Thursday, November 19, 2015

..और उम्‍मीद की रोशनी से भर गई जिंदगियां

तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर... दीपोत्सव दीवाली की शाम जब केदारघाटी के आकाश में वो आतिश पहुंची, तो साहित्‍यकार लोकेश नवानी सहसा ही माइक पर ये गीत गाने लगे। उनके भाव ने हमें जाने अनजाने में हमें यह यकीन दे दिया, कि 2 जुलाई 2013 को केदारनाथ आपदा के बाद प्रारंभ हुई हमारी (धाद की) आपदा प्रभावित छात्रों के पुनुरुत्थान के निमित्‍त यह यात्रा अपने संकल्प को पूरा कर पाने की राह में है। राहत कार्यों में जुटे हम लोगों को आपदा प्रभावित छात्रों की शिक्षा में सहयोग करने का ये विचार जिस बातचीत के दौरान आया, उसमें भी हम ये नहीं जानते थे कि ये यात्रा कितनी दूर तलक जा पायेगी, और ये परिस्थितिजन्य सम्बन्ध एक दिन हम सभी को एक गहरे दायित्वबोध से भर देगा।
काशीनाथ वाजपेयी, गजेन्द्र रौतेला और अजय जुगरान जैसे स्थानीय मित्रों के सहारे हमने उन चेहरों को तलाशने की कोशिश की, जिन तक पहुंचा जाना जरूरी था। फिर जब भारत नौटियाल के नेतृत्व मैं और हमारे अध्यक्ष हर्षमणि व्यास के प्रयासों के कारण विभिन्न संस्थाओं और आम समाज का सहयोग मिला, तो ये प्रयास 100 बच्चों तक पहुंचा। उन मासूम चेहरे में वो उल्लास लौटा लाने की जिद जिन्होंने वो भीषण अँधेरा देखा था, हमें बारम्बार केदारघाटी के उन गाँवों तक ले जाती रही। इस बीच कई आयोजन हुए लेकिन वो सभी लोग हमें मिलने आते और एक सकुचाहट और उदासीनता का भाव लिए लौट जाते।
फिर हमारी शोभा दीदी, किरण खंडूरी और विजय जुयाल जी ने उन सभी बच्चों और परिवारों से संवाद बनाने का जिम्मा लिया, तो धीरे-धीरे ये सम्बन्ध मात्र शैक्षणिक सहयोग का न होकर एक रिश्ते में तब्दील होते चले गए। जून 2015 में प्रेम बहुखंडी के विचार से उपजी और लखपत सिंह राणा के सहयोग से आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला निर्णायक साबित हुई। वहां से लौटते वक़्त हमने उन बच्चों और उनकी माताओं के चेहरे में जो उम्मीद और भरोसा देखा वो हमारे जेहन में कहीं गहरे पैबस्त हो गया।
मुंबई कौथिग के दौरान उन बच्चों के सहयोग की सार्वजनिक अपील करते हुए जिन लोगों ने हाथ बढाया, उनमें मोहन काला जी प्रमुख थे। उन्होंने कहा कि वे भी पिछले दो वर्षों से ऐसे 39 बच्चों की शिक्षा को जारी रखने में सहयोग कर रहे हैं और वह इस अभियान में सहयोगी बनना चाहेंगे। उन्होने 11 बच्चों की अतिरिक्‍त जिम्मेदारी लेते हुए कुल 50 बच्चों को सहयोग देना तय किया। तभी यह तय हुआ कि हम कोई सामूहिक कार्यक्रम आयोजित करें। केदारघाटी के अंधेरे को उजाले से भर देने का दीपावली से बेहतर अवसर क्या हो सकता था। हमने सभी 150 बच्चों के साथ सामूहिक दीपोत्सव का प्रस्ताव दिया और काला जी ने सहमति दी।  7 नवम्बर को लखपत भाई के सहयोग से डा. जैकस्वीन नेशनल स्कूल, गुप्तकाशी का आयोजन तय हो गया।
देहरादून से लोकेश नवानी, हर्षमणि व्यास, तन्मय ममगाईं, भारत नौटियाल, तोताराम ढौंडियाल, डीसी नौटियाल, विजय जुयाल, नवीन नौटियाल, हर्षवर्धन नौटियाल, विकास बहुगुणा, शोभा रतूड़ी, किरण खंडूरी, विमल रतूड़ी, अर्चना ग्‍वाड़ी, कोटद्वार से माधुरी रावत, उषा शर्मा, जगमोहन रावत, सम्पूर्णा बिंजोला, बीना सजवान केदारघाटी के निमित्‍त एक उजियाले का संकल्प लिए निकल पड़े।
