Wednesday, November 04, 2015

झड़ने लगे हैं गांव

सूखे पत्तों की तरह झड़ने लगे हैं यहाँ के गाँव
उजड़ने लगी है मनुष्यों की एक अच्छी स्थापना
महामारी और बमबारी के बिना
मनुष्यों से रिक्‍त हो जाने के बाद
बचे रह जाएँगे यहाँ केवल
पेड़, पत्थर, पहाड़, नदियां
बदरी-केदार के वीरान रास्ते
अतीत की स्मृतियाँ
पूर्वजों की आत्माओं को भटकाने के लिए
भग्नावशेषों के थुपड़े
चलो ऐसा करें
पहाड़ के गाँवों को पूरी तरह
खाली करें और मैदानों में ले आएँ
देवभूमि को बेऔलाद करने के लिए
वहाँ के कीड़े-मकोड़े भी नहीं चाहते
कि वे वहाँ के क्वूड़ों, पूड़ों और पुँगड़ों में रहें
उन्हें भी चाहिए
देहरादुनी-सुविधाएँ, मायायें और कायाएँ
इसलिए-
महानाद के साथ
मारते हुए एक ऐतिहासिक धाद
कह दो अपने मानवीय चालकों, परिचालकों और
तथाकथित उद्धारकों से-
"जिसके लिए हम लड़े-भिड़े, नपे-खपे
वह राज्य तुम्हारे लिए ही हो गया
तुम्हारा ही हो गया
इसलिए-
तुम्हारी ही तरह सेठ बनने के लिए
अपने गाँवों को मैदानों में
ले जाने के लिए ठनगए हैं हम
रास्ता छोड़ो.....वास्ता तोड़ो!
आने ही वाला है देवभूमि में
विदाई का एक अभिनव मौसम
बजने वाले हैं ढोल-दमौ
सिसकने वाली है पहाड़ की सगोड़ी-पुगंड़ी,
घुघुती, सेंटुली और घेंडुड़ी भी।

कविता- श्री चारूचन्द्र चंदोला

(रुद्रप्रयाग जिले के ग्राम बर्सू, का यह घर उन १२० परिवारों में से किसी का है, जो कुछ समय पूर्व तक यहां रहते थे। अब यह गांव पूरी तरह खाली (जनशून्य) हो चुका है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार राज्य स्थापना से पूर्व जहां १९९१ से २००१ तक पूरे उत्तराखण्ड परिक्षेत्र में ५९ गाँव पूरी तरह खाली हुए वहीं स्थापना के बाद २००१ से २००९ के केवल अकेले रुद्रप्रयाग जिले में ही २६ गाँव पूरी तरह खाली हो गए)
साभार- धाद से प्रकाशित कैलेण्डर २०१०.photo- sabhar

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