Monday, September 06, 2010

बे - ताल चिंतन

         काल परिवर्तन ने अब बेताल के चिंतन और वाहक दोनों को बदल दिया। आज वह बिक्रम की पीठ पर सवार होकर प्रश्नों के जरिये राजा की योग्यता का आंकलन नहीं करना चाहता। बनिस्पत इसके बेताल अब ‘हरिया‘ के प्रति अधिक ‘साफ्रट‘ है। हरिया जो ‘लोकतंत्र’ में भी राजा की प्रजा है।

हरिया से बेताल की निकटता आश्चर्य भी नहीं। क्योंकि, राजा अब कभी अकेला नहीं होता। न ही वह कभी एकान्त निर्जन में भ्रमण पर निकलने का शौक रखता है। दोनों के बीच सुरक्षा का एक बड़ा लश्कर तैनात है। जो बगैर इजाजत धुप को भी राजा के करीब नहीं फटकने देता। ताकि साया भी पीछा न कर सके। राजा अपनी मर्जी के रास्तों पर चलने की बजाय सचिवों के बताये अफर तय किये रास्तों पर ही सफर करता है। इसीलिए सचिवों ने आतंकवाद खतरा खड़ा कर फलीट के रास्ते में आने वाले सारे ‘बरगद‘ के पेड़ों को कटवा दिया है। ऐसे में यदि कभी राजा के अनुत्तरित हुआ तो भी बीच रास्ते से बेताल फुर्र भी नहीं हो सकता। यही नहीं आज राजा से संवाद का रिश्ता भी खत्म हो चुका है। क्योंकि राजा की भाषा और जुबां को भी सचिव ही तय करते हैं। सो बेताल को बार-बार राजा के करीबी होने का सबूत देना और मिलने की स्वीकृति लेना भी अच्छा नहीं लगता।

..........और, बेताल अपनी आजादी के इस हक को महज इसलिए हलाक नहीं होने देना चाहता कि राजा को प्रजा से ही खतरा है। जैसा कि मान लिया गया है। लिहाजा अब राजा से बेताल की अपेक्षायें भी खत्म हुई। सो राजा की पीठ का मोह छोड़ना बेताल के लिए लाजमी था। किंतु सवार होने की आदत से कैसे छुटकारा पाये। तो बेताल ने अपने चिंतन और वाहक दोनों को ही बदलने में भलाई समझी। रास्ते अलग-अलग मंजिलें जुदा-जुदा।

इस लिहाज से देखें तो आज भी दबी जुबां में ही सही हरिया मुंह फट्ट है। हरिया की साफगोई बेताल को भाने लगी है। नतीजतन इन दिनों हरिया के ‘दो जून के जंगल‘ में विस्थापित बेताल अक्सर हरिया की पीठ पर जंगल से उसके गांव, उसके घर और शहर तक बनिये की दुकान का दौरा कर आता है। जहां से हरिया हमेशा लाला की चिरौरी कर उधार राशन गांठ ही लाता है।

राजा से विरक्त बेताल हरिया की हाजिर जवाबी का कायल होकर इस भ्रमण में आधुनिक सदियों के परिवर्तन की तमाम जानकारियां उससे संवाद स्थापित कर जुटा लेता है। संवाद के इस दौर में हरिया बेताल के बोझ को तो महसूस करता है। परन्तु उसका चेहरा, कद, काठी नहीं जानता। बस्स! ढोने की आदत के चलते बेताल को भी लादे हुए है। हां, बचपन में मुंहजोरी कर दादा से बेताल की कुछ कहानियां जरूर सुनी थी उसने। इसलिए बेताल भी उसके सामने अपने दौर की कथाओं को नहीं दोहराता है। बल्कि वर्तमान से ही तारतम्य जोड़कर कहानी बुनता है, और हरिया के सामने कई ‘ऑबजेक्टिव‘ प्रश्न खड़े कर देता है। हां निश्चित ही यह भी कि, वह हरिया से उसे ‘एक दिन का राजा‘ बना देने जैसा हाइकू सवाल कभी नहीं पूछता। न ही यह कि, उसकी दो जून की ‘रोटी‘ के प्रति राजा का नजरिया क्या है।

यहां बेताल किसी बौद्धिक समाज का प्रतिनिधित्व भी नहीं करता। जिनके के मूक आखरों में कभी क्रांति की संभावनाओं को तलाशा जाता था। क्योंकि वह जान चुका है कि, यह वर्ग भी राजा के अनुदानों पर जीने का आदी होकर जंक खा चुका है। राजा के सवालों का जायज उत्तर देने के बजाय वे कुटनीतिक तर्कों में उलझकर रह गये हैं।

आज हरिया की पीठ का आसरा मिलने के बाद राजा से अपने पूर्ववर्ती रिश्तों के प्रति बेताल की भी कोई आसक्ति नहीं। हां अब हरिया को उलझाये रखने पर वह अवश्य ही कई बार अपनी पीठ ठोकता है। जबकि इधर राजा और बेताल में साम्य समझकर हरिया दोनों को ढोने की नियति से आज भी उबा नहीं है।

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

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