा गया। 2002 में पहले आमचुनाव में यूकेडी को महज चार सीटें मिलीं। जबकि बसपा के खाते में उससे ज्यादा 07 सीटें रही। 2007 और 2012 में भी वह तीन और एक सीट के साथ चौथे नंबर पर सिमटी। बसपा तब भी क्रमशः 08 व 03 सीटों के साथ तीसरा स्थान कब्जाए रही।
सन् 2007 में भाजपा और 2012 में कांग्रेस की अल्पमत सरकारों को समर्थन देने में यूकेडी ने कतई देरी नहीं की। नतीजा 2017 आते-आते वह खुद जमींदोज हो गई। क्योंकि 2012 में जीते अपने एकमात्र विधायक प्रीतम सिंह पंवार को वह पहले ही पार्टी से बाहर कर चुकी थी।2017 में प्रीतम निर्दलीय ही कामयाब रहे। अब संयुक्त उक्रांद अपनी भूलों को स्वीकार रहा है।

इसी अंतराल में क्षेत्रीय ताकत बनने को बेताब उत्तराखंड रक्षा मोर्चा और उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी भी अस्तित्व में आईं, मगर वह भी भाजपा और कांग्रेस के चुनावी हथकंडों के आगे खुद को साबित न कर सके। रक्षा मोर्चा फिलवक्त गुम है, जबकि उपपा अभी भी जनमुद्दों पर संघर्षरत है। इससे इतर प्रदेश की सियासत में वामपंथी दल भाकपा, माकपा, भाकपा (माले) के अलावा सपा और एनसीपी भी मैदान में रहे।किंतु, वह भी भाजपा-कांग्रेस को खरोंच तक नहीं लगा सके।हरबार वोटों के बिखराव ने कांग्रेस और बीजेपी को ही बारी-बारी सत्ता सुख दिलाया।

अब रही बात नए मोर्चे की, तो अतीत क्षेत्रीय क्षत्रपों के पक्ष में पूरी तरह से कभी नहीं रहा, या कहें कि उत्तराखंड का सियासी गेम प्लान हमेशा बीजेपी-कांग्रेस के बीच ही फिक्स रहा। पिछले दिनों थर्ड फ्रंट को सिरे से ही नकारने वाले भाजपा और कांग्रेस नेताओं के बयान इस ओर इशारा भी करते हैं। पूरे आत्मविश्वास कहते हैं कि तीसरा मोर्चा उनके लिए कोई खतरा नहीं।

दूसरी बात नए मोर्चे की कवायद में जुटे क्षत्रप जनमुद्दों की खातिर सत्ता पर दबाव के लिए तीसरे मोर्चे की बात तो कह रहे हैं, लेकिन उन्होंने प्रस्तावित फ्रंट में गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस दलों को साथ जोड़ने या उनके साथ चलने का संकेत भी नहीं दिया है। उनकी अब तक की बैठकों में इन दलों के समर्थक भी नहीं दिख रहे।

इसलिए, पहली नजर में यह कसरत सिर्फ नए राजनीतिक संगठन बनाने भर की कवायद ही लग रही है।ऐसे में थर्ड फ्रंट जैसी संभावना को इससे जोड़ना शायद जल्दबाजी होगी। प्रदेश की सियासत से वाकिफ लोग तो इस कसरत में सत्ता के लाभों से दूर हुए लोगों की महत्वाकांक्षाओं को छिपा हुआ देख रहे हैं। उनका यहां तक कहना है कि इनमें कब कौन अपने मूल दलों की अंगुलियां पकड़कर उनकी गोदी में बैठ जाए, कहा नहीं जा सकता।

लिहाजा, उत्तराखंड में संभावित तीसरे मोर्चे की हलचल के बीच फिलहाल ‘आगे-आगे देखिए होता है क्या’?

साभार- शिखर हिमालय (हिंदी पाक्षिक) 01 अगस्त अंक

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