09 September, 2010

गिद्ध गणना का सच


अर्ली मॉर्निंग, मानों सूरज के साथ घोड़ों पर सवार खबरी मेरे द्वार पहुंचा। उसके चेहरे पर किरणों की तेजिस्वता की बजाय सांझ ढलने सी खिन्नता मिश्रित उदासी पसरी थी। उसकी मलिन आभा पर मैं कयास के गुब्बारे फुलाता कि, वह ‘फिदाइन’ सा फट पड़ा..... यहां चहुंदिशी गिद्ध ‘नवजात’ के गात (शरीर) पर डेरा जमाये हुए हैं। कई तो नोचने को उद्विग्न भी लगते हैं। किंतु फन्ने खां सर्वेयर गिद्ध गणना के जिन आंकड़ों को सार्वजनिक कर रहे हैं। उनमें नवजात पर झपटे गिद्धों की गणना कहीं शामिल ही नहीं है।

मैं कुछ समझता अथवा कुछ प्रतिक्रिया दे पाता कि, खबरी ने मुंह उघाड़ने से पहले ही जैसे मुझे पूर्णविराम का इशारा कर डाला। उसके अनुसार, यूके में गिद्धों की संख्या में उम्मीद से अधिक इजाफा हुआ है, सही भी है। यहां आंकड़ों में सामान्य प्रजाति के साढ़े तीन हजार, साढ़े सात सौ के करीब हिमालयी व मात्र अब तक छप्पन ही अनाम प्रजातिय गिद्ध हैं। क्या आंकड़े सरासर मैनेज किये हुए नहीं लगते? अब बताओ कि, नवजात के गात पर झपटे गिद्धों की संख्या इनमें शामिल है? नहीं न........।

यहां पर मैंने खबरी को रोका, भई इसमें निराश और खिन्न होने जैसी क्या बात है। माना कि गिद्ध गणना के आंकड़े मैनेज लग रहे हों, तब भी यह परिस्थितिकीय दृष्टि से शुभ ही हैं। शुक्र करो कि, ग्लोबल वार्मिंग के इस युग में इनकी महत्ता को समझा जा रहा है। वरना ये प्रकृति रक्षक तो अब तक अपने होने का अर्थ ही भूल चुके थे। क्या तुम नहीं चाहोगे, स्वच्छ पर्यावरण में स्वस्थ जीवन के चार दिन.......।
किसी सिंगल स्टार दारोगा कि भांति खबरी ने मुझे डपटा और मैं मनमोहन शैली में सहमकर चुप हो गया। उफनते गुस्से में उसने कहा, मैं बात कर रहा हूं आगरे की और तुम सुना रहे हो घाघरे की। अरे! मामूल सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग या फिर ग्लोबल भी होता तो मेरी जगह फट्टे में टांग देने के लिए अमेरिका पहले से ही खम्म ठोके हुए है, और अब ओबामा किल्ला उखाड़ने से रहा। उनसे ‘करार’ के चक्कर में हम आन्तिरिक ‘रार’ तक ठान बैठे हैं। मगर ग्लोबलिकरण से डिफरंट है यहां का सवाल। यों तो गिद्ध दुनिया भर में कई प्रजातिय हैं। लेकिन फिलहाल यह गणना यूके के गिद्धों की हुई है। जिन्हे सार्वजनिक भी किया गया है। जरा ठहरो! कहीं तुम इसे अंग्रेजों का यूके तो नहीं समझ रहे न। भई यह अपना यूके है।

आफ्रटर द ब्रेक के अंदाज में मैं खबरी को रोकता कि, वह लालू एक्सप्रेस की तरह धड़धड़ाते हुए निकला चला गया। बोला, जिन गिद्धों की गणना न होने का मैं जिक्र कर रहा हूं। वे ‘यूके’ के जल, जंगल, जमीन और जनमन पर ढुके हुए गिद्ध हैं। इनमें क, ख, ग, घ, से लेकर चिड़या बिठाऊ, फाइल दबाऊ, फाइल सरकाऊ, खादी प्रजातिय, नेकर प्रजातिय, टाई प्रजातिय, नॉलेज हबीय, वाइन ठेकीय, आयोगीय, आरोगिय, दारोगिय इत्यादिय कई श्रेणियां मौजुद हैं। हालांकि यह मेरी ‘एक्सकलूसिव’ मुल्कि खोज है, सडनली! एक्सेट्रा खोज के लिए तो फिर ‘वास्कोडिगामा’ जैसा कोई चाहिए। या इस दिशा में सांइसदानों को प्रेरित किया जा सकता है। सर्वेयरों के भरोसे तो आजादी से पहले से अब तक ‘कर्णप्रयाग’ रेल नहीं पहुंची।

तब दे दनादन छक्कों की बरसात करते इस यूवी को मैंने थर्ड अंपायर की तरफ इशारा कर रोका, और उसे यूके के संसाधनों, संभावनाओं का रिकार्ड दिखाते हुए कहा, यहां की ‘उर्वरा’ में पोषण के सर्वाधिक मिनरल्स और जिंक मौजुद हैं। दोहन के लिए अनुदानिय एक्सेट्रा बजट है। अवस्थापनाओं की मजबूर जरूरत है, पर्याप्त स्पेस है। विदेश दौरों से प्राप्त ज्ञान है। जल है, जंगल है, जमीन है, जन है। यहां तक कि नई पीढ़ी का भविष्यगत विचार भी है।
खबरी ने कुछ मुंह खोलना ही चाहा कि, मैंने लेफ्ट राइट थम्म जैसा उद्घोष कर खबरी को फिर रोका। यदि यहां गिद्धों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि दृष्टिगत है तो ‘शुभस्य शीघ्रम’। अब खबरी का आपा ज्वार भाटा सा हिलोर मार गया। बाबू मोशाय! आकाश में मंडराते गिद्धों की गिनती से ‘पहाड़ा’ नहीं सीखा जाता है! सही फिगर तो धरती पर एक-एक गिद्ध को ‘टैग’ कर ही आयेगी। प्राकृतिक गिद्ध तो अब विलुप्त प्रजातिय हो चुके हैं। मगर कृत्रिम गिद्धों की पीढ़ी से तो काली का खप्पर भी मिनट से पहले भर जायेगा। खबरी के ह्यूमर पर मैं अव्यक्त रूप से ही सही, किंतु गदगद था। सो, उसकी खिन्नता भी लाजमी है।

@Dhanesh Kothari

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