कार्यक्रम को औपचारिक रूप से प्रारंभ करते समय लगभग सभी बच्चे उपस्थित हो चुके थे। हम सभी ने अपना परिचय दिया और अपना निश्चय दोहराया कि हम इस उजियाले के संकल्प में हिस्सेदार होने आये हैं। कि हम उस अँधेरे को मिटाने के लिए आपके साथ खडे हैं, जो प्रकृति ने इस क्षेत्र को दे दिया था। आयोजन के प्रमुख सहयोगी मोहन काला जी ने कहा कि उन्होंने भी ऐसी ही विषम परिस्थिति में अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष व्यतीत किये हैं और वे उन सभी लोगों के दुःख के साथ खुद को साझीदार पाते हैं। इसलिए इस दीपावली का दीया लेकर सबके बीच आये हैं। उन्होंने कहा कि उम्मीद की लौ भले ही मद्धम हो, लेकिन उसे छोड़ना नहीं चाहिए। एक दिन ये लौ ही वो उजाला लाएगी जिसका हमें इन्तजार है।
धाद महिला सभा कोटद्वार ने आगे कदम बढाते हुए तीन छात्राओं के शैक्षणिक सहयोग का जिम्मा लिया और यूको बैंक एसोसिएशन की तरफ से वीके बहुगुणा ने भी तीन छात्राओं के लिए संकल्प लिया। साथ ही विजय जुयाल जी की पहल पर दस परिवारों को गाय के लिए भी सहयोग दिया गया। 
                 विद्यालय के बच्चों ने दीपोत्सव पर केन्द्रित मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी और फिर सब हाथों में दिए- मोमबत्तियां लिए मैदान की और चल पड़े। आयोजन में विशेष रूप से आमंत्रित 18 ताल नौबत बजाने वाले लोक कलाकार स्व. मोलुदास के पुत्र अखिलेश ने जब ढोल पर पारंपरिक धुन छेड़ी, तो मानो मुनादी हो गयी कि उस अंधेरे के खिलाफ रोशनी की कतारें चल पड़ी हैं। स्कूल का खेल का मैदान रोशनी से भर गया और फिर एक आतिशबाजी छोड़ी गई। दूर आकाश में जाकर जब उसने रोशनी बिखेरी तो मानो घोषणा हो गयी कि अंधेरे की विदाई का वक्‍त आ गया। अब ये घाटी खुशहाली की नई इबारत लिखने को तैयार है। फिर तो फुलझड़ियों और आतिशों का सिलसिला चल पड़ा। छोटे बच्चे, महिलाएं सब रोशनी अपने हाथों में भर लेने को बेताब थे।
अखिलेश का ढोल अपना जाल बुन रहा था। सब घेरा बना कर मंडाण के रूबरू हो गए। उम्र की दहलीज को भूल सब उस माहौल में सराबोर हो चले। सारी से आई महिलाएं झुमेलो गाने लगी, लखपत राणा ने अपना सांस्कृतिक परिचय अपने सधे हुए क़दमों से दिया और माधुरी रावत और सम्पूर्णा बिंजोला के कदम लय में थिरकने लगे। सभी उल्लसित थे, फिर लोकेश नवानी जी ने माइक हाथों में ले लिया और तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर... गाने लगे। वो क्षणिक आवेग था, या कि आयोजन का निर्णायक संबोधन, पर उस गीत का जो भाव उस दिन समझ में आया वो अद्भुत था। इसके साथ ही केदारनाथ आपदा के बाद यहाँ के स्थानीय निवासियों की जिंदगी का संघर्ष आँखों में तैर गया। हमें महसूस हुआ की संभवतः रोशनी से भरा हुआ आकाश... सच में नवानी जी के मुख से अपनी बात कह गया था।
 हमारा अभियान अभी तलक जाने कितने हाथों के सहयोग से यहाँ तक पहुंचा था। हम उन सभी को इन क्षणों में विशेष रूप से आभार प्रकट करना चाहेंगे। ओएनजीसी हिमालयन एसोसिएशन, फ्रैंडस आफ हिमालय दिल्ली, हिमगिरी सोसाइटी, बुंरास यूथ यूनार्इटेड मुंबर्इ, गढ़वाली कल्‍चरल सोसार्इटी गोवा, अनूप नेगी मेमोरियल ट्रस्‍ट देहरादून, देहरादून डिवीज़न इंश्योरेंस एम्प्लाइज एसोसिएशन, मुंबर्इ एजूकेशनल ट्रस्ट मुंबई, डा. विमल नौटियाल, जयदीप सकलानी, शोभा रतूडी, विकास बहुगुणा, डा. स्वदेश बंसल एवं डा. सुशील बंसल, सूमित पूरधानी, शिवाली सेठी, समदर्शी बड़थ्वाल, रेखा डंगवाल, मालादास, बिमल रतूड़ी, अंकिता मैंन्दोलिया और भारतीय जीवन बीमा निगम के साथी सब इस उजाले के भागीदार हैं। हम सब इस उजाले के उत्तरोत्तर फैलते चले जाने की आशा करते हैं, और कामना करते हैं कि कभी कोई अँधेरा फिर इसे न घेर पाए।
रिपोर्ट - तन्‍मय ममगाईं, धाद, उत्‍तराखंड  

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