Saturday, September 11, 2010

चुनावी मेले में परिवर्तन के स्वर

          अब अपनी दुखियारी की रोज की भांज हुई कि वह अबके परिवर्तन को कांज के रहेगी। फरानी बुनावट में कुछ गेटअप जो नहीं। सो, वह तो उधड़नी ही होगी। कई चिंतामग्न भी दुखियारी की तरह इन सर्दियों में चिंता का अखाड़ा जलाकर बैठे होंगे और उनकी अंगेठी पर ‘परिवर्तन’ पक रहा होगा तन्दूरी मुर्गे की तरह। लेकिन, तासीर है कि बर्फ की तरह जम रही है।
खशबू सूंघते हुए जब मैंने भी तांकझांक कर संदर्भ को ‘टारगेट’ किया तो ‘परिवर्तन‘ के भांडे से कई तरह की ध्वनियां निकल रही थी। जैसे कि, परि- बर्तन, परि- बरतना व परि- वर्तनी आदि। ईलिंग-फलिंग, सभी तरह से कान बज रहे थे। संभव है कि, यह उच्चारण का दोष हो या फिर कह लो कि, मेरी गंवार भाषा का प्रभाव इन ध्वनियों से भ्रमित कर रहा हो। यह कानों का भ्रम या बुद्धि का फर्क भी हो सकता है।
मजेदार कि, जिन्हें उकसाया जा रहा है, वे पहाड़ों पर गुनगुनी धूप का आनन्द लेने में मशगूल हैं। वे किसी भी कबड्डी में सूरमा नहीं होना चाहते हैं। जबकि परिवर्तन के ‘ठाकुर‘ सतत् गर्माहट बरकरार रखने का घूंसा बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाकर ठोक रहे हैं।
खैर, जब बात पहले के मुकाबिल किसी बेजोड़, उन्नत और चमकदार बर्तन की होगी तो कोई खांटी लोहार ही जानता होगा कि, उसमें प्रयुक्त रांगा, नौसादर व धातु की कितनी मात्र टिकाऊ टांके का जोड़ रख सकती है, या फिर उसका हथौड़ा परिचित होगा कि कितनी दाब-ठोक थिचके-पिचके बर्तनों की डेण्ट-वेंट निकाल पायेगी। सो माजरा जब लोहार का है तो, फिलहाल ‘टेक्निकली‘ जमात भीतर बाहर सूरमा बन हथौड़ा लेकर परशुराम की शैली में हुंकार रही है। जनक कहौ.....। अपन तो ठेठ होकर ‘आंख‘ को ही खांचे में देख रहा हूं। फिलहाल गुमड़े तो अतिरेक में ओझल हैं।

अब यदि कृत्रिम प्रेक्षकों व विशेषज्ञों की मानें तो फराने, नये और संभावित ‘नयों’ की टंकार में कोई फर्क नहीं लगता। वे भरे हों या खाली तब भी एक सी आवाज आती है। हां, यदि शक फिर भी हो, तो किसी जलतरंग वादक की सेवा लेकर उनका परीक्षण किया जा सकता है।

कमाल की यह सारी कवायद उनके लिए हो रही है जिन्हें ये ही कल तक दूजे दर्जे का समझते थे। अतीत के ये ‘दूजे‘ किसी ‘तीसरे’ खोल़ा (मौहल्ले) में ‘घुंड्या रांसा’ लगाकर अवतरने की कोशिश में लगे हैं। उनका पश्वा भी आदेश की टेक के साथ नाच रहा है। मालूम नहीं कि, जब धारे का पानी झरेगा तब क्या ये अपनी गागर, कंटर, डब्बा भरने में ‘अगल्यार’ मार पाते हैं या फिर लाइन तोड़ शार्गिदों का शिकार होते रहेंगे।

जिनके द्वारा यह परिवर्तन बरता परखा जायेगा या जिनके समक्ष रैंप पर कैटवाक करने की कोशिश होगी। उन्हें ही मालूम है कि अब तक की पूजा पाठ और चार के आठ का क्या नतीजा रहा है। अगर परिवर्तन पर इन ‘सह-सवारों’ को देखा जाय तो इनकी सलवटें गवाह हैं कि अब तक ये निश्चिन्त होकर सोये हुए हैं।

फिर भी सवाल जस का तस कि बरतें किसे? यदि ‘वर्तनी’ की निगहबानी भी करें तो मतलब कितना निकलेगा। कांग्रेस भागा भाजपा बराबर भाजपा या भाजपा भागा कांग्रेस बराबर कांग्रेस अथवा कोई साम, दाम, बाम या दण्ड। या कि, इन्हीं में से कोई एक पेंदाहीन उदण्ड, जो परिवर्तन की वर्तनी को त्रिशंकु की मुद्रा में ले जायेगा और, परि-वर्तन का आशय फिर थिचक-पिचक कर अधमरा होकर रह जायेगा। या फिर हुं-हां की ‘सियार डुकर‘ की बदौलत प्रताड़ित होकर एक और संगमरमरी की दरकार तलाशेगा। ले- देकर तब तक गंगा जमुना के मुहानों से ग्लेशियर बहुत पीछे हट चुका होगा। तब ’डाम’ जैसी अवस्थापना के बाद सुखी गंगा में तड़पती मछली की तरह पुकारना होगा कि, मैं त यक्कि चुम्खि चैंद.....।

सो हे परिवर्तनकामी आत्माओं! आशय को साफ-साफ छापो ताकि यह ‘निरर्थक जन‘ वोट छपाई (चुनाव) के बड़े ‘कौथिग’ में निर्द्वन्द के रण-बण का जुद्ध जोड़ सके। और स्वयं के ‘जनार्दन‘ होने का भ्रम भी जीवित रख सके।

@Dhanesh Kothari

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