Wednesday, December 09, 2015

नई ऊर्जा, नई दिशा और नया आकाश



- धाद लोक वाद्य एवं लोककला संवर्धन स्वायत्त सहकारिता
तुंगनाथ मंदिर में नौबत बजाने वाले लोक-कलाकार मोलूदास के अंतिम क्षणों में हमें जो बात सबसे अधिक आहत कर गई थी, वो एक तरह की अघोषित सांस्कृतिक अश्‍पृश्‍यता थी। केवल 'कृपा' पर जीने की आदत ने उनके परिजनों और उन्‍हीं के समाज में मानवीय सम्‍मान की चाहत को भी कहीं गहरे दफना दिया था। ये सवाल उठा तो, मगर आगे नहीं बढ़ सका। यह भी एक कड़वा सच था कि बहुत फख्र से उन्‍हें लोक-कलाकार कहने वाला समाज मोलूदास को मानवीय संवेदनाओं के अनुसार भी विदाई देने में नाकाम दिखा।

चार बरस बाद जब चार अक्‍टूबर को मोलूदास की पुण्‍यतिथि के आयोजन के मौके पर यह प्रस्ताव आया, कि उत्तराखंड के लगभग सभी सांस्कृतिक आयोजनों के दौरान उन सभी का हाशिए पर रहना- जो कि इसके वास्तविक हक़दार हैं, एक बड़ा सवाल है। लिहाजा, पीढ़ियों से कुछ अद्भुत थापों, तालों की थाती को संजोये रखने वाले ऐसे अनजान लोक-कलावंतों के सामूहिक प्रदर्शन का एक आयोजन हो। जो हाशिए पर रहने की उनकी सदियों पुरानी पीड़ा के बरक्‍स एक सामूहिक अभिव्यक्ति का प्रतीक बन जाए, और ढोल दमाऊ बजाने वाला समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत को जन-जन के बीच गाते हुए जिंदा रख सके। उनका जायज सामाजिक हक और उसके उन्नयन में उनकी हिस्‍सेदारी को तय कर सके।
तब, यह भी तय हुआ कि एक जिम्मेदार संगठन होने के नाते, हमें इसमें अपना योगदान करना चाहिए। विचार के स्तर पर चली रही इस प्रक्रिया की भागीदार रही रामेंद्री मंद्रवाल, जो कि वर्तमान में सहकारिता विभाग में कार्यरत हैं, ने हरसंभव सहयोग का प्रस्ताव दिया। तभी उत्तराखंड के प्रथम अंतरराज्‍य सहकारिता मेले ने इस विचार को नई दिशा दी। प्रस्ताव आया कि उन पहाड़ी कलावंतों की सामूहिक अभिव्यक्ति, उनके सांस्कृतिक श्रम के मूल्य और हक के लिए उन्हे संगठित कर सहकारिता का स्वरुप दिया जाए, और धाद उसमें वैचारिक भूमिका का अदा करे।
.. और इसी के साथ डीसी नौटियाल के प्रोत्साहन और धाद के केंद्रीय अध्यक्ष हर्षंमणि व्यास के आगे बढ़ने के निर्देश के चलते उत्तराखंड में ढोल-दमाऊ की पहली सहकारिता 'धाद लोक वाद्य एवं लोककला संवर्धन स्वायत्त सहकारिता' अस्तित्व में आई। एक सामूहिक आयोजन में लोकेश नवानी ने सभी साथियों को धाद की सदस्यता प्रदान की, और राज्य के प्रथम अंतरराज्‍य सहकारिता मेले के आयोजन में जिन नए क्षेत्रों में सहकारिता के दरवाजे खुलना तय हुआ, उनमें ढोल दमाऊ वादक भी शामिल थे।
देवप्रयाग के श्री ओंकार और स्‍व. मोलूदास के पुत्र अखिलेश के नेतृत्व में गठित सहकार ने जब 'सहकारिता मेले' का स्वागत किया, तो उनका बैनर थामे हुए कल्पना बहुगुणा, किरण खंडूरी, शोभा रतुड़ी, स्वाति डोभाल, अर्चना, रविन्द्र, प्रमोद, भारत, अंजलि भीतर तक आह्लादित थे। और फिर युवा धाद के साथियों के लिए उनका प्रिय मंडाण्‍ लग चुका था। तब धाद की सामाजिक यात्रा में एक नया अध्याय जुड़ गया। एक समतापूर्ण समाज के निर्माण के लिए हमारी संकल्पना की दिशा में बिलकुल नया कदम। उम्मीद है,कि हम सभी साथी इस पहल को एक व्यापक फलक देते हुए, इसे नई दिशा और नई ऊर्जा से एक नया 'आकाश' दे पायेंगे।
आलेख- तन्मय ममगाईं, धाद

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